बुधवार, 3 फ़रवरी 2010

घर-बाहर

औरतें
और अपने घरों सें;
निकल कर भी
करती हैं मेहनते ,
लड़ती हैं सुबह से शाम तक
या फिर कानाफूसी करती हैं बैठकर
चबूतरे पर शाम तक
मौसम के भीतर उठता है
वसंत ,
लेकिन घरों में कभी नहीं बदलता
मौसम ,
इनकी आँखों में ठहरते हैं ,
आंसू ज्यादा देर तक
और भींगता है आँचल का छोड़
ज्यादा देर तक
नहीं देख पाती ये मौसम कैसे बदलता है ,
केवल देख पाती हैं ये
बेटियों का बढ़ना
जंगल की घास की तरह ,
बरसात के बांस की तरह
बेटियां बढ़ रही हैं
बेटियां पढ़ रही हैं
औरतों की नजर मैं रहती हैं
पढ़ती हुई बेटियां
बढ़ती हुई बेटियां
बेटियां निकल रहीं हैं घरों से
उन्हें और बढ़ना है ,
क्योंकि घरों में तो मौसम
नहीं बदलता
सिर्फ बढ़ती है बेटियां
बेटियां जो बनती हैं _औरतें

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