मंगलवार, 19 अक्तूबर 2010

जीवन के जमीनी संघर्ष की उपज मुनिला :'माटी कहे कुम्हार से'



 

उपन्यास और कहानी की सार्थकता इस बात पर निर्भर होती है कि वे सामान्य जनजीवन से जुड़े हों ; तथा आम आदमी के सुख-दुःख की अनुभूतियों को साथ लेकर चलें। ’ माटी कहे कुम्हार से ’(2006 ) कथाकार मिथिलेश्वर का ऎसा ही उपन्यास है । झोपड़पट्टियों में समाज के हाशिए पर स्थित जीवन की तल्ख सच्चाई से प्रारभं इस उपन्यास की कथावस्तु इक्कीसवीं सदी के भारतीय गाँवों की बेबाक पड़ताल करते हुए शहर में पहुँचकर शहरी समाज की अंतर्कथा प्रस्तुत करती है।

कथा का प्रारंभ इस वाक्य से होता है

-"इस गूँगी छोरी ने हमें कहीं का नहीं  रहने दिया , हम इसे सोझिया बुझते थे , सोझिया बाछी ही लुगा चबाती है......इसने तो सारी मर्यादा मिट्टी में मिला दी ......इसे घटिया कर देना  ( दो लाठी के बीच में गला दबाकर मार देना )ठीक रहेगा |"(पृ.7 )  

कहानी जन्मजात गूँगी ब्राह्मणी कलावती और यदुवंशी बिसुनदेव की है । पिता द्वारा मुहमाँगा दहेज देने पर भी कलावती के लिए अच्छा घर-वर नहीं मिल पा रहा था , लोग साफ कह देते सब कुछ तो ठीक है , लेकिन लड़की गूँगी है । कलावती सिर्फ जुबान की गूँगी थी, लेकिन रूप रंग के मामले में एकदम खिली हुई फूल सरीखी । शादी की प्रतीक्षा में उसकी उम्र बढ़ती चली गई और  अपने घर में दूध लाने वाले बिसुनदेव के संर्पक में वह कब आ गई, पता ही नहीं चला । इस बात की भनक परिवार के लोगों को तब लगी जब कलावती गर्भवती हो गई । परिवार वालों का एक ही निर्णय था - कलावती को खत्म कर दिया जाए । न रहेगा बाँस न बजेगी बाँसुरी ! माँ की आरजू मिन्नत पर परिवार वाले निर्णय बदलकर  कलावती के गर्भपात के लिए राजी हो जाते हैं । लेकिन यह क्या ! रात के सन्नाटे में माँ की बगल में सोई कलावती को अपनी पीठ पर लाद बिसुनदेव छत के रास्ते चम्पत हो गया, घर के लोग माथा पीटते रह गए । पुनः घर के लोगों ने यह सोचकर अपने आप को ढाढस  बँधा लिया कि अच्छा हुआ कुलबोरन कुपातर लड़की चली गई, माथे का कंलक टल गया । इधर बिसुनदेव कलावती को लेकर भागते-छिपते नरही नामक झोपड़पट्टी में पहुँचता है । संभवतः इस झोपड़पट्टी में उसी की तरह फरार, विवश और विस्थापित लोग आ बसे थे । उन सब लोगों ने कलावती और बिसुनदेव को हाथोंहाथ उठा लिया । नरहीवासियों के सहयोग से बिसुनदेब झोपड़ीनुमा एक कमरा बनाकर झोपड़पट्टी के अन्य लोगों की तरह रोज मजदूरी कर कलावती का भरण-पोषण करने लगा । 

एक दिन बैसाख की उमस भरी रात में कलावती ने एक बच्ची को जन्म दिया । जहाँ रूप रंग में वह अपनी माँ कलावती पर गई थी, वहीं डील डौल में अपने पिता बिसुनदेव पर । नरही की औरतों ने यह कहते हुए स्वागत किया-’मुन्नी आई है लक्ष्मी आई है ।’ जब मुन्नी चलने -फिरने लगी कलावती भी बिसुनदेब के साथ झोपड़पट्टी की अन्य लुगाइयों की तरह काम पर जाने लगी । इधर कलावती की भनक उसके परिवारवालों को लग चुकी थी । उन्होंने जागा और तेगा नामक भाड़े पर हत्या का काम करनेवाले हत्यारों को कलावती की हत्या करने भेजा।

धान की कटनी में मशगूल कलावती इस बात से बिल्कुल अनभिज्ञ थी कि राहगीर की शक्ल में मौत जाल बिछाए खड़ी है। जल्लादों ने निशाना साध कर गोली कलावती के सीने में दाग दी । कटिहारिनें चीखने चिल्लाने लगीं -

" अरे बाप रे बाप ! मार देलन स हरामी ! धावजा हो पकड़ जा हो .....भागल जा तरसन ।" (पृ.12 )

 हँसती बोलती कलावती क्षणभर में लाश का ढेर  बन चुकी थी । बिसुनदेव तो जैसे आपे में नहीं रहा । उसके ऊपर  हत्या की धुन सवार हो गई । अन्त्येष्टि समाप्त होते ही उसने झोंपड़पट्टी की एक वृद्ध औरत रमला काकी के जिम्मे मुन्नी को सौंप दिया और चल पड़ा हत्यारों की तलाश में । जल्दी ही बिसुनदेव को टोह मिल गई, दोनों ही हत्यारे उसी के गाँव के हैं । एक दिन बिसुनदेव को अनुकूल अवसर मिल गया। दोनों शैतान जागा और तेगा गाँव से दूर अपनी छावनी में रंगरलियाँ मनाने आए थे । मौका पाते ही बिसुनदेव ने पहले तेगा को ढेर किया फिर जागा को । लेकिन बिसुनदेव भी नहीं बच सका । जागा की  गोली का शिकार हो गया । दूसरे दिन गाँव के लोगों ने अभिभूत होकर बिसुनदेव के सच्चे प्रेम की चर्चा की । लोगों ने कहा उसने अपनी पत्नी की  हत्या का बदला ले लिया। 

इधर मुन्नी इतनी भी छोटी नहीं थी कि वह अपने माई बाबू का मरना न जान सके । बुढ़िया दादी ही मुन्नी के लिए सब कुछ थी । लेकिन मुन्नी की बाल आसक्ति पर उसकी नियति निर्धारित नहीं थी। एक रात जाड़ा देकर बुखार लगने से बुढिया दादी भी चल बसी । रोती बिलखती मुन्नी को झोपड़पट्टी की हमउम्र लड़कियों ने सहारा दिया; ढाढ़स बँधाया । अब उन लड़कियों के साथ मुन्नी भी रोपनी - कटनी तथा रोज मजूरी के काम पर जाने लगी । अपने रूप रंग में अनूठी, झोपड़पट्टी की लड़कियों से अलग, मुन्नी वहाँ के लड़कों के लिए आकर्षण की केंद्र थी । लड़के अपनी  तरफ उसका ध्यान आकर्षित करने के लिए उसके साथ हँसी - मजाक तथा छेड़छाड़ करते थे । लेकिन इनके बीच रहते हुए भी मुन्नी तटस्थ एवं निर्विकार रहती थी । 

एक दिन वैशाख की अलसायी भोर में सुबह चार बजे मुन्नी जब गंगा में नहा रही थी तभी उसकी टोह में छुपा करमचंद उसे बलात्कार के इरादे से घसीटता हुआ जंगल में ले गया ।  पिता बिसुनदेव के खून का असर क्षणभर में मुन्नी को हिंसक बना गया  । पास पड़े हुए पत्थर के टुकड़े से मुन्नी करमचंद केऊपर क्रुद्ध सिंहनी की भाँति प्रहार करती है, करमचंद का सिर फट जाता है । करमचंद ने सपने में भी नहीं  सोचा था कि मुन्नी ऎसा सख्त प्रतिकार और तीखा प्रहार करेगी । उसे लगा था कि वह मान मनौवल वाली छोरी है । 

झोंपड़पट्टी में संभवतः इस तरह की यह पहली घटना थी । लेन देन उधार पेंच के मामले में वहाँ झगड़े होते रहते थे । पर छोरा-छोरी, मर्द-लुगाई का मामला कभी सामने नहीं आया था । यह विस्थापितों का समाज था । जाति-धर्म के बंधनों से मुक्त जीने की चाह में अपने समाज से निष्कासित या फरार जोड़े ही यहाँ पहुँचते थे । यहाँ का रिवाज था छोरा-छोरी बड़े होने पर स्वयं अपना जोड़ीदार ढूँढ लेते या कभी -कभी दूसरे या तीसरे जोड़ीदार को भी आजमाते । उनके लिए यह तुच्छ मामला था और इस पर वे कभी बवाल खड़ा नहीं करते थे । यहाँ एक दूसरे के प्रति एकनिष्ठता के लिए कोई सामाजिक दबाव नहीं था यह उनकी आंतरिक प्ररेणा पर निर्भर करता था । यह उन्मुक्त समाज था । यहाँ जोर  जबरदस्ती की कोई गुंजाइश नहीं थी। ये सब बातें यहाँ के समाज में सर्वसुलभ तथा सहज थी । 

"मुन्नी ने इस सहजता को झटका दिया था और करमचंद ने इसे ज्यादती का रूप  दिया था ।" (पृ.सं.23 ) 

इस घटना के बाद मुन्नी की दुनिया  काम से लौटने पर अपनी झोपड़ी में ही सिमट गई । एक पेट के लिए अलग से खिचड़ी पकाती जो बच जाता उसे पड़ोसियों तथा बच्चों में बाँट देती ।

" आदमी अकेले आता है अकेले ही जाता है फिर अकेलेपन से क्या भागना।"(पृ.सं.26 )

भगवान ने ही उससे उसके माय बाबू को छीन लिया, यह सोचते हुए मुन्नी दरवाजा बंद करने आगे बढ़ी । ठीक उसी क्षण बाहर से भागता हुआ अधेड़ पैंतीस - चालीस साल का व्यक्ति आकर मुन्नी से याचना करने लगा मुझे छिपा लो, मेरे दुश्मन मेरा पीछा कर रहे हैं । उस व्यक्ति के आकस्मिक आगमन पर मुन्नी हतप्रभ तथा मौन रह गई । आंगतुक झट से झोपड़ी में आकर दरवाजा बंद कर लेता है। खतरा टलते ही वह व्यक्ति बाहर आता है, मुन्नी का  धन्यवाद करते हुए अपनी कहानी सुनाता है कि वह कोई चोर बदमाश नहीं । पट्टीदार का झगड़ा है ,  चचरे भाइयों ने उसके  पूरे परिवार का संहार कर दिया है । अब वे उसे मारना चाहते हैं , ताकि उसके  हिस्से की  जायदाद उन्हें मिल जाए । उनमें से दो को तो वह मार चुका है,  बाकी जो बचे हैं वे उसकी टोह में हैं । पुनः वह मुन्नी से पूछता है कि वह यहाँ अकेली क्यों हैं ?

 ''मुन्नी कहती है -मेरे माय बाबू मर गए । कोई भाई बहन नहीं है । बाहर बारिश थम चुकी थी , उसने विदा लेते हुए मुन्नी से कहा , तूने मेरी जान बचाई ; कभी तेरे काम आ सका तो अपने आप को धन्य मानूँगा ।"(पृ.सं.29)

दो सप्ताह बाद मुन्नी इस घटना को लगभग भूल चुकी थी, लेकिन वह आगुंतक पुनः थैले में कुछ फल और मिठाइयों  के साथ आ धमकता है। मुन्नी को उसका आना अच्छा नहीं लगा । तत्क्षण उसने कहा, अब मैं चलूँगा । पुनः वह पलट कर पूछ बैठा -तेरा नाम क्या है? जवाब में वह बोल उठी , मुन्नी । इस पर वह भी झट से बोल उठा- मेरा भी नाम मुनीलाल है। बरसात का समय आ चुका था, इस बार गंगा में आई बाढ़ हर साल की अपेक्षा ज्यादा तबाही और विनाशलीला लाई । मवेशियों तथा आदमियों के मरने से झोंपड़पट्टी में महामारी फैल गई ।  जिउत , फिर भीखू तथा नरपत महामारी की चपेट में आकर काल के गाल में समा गए । झोंपड़पट्टी के बुजुर्गों ने वहाँ की रीत के अनुसार सीतला मइया को दारू  की बोतल ढार कर एक मुर्गे की बलि दी । उनका मानना था कि सीतला मइया के प्रकोप से ही बस्ती में महामारी फैली है । जो बचेंगे सो बचेंगे, नहीं  बचने वाले सीतला मइया की सवारी बन जाएँगे । मुन्नी भी दुर्भाग्यवश इस बीमारी के चपेट में आ गई । अपने बचने की आस छोड़ चुकी मुन्नी के लिए मुनीलाल देवदूत बनकर प्रकट होता है । वह जबरदस्ती शहर के अस्पताल ले जाकर मुन्नी का इलाज करवाता है। अब मुन्नी रोगमुक्त हो चुकी थी तथा मुनीलाल अपने उद्देश्य में सफल | झोंपड़पट्टी की  परंपरा के अनुसार सीतला मइया के पास जाकर शादी कर दोनों विधिवत पति पत्नी बन जाते है । मुन्नी अब मुनिला बन चुकी थी  

अचानक एकदिन मुनीलाल के दुश्मन उसे ढूँढ़ते हुए नरही पहुँच जाते हैं । मुनीलाल मुनिला के साथ वहाँ से पलायन कर झाबुआ पहुँच जाता है । मुनिला के झाबुआ के प्राथमिक स्कूल में दाई का काम मिल जाता है , तथा मुनिलाल को रिजवान साहब के आटा मिल में नौकरी मिल जाती है । जहाँ मुनिला अपने काम से स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों तथा शिक्षकों तथा बच्चों का दिल जीत लेती है, वहीं मुनीलाल भी अपनी ईमानदारी से रिजवान साहब तथा गाँववालों के बीच काफी लोकप्रिय हो जाता है । 

इसी बीच शांत तथा एकांतप्रिय झाबुआवासियों के बीच शरद तथा पवन जैसे नेताओं की आवाजाही बढ़ती है । ये नेता कभी गाँव के विकास के नाम पर तो , कभी किसी का स्मारक बनाने के नाम पर जबरन गाँववालों से चंदा उगाही करते हैं । रिजवान साहब द्वारा विरोध किए जाने पर भाडे के डकैतों को उनका घर लूटने के लिए भेज दिया जाता है । रिजवान साहब की जान बचाते हुए मुनीलाल शहीद हो जाता है । रोती बिलखती मुनिला को स्कूल का मास्टर रमन अपने गाँव बजरंगपुर ले जाता है, जहाँ उसके रिटायर दादा सुमेरसिंह जमीन जायदाद की देखभाल के लिए अपना भरापूरा परिवार पटना में छोड़कर अकेले गाँव में शिवबचन के सहारे जीवन गुजार रहे थे । रमन अपने दादा को मुनिला की विडंबनापूर्ण गाथा सुनाता है । दादा कहते हैं-अच्छा किया जो इसे यहाँ ले आया । सुमेरसिंह के घर में रहते हुए मुनिला को लगभग तीन महीने बीत चुके थे । मुनिला अब धीरे-धीरे मुनीलाल तथा झाबुआ को भूल रही थी । लेकिन होनी को तो कुछ और मंजूर था , पत्नीविहीन तथा अपने एकाकीपन से त्रस्त सुमेरसिंह मुनिला को मालकिन बनाना चाहते थे । 

इधर स्वार्थी नेताओं द्वारा जातिवाद का नारा बुलंद किए जाने से बजरंगपुर भी सत्तालोलुप अवसरवादियों  की स्वार्थसिद्धि का अड्डा बन गया था। गाँव में आए दिन रणवीर सेना तथा भूमिहीन सेना आमने सामने भिड़ने लगी । सुमेरसिंह तथा उनके जैसे अन्य लोग गाँव के बदले राजनीतिक हालात से दुःखी रहने लगे । 

उधर मुनिला ने सुमेरसिंह को समझाना चाहा कि नौकरानी तथा मालिक का यह संबंध ठीक नहीं । लेकिन सुमेरसिंह का मानना था कि अच्छा बुरा कुछ नहीं होता -

"जो अपने सामर्थ्य से अपने को मजबूत बनाए रखता है । लोग उसकी तारीफ करते है , और जो कमजोर पड़ता है उसकी आलोचना करते हैं ।"(पृ.सं. 36 ) 

 सुमेरसिंह मुनिला को भरोसा दिलाते हैं कि परिवारवाले उन्हें रोकने टोकने की हिम्मत नहीं करेंगे । उन्होंने अपना खेत खलिहान सबकुछ मुनिला के नाम लिखने का आश्वासन भी दिया । दोनों मर्यादा के बंधन को दरकिनार कर बाँध तोड़कर बहने वाली उफनती नदी बन चुके थे ।  मुनिला में शारीरिक परिवर्तन शुरू  हो चुका था । सुमेरसिंह को जिस बात का डर था आखिर वह सच ही निकला , मुनिला गर्भवती थी । सुमेरसिंह को लोकलाज की चिंता खाए जा रही थी । लोग क्या कहेंगे ! इस अधेड़ उम्र में ! उन्होंने मुनिला को समझाने बुझाने की कोशिश की , लेकिन मुनिला बच्चे को जन्म देने की जिद पर अड़ी रही । अड़े भी क्यों न ! आखिर यह उसका पहला बच्चा  जो था । इधर गाँव के लोगों ने पटना फोन पर सुमेरसिंह के बेटे बहू को सारी बातों की जानकारी दे दी । बेटा बहू रविवार को गाँव आने वाले थे, भय से सुमेरसिंह की हालत बिगड़ती जा रही थी । शनिवार की रात अचानक सुमेरसिंह की तबियत बहुत ज्यादा बिगड़ी । उनके सीने में तेज दर्द उठा, रात के एक बजे ह्रदयगति रुक जाने से सुमेरसिंह की मृत्यु हो गई । मुनिला को जैसे काठ मार गया | एक क्षण तो वह किंकर्तव्यविमूढ़ बनी रही । कुछ देर तक सुमेरसिंह के शरीर पर विलाप करने के बाद अचानक मुनिला ने तंद्रा से जागकर शिवबचन से कहा - " काका इस कायर के बच्चे को अब एक क्षण भी अपने पेट में नहीं रहने दूँगी । इसका बेटा बहू इसे डाँटने आ रहे थे , इस डर से यह मर गया । इस डरपोक का बच्चा हमें नहीं चाहिए । "(पृ.सं.296)   बदहवास सी दौड़ी मुनिला | उसके पीछे शिवबचन भी दौड़ा । सिलवट लोढ़े पर पेट के बल जा गिरी । मुनिला बेहोश हो चुकी थी , शिवबचन की निगाह मुनिला की साड़ी पर पड़ी । साड़ी खुन से रंगती जा रही थी ।  मुनिला का गर्भपात हो चुका था । सुबह होते हीं सुमेरसिंह के बेटे बहू भी आ पहूँचे । उन्होंने शिवबचन से पूछा - मुनिला कहाँ है ? शिवबचन ने कहा - उसका गर्भपात हो चुका है । बेटे बहू ने राहत की साँस ली । पुनः शिवबचन ने निवेदनपूर्वक कहा - बबुआ जिस जीप से मालिक को अंत्येष्टि के लिए लेकर जा रहे हो उसी जीप से मुनिला को शहर में डा. रजिया रेहान के अस्पताल में डाल देंगे| पता नहीं बेचारी बचेगी भी या नहीं ? शिवबचन काका की बात मानकर सुमेरसिंह के बेटे बहू ने मुनिला को अस्पताल पहुँचा दिया । 

यहाँ से मुनिला की जिंदगी की दूसरी पारी की शुरूआत होती है । मुनिला का अपना कहने वाला कोई आगे पीछे बचा नहीं था । उसे  जिंदगी से अब क्या चाहिए था ? दो जून की रोटी और छत, जो उसे डा.रजिया रेहान के यहाँ नौकरानी का काम करते हुए मिल चुकी थी । लेकिन यहाँ मुनिला ने जिंदगी की दर्दनाक सच्चाइयों का सामना किया । मुनिला ने देखा ने झुग्गी बस्तियों में रहने वाले लोग जिस डा. रजिया रेहान को भगवान समझते हैं, वह डाक्टर तो पैसों के हाथ मजबूर शैतान थी जिसका दीन, धर्म, ईमान पैसा-पैसा सिर्फ पैसा था, भले ही मरीज पैसे  के अभाव में दम क्यों न तोड़ दे । 

मुनिला का मन रजिया रेहान की बनावटी झुठी दुनिया से ऊब चुका था । अब वह वहाँ एक पल भी रुकना नहीं चाहती थी । लेकिन शहर में जिन - जिन घरों में मुनिला को काम करने का मौका मिला वहाँ कहीं दहेज के लिए लालची सास और ननद का बहू पर अत्याचार तो कहीं बेटी के हिस्से का प्यार बेटे को मिलते देखा । कहीं पाई - पाई के लिए तरसते हुए बूढ़े माँ-बाप देखने को मिले । शहर की इस झूठी शान - शौकत तथा मुखौटे -वाली दुनिया से मुनिला को नफरत हो चली थी । मुनिला को अपनी झोपड़पट्टी तथा छल प्रपंच से अछूते वहाँ के लोगों की याद आई । 

इसी क्रम में मुनिला को एक सरकारी अफसर के घर में काम करने का मौका मिला । बाहर से यह घर जितना सादा था अंदर से उतना हीं कुबेर का खजाना । घर की मालकिन हीरे जवाहरात से नख से शिख तक लदी रहती थी । इन लोगों का आस पड़ोस से कोई संबंध नहीं था । घर में नौकर के नाम पर सिर्फ दो लोग थे, एक लंगड़ा शामू, दूसरी मुनिला । घर के बाहर का काम मालिक का साला धीरज तथा रसोई का काम उसकी पत्नी देखती थी । एक दिन मालकिन के बीमार पड़ने पर जब मुनिला पौधों को पानी देने लगी तो उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं । सोने के बिस्कुटों से गमला भरा हुआ था । फिर उसने देखा , मालकिन के पुजा घर में आसन के नीचे गुप्त दरवाजा था । दरवाजा खोलने पर मुनिला की आँखें फटी की फटी रह  गई । उसने देखा , अंदर एक तहखाना है जो नोटों से भरा पड़ा है । अचानक एक दिन मालिक के घर में एंटी करप्शन वालों का छापा पड़ता है । धीरज जो स्वयं गुंडा बदमाश है सारा दोष शामू पर लगा देता है तथा रात में शामू को मार कर गायब कर देता है । जब मुनिला शामू के बारे में मालकिन तथा धीरज से पूछती है तो  दोनों गोलमटोल जबाव देते हैं । मुनिला का शक यकीन में बदल जाता है कि इन लोगों ने शामू की हत्या कर दी है । मुनिला ठान लेती है कि वह इन हत्यारों को नहीं छोड़ेगी और शामू को इंसाफ दिला कर रहेगी । 

 छापेमारी के समय मुनिला जनहित सेवा दल के गगन बिहारी का नाम सुन चुकी थी। मुनिला सीधे जनहित सेवा दल के आफिस पँहुचकर एस.के सिंह के घर में रखे गुप्त धन की जानकारी उन लोगों को देती है । गगन बिहारी विपक्षी दल के नेता थे । उन्हें पता था कि वर्तमान मुख्य्मंत्री के राजस्व मंत्री तथा उसके अधिकारी सरकारी खजाने का दुरुपयोग कर रहें हैं । लेकिन उनके हाथ में कोई ठोस सबुत नहीं था । मुनिला के रूप में सबूत  उनके हाथ लग चुका था । गगन बिहारी अवसरवादी राजनेता थे । वे इस अवसर को हाथ से जाने देना नहीं चाहते थे । उन्होंने पुलिस अधिकारियों का एक दल तथा मुनिला को लेकर स्वयं एस.के सिंह के घर पहुँच मुनिला द्वारा बताई गई जगहों पर छापेमारी की । एस.के सिंह के घर से बरामद संपत्ति देखकर सबकी आँखें फटी रह गईं । पुलिस के साथ मीडिया  भी था । मुनिला रातों रात स्टार बन चुकी थी । 

दूसरे  दिन सभी समाचार पत्रों के मुख्य पृष्ठ पर मुनिला छाई हुई थी । मुनिला अब अपने बस्ती लौट जाना चाहती थी । उसका काम खत्म हो चुका था । शामू की   हत्या का बदला वह ले चुकी थी । गगन बिहारी अच्छी तरह समझते थे । उनके हाथ हुक्म का इक्का लग चुका था । मुनिला झोपड़पट्टी से संबंधित थी तथा  दलित थी । गगन बिहारी को लगा, मुनिला उनके राजनीतिक भविष्य के लिए लंबी रेस का घोड़ा है । उन्होंने समझ बूझ कर पार्टी कार्यालय में मुनिला के रहने की व्यवस्था करवा दी । पार्टी कार्यकर्त्ता शारदा दीदी को मुनिला की देखभाल की जिम्मेदारी सौंप दी गई । अगले दिन सुबह पत्रकारों के साथ मुनिला का इंटरव्यू था । गगन बिहारी परेशान था कि पत्रकार कहीं मुनिला से कुछ उल्टा सीधा न पूछ बैठें । मुनिला ने गगन बिहारी को आश्वस्त किया- आप चिंता न करें । पत्रकारों के प्रश्नों का मुनिला को  पके नेताई अंदाज में एकदम सटीक जबाव देते देख पार्टी के लोग भौंचक्के रह गए । 

राजस्व तथा विभागीय अधिकारियों के इतने बड़े घोटाले का पर्दाफाश होने पर मुख्यमंत्री को इस्तीफा देना पड़ा । चुनाव सामने था । गगन बिहारी मुनिला को हर चुनावी भाषण में पार्टी के एजेंडा को ध्यान में रखते हुए भाषण देने को कहते लेकिन निडर मुनिला वही बोलती जिसमें जनता की भलाई थी । गगन बिहारी तथा पार्टी के कार्यकर्त्ताओं  को यह बात नागवार  गुजरी|  उन्होंने मुनिला को समझाने को बहुत कोशिश की लेकिन मुनिला नहीं मानी । पार्टी छोड़ कर चले जाने के भय से उन्होंने मुनिला पर कोई कार्रवाई नही की । "गगन बिहारी यह अच्छी तरह समझ चूके थे कि राजनीति में उसीका महत्त्व सर्वोपरि होता है जिसके पास जनाधार हो ।"(पृ.सं. 495) अब यह जनाधार मुनिला के पास था  | अपने राजनीतिक जीवन में गगन बिहारी को पहली बार पछाड़ खानी पड़ी थी, वह भी एक मामूली सी महिला के हाथों ।

मुनिला को गगनबिहारी के संसदीय क्षेत्र बिसनपुरा में चुनावी सभा को संबोधित करना था । बिसनपुरा में चारों तरफ मुनिला जिंदाबाद के नारे लग रहे थे। संचालक महोदय सभी को मंच पर एक एक कर अपने विचार व्यक्त करने के लिए बुला रहे थे लेकिन भीड़ बार बार ’मुनिला को बुलाओ ’ की जिद पर अड़ी थी । सबसे अंत में जैसे ही मुनिला ने भीड़ को संबोधित करना शुरू  किया, भीड़ से ही दो गोलियाँ धाँय-धाँय करते हुए मुनिला की  छाती को भेद गईं। खून से लथपथ मुनिला वहीं ढेर हो चुकी थी। भीड़ नेतृत्व विहीन, हिंसक और बेकाबू हो चुकी थी। भीड़ ने माँग रखी- जब तक प्रधानमंत्री खुद नहीं आएँगे हम मुनिला का दाह संस्कार नहीं होने देंगे । मुनिला की जघन्य  हत्या से मुनिला के असली हमदर्द उद्विग्न और उद्वेलित थे । 

घटना को तीन दिन बीत चुके थे, प्रायः सभी अखबारों के मुख्य पृष्ठ का मुख्य विषय मुनिला की हत्या से संबंधित था । इसी बीच राज्य के एक प्रसिद्ध समाचार पत्र ने मुनिला अंक जारी कर उसके समग्र जीवन संघर्ष को जनता के सामने रखा; साथ ही हत्या का धमाकेदार खुलासा भी! इस खुलासे के अनुसार ’जनहित सेवा दल ’ के गगनबिहारी ने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर मुनिला की हत्या के लिए विपक्षी पार्टियों को कसूरवार ठहराते हुए इसे  ’ जघन्य अपराध और कायरतापूर्ण ’ कदम बताया तथा इसकी न्यायोचित जाँच की माँग की । दूसरी ओर विपक्षी पार्टियों ने भी प्रेस विज्ञप्ति जारी कर इस बात का खुलासा किया कि स्वयं गगनबिहारी ने मुनिला की हत्या कराई। मुनिला के जनाधार के समक्ष वे बौने हो चुके थे, अध्यक्ष और नेता का पद उनके हाथ से फिसलता दिखाई पड़ रहा था । उनके गलत  मुद्दों की सरेआम मुनिला धज्जियाँ उड़ा रही थी । वे चाह कर भी इसे रोक नहीं पा रहे थे। इस स्थिति  में सुनियोजित साजिश के तहत उन्होंने हीं उसकी हत्या कराई । गगन बिहारी के ऎसे घातक और छलपूर्ण कदम को विपक्षी पार्टियों ने ’लोकतंत्र की आत्मा के साथ बलात्कार ’ बताते हुए इस घटना की जाँच सी.बी.आई. से कराने की माँग की । इन दोनों खुलासों के अतिरिक्त एक तीसरा खुलासा भी कुछ समर्थकों ने किया । इस तीसरे खुलासे के अनुसार जेल से एस.के. सिंह और उनके साले धीरज ने सुपारी देकर मुनिला की हत्या कराई । 

इस प्रकार ’माटी कहे कुम्हार से ’ नायिका प्रधान उपन्यास है । कथाकार मिथिलेश्वर ने भारतीय समाज की किसी भी समस्या को अछूता नहीं छोड़ा है । उपन्यास की रेखांकित समस्या नारी संघर्ष और शोषण से बुनी हुई है । इसके अलावा ग्रामांचल की अन्य प्रमुख सामाजिक समस्याएँ भी द्र्ष्टव्य हैं  - जातपांत की समस्या ,अनैतिक संबंधों की समस्या और अंधविश्वास की समस्या । लेखक ने यह दर्शाया है मुनिला की कहानी समाज के प्रति नारी के विद्रोह की कहानी है । मुनिला बदलाव की छ्टपटाहट की प्रतीक है । जिस सत्ता को मुनिला वरण करने से इंकार करती है, वही सत्ता अंत में  उसका अमानवीय शोषण करते हुए उसकी बलि लेती है । 

’ माटी कहे कुम्हार से ’ में लेखक ने भारतीय लोकतंत्र की राजनीति का कच्चा चिट्ठा खोलकर रख दिया है । स्वातंत्र्योत्तर भारत में निरंतर राजनीतिक मूल्यों  के क्षरण और छल प्रपंच की राजनीति के प्रसार के यथार्थ को इस उपन्यास में प्रभावी अभिव्यक्ति मिली है।गँवई  भाव संवेदना के साथ  भोजपुरी मिश्रित भाषिक संरचना का दुर्लभ तालमेल उपन्यास को जीवंतता प्रदान करता है। उपन्यास का कैनवास इतना विस्तृत एंव व्यापक है कि इसे समकालीन भारतीय जीवन का आख्यान कहा जा सकता है । उपन्यास की नायिका  मुनिला का चरित्र सबसे अधिक प्रभावशाली, अद्भुत  एंव अविस्मरणीय है। लोक जीवन एंव लोक कथाओं से गहरा जुड़ाव इस उपन्यास की एक अन्यतम विशेषता है । इसमें तेजी से बदलते समय और समाज के गतिशील यथार्थ का चित्रण सफलतापूर्वक किया गया है । 

कुल मिलाकर इस उपन्यास में लेखक ने सामाजिक और राजनैतिक मुददों को उठाकर ज़मीनी समस्याओं का विवेचन विश्लेषण प्रस्तुत कर समाधान खोजने का प्रयास मुनिला जैसे सशक्त नारी पात्र के माध्यम से किया है ।यह अलग बात है कि प्रयास अपने परिणाम तक नहीं पहुँच पाया पर बदलाव के कुछ संकेत लेखक ने अवश्य प्रस्तुत किए हैं । साथ ही स्त्री विमर्श की दृष्टि से इस उपन्यास में जहाँ  एक ओर स्त्री के अनेकमुखी शोषण का अंकन है, वहीं उसकी आंतरिक ऊर्जा  के सकारात्मक प्रस्फुटन की भी अभिव्यक्ति है जिससे लेखक का स्त्री विषयक दृष्टिकोण स्पष्टतः उभरकर सामने आ सका है । स्त्री की सार्वजनिक भूमिका और उससे भयभीत राजनीति का द्वंद्व इस उपन्यास के स्त्री विमर्श की मौलिक उपलब्धि है ।
 

बुधवार, 6 अक्तूबर 2010

उधार की सुरक्षा में असुरक्षित स्त्री

’त्रिया हठ ’ (2006) मैत्रेयी पुष्पा (1944) के लेखन हठ का एक सटीक प्रमाण है, स्त्री लेखन एक प्रकार से लेखन हठ हीं तो है। जो अब तक जिस रुप में नहीं कहा गया , नहीं कहा जा सका , उस अप्रत्यशित सत्य को इस रुप में कहने की हठ की तथाकथित शालिनता के पर्दे हिल उठे । ठीक है कि मातृत्व स्त्री जीवन की परिपूर्णता है । लेकिन उसे भयंकर त्याग का पर्यायवाची बनाकर स्त्री को जीवित इच्छाओं आकांक्षाओं     की ठंडी कब्र बना देना कहाँ का न्याय है? स्त्री से सब प्रकार की बलिदान और त्याग का माँग करने वाला समाज उसे आत्म्भिव्यक्ति तक का हक नहीं देता । महिला रचनाकरों को ऎसे अनुभवों से गुजरना पड़ा है , जहाँ उनके शब्दों को परिवार ने संपादित किया है, सेंसर किया है । फिर भी स्त्रियाँ लिख रही हैं , लिखे जा रही हैं यह लेखन हठ नहीं तो और क्या है। अनुभव की प्रामाणिकता में स्त्री को अपने चरित्रगत उत्थान को पति के घर और घेरे में सीमित कर लेना पड़ता है । इस घेरे से बाहर निकलने के प्रयत्न का अर्थ है दुश्चिरत्रता का लांछन झेलना । लेकिन लेखिकाओ का अनुभव संसार इतना शाही नहीं होता ,वे भी अपने समय और समाज पर गहरी नजर रखती है और उसकी उन भीतरी सच्चाईयों से परिचित रहती हैं, जिन्हें पुरुषों की दुनिया सदा अंधेरे में कैद रखती है । ’त्रिया हठ ’में भी कुछ ऎसी ही अंधकार ग्रस्त दबी छिपी सच्चाइयों को सामने लाया गया है ।

इस उपन्यास में मुख्य आठ पात्र सम्मिलित हैं। मीरा इस कथा की वाचिका है। केंद्रीय पात्र है उर्वशी जो मीरा की सखी है; उससे कम आयु की है, वैधव्य झेल रही है और मीरा के पिता की प्रेमिका है । बरजोर सिंह मीरा के पिता हैं ,उनकी पत्नी की मृत्यु हो चुकी है । अजीत उर्वशी का भाई है ,बरजोर सिंह की कृपा दृष्टि से उसे वन विभाग की नौकरी मिली है। उदय बरजोर सिंह का छोटा बेटा है तथा उर्वशी से शादी करना चाहता है। सर्वदमन सिंह उर्वशी के पति एंव वकील है जिसकी रोड दुर्घटना में मृत्यु हो जाती है शत्रुजीत सिंह उर्वशी का जेठ है तथा सर्वदमन की मृत्यु के बाद उसके हिस्से की जायदाद हड़पने के फिराक में है । देवेश उर्वशी का बेटा है जो अपनी माँ की मौत की सच्चाई पता लगाना चाहता है ।
’त्रिया हठ ’(2006) की कथा वस्तु पतिव्रता उर्वशी की कथा है । एक बेटे द्वारा अपनी माँ की मौत की सच्चाई ढूँढ़ने की और माँ को इंसाफ दिलाने की कथा । कहानीकार को एक बेटे की चुनौती की गाथा कि-

"क्या सचमुच मेरी माँ की प्रकृति ऎसी थी जैसा कि आपने कहानी में दी है ? नहीं ऎसी प्रकृति किसी लड़की की नहीं होती । आप लोगों ने किसी औरत की असली कहानी नहीं लिखी ,घर -परिवार और समाज की मर्यादा की चापलुसी में कहानियाँ लिखी हैं, इस सत्य को स्वीकार कर लें तो आपकी भी ईमानदारी बची रहेगी।" (आवरण पृष्ठ) 

बात उन दिनों की है जब देवेश की मामी प्रधान पद की उम्मीदवार के रुप में खड़ी हुई थी । उन्हें आशा थी कि देवेश वोट माँगने में उनकी सहायता करेंगें लेकिन मीरा को आशा नहीं थी कि देवेश भी यहाँ मिलेगा । देवेश मीरा के सामने अपना प्रश्न दोहराता है

,"बताओ न मीरा जिज्जी । तुमने आज तक हमारे सवाल का जबाब नहीं दिया , तुम्हारे पिता ने हमारी अम्मा को दिनारी (धीमी गति से असर करने वाला जहर) दी थी न । मीरा ने अपनी जड़ता पर काबू पाते हुए कहा- "हमारे यहाँ से तो अच्छी भली ही गयी थी । "(पृ.सं.-11)

  अन्य रिश्तेदार आ गए बात आई-गई हो गई । यह वही देवेश है जो बचपन में अपनी तुतली बोली से मीरा को ’मौछी-मौछी’ कहा करता था । मगर जवानी आते ही संबंधों की असलियत जान गया और मौसी से जिज्जी कहने लगा । यह शब्द उतना ही तीखा है जितना की मौसीपना मीठा था। देवेश मीरा से कहता है

 "तुम्हारे पिता की औरत मेरी माँ;तुम मेरी माँ की सखी ही सही बहन तो नहीं मौसी कैसे कहूँ ? तुम्हारे ही घर में वह औरत बेइज्ज्त हुई जिसका नाम उर्वशी था ।"(पृ.सं.-15)

देवेश से सामना होते ही मीरा के अंदर मातृत्व सा जागा , मगर संवाद हुआ तो एकाएक उल्लास का रंग बदल गया । ममता बदरंग हो गई । मीरा ने सोचा , सारी कहानी की सच्चाई देवेश के सामने रख देगी । लेकिन कहानी क्या दो दिन की है, जो तुरंत उत्तर मिल जाए । एक जिंदगी की कथा कई जिंदगी को समेटे रहती है । अपना रुप आदमी खुद बनाता बिगाड़ता है । देवेश कहता है मीरा जिज्जी मुझे साबित करना है कि मेरी माँ बदचलन नहीं थी , चंदनपुर वाले कायर और कातिल है ।

 "मीरा कहती है , क्या कहूँ ! देवेश मर्द घर परिवार के हों या बाहर के एक हीं बात पर कमर कसे रहते हैं कि उनके घर की औरतें कितनी शुद्ध पवित्र हैं।" (पृ.सं.17) 

मीरा सोचती है जो जानकारी यह लड़का इतना अधीर होकर माँग रहा है, क्या उसके साथ इंसाफ कर पाएगा ? विलुप्त हुई स्त्री की पहचान के कटे फटे अवशेष तक पुनः लौटना चरित्र की उस उँचाई तक चढ़ने की मशक्कत है, जो अपने आप में उँचाईयों को शिखर लगे । बेटे से माँ की तमाम न कहने वाली बातें कैसे बताई जा सकती हैं ? बेटे के पास तो माँ की छवि देवी की है,सती की है जो किसी तरह सामान्य या साधारण औरत की छवि नहीं हो सकती । सच्चाई जानने पर कहीं अपनी माँ को कुलटा न मान बैठे । मीरा देवेश से कहती है-

"देवेश कहानी के पात्र हमारे बीच नहीं हैं तुम उर्वशी के बेटे हो मगर उसकी मामुली कहानी नही सुनने आए । मामूली औरत गैर मामूली कारनामों से गुजरेगी ,कहानी तभी बनेगी न ।"(पृ.सं.-31)

 मीरा के मन में पुनः प्रश्न उठता है ,कहीं देवेश अपनी माँ की कहानी अपनी लोकप्रियता के लिए  तो छपवाना नहीं चाहता । देवेश कहता है -

" मैंने अपनी माँ की मौत नहीं देखी । मुझे हत्या का अनुमान है। हत्या के साथ सवाल जुड़ जाते हैं जो कि मौत के साथ नहीं होते ।"(पृ.सं.-32) |

मीरा अतीत में जाती है-

" राजगिरि का घर यह नहीं था । पुराना था। पुराने घर पुराने लोग । अपनी तरह का अनुशासन । परिवार जैसे कोई स्कूल हो ,स्कूल के हेडमास्टर नाना ,नानी हेडमिस्ट्रेस । दोनों बुजूर्ग हमारे समय को जिस शक्ल में ढालते हम उसी सूरत में हर काम को अंजाम देते । ये वही मामी हैं, जो आज प्रधान पद की उम्मीदवार है जब ब्याह कर आई थीं तो इनके रहने -सहने , उठने -बोलने ,बतियाने की एक निर्धारित सीमा थी|  मेरी माँ की मृत्यु हो चुकी थी । मेरा बड़ा भाई विजय फिर भी सीधा-सादा था,लेकिन उदय पहले नंबर का जिद्दी  था । दादी ने मुझे अपने घर चंदनपुर से अलग कर राजगिरि यह कहकर भेज दिया कि दो लड़कों के मुकाबले लड़की की जिम्मेदारी भारी है। नाना-नानी तथा मुझसे उम्र में छोटी उर्वशी ( जो मेरी सहेली सेविका सब कुछ थी) के संरक्षण में मैं चंदनपुर को धीरे-धीरे भूलने लगी । मेरे पिताजी यहाँ आते तो मैं उर्वशी के घर में छिप जाती । लेकिन उर्वशी मेरे पिताजी को फूफा कहकर प्रसन्न मन घूमती फिरती ।"(पृ.सं.-20) 

देवेश उस घर को देखता है जहाँ उसकी माँ उर्वशी रहा करती थी जो अब खंडहर में तब्दील हो चुका है। देवेश मीरा से कहता है वह यहाँ घर बनवाना चाहता है । मीरा कहती है जहाँ तक मैंने सुना है तुम ब्याह न करने की ठान चुके हो,फिर उसमें कौन रहेगा ? वह कहता है उर्वशी । मैं अपनी बेटी का नाम उर्वशी रखूँगा । मीरा कहती है बिना ब्याह के ही उर्वशी पैदा होगी ! देवेश कहता है-

"जिज्जी उर्वशियाँ विवाह के बिना हीं पैदा होती है , विवाह तो उनका खात्मा कर डालता है ।" (पृ.सं.-23) 

मीरा बात बदलने की गरज से देवेश को अपनी तथा उर्वशी के बचपन की कहानी सुनाती हैः

 " हमारे घर के बीच एक दीवार हुआ करती थी। मेरे जिद्द पर नाना ने उसमें खिड़की लगवा दी । मैं और उर्वशी एक दूसरे के घर कूदकर जाया करते थे । खिड़की थी कि हमारी इच्छाओं का झरोखा ।"(पृ.सं.-24) 

देवेश के नाना कर्जा उठाते ,ब्याज पटाते अपनी जिंदगी काट रहे थे । अपनी हालत सुधारने के लिए उन्होंने अजीत को यह सोचकर पढ़ाया कि बेटे की नौकरी एकमुश्त रकम मिलने का साधन बनेगा । मीरा की आँखों के सामने अनायास ही उर्वशी का किशोरी रुप उभर आया -गोरा रंग ,तीखी आँख ,तोता नाक ,सुराही गर्दन , भरी -भरी देह मगर उर्वशी को अपने अप्रतिम रुपवती होने की खबर नहीं थी ।

एक दिन अजीत मामा के गैरहाजिरी में गेरुआ वस्त्र धारण किए बैरागी आता है। दादा ने बैरागी के चरणों में साष्टांग दंडवत कर हाथ जोड़ कर पूछा , महराज हमारी मोड़ी का हाथ देखकर बताना शादी -ब्याह का संजोग कब बैठता है। बैरागी कहता है -

 " कन्या को भिजवा दो । हमारा प्रदोष व्रत है। हमारे लिए दूध लाना आप । जब तक नाना घर से बाहर निकले ,उर्वशी ने अपने आपको कोठरी में बंद कर लिया । इधर साधु चबूतरे पर चिमटा गाड़कर बैठ गया। नानी ने कहा-" साधु को हड़काओ। नाना ने कहा पाप तुम लोगी ? सराप देगा ,नरक में जाएगें हम।"(पृ.सं.-35)

 गाँव के लोगो ने साधु का चिमटा, कंमडल उठाकर गली में फेंक दिया । नाना ने कहा महराज कोई अज्ञानी लड़का बदसलुकी कर जाए इससे पहले आप यहाँ से चले जाएँ । साधु ने कहा -

"बच्चा इस घर की कन्या से भिक्षा दिलवाओ, उसका मंगल होगा । वह तेज की स्वामिनी है। उसके हाथ में चक्र है, पाँव में पदम है , वह पदमिनी के नस्ल की है मगर भाग्य में वैध्व्य है। उसके हाथ से दान करवाओ ग्रह शांत होंगे ।"(पृ.सं.-36)

सीता को कहाँ पता था साधु कपटी वेश धारण कर उनका हरण करने आया है । उर्वशी को भी नहीं मालूम था महात्मा उससे कहेंगे , हमारे संग चलो मुक्ति पाओ । रावण सीता को ले गया ,राम ने सीता के लिए विलाप किया उर्वशी के लिए यहाँ कौन रोने वाला था । माँ बाप अपनी इज्ज्त लुट जाने पर रोते थे न कि उर्वशी के लिए । इधर यह वैरागी तो सिरसा वाले शत्रुजीत सिंह का आवारा चचेरा भाई निकला । लोगों ने उसे जबर्दस्ती सिरसा पहुँचा दिया ।

इधर पढ़ा-लिखा बेरोजगार अजीत नौकरी की तलाश में दर-बदर की ठोकरें खा रहा था । अंत में थक हारकर अजीत अपनी माँ से कहता है माँ मुझे नौकरी के लिए एलकारों को पैसा देना है । वे मोहरे मुझे दे दो जो तुम्हारे पास रखी हैं। माँ कलयुगी पूत को देखती रह गई । मोहरें अजीत के ससुराल से ब्याह में आई थीं, आज अजीत उन मोहरों पर अपना हक जता रहा था ।

आज माँ को महसुस हो रहा था -

"इससे अच्छा तो बिटिया को पढ़ा लेते । मोड़ी कम से कम मास्टरनी तो हो जाती । सारा दारोमदार लड़के पर तो कायम नहीं रहता ।"(पृ.सं.-45)

 माँ ने चुपचाप मोहरें बेटे के हवाले कर दी । लेकिन मोहरों के पैसे ऎलकार को देने के लिए पूरे नहीं पड़े । अजीत ने अम्मा के पाँवों की तरफ देखते हुए कहा ,अम्मा अपना पैंजना दे दो ,काम बन जाएगा । माँ बोली , पैंजना न मिलेंगे लला । अजीत ने समझाया ; माँ नौकरी में हम से ज्यादा पैसे वालों की लाइन है। चंदनपुर वाले फुफा इंतजार नही करेंगे । बरजोर सिंह के प्रयास से किसी तरह अजीत को नौकरी मिल गई । आदमी कर्ज से ज्यादा एहसान से दबता है, यहाँ तो कर्ज और एहसान दोनों माफ थे। इस उदारता ने बरजोर सिंह की इज्जत राजगिरि में कई गुना बढ़ा दी ।

इधर मीरा की नानी अजीत की माँ से यह कहकर लड़ाई करती है कि तुम माँ -बेटी की नजर चंदनपुर में हमारे दामाद की जायदाद पर है । उर्वशी के बाबत तुम हमारे दामाद को चाहते हो । लेकिन अजीत सिरसा के शत्रुजीत सिंह के छोटे भाई सर्वदमन से उर्वशी की शादी तय कर देता है । मगर शत्रुजीत सिंह सर्वदमन से इस बात पर नाराज होता है कि यह भी कोई बात हुई वकालत पढ़कर आदमी बिना दान दहेज के शादी करे, नाक कटाने वाली बात । पढ़ाई लिखाई में खर्चा हुआ उसकी भरपाई कौन करेगा ? सर्वदमन जो कमाएगा उसका कर्त्ता-धर्ता तो एक दिन उसकी घरवाली बनेगी । जेठ-जेठानी कब तक ले पाएंगे उसके रहते । शत्रुजीत सिंह की सौदेबाजी की मंशा को सर्वदमन सिरे से खारिज कर देता है । बड़े-बूढ़ों के अपील पर भी उसने ध्यान नहीं दिया ।

इधर मीरा को बैरागी द्वारा देवेश के लिए अपनापन जताने पर गुस्सा आता है । मीरा का मन कर रहा था कि वह उन सारी बातों को खोल दें ताकि उसकी सारी शुभचिंतकी धरी की धरी रह जाए क्योंकि बैरागी ने जो लंपटता दिखाई थी उसका कंलक मीरा और उर्वशी ने ढोया था ।दुःख इसकी औरत ने भोगा । मीरा पुनः उर्वशी के कथा संसार में देवेश को वापस ले जाती है । कहती है-


"तुम्हारे पिता सर्वदमन आदर्शवादी तो थे मगर दुसरों के सामने दिखावे के लिए । उनके तो दोनों हाथ में लड्डु थे । गोपनीय तरीके से बीस हजार दहेज अलग मिल गया । उर्वशी जैसी कम पढ़ी लिखी पत्नी जमकर मेहनत करेगी , दोस्तों के बीच ले जाना हो तो पहनने ओढ़ने का सलीका सिखा दो , आधुनिकाओं पर भारी पड़ेगी| "(पृ.सं.-73) 

शादी के समय मीरा के नाना अजीत को शाबाशी दी थी-


"काकाजू तुम बिटिया को गईया ठौर मानते हो पर कसाइयों के खूँटे पर नहीं बाँध पाए ,धन्य है तुम्हारी इंसानियत । मानिख की बेटी मानिख को ही मिली ।"(पृ.सं.-79)

बरजोर सिंह की बेटी मीरा अपने घर से त्रस्त उर्वशी का सुख देख रही थी , खुशकिस्मत माँ जिसका बेटा वन विभाग में नौकरी  पा गया , बहू घर संभाल रही है और बेटी राजरानी की तरह राज कर रही है । लेकिन भाग्य को कुछ और मंजूर था । एक दिन सर्वदमन और बैरागी मोटरसाईकिल से कहीं जा रहे थे , सर्वदमन चालक की भूमिका में थे । पीछे से ट्रक ने टक्कर मार दी बैरागी तो बच गए लेकिन सर्वदमन को नहीं बचाया जा सका । देवेश उस समय उर्वशी की गोद में था । यह दुर्घटना थी या साजिश ? कुछ लोगों का कहना था कि अजीत उन दिनों वन विभाग से सस्पेंड कर दिए गए थे; रिश्वत देकर दुबारा नौकरी हासिल करना चाह रहे थे । बरजोर सिंह की नजर उर्वशी पर थी । अजीत अपनी नौकरी बचाने के लिए उर्वशी को बरजोर सिंह के सुपूर्द करना चाहते थे । लेकिन सर्वदमन के रहते यह संभव नहीं था ।

इन्हीं दिनों उर्वशी अपने मायके आती है। भावज के साथ जमकर कलह हुआ । बरजोर सिंह ने बीच बचाव किया तथा उर्वशी के सिर पर अपना हाथ धर दिया । उर्वशी चंदनपुर आ जाती है । अजीत चाहते थे कि उर्वशी की दुबारा शादी कर दी जाए , इतनी लंबी जिंदगी अकेले कैसे काटेगी । देवेश बड़ा होकर अपना हिस्सा बाँट लेगा ,लड़का है मर्द हो जाएगा । इधर लोगों ने पूछना शुरु किया उर्वशी चंदनपुर क्यों आई?


" ब्याहता औरत है कहीं भी आ जा सकती है। अरे, वो विधवा है, अब काए की ब्याहता है?" (पृ.सं.-107)

बरजोर सिंह बूढ़े हो चले थे । उनके संग उर्वशी को बसाया जा रहा था या बरजोर सिंह के घर को आबाद करने के मंसूबे अजीत के थे ? अहसान तो तभी उतरता है जब अहसान करने वाले को कृताथ करो , विधवा विवाह के नाम पर तमाम बूढों की दयनीय कामुकता और उजड़ते घरों के उपाय खोजे जा रहे थे । उर्वशी को बरजोर सिंह के बेटे विजय या उदय के संग बसाया जाता तो निश्चित ही विधवा विवाह की सार्थकता होती , लेकिन यहाँ भी पुरुष का वर्चस्व काम कर रहा था जो हजारों सालों से हमारे संस्कारों में शामिल है । विजय या उदय के संग उर्वशी क विवाह होने पर उल्टा और एक अहसान अजीत के उपर चढ़ जाता । इधर दहेज उन्मुलन अभियान के तहत फारेस्ट अफिसर शशिरंजन कुँआरा बुढ़ा हुआ जा रहा था । उसके रिटायरमेंट में दो साल थे । वह अजीत से उर्वशी का हाथ माँग रहा था । मगर अजीत सबकी उम्मीदों पर पानी फेरते हुए उर्वशी को वापस सिरसा पहुँचा देता है । चंदनपुर में विजय की शादी तय हो जाती है । मीरा को बिना बताए उर्वशी चंदनपुर आ धमकती है । गाँव में उर्वशी को लेकर मीरा अपने पिता की बदनामी से आहत थी । उसे समझ में नहीं आ रहा था कि उर्वशी को वह अपनी सखी समझे या सौतेली माँ ।

इधर देवेश की सहपाठिनी स्मिता जो देवेश के साथ मिलकर उर्वशी के जीवन के कटे फटे अवशेषों को छाँटने में जुटी थी , उसका मानना था कि अगर सर्वदमन पत्नीविहीन हो गए होते तथा दूसरी शादी कर अन्यत्र बस गए होते तो सिरसा में उनका जमीनी हक खारिज तो नहीं हो गया होता । फिर उर्वशी को अपने अधिकारों से क्यों खारिज किया जा रहा है ? दूसरी तरफ मीरा उर्वशी तथा अपने पिता के संबंधो से आहत होकर आत्महत्या का प्रयास करती है। इस घटना के बाद दादी एंव उदय के सम्मिलत प्रयास से उर्वशी को सिरसा पहुँचा दिया जाता है ।

उर्वशी के खिलाफ पंचायत बुलाई जाती है , जेठ के बिगड़ैल बच्चे चाची को गाली देते हैं । भाई अजीत कहता है,बदकार बहन मर चुकी है मेरे लिए । फैसला शत्रुजीत सिंह पर छोड़ दिया जाता है । तभी उर्वशी को बरजोर सिंह के ब्रेनहेम्रेज की खबर मिलती है । उर्वशी भागकर चंदनपुर वापस आ जाती है । एक कुशल परिचारिका की भाँति बरजोर सिंह के सेवा में जुट जाती है। लेकिन यह क्या ? इस बार उर्वशी की तरुणाई के लपेटे में उदय आ जाता है ।


" इतिहास गवाह है प्रेम और सत्ता के लिए बाप बेटे लड़े हैं ।" (पृ.सं.-151)


  एक मूल्यवान रिश्ता खत्म हो रहा था , बाप के सामने बेटा कहता है , मैंने उर्वशी से प्रेम किया है । पिता की आँखे कौड़ी की तरह खुली रह जाती है । उदय कहता है न तो तुम्हारी उम्र है कि तुम उससे शादी करो और न उसके बेटे को अपनाने का संस्कार रखते हो। बाप बेटे के बीच सही गलत का फैसला कौन करता । उन्होंने तो अपना उदात्त चरित्र पेश कर पूरे घर को आश्चर्य में डाल दिया !

इधर महीनों तक बरजोर सिंह और उदय के बीच अपनी जिदंगी के नए आयाम को तलाशती हुई एक दिन अचानक उर्वशी भूमिगत हो जाती है। पूरे इलाके में हंगामा ! सर्वदमन की औरत भाग गई । कहीं मुँह काला कर रही होगी । जेठ के दोनो लड़के योगेन्द्र एंव महेन्द्र जात बिरादरी के पंचों के साथ अपने घर की मर्यादा में चाची की लाश बिछाने को तैयार ? खेत में उर्वशी मिली। अचानक कंधे पर तीन -चार लट्ठ पड़े -


" फिर आघात पर आघात । खून फव्वारे की तरह फूटी । सारी पृथ्वी रक्तिम बाढ़ मे डुबने लगी । औरत ढेर  हो गई । ढेर में औरत, औरत में ढेर और ढेर सारा तमाशा ।" (पृ.सं-160-161)

पारिवारिक फैसले में आहत शरीर , छितराई स्त्री देह का तमाशा सब ने देखा । पीड़ा का आनंद कैसा नशीला होता है कोई यहाँ देखे । हाथ -पाँव बंधी बकरी की तरह उर्वशी को घर तक लाया गया । अगले दिन कंधे से लेकर पाँव तक पलस्तर चढ़ गया । शत्रुजीत ने जेठ की मर्यादा त्याग दी । अपनें हाथों से उर्वशी को दूध रोटी खिलाते । सारा घर उर्वशी की तीमारदारी में लग गया । देवेश को आने नहीं दिया गया-बच्चा है अम्मा की हालात देखकर डर गया । सारा घर उर्वशी से माफी माँग रहा था कि उसे बरजोर सिंह के लैठेतों से नहीं बचा सके । उर्वशी की हालत दिन-ब-दिन बिगड़ती जा रही थी । बरजोर सिंह सिरसा पँहुचते है उर्वशी से मिलने मगर शत्रुजीत सिंह बरजोर सिंह को उर्वशी से नहीं मिलने देते । अचानक एक दिन गर्मी की दोपहर ,खबर आती है -


" उर्वशी नही रही न बंधंन में, न आजादी में , न सिरसा में न राजगिरि मे।" (पृ.सं.- 164)

उर्वशी को उन दवाओं के जरिए मारा गया जो उसके इलाज के लिए दी जा रही थीं । उदय उदघाटित करता है-


"उसकी मानसिक मौत पहले हुई थी , फिर चोला छोड़ा ....।" (पृ.सं.-165) डाक्टर कहते हैं बरजोर सिंह की मानसिक हालत असामान्य है- " उनका उत्कंट वेदनामय प्यार उर्वशी की जिद की तरह अपने पूरे उठान पर।"(पृ.सं.-वही) 

कथाकार मैत्रेयी पुष्पा ने अपने इस उपन्यास के माध्यम से इस बात को सामने रखा है कि भारतीय समाज में आज भी स्त्री एक वस्तु है। फायदे के लिए उसका क्रय-विक्रय किया जा सकता है । अजीत जैसे पात्रों के रुप में लेखिका ने इसका सफल चित्रण किया है । साथ हीं यह भी दर्शाया है कि अगर स्त्री पर एक बार चरित्रहीनता का ठप्पा लग गया तो उसका गुजारा सवर्ण समाज में हीं नहीं हाशियों के समुदाय और दलित वर्ग में भी नहीं है । हमारे समाज की मानसिकता औरत के प्रति कितनी खोखली है ,पंचों में बैठे बरजोर सिंह के इस कथन से झलकता है -


" औरत जात की रखवाली गाय भैंस की रखवाली नहीं है जिसे खूँटे से बाँध दो और रस्से की मजबूती जाँच लो । जनी की निगरानी खेत की निगरानी जैसी नहीं होती कि खेत एक ही जगह रहे और तुम जब मन चाहे तब उसे देख आओ। औरत को घेरना मुशिकल होता जाता है । जैसे वह ढोर की तरह चारे-सानी में खर्च नहीं कराती ,खेतों की तरह बीज खाद का दरकार नहीं रखती , अपनी सेवा मुफ्त में देती रहती है । बस उसी तरह तमाम खतरे भी पैदा कर देती है कि किवाड़ खोलकर कब चल दे ....।" (पृ.सं.-140) 

उर्वशी के साथ भी तो ऎसा हीं हुआ । पता हीं नही चला कि कब और कैसे वर्जित क्षेत्र में घुस गई तथा अवैध रिश्तों के भूल भुलैया में भटकती बरजोर सिंह की बैठक में प्रवेश कर गई । न अपनी गरिमा का ख्याल न मर्यादा का ?

आज देश की आजादी के 62 साल गुजर गए लेकिन कहानी बिल्कुल नहीं बदली । पंचायतो के स्वरुप में रत्ती भर बदलाब नहीं आया । परदादी , दादी और माँओं के जमाने का कानून पंचायत में आज भी चलता है । हरियाणा , उत्तरप्रदेश राजस्थान और बिहार जैसे प्रदेशों की पंचायतों ने औरतों पर कैसा कहर बरपाया है , इसका उदाहरण झज्जर की गुड़िया , मुज्जफर नगर की इमराना , बिहार की दलित महिला , राजस्थान की भँवरी देवी आदि है जो लोकतांत्रिक व्यवस्था में क्रुर पंचायतों के कानून का शिकार हुई हैं । क्या हमारी सभ्यता इन क्रुर    आदिम पंचायतों के रुप में आज भी चुनौती बनकर खड़ी हैं ? कहने को तो हमारे पास प्रगति ,विकास और आधुनिकता के आँकड़े  जमा हैं । इन्हीं के दम पर इंडिया शाइन स्त्री सशक्तिकरण , सबको रोजगार , नागरिकों के अधिकारों की उपल्बिध आदि के नारे हैं । नारों से दबे हम अपने वजूद के कुचले जाने के लिए अभिशप्त हैं ।

क्या यह विडंबना नहीं है कि आज भी ब्राह्मण , बनिया , ठाकुर , कायस्थ तथा मुसलमान के नाम पर जातिवादी गुट लड़कियों को सुरक्षा देने का वायदा करते हैं और उनके द्वारा निर्धारित आचार संहिता का पालन न करने पर मौत के घाट उतार देते हैं । ये गुट स्त्री को अपने वर्ग चेतना के रुबरु खड़ा नहीं होने देते । प्रश्न यह उठता है - क्या स्त्रियाँ उधार की सुरक्षा की कायल है? उधार की सुरक्षा अक्सर धोखा देती है , जैसा कि उर्वशे के साथ हुआ ।
  

शनिवार, 21 अगस्त 2010

प्रेम के लिए देह नहीं, देह के लिए प्रेम ज़रूरी! - मैत्रेयी पुष्पा


मैत्रेयी पुष्पा का 2004 में प्रकाशित उपन्यास ''कही ईसुरी फाग'' स्त्री विमर्श के दृष्टिकोण से ध्यान आकर्षित करने वाला महत्वपूर्ण उपन्यास है । कथावस्तु को ऋतु नामक शोधार्थी द्वारा लोक कवि ईसुरी तथा रजऊ की प्रेम कथा पर आधारित शोध के बहाने नई तकनीक से विकसित किया गया है । इस शोध को इसलिए अस्वीकृत कर दिया जाता है क्योंकि रिसर्च गाइड प्रवर पी. के. पांडेय की दृष्टि में ऋतु ने जो कुछ ईसुरी पर लिखा था , वह न शास्त्र सम्मत था , न अनुसंधान की ज़रूरतें पूरी करता था । उसे वे शुद्ध बकवास बताते हैं क्योंकि वह लोक था । लोक में कोई एक गाइड नहीं होता । लोक उस बीहड़ जंगल की तरह होता है जहाँ अनेक गाइड होते हैं , जो जहाँ तक रास्ता बता दे , वही गाइड का रूप ले लेता है। ऋतु भी ईसुरी - रजऊ की प्रेम गाथा के ऎसॆ ‍बीहड़ों के सम्मोहन का शिकार होती है -


 "बड़ा खतरनाक होता है, जंगलों , पहाड़ों और समुद्र का आदिम सम्मोहन .....हम बार-बार उधर भागते हैं किसी अज्ञात के दर्शन के लिए ।''

’कही ईसुरी फाग’ भी ऋतु के ऎसे भटकावों की दुस्साहसिक कहानी है । इस उपन्यास का नायक ईसुरी है,लेकिन कहानी रजऊ की है - प्यार की रासायनिक प्रक्रियाओं की कहानी जहाँ ईसुरी और रजऊ के रास्ते बिल्कुल विपरीत दिशा में जाते हैं। प्यार जहाँ उनको बल देता है,तो तोड़ता भी है। शास्त्रीय भाषा में कहा जाए तो ईसुरी शुद्ध लंपट कवि है, उसकी अधिकांश फागें शृंगार  काव्य की मर्यादा का अतिक्रमण करते हुए शारीरिक आमंत्रणों  का उत्सवीकरण है।

ऋतु की शोध यात्रा माधव के साथ ओरछा गाँव से शुरू  होती है । लेकिन यह क्या, कि सत्तरह गाँवों की खाक छानकर रजऊ की खोज में पहुँची ऋतु को लोग ईसुरी का पता तो देते हैं मगर रजऊ के बारे में जानकारी देना इसलिए बुरा मानते हैं चूँकि उनकी नजर में रजऊ बदचलन है । लोग विद्रूप सा चेहरा बनाकर कहते हैं , आजकल पढ़ाई में लुचियायी फागें पढ़ाई जाती हैं! यह गाँव ऋतु की  बुआ का गाँव था । ऋतु की बदनामी बुआ के परिवार की बदनामी थी । ऋतु को अपने ऊपर  झुँझलाहट होती है कि मैंने रजऊ को अपने शोध का विषय क्यों बनाया?
 "क्योंकि रजऊ के स्त्रीत्व पर कोई विचार नहीं करता, उसके रूप  में मेरी देह का अक्स लोगों के सामने फैल जाता है ।"(पृ.सं-14)
ऋतु के शोध का अगले  पड़ाव का संबंध  सरस्वती देवी की नाटक मडंली में  फाग गाने वाले ईसुरी तथा धीर पंडा से है। रामलीला में तड़का लगाने के लिए ईसुरी के फागों की छौंक ! यह क्या,  तभी एक बूढ़ी औरत मटमैली सफेद धोती पहने माथे तक घूँघट ओढ़े भीड़ को चीरती हुई मंच पर आ जाती है । उसकी कौड़ी सी दो आँखो में विक्षोभ का तूफ़ान  उठ रहा था-
 " मानो फूलनदेवी की बूढ़ी  अवतार हो । काकी उद्धत  स्वर में चिल्लाई  -’ओ नासपरे ईसुरी लुच्चा तोय महामाई ले जावे ।’ काकी भूखी शेरनी की तरह ईसुरी की  तरफ बढ़ने लगी । मुँह से शब्द नहीं आग के गोले निकल रहे थे । टूटे दाँतों के फाँक से हवा नहीं तपती आँधी टूट रही थी । काकी ने चिल्लाकर कहा, हमारी बहू की जिन्दगानी बर्बाद करके तुम इधर फगनौटा गा रहे हो। अब तो तुम्हारे जीभ पर जरत लुघरा धरे बिना नहीं जाएंगे।"(पृ.सं.-21)
दर्शक उठकर खड़े हो जाते हैं | रघु नगड़िया वाला आकर कहता है -
" भाइयों अब तक आपने फागें सुनी और अब फागें नाटक में प्रवेश कर गईं  -’लीला देखे रजऊ लीला’ काकी रघु से कहती है-’अपनी मतारी की लीला दिखा’ काकी कहती है -’आज तो हम ईसुरी राच्छस के छाती का रक्त पीके रहेंगे । धीर का करेजा चबा जाएँगे।" (पृ.सं.-22) 
काकी के कोप का आधार ? बात उन दिनों की है जब काकी का बेटा प्रताप छतरपुर रहता था और उसकी नवयुवा बहू रज्जो की उम्र बीस वर्ष से कम थी । सुंदर इतनी कि जहाँ खड़ी हो जाए, वही जगह खिल उठे । वह अपूर्व सुंदरी थी या नहीं , मगर ईसुरी के अनुराग में उसकी न जाने कितनी छवियाँ छिपी थीं ।

काकी के घर उन दिनों पंडितों के हिसाब से शनि ग्रह की  साढ़े साती लगी थी; नहीं तो मेडकी  के ईसुरी और धीर पंडा माधोपुरा की ओर न आते और रज्जो फगवारे को अनमोल निधि के रूप में न मिलती । घूंघटवाली रज्जो से अब तक ईसुरी का जितना भी परिचय हुआ वह लुकते छिपते चंद्र्मा से या राह चलते-निकलते आँखों की बिजलियों से । ऎसे ही बेध्यानी में ईसुरी एक दिन ठोकर खा गए और गिरे भी तो कहाँ; रजऊ की  गली में ! ईसुरी ने अपनी ओर से रज्जो को नाम दिया - रजऊ ।

रज्जो को घूंघट से देखने की दिलकश अदा अब ईसुरी को सजा लगने लगी ।  वे सोचते - यह सब मुसलमानों के आने से हुआ । वे अपनी औरत को बुर्का पहनाने लगे । हिंदुओं ने सोचा, हमारी औरत उघड़ी काहे रहे ? मुसलमानों के परदे   को अपना लिया पर अंग्रेजों का  खुलापन उन्हें काटने दौड़ा ।

इधर प्रताप छतरपुर में मिडिल की पढ़ाई  पूरी  न कर पाने के कारण  अपने गाँव वापस नहीं आ पाता है | इस खबर से उसकी बूढ़ी माँ एवं  पत्नी उदास हो जाती हैं । सास बहू को समझाती  - ऎसे उदास होने से काम नहीं चलेगा । स्थिति  को पलटने के लिए सास ने दूसरा नुस्खा अपनाया । फाग के पकवानों की तैयारी पूरी है,फगवारे को खिलाकर कुछ पुन्न-धरम कर लेते हैं। रज्जो के चेहरे पर हुलास छा जाता है। सास मन-ही-मन जल-भुनकर गाली भरा श्राप ईसुरी को देना शुरू  करती है।

सास रज्जो को समझाती है। पूरा मोहल्ला होली में आग नहीं लगा रहा बल्कि हमारे घर में आग लग रही है। प्रताप का चचेरा भाई रामदास भी रज्जो और फगवारे के प्रसंग को लेकर आगबबूला होता है। सास बदनामी से बचने के लिए रज्जो को मायके जाने की सलाह देती है। लेकिन रज्जो मायके जाने से साफ मना कर देती है। अपनापन उडेलते हुए सास से कहती है  -
 "हमारे सिवा तुम्हारा यहाँ है कौन ? तुम्हारी देखभाल कौन करेगा । गाँव के लुच्चे लोगों की बात छोड़ दो ।" (पृ.सं.-45)
सास रज्जो का विश्वास कर लेती है और कहती है-
"मोरी पुतरिया,भगवान राम भी कान के कच्चे थे, मेरा बेटा तो मनुष्य है।" (पृ.सं.-46)
सास रज्जो को अपनी आपबीती सुनाती है कि किस प्रकार फगवारा  उसके लिए फाग गा रहा था और उसी दिन प्रताप के दददा उसे लिवाने आए थे । उन्होंने सुन लिया था ।
''मर्द की चाल और मर्द की नजर का मरम मर्द से ज्यादा कौन समझे ! अपना झोला उठाया और चुपचाप वापस चले गए । फिर खबर आई -अपनी बदचलन बेटी को अपने पास रखो, ऎसी सत्तरह जोरू  मुझे मिल जाएगी ! फिर क्या था माँ ने डंडों से मेरी पिटाई कर डाली तथा जबरदस्ती नाऊ (हजाम) के संग सासरे भेज दिया । कहा कि नदी या ताल में ढकेल देना, अकेले हमारे देहरी न चढ़ाना  । नहीं तो इसके सासरे वालों से कहना- खुद ही कुँआ बाबरी में धक्का दे दें । हम तो कन्यादान कर चुकें हैं । ससुराल वालों ने तो अपना लिया लेकिन पिरताप के दद्दा  का कोप बढ़ता तो हथेली पर खटिया का पाया धर देते , अपने पाया के उपर बैठ जाते । डर और दर्द के मारे मैं सफेद तो हो जाती मगर रोती नहीं । यह सोचकर जिन्दा रही अपना ही आदमी है जिसका बोझ हम हथेली पर सह रहें हैं। जनी बच्चे का बोझ तो गरभ में सहती है जिंदगानी तो बोझ वजन के हवाले रहनी है ; सो आदत डाल लिया ।"(पृ.सं.48)
रज्जो सास के हाथों पर घाव के भयानक निशान देखकर काँप उठती है।

सास ईसुरी तथा पंडा को खाना खिलाते हुए वचन लेना चाहती है कि रज्जो के नाम पर अब वे फाग नहीं गाएँगे । एकाएक फगवारे खाना छोड़कर उठ जाते हैं। ईसुरी इंकार करते हुए कहता है -
 "काकी हम जिस रजऊ का नाम फाग के संग लगाते हैं वह न तो प्रताप की दुल्हन है न तुम्हारी बहू?"(पृ.सं.53) 
ऋतु के श्रीवास्तव अंकल ऋतु को सरस्वती देवी का पता देते हुए चिरगाँव जाने को कहते हैं और बताते हैं कि हिम्मती औरत है, समाज सेवा का काम करती है, लोकनाट्य में रुचि है और हर साल मंडली जोड़ती है।


सरस्वती देवी ने ऋतु तथा माधव को अपने जीवन का किस्सा बताया ।
 "विधवा हुई , मेरे संसार में अंधेरा छा गया । मगर जिंदगी ने बता दिया कि पति न रहने के बाद औरतों को अपने बारे में सोचना पड़ता है। अपने लिए फैसले लेने पड़ते हैं और फैसला ले लिया । फाग मंडली एक कुलीन विधवा बनाए , परिवार वाले यह बात कैसे सहन करते। कभी जलते पेट्रोमेक्स तोड़े गए तो कभी फगवारे को भाँग पिला दी गई । सरस्वती देवी कहती हैं -पर मैं हार नहीं मानने वाली थी , दूसरे फगवारे को खोजती फिरती क्योंकि मेरे भीतर का हिस्सा रजऊ ने खोजकर कब्जा कर लिया था । फागों में उसका वर्णन सुनकर सोचती थी कि औरत में इतना साहस होता है कि उसके पसीने की बूँद गिरे तो रेगिस्तान में हरियाली छा जाए, आँखों से आँसू गिरे तो बेलों पर फूल खिल जाएँ  । रजऊ जैसा नगीना फागों में न टँका होता तो ईसुरी को कौन पूछता ।’ " (पृ.सं.-57)
इधर मामा के छतरपुर वाले घर को आधुनिक नरक कहने वाला माधव उधर ही जा रहा था । लेकिन वहाँ के भ्रष्ट माहौल को देखकर वह वापस ऋतु के पास लौट आता है । जहाँ ऋतु के मन में माधव के प्रति प्रेम का अंकुर फूटता है वहीं मामा के घर जाने पर क्रोध भी आता है । 

सरस्वती देवी ऋतु को मीरा की कहानी सुनाती है - किस प्रकार आँगनवाड़ी के क्षेत्र में मीरा महिला सशक्तीकरण की मशाल  अपने हाथ में लेती है । गाँव की सीधी-सादी तथा ससुरालवालों द्वारा पागल समझी जाने वाली मीरा को पढ़ने की बीमारी लग चुकी थी । गाँव की सभ्यता को दरकिनार करते हुए मीरा मोटरसाइकिल चलाने का निर्णय लेती है।

मीरा सिंह की  मोटरसाइकिल पर ऋतु बसारी पहुँचती है, 90 वर्ष की बऊ से मिलने । गौना करके आई रज्जो के अपूर्व रूप  का वर्णन बऊ करती है। कहती है -
"प्रताप की बहू रूप  की नगीना, नगीने के नशे में मदहोश प्रताप।"(पृ.सं.-69)
 इधर प्रताप छुट्टी बिताकर छतरपुर वापस चला जाता है, उधर ईसुरी के चातक नयन रज्जो की बाट न जाने कब से देख रहे थे । एक ओर पराई औरत की आशिकी और फागों में फिर-फिर रजऊ का नाम लगाने वाले  ईसुरी के  यश की गाथा राजा रजवाड़ों तक पहुँची । दूसरी ओर सुंदर बहू की बदकारी गाँववालों से होते हुए प्रताप के कानों तक पहुँची । प्रताप पहले फगवारे को समझाता है, पैर पड़ता है, लेकिन सब बेकार। अंत में उसने फगवारे की पिटाई कर दी । प्रताप एक कठोर निर्णय लेता है वह रज्जो का मुँह कभी नहीं देखेगा । वह वापस छतरपुर जाकर अंग्रेजों की  पलटन में भर्ती हो जाता है । मर्द चले जाते हैं , घर की रौनक बाँध ले जाते हैं । प्रताप का विमुख होना घर की तबाही बन गया  ।

यह बात तो दीगर थी कि रज्जो ने ईसुरी को दिल से चाहा था , लेकिन यह क्या कि  फगवारे तमोलिन की  बहू के नाम पर फाग गा रहे हैं । जोगन बनी रज्जो आहत होती है । सास रज्जो की पहरेदारी करती है, रज्जो फगवारे से न मिल पाए । तभी पिरभू आकर खबर देता है -"ईसुरी जा रहे हैं आपसे आखिरी बार मिलना चाहते हैं ।" सास की परवाह किए बगैर  रज्जो रात के आखिरी पहर हाथ में दिवला जलाए प्रेमानंद सूरे  की  कोठरी की ओर चल देती है । यह कैसा अदभुत प्रेम ! नहीं देखा कि उजाला हो आया, दीये की रोशनी से ज्यादा उजला उजाला । गाँव के लोगों ने कहा , यह तो प्रताप की दुल्हन है, बिचारी अपने आदमी की बाट हेर रही है , बिछोह में तन-मन की खबर भूल गई है। इतना भी होश नहीं रहा कि दिन उग आया है। नाइन की बहू फूँक मारकर दिवला बुझा देती है । रज्जो उस छोटे बच्चे की भाँति नाइन बहू की अंगुली थामे लौट आती है जिसे यह नहीं पता कि अंगुली थामने वाला उसे कहाँ ले  जा रहा है ? रज्जो की सास कहती है-
"मोरी पुतरिया कितै भरमी हो ? पिरताप की बाट देख-देखकर तुम्हारी आँखे पथरा गई !" (पृ.सं.-91)
"रज्जो उस बुझे हुए दीए की तरह खुद भी नीचे बैठ गयी मानो प्रकाश विहीन दीये की सारी अगन रज्जो ने सोख ली , जलन कलेजे में उमड़ रही थी ।"(पृ.सं.-91) 
सास और रज्जो दोनों जोर-जोर से रो पड़ीं । शोकगीत ने आँगन को ढँक लिया । किसके वियोग में गीत बज रहा था ? प्रताप के या ईसुरी के ? दोनों जानती थीं, दोनों के दुःख का कारण दो पुरुष हैं ।

प्रताप का चचेरा भाई रामदास रज्जो का जीना दूभर कर देता है। तीन बेटियों का बाप रामदास कुल की मर्यादा बचाने तथा कुलदीपक पैदा करने के लिए एवं  प्रताप के हिस्से की जमीन हथियाने की चाह में रज्जो से शादी करना चाहता है। उसके अत्याचार से तंग आकर रज्जो घर छोड़ गंगिया बेड़िन के साथ भागकर देशपत के साथ जा मिलती है , जो देश की आजादी के लिए अपनी छोटी सी सेना के साथ अपने  प्राण तक न्यौछावर करने को तैयार है। यहीं रज्जो को खबर मिलती है कि प्रताप गोरे सिपाहियों से बगावत कर अपने देश के खातिर शहीद हो चुका है। रज्जो दो बूँद आँसू अपने वीर पति की याद में श्रद्धांजलि स्वरूप अर्पण करती है। शरीर का साथ वर्षों से नहीं रहा वहीं मन इस कदर बँधा था । तभी तो कहती है -
 "गंगिया जिज्जी,प्रेम के लिए देह ज़रूरी  नहीं है पर देह के लिए प्रेम ज़रूरी है । उनके तन की खाक मिल जाती, हम देह में लगा के साँची जोगिन हो जाते ।"(पृ.सं.-278)

देशपत की फौज में जासूसी का काम करने वाली रज्जो पर कुंझलशाह की बुरी नजर पड़ती है । देशपत की फौज का बाँका सिपाही राजकुमार आदित्य रज्जो को कुंझलशाह के कहर से मुक्ति दिलाता है। रज्जो आदित्य से घुड़सवारी तथा तलवारबाजी सीखती है।

1857 में अंग्रेजों ने झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई के दत्तक पुत्र को मान्यता देने से इंकार करते हुए रानी के खिलाफ युद्ध का बिगुल फूँक दिया । रानी को बचाने की जिम्मेदारी अपने कंधों पर लेती हुई रज्जो रानी का बाना धारण करती है और  अंग्रेजों के साथ लड़ाई करते हुए रानी से पहले शहीद हो जाती है ।


इधर अपने प्रायश्चित के ताप में तप रहे ईसुरी को आबादी बेगम के द्वारा वीरांगना रज्जो के शहीद होने की खबर मिलती है । अपने जीवन की आखिरी जंग लड़ रहे ईसुरी आँखें मूँदे आखिरी निरगुण फाग गाते हुए सदा के लिए खामोश हो जाते हैं ।
 "कलिकाल के वसंत में न गोमुख से धाराएँ फूटी न तरुणियों ने रंगोलियाँ सजाईं, न दीये का उजियारा , न ही उल्लास की टोकरी भरता अबीर गुलाल ईसुरी ने अखंड संन्यास  की ओर कदम रख दिया ।"(पृ.सं.-340)
 ऋतु ने अपने शोध का ऎसा अंत कब चाहा था ! आंकाक्षा थी कि ईसुरी और रजऊ का मिलन होता ,वे अपनी चाहत को आकार देते हुए जीवन यात्रा तय करते और फागों का संसार सजाते । मगर चाहने से क्या होता है जानने की पीड़ा और दूर होते जाने की दर्दनाक मुक्ति तन और मन मिलने पर भी भावनाओं का ऎसा बँटवारा!  ऋतु और माधव दोनों के रास्ते अलग-अलग । ऋतु को माधव का संबंध विच्छेद पत्र मिलता है -
"ऋतु मुझे गलत नहीं समझना । साहित्य से आदमी की आजीविका नहीं चलती । भूख आदमी को कहाँ से गुजार देती है, यह मैंने गोधरा और अहमदाबाद के दंगों के दौरान देखा है। ऋतु मुझे क्षमा करना रिसर्च रास नहीं आई । अभावों भरी जिंदगी तो बस तरस कर मर जाने वाली हालत है, संतोष कर लेना भी गतिशीलता की मृत्यु है और इस बात से तुम ना नहीं कर सकतीं, जानेवाला टूटा हुआ होता है, उसके तन मन में टूटन के सिवा कुछ नहीं होता। तुम्हें टूटकर चाहने के सिवा मेरे पास कुछ भी नहीं है ।"(पृ.सं.-306-307)

अब प्रश्न यह उठता है कि क्या ईसुरी रजऊ को अहिरिया कहकर राधा के विराट व्यक्तित्व से जोड़ना चाहते थे? या राधा जैसी मान्यता दिलवाकर कुछ छूटों का हीला बना रहे थे, जो साधारण औरत को नहीं मिलती है। नहीं तो रजऊ को मीरा से क्यों नहीं जोड़ा गया ? ईसुरी कृष्ण भगवान नहीं थे जो विष को अमृत में बदल देते। वे हाड़ माँस की पुतली अपनी रजऊ से  पूजा नहीं, प्रीति की चाहना करते थे । भगवान की तरह दूरी बनाकर जिंदा नहीं  रहना चाहते थे।

मैत्रेयी पुष्पा ने वर्तमान और अतीत में एक साथ गति करने वाली इस सर्पिल कथा के माध्यम से कल और आज के समाज में स्त्री जीवन की त्रासदी को आमने-सामने रखने में बखूबी  सफलता पाई है। रजऊ की संघर्ष गाथा तब और अधिक प्रबल हो उठती है जब वह 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम से  सक्रिय रुप से जुड़ती है। ईसुरी का प्रेम जहाँ उसे कभी राधा बनाता है और कभी मीरा | वहीं वह प्रताप की मृत्यु पर जोगन की तरह विलाप करती है और अंततः देश के लिए एक साधारण सैनिक बनकर शहीद होते हुए लोकनायिका बन जाती है । ईसुरी पर शोध कर रही ऋतु एंव उसके प्रेमी माधव के बहाने मैत्रेयी पुष्पा ने शिक्षा और शोध तंत्र में व्याप्त जड़ता पर भी  प्रहार किया है। ऋतु और माधव के जरिए लेखिका ने एक बार फिर रजऊ और ईसुरी की प्रेमकथा को जीवंत  किया है। 
"वहीं  ’प्रेम’और ’अर्थ’ में एक विकल्प के चुनाव पर माधव अर्थ के पक्ष में हथियार डाल देता है।" (प्रो.ऋषभदेव शर्मा , स्वतंत्रवार्ता, 06 फरवरी ,2005)
और रजऊ की भाँति ऋतु भी अकेली रह जाती है। इस प्रकार मैत्रेयी पुष्पा रजऊ से लेकर ऋतु तक अपने सभी स्त्री पात्रों को संपूर्ण मानवी का व्यक्तित्व प्रदान करती हैं। ’कही ईसुरी फाग’ की जो बात सबसे ज्यादा आकर्षित करती है वह यह है कि  रजऊ और ऋतु दोनों ही अबला नहीं हैं, वे भावनात्मक स्तर पर क्रमशः परिपक्वता प्राप्त करती हैं और उनके निकट प्रेम का अर्थ  पुरुष पर निर्भरता नहीं है।

रविवार, 8 अगस्त 2010

नीलू नीलिमा नीलोफर

भीष्म साहनी का 2000 ई.प्रकाशित उपन्यास " नीलू नीलिमा नीलोफर " प्रेम कहानी है । इस उपन्यास की कथा वस्तु बाल्यकाल की दो सखियाँ नीलू उर्फ नीलोफर तथा नीलिमा के ईर्द-गिर्द घूमती है। यह उपन्यास ऎसे समय के भारतीय समाज की कहानी प्रस्तुत करता है जो किसी धार्मिक डर से गैर मजहब में अपनी बेटी को विवाह करने से हीं नहीं रोकता बल्कि दूसरे धर्म के प्रति घृणा को दर्शाता है। यह घृणा इतनी ज्यादा है कि अपनी बेटी का भविष्य बर्बाद कर देने मे उसे कोई संकोच नहीं है ।

नीलू और नीलिमा नामक मुख्य पात्रों के अतिरिक्त इस उपन्यास में चार अन्य महिला पात्र हैं , जो औरत की विभिन्न स्थितियों का बयान करती हैं । नीलमा की दादी स्वयं अपने युग में पति और ससुराल द्वारा उपेक्षित और दमित रहीं हैं,लेकिन पोती किसी मुसलमान लड़के से शादी करे , यह उन्हें मंजूर नहीं । इतना ही नही हिन्दू पति के उत्पीड़न को भी यह मानकर नजर-अंदाज करती है कि ऎसा सब जगह होता है।

सामाजिक रीति-रिवाज तथा परम्पराओं की डोर में बंधी नीलू की माँ जहाँ अपनी बेटी को बहुत चाहती है तथा हिदू लड़के से उसके विवाह के अपराध को क्षमा कर देना चाहती है वहीं दूसरी तरफ अपने बेटे तथा परिवार के दूसरे सदस्यों के हिंसक विरोध के डर से अपनी बेटी को डाँटती है ।

नीलिमा के पति के बास की पत्नी मिसेज वर्मा इस बात का प्रतीक है कि भारतीय समाज में औरतों का स्वयं कोई कद नही होता बल्कि पति के कद से ही उनका कद निर्धारित होता है।

हमारे समाज मे औरत होने की पहली शर्त है उसका समर्पिता होना और इस समर्पण का कोई परिणाम नहीं, सीमा नहीं । समूचा उपन्यास एक ओर औरत की दारुण दशा को प्रस्तुत करता है तो दूसरी ओर उसके व्यक्तित्व के विभिन्न आयामों को स्थापित करता है तथा अनेक मामले में उसे पुरुष से श्रेष्ठ साबित करता है। एक बेटी की एक बेटे की तुलना में माता-पिता के प्रति अधिक वफादार सिद्ध करता है एवं एक पत्नी के रुप में अधिक संवेदनशील और पोषक सिद्ध करता है ।

उपन्यास की कथा वस्तु बचपन की दो सखियों नीलू (नीलोफर ) तथा नीलिमा की है । नीलू के पिता उदारवादी विचारधारा के हैं। मुस्लिम समाज में व्याप्त पर्दाप्रथा तथा संकीर्ण संस्कृति को दरकिनार करते हुए वे अपने बेटीको फाइन आर्ट की डिग्री लेने के लिए कालेज भेजते हैं । वहीं उसकी मुलाकात फाइनल ईयर के छात्र सुधीर से होती है। दोनो एक दूसरे को पसंद करने लगते हैं । परिवारवालों के मर्जी के खिलाफ नीलू कोर्ट में सुधीर से शादी कर लेती है। सुधीर का शराबी पिता नीलू को अपनाने से इंकार कर देता है। दोनों शिमला मे अपना आशियाना ढूँढ़ते हैं। लेकिन नीलू का भाई हमीद एक कट्टर मुसलमान है। वह नीलू को शिमला में ढूँढ़ निकालता है और उसे विश्वास दिलाता है कि वह उसके हिंदू पति सुधीर तथा उसके होने वाले बच्चे को दिल से अपना चुका है। नीलू हमीद के चालों से अनजान उसके साथ घर जाने के लिए राजी हो जाती है।

हमीद नीलू को देशी डाक्टर के पास ले जाकर जबर्दस्ती उसका गर्भपात करवा देता है एवं तरह-तरह की यातनाएँ देते हुए वापस घर ले जाता है। घर में एक अंधेरी कोठरी में बंदकर नीलू के साथ जानवरों से भी बदतर व्यवहार करता है। हमीद कहता है नीलू का पति सुधीर या तो कलमा पढ़ले,नही तो वह नीलू की दूसरी शादी मनियारी की दूकान करने वाले तीन बच्चों के बाप से करवा देगा।

नीलू की माँ भी नीलू को पीटती है। कहती है मेरी कोख ही खराब थी जो इस कुलच्छ्नी को जना । लेकिन माँ की मदद से नीलू घर से भागकर वापस सुधीर के पास शिमला पहुँचने में कामयाब हो जाती है।

उपन्यास की दूसरी मुख्य पात्र नीलिमा बहुत हीं खुबसूरत तथा खुले विचारोंवाली लड़की हैं। नीलिमा के पिता बैरिस्टर तथा आजाद ख्याल के इंसान हैं। नीलिमा अपने कालेज के साथी अल्ताफ को पंसद करती है। अल्ताफ रोज नीलिमाके घर टेनिस खेलने आया करता है। नीलिमा की दादी पुराने ख्याल की महिला है । उन्हें नीलिमा तथा अल्ताफ का मेल-जोल बिल्कुल पसंद नही है। वह हमेशा नीलिमा तथा अल्ताफ के मेल-जोल पर एतराज जताती है। नीलिमा के पिता कहते है कि नीलिमा की खुशी में ही उनकी खुशी है। किसी भी तरह बेटे को अपनी बात न मनवा पाने में असफल दादी कहती हैं- "मेरे जीते जी यह नहीं हो सकता है। मेरे आँख मूँद लेने के बाद तुम्हारे जो मर्जी में आए करना ।"

पिता और दादी में चल रहे द्वंद्व  से वाकिफ नीलिमा सुबोध नामक मध्यमवर्गीय तथा महत्वाकांक्षी लड़के से शादी कर लेती है। सुबोध को अपने कैरियर के अलावा दूसरी किसी बात का फिक्र नहीं है। शुरु-शुरु में वह नीलिमा को एक पार्टी से दूसरे पार्टीमें नुमाइश की तरह लोगों के सामने पेश कर रहा था । मानो वह आदमी नहीं टिकट से देखे जाने वाली वनमानस हो । नुमाइश की हर पार्टी में सुबोध नीलिमा को खुद तैयार करता -आज यह साड़ी पहनो , आज हरे रंग का मोतियों वाला जड़ाऊ हार पहनना । मानो कोई फैशन परेड हो रही हो। अपने रुप तथा अपनी वाकपटुता एवं हँसमुख स्वभाव की तारीफ सुनते नीलिमा थकती नहीं थी ।

सुबोध अपनी दिनचर्या का ऎसा पक्का मानो उसे कोई चाभी लगी हो , सभी काम समयानूकुल यहाँ तक की हँसना बोलना भी समय के हिसाब से करता था । पति के रुप में नीलिमा को एक टाइममशीन मिला जो अपनी पदोन्नति का रास्ता अपनी पत्नी के रुप के जरिए तय करना चाहता था नीलिमा के खुबसूरती का खुमार का दौड़ जल्दी ही खत्म हो जाता है तथा सुबोध के अत्याचार का सिलसिला शुरु हो जाता है ।

नीलिमा को अपनी मर्जी से एक पैसा खर्च करने का अधिकार नहीं था । सुबोध की मर्जी के बिना अगर वह कुछ कर लेती तो उसे सुबोध के कोप का शिकार होना पड़ता था । अगर शनिवार के दिन शाम में फ्रिज में बीयर की बोतल नहीं हो तो सुबोध ऎसा चुप्पी साधता मानो फ्रिज से भी ज्यादा ठंढ़ा हो गया हो ।अपनी बेटी को खुश रखने के लिए नीलिमा के पिता सुबोध की बदसलुकी को भुलाकर उसे कार तोहफे में देते हैं। लेकिन सुबोध का अत्याचार रुकने का नाम नहीं लेता । हद तो तब हो गई , जब सुबोध का बास मिस्टर वर्मा उनके घर के ठीक उपर वाले फ्लैट में रहने आ गए उनसे मिलने सुबोध तथा नीलिमा जब उनके घर जाने का निर्णय लेते हैं तब मिसेज वर्मा के घर के सामने अचानक सुबोध की नजर नीलिमा के नंगे पाँव पर जाती है। यह क्या ! सुबोध वहीं नीलिमा को एक चाँटा लगा देता है।

नीलिमा अपने आप को खत्म करने का निर्णय लेती है।गुसलखाने मे मोमबत्ती से अपने आप को आग लगा लेती है। बीयर के नशे में धुत्त सुबोध नीलिमा के चीख पुकार से अनभिज्ञ रहता है। नीलिमा शिमला अपने चाची तथा पिता के साथ अस्पताल मे अपना उपचार करवाती है । वहीं उसकी मुलाकात अपनी सखी नीलू से होती है। दोनो एक दूसरे को अपनी आपबीती सुनाते हैं।नीलिमा के पिता निर्णय लेते हैं कि नीलिमा उस घर मे वापस कभी नही जाएगी । दादी समझाती है-"पति पत्नी के मन मुटाव को तुम बहुत तुल दे रहे हो । ऎसी घटना किस घर मे नहीं घटती ? तेरे बाप ने मुझे मायके भेज दिया था और पूरे तीन साल तक मेरी खोज -खबर नही ली थी , पर मेरी गृहस्थी तो नही टूटी थी । नीलिमा के बच्चे हो जाए देखना कितना जल्दी सुबोध का मन बदल जाएगा । बहू से प्यार न करे अपने बेटे से तो प्यार करेगा । लड़की जून ही अभागी जुन होती है। उसे बहुत कुछ भोगना सहना पड़ता है । " (पृ.सं.134)

दादी माँ का यह मानना था कि " स्त्री दुःख भोगने के लिए संसार में आती है। उसे अपना सर्वस्व देना हीं देना है , जीवन से कुछ माँगना नहीं है । किसी चीज की अपेक्षा करनी नहीं है। स्त्री पराधीन होती है बेटा तुम नई रोशनी के लोग हो तुम्हें कोई क्या समझाए । तुम बराबरी की बात करते हो , पर बेटा बराबरी नाम की कोई चीज नहीं होती है। एक दूसरे को आँख दिखाने से कुछ नहीं होता घर में रहेगी तो उसका दर्जा माँ का तो होगा घरवाली का तो होगा पर बराबरी का नहीं होगा ।तलाक लेगी तो भी उसी की मिट्टी पलीद होगी । "

दादी माँ पुरातन पंथी ही नही थी उनमें वैराग्य भाव भी कूट-कूट कर भरा था । सच तो यह है कि उन्हें इस बात की अपेक्षा नहीं थी कि स्त्री का जीवन कभी सुखी हो सकता है। हर स्त्री को अपना भाग्य वहन करना है , यही कुछ वह जानती थी । यही कुछ जीवन के दसियों साल के अनुभव से उन्होनें सीखा था । हमारी बच्ची भोली है। उसने बता दिया होगा कि उसका उठना बैठना उस मुसलमान लड़के के साथ था और यह बात उस के दिल को काट मार गई होगी । धीरज रखो बेटा धीरज ही इसका इलाज है। नीलिमा के पिता अपने आप को गुनाहगार मानते हैं - " मैं हीं अंधा बना रहा । मैंने बेटी के इस विवाह को क्यों नहीं रोका ? " इधर स्त्री जीवन का यथार्थ धीरे-धीरे नीलिमा को घेर रहा था । नीलिमा एक सख्त निर्णय लेती है । वह वापस जाएगी सुबोध के पास गहरे आत्मविश्वास के साथ , अपने आप को किसी भी क्षण कमजोर नहीं होने देगी । चाहे जो हो जाए हालात के सामने घुटने नहीं टेकेगी । सुबोध नीलिमा का यह बदला रुप देखकर हैरान रह जाता है।

’नीलू नीलिमा नीलोफर ’ प्रेम कहानी है। प्रेम कहानियों में अड़चने उठती है, कभी आर्थिक विषमताओं के कारण , कभी जाति भेद के कारण , कभी पारिवारिक मतभेद के कारण । इस कहानी में भी अवरोध उठते हैं, परस्पर प्रेम के कोमल तंतुओं को कुचलने के लिए । अंतर केवल इतना है कि इस प्रेम कहानी मे उठने वाले अवरोध कुछ ऎसे पूर्वग्रह लिए हुए हैं जिनकी जड़ें  समाज में बहुत गहरी हैं और जिनकी भूमिका कभी -कभी दारुण भयावह रुप ले लेती है।

"इन अवरोधों से जूझना एक तरह से अपने परिवेश से जूझना भी है। इस परिवेश में अपने को खोजना भी है। अपने को पहचान पाने का प्रयास भी है ।" (आमुख)

इस उपन्यास में रिश्तों के अतीत तथा वर्तमान को जिन्दगी के भोगे अनुभव और संस्कार , नारी के ममत्व ,अपनत्व और उसके घनत्व के प्रभाव को पूरी सहजता के साथ प्रस्तुत किया गया है। दूसरी तरफ इस उपन्यास में पारिवारिक संबंधों में आई संवेदनशून्यता को बड़ी सहजता के साथ रेखांकित किया गया है।

अंत में उपन्यास इस निष्कर्ष पर पहुँचता हैकि औरतों के दमन में सिर्फ समाज के पिछड़े वर्ग हीं सक्रिय नहीं होते , बल्कि तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग भी शामिल है। इसी माहौल में उपन्यास के पात्र अपनी जिन्दगी का ताना बाना बुनते हैं।