सोमवार, 10 दिसंबर 2012

अल्मा कबूतरी में सामाजिक यथार्थ


अर्पणा दीप्ति

यथार्थ मानव जीवन की सच्ची अनुभूति है जिसके द्वारा हम अपने जीवन में घटित होने वाले घटनाओं एवं भावनाओं का अनुभव करते हैं। अपनी इन्द्रियों के द्वारा समाज में होने वाले सभी प्रकार के क्रियाकलापों का अनुभव करना एवं ज्यों का त्यों कहना यथार्थ है। सामाजिक यथार्थवाद का अर्थ होता है-समाज की वास्तविक अवस्था का यथार्थ चित्रण।साहित्य लेखन और जीवन का यथार्थ दरसल एक ही कोण की दो भुजाएँ हैं। अगर मन का भावनात्मक रूप सहित्य है तो उसी की बुद्धिगत परिकल्पना यथार्थ है। युगीन यथार्थ को पहचानने के लिए जीवन के मूल स्रोतों से संबंध स्थापित करना पड़ता है।, उनसे उलझना पड़ता है। इसे सिर्फ बाहर से बाहर समझना मुश्किल है। यथार्थ हमेशा समाज से जुड़ा रहता है। वह व्यक्तिगत, समाजगत और विश्व से संबंधित है। व्यक्ति का अस्तित्व समाज से और समाज का अस्तित्व विश्व से है। डॉ. त्रिभुवन सिंह के अनुसार 

"सामाजिक यथार्थवाद का अर्थ होता है समाज की वास्तविक अवस्थाओं का यथार्थ चित्रण। परंतु साहित्य के अंदर किसी भी वस्तु का चित्र उतार कर रख देना कठिन होता है क्योंकि सहित्यिक चित्र कैमरा द्वारा लिया गया चित्र नहीं होता है, बल्कि वह साहित्यकार की सूची के द्वारा चित्रित किया गया ऎसा चित्र है जिसमें साहित्यकार के अनुभव एवं कल्पना के सुंदर रंग ढले होते हैं। सामाजिक विषमताओं, भ्रष्टाचारों तथा वैयक्तिक स्वार्थों से आक्रांत, पीड़ित समाज की दयनीय परिस्थितियों को उसके वास्तविक रूप में समाज के सामने प्रस्तुत करना सामाजिक यथार्थवाद का प्रधान लक्ष्य है। सामाजिक यथार्थवादी साहित्यकार समाज और व्यक्ति के पारस्परिक संबंधों उसके प्रत्येक आचार-विचारों तथा उसकी राष्ट्रीय, आर्थिक एवं नैतिक अवस्थाओं का मूल्याकंन तत्कालीन परिस्थितियों के आधार पर करता है। वह केवल समाज जैसा है, वैसा ही उसका वर्णन मात्र नहीं कर देता, बल्कि उसको इस रूप में प्रस्तुत करता है जिससे पाठक युग के सत्य एवं समाज में होने वाले कार्यव्यापारों के औचित्य तथा अनौचित्य को सरलता से परख कर सकें और उन मर्यादाओं का अनुकरण कर सकें, जिस पर चलकर एक आदर्श समाज की स्थापना हो सके।" ( हिंदी उपन्यास और यथार्थवाद : प्रो. त्रिभुवन सिंह-पृ.१७) 

मैत्रेयी पुष्पा कृत ’अल्मा कबूतरी’ (२०००) में यथार्थ पानी में तेल की तरह साफ दिखता है।इस उपन्यास के माध्यम से कथाकार ने एक ऎसे विषय को उठाया है जिससे अधिकांश लोग अपरिचित हैं। अगर परिचित हैं तो उनके डरावने और अपराधित कारनामों से, उनके भीतर छिपी मानवीय संवेदनाओं और उत्पीड़न से नहीं। यह उपन्यास बुंदेलखंड की कबूतरा जनजाति के माध्यम से समाज में ’जन्मजात अपराधी’ घोषित की गई तमाम जनजातियों का ’दस्तावेज’ प्रस्तुत करता है। १८७९ ई. के अधिनियम के तहत अंग्रेजों ने इन्हें जन्मजात अपराधी घोषित कर दिया था। वास्तव में अपने देश को अपनी नागरिकता को बचाने के लिए वे अपनी ताकत भर अंग्रेजों से लड़े थे। इसलिए इन्हें सजा के तौर पर १८७९ ई. के अधिनियम के तहत अंग्रेजों ने इन्हें ’जन्मजात अपराधी’ घोषित कर दिया था।  यह प्रथा आज तक चली आ रही है। डॉ. डी. एन मजमूदार के अनुसार-

"नर विज्ञान और रक्त विज्ञान द्वारा जो भी आँकड़े प्राप्त हुए हैं उन से केवल यह पता चला है कि वे विशुद्ध जातियाँ नहीं हैं, अन्य जातियों के मिश्रण से बनी है और उनमें ’बी’ रक्त का बाहुल्य है। इसके अतिरिक्त उनकी शारीरिक बनावट और शारीरिक रक्त का कोई दोष नहीं है, क्योंकि उनकी शारीरिक बनावट और शारीरिक रक्त में अन्य जातियों की अपेक्षा कोई विशेष अंतर नहीं है।"(भारत की जन जातियाँ-डॉ.शिव तोष दास-पृ.सं.१७४)

मैत्रेयी पुष्पा ने 'अल्मा कबूतरी' की कथावस्तु के लिए एक ऎसी जनजाति को चुना जिन्हें समाज मे अब तक कोई स्थान नहीं मिल सका है। कथावस्तु का चयन करते समय मैत्रेयी पुष्पा के मस्तिष्क में शायद यह बात रही हो कि हिंदी कथा साहित्य में इस विषय की ओर कम ध्यान दिया गया हो। यह ठीक है कि प्रेमचंद ने अपने कथा साहित्य में अपेक्षित वर्ग को स्थान दिया। लेकिन उन लोगों में और आदिवासियों में बहुत फर्क है। साथ ही मैत्रेयी पुष्पा ने अल्मा कबूतरी  में नायक को न चुनकर नायिका को चुना है।

’अल्मा कबूतरी’ नायिका प्रधान उपन्यास है अत: लेखिका ने इस उपन्यास को लिखते समय समाज के यथार्थ चित्रण के साथ-साथ आदिवासियों खासकर महिला आदिवासियों की समस्याओं को मुख्य रूप से रेखांकित किया है। मुख्य रूप से उपन्यास का ताना-बाना स्त्री शोषण तथा स्त्री संघर्ष से बुना गया है। इसके अलावे उपन्यास की अन्य प्रमुख समस्याएँ द्रष्टव्य है यथाः-
१.जात-पात तथा ऊँच-नीच की समस्या
२.अनैतिक संबंधों की समस्या
३.अंधविश्वास की समस्या
४.निर्धनता एंव बेरोजगारी की समस्या
५.अशिक्षा
भारत में आज भी कुछ ऎसी अभागी जनजातियाँ हैं जो आजादी का अर्थ नहीं जानती उनके पास न तो अपना जमीन है और न ठिकाने का घर। औपनिवेशिक शासन ने उन्हें ’जरायमपेशा’ जाति घोषित कर न केवल तथाकथित ’सभ्य समाज’ के नजरों में उपेक्षा और घृणा का पात्र ही नहीं बल्कि पुलिस अत्याचार का नरमचारा भी बना दिया। यद्यपि देश के आजाद होने के बाद इन जातियों को समान नागरिकता का अधिकार प्राप्त तो हो गया, पर जीविकोपार्जन का कोई सम्मानजनक साधन उपलब्ध नहीं होने के कारण इनके पुरुष अपराधकर्म और स्त्रियाँ देह व्यापार के लिए विवश होती है। मैत्रेयी पुष्पा ने ’अल्मा कबूतरी’ में इस कटु यथार्थ को गहरी संवेदना तथा जबर्दस्त सृजनात्मकता के साथ प्रस्तुत किया है।
१९३६ में जनजातियों की संपूर्ण स्थिति को देखते हुए जवाहरलाल नेहरू ने एक अधिनियम बनाने की घोषणा की जिसमें उन्हें अपराध से मुक्त घोषित किया गया था। १९५२ में प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने इस घोषणा को लागू भी किया। देश को स्वतंत्र होकर ६२ वर्ष बीत चुके हैं लेकिन स्थिति आज भी ज्यों की त्यों बनी हुई है। ’अल्मा कबूतरी’ को पढ़ने के बाद पाठक वर्ग का यथार्थ की एक ऎसी दुनियाँ से साक्षात्कार होता है जँहा स्त्रियाँ अपने आपको बेचकर अपने बच्चों का पालन पोषण करती हैं और इनके पुरुष इन बच्चों की सलामती के लिए अपना जान तक कुर्बान करने से पीछे नहीं हटते। वहीं समानातंर में स्त्रियों का एक ऎसा वर्ग भी है जो ऎशो आराम से जीता है जिन्हें लेखिका ने ’कज्जा’ का नाम दिया है। ये कज्जा वर्ग के पुरुष अपनी कामवासना की पुर्ति के लिए कबूतरी स्त्रियों का इस्तेमाल करते हुए उनका शोषण करते हैं और उन्हें मुहरे की तरह बाजी पर भी लगा देते हैं। उपन्यास पढ़कर ऎसा प्रतीत होता है कि अपराधी कबूतरा जनजाति नहीं बल्कि अपराधी अपने को सभ्य कहनेवाला असभ्य और बर्बर समाज है जो इन जनजातियों को ’अपराधी’ बने रहने पर विवश कर देता है; वे उठना चाहे तो न उठने दे, पढ़ना भी चाहे तो न पढ़ने दे। सभ्य समाज का कानून और पुलिस उन्हें अपराधी और असभ्य इसलिए बनाए रखना चाहती है ताकि उन्हीं के रू-ब-रु वे अपने को सभ्य और सुसंस्कृत कर सके।

(अ) "हम लोग न खेतों के मालिक न मजूर सो गोह खाते-खाते होंठ चिपचिपा गए हैं। देखें तो धरती मैया कैसी-कैसी चीजें देती हैं? जमीन में हमारा हिस्सा नहीं।"(अल्मा कबूतरी-मैत्रेयी पुष्पा-पृ.सं.५८)
(आ)"बच्चे गाँव से दूर पड़े घूरों को कुरेद आए। कुछ चिथड़े उखाड़ लाए। उन्होंने ने चिथड़े घर के भीतर माँ-काकियों के पास फेंक दिए। नहीं देखा कि वे चिथड़े गंदगी में लिथड़े है या माहवारी.....। फायदा भी क्या था दूसरा सहारा न था। माँ-काकियों के नंगे बदन रह-रहकर आँखों में छा जाते।"(वही-पृ.४७)

मुख्यत: बुंदेलखंड में बसनेवाली कबूतरा जनजाति के जीवन को उपन्यास का विषय बनाया गया है, जो अपनी वंश की परंपरा रानी पद्‍यमिनी और झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई की अंगरक्षिका झलकारी बाई से जोड़ते हैं।

"हम सब एक लकड़ी नहीं बँधे हुए गट्‍ठर हैं। तोड़ने से न टूटेंगे! चित्तौड़ से लेकर झाँसी की रानी का साथ निभाने की सजाएँ भोगो। भोगेंगे।"(पृ.सं.१७५)

 इसके साथ ही लेखिका ने समानांतर ’सभ्य’ समाज से जिन्हें वे ’कज्जा’ कहकर पुकारती हैं, शोषकवर्ग के रूप में इनका चित्रण बड़ी ही सफलता से किया है। वस्तुत: ’कज्जा’’कबूतरा’ का द्वंद ही ’अल्मा कबूतरी’का केंद्रीय विषय है। भूरी उसके बेटे रामसिंह और उसकी बेटी अल्मा की कहानी उनके अपमान, संघर्ष और पीड़ा की कहानी है। इन पात्रों ने सभ्य समाज से संघर्ष कर अपना सबकुछ दाँव पर लगा देने के बावजूद ’लहूलुहान’ कबूतरा ही रहते हैं। इसका कारण यह है कि पूरी व्यवस्था ही अपनी पूरी शक्ति के साथ उनके विरोध में खड़ी है। भूरी कज्जा समाज से टक्कर लेती है। वह शरीर का सौदा करके भी अपने बेटे को पढ़ा लिखाकर इस योग्य बनाना चाहती है, कि वह समाज मे सम्मान की जिंदगी जी सके।

"पतिविरता लुगाई अपने आदमी के संग सती होती है। मैं अपने मर्द की ब्याहता खुद को तब माँनूगी, जब रामसिंह को पढ़ा लिखाकर इसी कचहरी के दरवाजे खड़ा कर दूँगीं। भले इस सफर में मुझे दस मर्दों के नीचे से गुजरना पड़े।"(पृ.सं.७४)

 भूरी विद्या को महत्त्व देते हुए कहती है कि

 "विद्या रतन के आगे देह का खजाना कुछ भी नहीं।"(वही)

 बस्ती की सबसे पहली माँ थी भूरी जिसने बेटे को कुल्हाड़ी-डंडा नहीं थमा कर पोथी-पाटी पकड़ाया। अपने बेटे को सभ्य बनाने के लिए भूरी कबुतरा जीवन तथा बदनामी का बोझ ढ़ोने को तैयार थी। पर ऎसा नहीं हो पाता है। भूरी का बेटा रामसिंह कबूतरा बनकर ही जीने को अभिशप्त है। वह धीरे-धीरे अपनी संघर्ष की क्षमता खोकर पुलिस का दलाल बन जाता है और बेटा सिंह डाकू के नाम पर पुलिस द्वारा प्रायोजित मुठभेड़ में मारा जाता है। एक कबूतरा के ’सभ्य’ बनने की कोशिश का यह अंजाम दिखाकर लेखिका ने यथार्थ को उसके ’नग्नतम’ रूप में पेश करने का प्रयास किया है। 

 अल्मा की कहानी इस स्थिति के प्रति नारी के विद्रोह की कहानी है। वह अपने पिता के साथ रहती है, अपने साथ रहते राणा को बच्चे से मर्द बनाती है।, कुँआरी माँ बनने का साहस दिखाती है, आततायियों को साहस के साथ झेलती है, पशुओं से भी बदतर जिंदगी जीने को बाध्य होती है पर हार नहीं मानती।

(अ)"इज्जत बचानी नहीं गँवानी है, जान रखनी नहीं देनी है....भागकर कहाँ तक जाएगी फिर कोई ऎसा खतरनाक हाथ आएगा  नए नंगा करेंगे। हर आदमी की एक ही भूख।"(पृ.सं.३०७)
(आ)"पाप के खिलाफ लड़ने के लिए अपने देह से पाप को गुजार देना कितना जरूरी था।"(पृ.सं.३६८) उसकी कहानी को एक आकस्मिक मोड़ देकर अल्मा कबूतरी से श्रीमती अल्मा शास्त्री तथा बबीना विधानसभा सीट का संभावित प्रत्याशी बना दिया जाता है।

वस्तुत: ’अल्मा कबूतरी’ की नायिका अल्मा नहीं भूरी-कदमबाई तथा अल्मा का समुच्च्य है, जिसमें तमाम अन्य स्त्री पात्र भी सिमट जाते हैं। इस तरह कुल एक और एक ही स्त्री मूर्ति प्रतिष्ठित होती है ’अल्मा’। यह नामकरण तक प्रतीकात्मक है-अल्मा यानि ’आत्मा’

अब प्रश्न यह उठना स्वभाविक है कि क्या भूरी, कदम, अल्मा दलित है? क्या अल्मा कबूतरी दलित गाथा है? नहीं! दरअसल अल्मा, कदम, भूरी दलित नहीं हो सकती। ये तीनों हीं स्त्रियाँ महाकाल से टकराने में सक्ष्म है। ये तीनो पग-पग पर उत्पीड़ित होती हैं, उनका एक-एक सपना टूटता है फिर भी वे चुनौतियों से टकराती हुई संघर्ष करती है। भूरी, कदमबाई तथा अल्मा तीनों एक ही किरदार के विभिन्न अवस्थाओं के रूप हैं। जहाँ शुरूआती नायिका कदमबाई बदलाव की हताशा भरी छटपटाहट को खोलती है, वहीं भूरी विद्रोह का अंकुर प्रस्फुटित करती है, लेकिन उसे तार्किक बिंदु पर पहुँचाती है अल्मा। जहाँ वह सत्ता को वरण करने से इंकार नहीं कर पाती है। वही सत्ता जिसने भूरी और कदम ही नहीं अल्मा का भी अमानवीय शोषण किया; अस्मिता को कुचला तब भी इनकी संघर्ष यात्रा को रोक नहीं सकी। अंतत: अल्मा भी सत्तासीनों के दायरे में शामिल होकर उसी का हिस्सा बन जाती है। वही सत्ता जिसने रानी पद्‍मिनी से लेकर झाँसी की रानी की विश्वास पात्र झलकारीबाई तक की बलि ली तो यह विजय है या आत्मसमर्पण! विजय भले ही नहीं सही पर आत्मसमर्पण कतई नहीं। हालाँकि इस बिंदु पर आकर अल्मा कबूतरी की कथा विश्राम ग्रहण करती है।

’अल्मा कबूतरी’ स्वातंत्र्योत्तर भारत में निरंतर राजनैतिक नैतिकता के क्षरण की कहानी है। वस्तुत: जहाँ पुलिसवाले अपनी अंगुलियों और हथेलियों से डंडा खेलने में व्यस्त हैं, जहाँ ज्ञान पाकर नफरत कमाई जाती है, सच्ची बातों से बचकर समाचार पत्र ईमान बेचने लगे हैं। पढ़े-लिखे लड़के कुत्तों से ज्यादा वफादार है तथा पेट की आग बुझाने के लिए अपना जमीर तक बेचने को तैयार हैं, जहाँ खुबसूरत शरीर बदसूरत भविष्य गढ़ता है वहाँ आक्रोश तक निरर्थक है। इन सभी पहलुओं को मैत्रेयी पुष्पा ने बड़े ही बेबाक तरीके से अल्मा कबूतरी में दर्शाया है।

वहीं इस उपन्यास में कई पात्रों में द्वंद दिखाई देता है। मुख्य रूप से अनेक संदर्भों में मंसाराम, कदमबाई, राणा, भूरी, रामसिंह आदि पात्र द्वंद में पड़ जाते हैं। इस उपन्यास में जहाँ एक तरफ समाज शास्त्र मौजूद है तो वहीं दूसरी तरफ यथार्थ का दस्तावेज भी अपने पूर्ण साक्ष्य के साथ उपलब्ध है। मैत्रेयी पुष्पा के लेखन की सबसे बड़ी विशिष्टता यह है कि वे लोक जीवन एवं सामान्य-जीवन से कथा वस्तु का चुनाव करती हैं तथा स्त्रीपात्र को उसके केंद्र में रखती हैं। मैत्रेयी पुष्पा ने अपने सभी उपन्यासों में नायिकाओं को विजय की स्थिति में पहुँचाया है अल्मा भी इनसे अछूता नहीं रहती। यह उपन्यास अपराधी जनजाति यानी क्रिमिनलाइब्स से संबंधित है एवं अपराधी जनजाति कबूतरा के समाज की मुख्यधारा में शामिल होने की प्रक्रिया पर आधारित है। यदि गैर समाजशास्त्रीय शब्दों में कहा जाए तो इनकी नियति उस ’त्रिशंकु समाज’ की है जो अवांछित बने रहकर गुजरबसर करते हैं। इन्हीं अवांछित लोगों की कथा है ’अल्मा कबूतरी’’अल्मा कबूतरी’ में अल्मा चाहे जितना संघर्ष करती है, लेकिन अंतत: एक मुकाम हासिल करती है। इस प्रकार वह किसी जनजाति विशेष की नहीं रह जाती। उसकी आशा-आकांक्षा -जिजीविषा जाति से भी आगे जाकर लिंग भेद तक को लाँघती है|

संदर्भ:
हिंदी उपन्यास और यथार्थवाद-डॉ. त्रिभुवन सिंह, ओमप्रकाशबेरी प्रकाशन, बनारस-१९५५
भारत की जनजातियाँ-डॉ. शिवतोष दास, किताबघर प्रकाशन, नई दिल्ली १९८३
अल्मा  कबूतरी में सामाजिक यथार्थ-एम.फिल शोधप्रबंध-२००८-अर्पणा दीप्ति 



2 टिप्‍पणियां:

  1. मैंने अभी यह उपन्यास नही पढा । लेकिन मैत्रेयी जी ने इसे लिखने के लिये कितनी मुसीबतों का सामना किया कहाँ-कहाँ कितने अपमान व शर्म का सामना करना पडा यह उनकी आत्मकथा में पढने मिला । निश्चित ही यह उनके उत्कृष्ट लेखन का ही नही ,उनके संकल्प और साहस का भी प्रतीक है । अद्भुत लेखिका हैं मैत्रेयी पुष्पा जी ।

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  2. मैत्रेयी जी की लेखनी को पुन: नमन !

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