बुधवार, 3 फ़रवरी 2010

सम्बन्ध वध

बहुत उलझ गया है
यह रिश्ता
तो आओ सुलझा लें इसे
एक आसन तरीका अपना लें
सब कुछ भुला दें
और हो जाए दूर धीरे ....धीरे
स्लो पायजन की तरह
धीरे- धीरे मरने के लिए
फिर हर दिन एक कुल्हाडी की मार
सहन करनी होगी
तभी तो रिश्तों का वत वृक्ष
हर दिन
थोडा -थोडा कटेगा
गिरेगा और फिर ,
मर जाएगा
टूट जाएँगे रिश्ते
हरी पत्तियों से
डालियों से और उस पर बसने वाले बेनाम पंक्षियों से
एक रिश्तें से जुड़े
अनगिनत रिश्ते
पर क्या टूट पाएगा
रिश्ता जड़ों से ?
कैसे निकल पाएगा
स्नेह का बीज
जो दबा हुआ है कहीं गहराइयों में
बड़े स्वार्थी हैं हम
दर्द से डरते हैं ,घबराते हैं ,
दूर भी होते हैं तो धीरे -धीरे
एक और रिश्तें का सहारा धुंध (सर्च ) लेते हैं
एक रिश्ते को ख़तम करने से पहले
पर एस तरह थोडा -थोडा मरने से
तो बेहतर है
मर जाना एक बार में ,
पर उफ !यह आदमी
किश्तों में जीने की आदत
हो गई है इसे
अब तो सम्बन्ध और प्रेम भी
टुकड़ों में होते हैं
पर क्या इतना आसान है ;
दूर होना ?
किसी को भुलाना
वृक्ष की नामो निशान को मिटाना
हर दिन अन्दर कुछ टूटता है ,
और किरेंच चुभती रहती है
बड़ी देर तक
हम भुलावे में जीतें रहतें हैं ,
की भूल रहें हैं किसी को
और हो रहें दूर धीरे-धीरे
जब -जब गहराइयों में दबे
बीज को
मिलेगी हवा,मिट्टी पानी
और अनुकूल वातावरण
हरी कोपलें फिर से फूटेंगी ,
यादें फिर हो जाएगी ताजा
और आँखे हो जाएगी नम

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