सोमवार, 27 अगस्त 2012


आत्म सत्य का औपन्यासिक दस्तावेज : कस्तूरी कुडंल बसै

अर्पणा दीप्ति

हिंदी कथा-लेखन के क्षेत्र में जिन कतिपय महिला लेखिकाओं ने सर्वाधिक ख्याति अर्जित की है उनमें मैत्रेयी पुष्पा एक सम्मानित नाम है। १९९० में प्रकाशित ’स्मृति दंश’ तथा १९९३ में प्रकाशित ’बेतवा बहती रहे’ जैसे उपन्यासों के माध्यम से पुरुष वर्चस्व प्रधान समाज में अत्याचार झेलती स्त्री की करूण गाथा प्रस्तुत की तो १९९४ में ’इदन्नम्म’ में उस करूणा को जुझ और संघर्ष में बदलते हुए दिखाया। १९९७ में प्रकाशित ’चाक’ की नायिका सारंग नैनी शोषण और अत्याचार को चुनौती देने के लिए ग्रामीण राजनीति में प्रवेश करती है एवं ’झूलानट’ की शीलो विवाह संस्कार की निरर्थकता को समझकर अपनी नियति को बदलने वाली अद्‍भुत जिजीविषा संपन्न स्त्री है। २००० में प्रकाशित ’अल्मा कबूतरी’ में लेखिका ने सभ्य कहे जाने वाले असभ्य और बर्बर समाज का तल्ख चित्रण किया है। विजन, अगनपाखी और औपन्यासिक आत्मकथा ’कस्तूरी कुडंल बसै’ २००२ में पुरुष समाज की रूढ़ियों से तय की गई नियति के प्रति स्त्री का विद्रोह एक स्पष्ट विमर्श के रूप में उभरकर सामने आया है।

      जैसा कि इस उपन्यास के आवरण पर लिखा है ’हर आत्मकथा एक उपन्यास है और हर उपन्यास एक आत्मकथा।’ दोनों के बीच सामान्य सूत्र है ’फिक्शन’। जो तत्त्व किसी आत्मकथा को श्रेष्ठ बनाता है वह है उन अंतरंग और लगभग अनछुए अकथनीय प्रसंगों का अन्वेषण और स्वीकृति जो व्यक्ति की कहानी को विश्‍वसनीय और आत्मीय बनाते हैं। हिंदी साहित्य में महिला रचनाकारों की गिनी-चुनी आत्मकथाएँ ही सामने आई हैं। इन्हें पढ़ते हुए कबीर की उक्ति ’सीस उतारै भूंई धरै’ की याद आती है यह साहसिक तत्त्व ’कस्तूरी कुडंल बसै’ में दिखाई देती है। 

      ’कस्तूरी कुडंल बसै’ अपने लिए जगत बनाती विद्रोही स्त्री कस्तूरी के जीवन संघर्ष  की दास्तान है। पुरुष वर्चस्वीय सामाजिक बंधन में, स्वतंत्र और आत्मनिर्भर होने के प्रयास में स्त्री को किन-किन समस्याओं से गुजरना पड़ता है, स्त्री के इसी जद्‍दोजहद का आख्यान इस उपन्यास में प्राप्त होता है। कस्तूरी अभावग्रस्त ब्राह्मण परिवार की छोटी लड़की है। संग सोने और बैठने की शर्त पर जो खाने ओढ़ने का प्रबंध करता है, वह पति है। ऎसी रूढ़िगत मर्यादाओं के तहत कस्तूरी की मर्जी के खिलाफ उसकी शादी बूढ़े एवं बीमार हीरालाल से हो जाती है। पति के मौत पर रेशम कुँवर की तरह सती होने के बजाए वह ढ़ाई मील दूर इग्लास की पाठशाला में पढ़ने जाती है। डेढ़ साल की बच्ची को बूढ़े और अपाहिज ससुर को सौंपकर वह निडर अपनी राह बनाती है। इस निडर, बहादुर, दृढ़ संकल्पी माँ की बेटी के रूप में मैत्रेयी, इस उपन्यास में अपनी अलग भूमिका निभाती है।
      उपन्यास का आरंभिक वाक्य है- ’मैं ब्याह नहीं करूँगी’ सोलह वर्षीय लड़की कस्तूरी का यह वचन माँ के कानों पर धमाका मारता है। रात में अपनी चाची द्वारा पूछे जाने पर वह कहती है-"डर! डर ही तो लगता है ब्याह से बड़ा डर लगता है।" (पृ.सं.१०) ये दोनों वाक्य विवाह रूपी संस्था की संरचना में जो खोखलापन और खोट है, इसकी ओर इशारा करते हैं। अंतत: सामाजिक मान-मर्यादाओं के पालन, कुल परिवार की हिफाजत के लिए विवश होती कस्तूरी की शादी हीरालाल से होती है।

      ससुराल में मुँह दिखाई रस्म में औरतों से वह चिढ़ जाती है। एक बूढ़ी का कथन उसे आतंकित करता है-"ओ आठ सौ की घोड़ी, तू मुँह नहीं दिखाती तेरी यह मजाल! कस्तूरी सब कुछ समझ लेती है कि ब्याह के नाम पर जो खरीददारी चलती है, उसमें वह कैसे बिकाऊ चीज बन गई है। वह खरीदी गयी घोड़ी से ज्यादा कुछ नहीं, यह सोचते ही घोड़ी घूँघट नहीं मारा करती, झटके से घूँघट उतार फेंका। औरतें सन्न रह जाती हैं।"(पृ.सं.१७) औसत भारतीय स्त्री की भूमिका अदाकर अपने आपको गुलामी के बोझ तले दबाना वह पसंद नहीं करती। असल में रीति रिवाजों और आचार-व्यवहार के व्यवस्था के समर्थन में बेटियों को ’कंडीशनिंग’ करने में माँ रूपी ’सिस्टम’ का बड़ा हाथ है। 

      कस्तूरी औसत नारी के रूप में जीवनयापन करना नहीं चाहती। अपने पति की मृत्यु के पश्चात घर की सारी जिम्मेदारी कस्तूरी पर आ जाती है। ऎसे में एक जोखिम भरा निर्णय कस्तूरी के पढ़ाई का प्रण। "बिना घूँघट के बहू हाथ में किताब कापी भरा झोला"(पृ.सं.३०) लोग जो चाहे सोचे, कस्तूरी बेफिक्र है। आत्मविश्‍वास से भरा पूरा निर्णय। स्त्री मुक्ति के दौर में अपमान और शोषण के खिलाफ लड़ने के लिए लड़ैत और कठकरेज होना आवश्यक है। "नंगे पाँवो रास्ता नापती स्त्री की सारी दौलत किताब-कापियाँ हो गईं, जिन की झोली लटकाए वह सूरज और चंद्रमा के साथ समय की परिक्रमा करती रही और धरती के सारे दोषों से दूर होती जाती।"(पृ.सं.३२)

      पितृसत्तात्मक समाज की स्त्री के प्रति जो अनीतियाँ हो रही हैं, उसकी शिकार रही कस्तूरी उनके विरोध की शक्ति अर्जित करती है उसके लिए शिक्षा ही एकमात्र उपाय रहा। अपने पैरों पर खड़े होने की अदम्य आकांक्षा उसे अब मुसीबतों को झेलने के लिए सुसज्जित करती है। आत्मनिर्भर होने का यह निर्णय उसके परिवार की भलाई पर लक्षित है। अति संकटपूर्ण रास्ते से वह अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए कटिबद्ध है। "यह राँड क्या हुई, साँड हो गई। न बच्ची पर ममता न बूढ़े ससुर का रहम। पढ़ाई-लिखाई का भजन करती हुई दोनों को रौंद रही है।"(मिथिला की लोकोक्ति का अनुवाद) यह गाँव की स्त्रियों की प्रतिक्रिया है। लेकिन पढ़लिखकर जब वह नौकरी पा जाती है तो उनकी नजर में देवी बन जाती है।

     ’कस्तूरी कुडंल बसै’ की आरंभिक टिप्पणी में लेखिका कहती है, "यह हमारी कहानी है। मेरी और मेरी माँ की। आपसी प्रेम, घृणा, लगाव और दुराव की अनुभूतियों से रची कथा में बहुत सी बातें ऎसी हैं जो मेरे जन्म के पहले घटित हो चुकी थी, मगर उन बातों को टुकड़े-टुकड़े में माताजी ने जब तब बता डाला इसकी फलश्रुति स्वरूप यह उपन्यास पाठकों के सामने है।" कस्तूरी और मैत्रेयी के बीच के संबंधों में जो कुछ घटित होता है, उसके द्वारा जो कथा-विस्तार संभव होता है, असल में स्त्री अस्मिता के तहत होनेवाली आकांक्षाओं और संवेदनाओं का आख्यान है यह। ’कस्तूरी कुडंल बसै’ एक कठकरेज लुगाई के रूप में बेरंग कपड़े, उजरा सूना चेहरा, नंगे बूचे हाथ, बैरोनक खुरदरे पाँव कस्तूरी का यह रूप दरसल में स्त्री के साज शृंगार के खिलाफ एक मुहिम है। "सुख पति के जमाने में क्यों नहीं था ? इस सवाल से कस्तूरी अक्सर जुझने लगती है। स्त्री के जीवन में बचपन से लेकर म्रुत्युपर्यंत पुरुष का साया ही सुख माना जाता है जबकि उसको कभी सुरक्षा तक महसूस नहीं हुई।" (पृ.सं.३५) क्या ये मान्यताएँ कस्तूरी के संदर्भ में झुठी थी या फिर मान्यता केवल मानने भर तक ही सीमित थी?

      कस्तूरी स्त्री संघर्ष का जो बीड़ा उठाते है उसे कहीं अंजाम पर पहुँचा देने में वह सफल होती है। उसे अपनी बेटी पर बड़ी आशा-अभिलाषाएँ थी- वह स्त्री के सशक्तिकरण की मशाल अपने हाथ में ले लेगी। लेकिन यह गलत साबित हुआ। बी.ए. में पढ़ने वाली मैत्रेयी माँ से कहती है-"माताजी मेरी शादी करा दो।"(पृ.सं.५८) कस्तूरी के सारे सपने, संकल्प टूट जाते हैं। कस्तूरी चाहती है कि उसकी बेटी पढ़ लिखकर स्वावलंबी बने। पुरुष सत्तात्मक समाज के दकियानूस आचार-विचारों के खिलाफ लड़ती कस्तूरी बेटी की परवरिश में असफल हो जाती है। "कस्तूरी के जीवन में बहुत शोरगुल मचे हैं, मगर ऎसा हंगामा कभी हुआ नहीं। तब भी नहीं हुआ जब वह विवाह के योग्य लड़की थी और घरवालों ने उसे दो पीतल के कलशों के तरह ही बेच दिया था, कलशे बनिया को कस्तूरी आदमी को। इसके बाद भी नहीं, जब मुँह दिखाई के समय औरतों ने उसे आठ सौ में खरीदी घोड़ी कहा था। उस दिन भी नहीं जब बीस दिन जीकर उसका बेटा मर गया था और उस रात को पति उसी घर में पर स्त्री के संग.... तब भी नहीं जब पति का स्वर्गवास हो गया और तब भी नहीं जब भाई दिलासा देने की जगह लूट मचाने लगा। इतनी  इतनी विपदाएँ टूटीं वह न दहलीं न हिलीं। फिर आज क्या हुआ? क्या उनके जीवन में मैत्रेयी ही सबसे बड़ा स्थान पा गई है?"(पृ.सं.११४) बढ़ती उम्र में बेटी के लिए माँ की ओर से जो कुछ शारीरिक और मानसिक विकास के लिए आवश्यक है, वह सब ढ़ोने में कस्तूरी पराजित हो जाती है। वह अपने जीवन संघर्ष में यह भूल जाती है कि स्त्री के रूप में एक ’करेक्टर कोड’ जो माताएँ अपनी बेटियों को बचपन से देती आ रही है, वह चाहे गलत हो या सही उसे देने में कस्तूरी पिछड़ती रही।

      मैत्रेयी के व्यक्तित्व निर्माण में माँ के रूप में कस्तूरी का रोल कहाँ तक सही रहा, यह सोचने का विषय है। बचपन से ही माँ की ममता और प्यार से मैत्रेयी वंचित रही। पढ़ाई-लिखाई में उसकी रूचि नहीं रही। ग्रामीण परिवेश में अनियंत्रित और बेसहारा मैत्रेयी के लिए जीवन संघर्षपूर्ण रहा। माँ अपनी तरह बेटी अपनी तरह। मैत्रेयी के लिए बड़ी समस्या यह रही कि वह लड़की है। कस्तूरी ने जिस जगह में रहकर मैत्रेयी के लिए पढ़ने का इन्तजाम किया वहाँ उसका अपना कोई नहीं था। इस स्थिति में उसका बिगड़ जाना स्वाभाविक था। बचपन से वह जिन पुरुषों के संपर्क में आई, इन सबने उसका शोषण किया। साइकिल वाला जगदीश से लेकर डी.बी. कॉलेज के प्रिन्सिपल तक। इसी परिवेश में मैत्रेयी माँ से अपनी शादी की अपील करती है।

      बेटी के लिए वर की तलाश में निकली कस्तूरी के सम्मुख बहुत सारी मुसीबतें खड़ी होती है। पहले ही हमारा समाज ब्याह जैसे सामाजिक रस्मों के प्रति सामंती मूल्य मर्यादाओं का पक्षपाती है। लेकिन मैत्रेयी के प्रसंग में माँ कस्तूरी प्रगतिशील विचारधारा की स्त्री है। वह ग्रह, कुंडली तथा खानदान के बदले लड़के की डिग्री और पेशे के बल पर शादी करा देना चाहती है। किंतु एक विधवा होने के नाते और अपने नये विचारों के नाते कस्तूरी को जगह-जगह अपमानित होना पड़ता है। इंजीनियर अयोध्या प्रसाद के साथ शादी तय होती है किंतु मैत्रेयी के स्वस्थ विचार पर वह रिश्ता टूट जाता है। और अंत में डाक्टर के साथ शादी हो जाती है। लेकिन यहाँ विडंबना यह है कि लड़की को देखे बिना डाक्टर ब्याह के लिए हाँ कर देता है दहेज के बारे में वह बेफिक्र है। क्योंकि मैत्रेयी इकलौती बेटी है, यह उसको पता है। यहाँ शोषण का तरीका बिल्‍कुल साफ है, किंतु सलीके से किया जाता है।

      उपन्यास के आरंभ में कहा गया है कि हम माँ बेटी की कहानी है। किंतु इसमें माँ और बेटी का चरित्र बिल्कुल अलग है। जहाँ माँ एक तरफ स्त्री की स्वतंत्रता और अस्मिता की मुहिम चलाती रही है तो वहीं दूसरी ओर बेटी इसके विपरीत विवाह संस्था की सुरक्षा में आकर्षित होकर पूर्णता और आत्मविस्तार की कामना करती है। माँ की ममता और प्यार की अभाव में बचपन से पलती आयी मैत्रेयी का पुरुषों से कोई परहेज नहीं रहा। उनके लिए जीवन की सारी चेतना और विद्रोह प्रेम एवं देह संबंधों के इर्द-गिर्द घूमता रहा। कहीं अन्यत्र लेखिका कहतीं हैं "श्‍लीलता की रक्षा के लिए मैं जिंदगी तबाह कर दूँ, ऎसा दबाब मानने से मैं इनकार करती हूँ" (सुनो मालिक सुनो, लक्ष्मण रेखा की चुनौतियाँ, पृ.१) 

        ’कस्तूरी कुंडल बसै’ स्त्री पक्षधरता के उपान्यासों में ऊँचा स्थान अलंकृत करता है। स्वतंत्रता, समता, स्वत्वानवेषण और स्वालंबन की जो चर्चा स्त्री मुक्ति आंदोलन के प्रसंग में जोरों पर हो रही है उस वैचारिक मुद्‍दो को अपनी नायिका के जीवन संघर्षों के माध्यम से उजागर करने में मैत्रेयी पुष्पा पूर्णतः सफल रहीं हैं। दो पीढ़ियों  के विचार, मूल्य संकल्पनाएँ, धर्म, जाति, कुलसंप्रदाय आदि धारणाएँ इस उपन्यास में सर्वत्र बिखरी पड़ी हैं।  स्त्री की शक्ति उसके अपने अंदर ही छिपी हुई होती है जैसे कस्तूरी मृग के नाभि में। किंतु इस शक्ति को पहचाने बिना जीवन में जो कुछ घटित होता है उसे नियति मानकर गुलाम की जिंदगी नारी के लिए अभिशाप है। जागो, शक्ति संभालो और जीवन जियो स्त्री के लिए मैत्रेयी का यही संदेश है।





        

शनिवार, 18 अगस्त 2012

उपन्यासों में स्त्री विमर्श


लज्जा

अर्पणा दीप्ति

'लज्जा' नारीवादी लेखिका 'तस्लीमा नसरीन' का बहुचर्चित विवादास्पद उपन्यास है। इस उपन्यास के प्रकाशन से न केवल बांग्लादेश में हलचल मची बल्कि भारत में काफी उफान उठा। सीमापार (भारत) के लोगों ने जहाँ इस उपन्यास को सिर माथे से लगाया वहीं बांग्लादेशी कट्‍टरवादी सांप्रदायिक ताकतों (कठमुल्लाओं) ने लेखिका के विरूद्ध फतवा जारी करके सजा-ए-मौत मुकर्रर कर दी। कारण यह है कि उपन्यास बांग्लादेशी हिंदू विरोधी मानसिकता तथा सांप्रदायिकता पर कठोर प्रहार करता है, एवं वहाँ के नरक का लोमहर्षक चित्रण करता है जो वहाँ रहने वाले हिंदूओं की नियति बन चुका है।
       वस्तुत: 'लज्जा' को पढ़ना दुधारी तलवार पर चलने जैसा है। लज्जा जहाँ एक ओर मुस्लिम सांप्रदायिकता को बेनकाब करती है वहीं हिंदू सांप्रदायिकतावादी ताकतों की भी बखिया उधेड़ती हुई नजर आती है।

       'लज्जा' की शुरूआत ६ दिसंबर १९९२ को भारत में कारसेवकों द्वारा अयोध्या स्थित बाबरी मस्जिद का ढ़ाँचा गिराए जाने एवं बांग्लादेशी मुसलमानों की आक्रामक प्रतिक्रिया से होती है।

        उपन्यास की कथावस्तु सुरंजन तथा माया के इर्द-गिर्द घूमती है। सुरंजन हिंदू परिवार से है तथा मुसलमान लड़की परवीना से प्रेम करता है। लेकिन दोनों के बीच मजहब दीवार बनकर खड़ा हो जाता है एवं सुरंजन को अपने प्यार से हाथ धोना पड़ता है। माया सुरंजन की बहन है जिसका दंगाईयों द्वारा अपहरण कर लिया जाता है। सुरंजन के माता-पिता (किरणमयी तथा सुधामय) अपनी बेटी माया तथा बेटे सुरंजन से बहुत प्यार करते हैं। माया की तलाश में कथावस्तु आगे बढ़ती है। एक दस बर्षीय बच्ची मादल को देखकर किरणमयी सोचती है "काश उसकी बेटी भी दस बरस की होती तो दंगाई उसे उठा न ले जाते।"(पृ.सं १२६) सुरंजन सोचता है, "वे लोग माया को क्यों उठा कर ले गए? माया हिंदू है इसलिए? और कितने बलात्कार, कितने खून, कितनी धन-संपदा के बदले हिंदूओं को उस देश में जिंदा रहना पड़ेगा; कछुवे की तरह सिर गड़ाए। कितने दिन तक? (पृ.सं. १२६) सुरंजन अपने आप से इस प्रश्न का जबाव चाहता है लेकिन उसे जबाव मिल नहीं पाता।

        सुरंजन का मित्र हैदर माया की तलाश जारी रखने से इसलिए मना कर देता है, क्योंकि वह अवामी लीग का सदस्य है तथा अपने हिंदू मित्र की मदद उसकी तरक्की के राह में रोड़े अटका सकती है। कोई भी समाज या राष्ट्र किसी व्यक्ति विशेष का देन नहीं हो सकता ठीक उसी प्रकार बांग्लादेश का उदभव भी वहाँ के नागरिकों का सामूहिक प्रयास था- "बांग्लादेश का निर्माण यूँ ही नहीं हो गया हिंदू, बौद्ध, क्रिश्चियन, मुसलमान सभी का इसमें समान त्याग है, लेकिन किसी एक धर्म को राष्ट्रधर्म घोषित करने का अर्थ होता है दूसरे व्यक्ति के मन में अलगाववाद को जन्म देना।"(पृ.सं.११२)  इसका पुख्ता प्रमाण इन बातों से मिलता है जब माया स्कूली बच्चों से तंग आकर अपने भाई सुरंजन से कहती है "अब मैं हिंदू नहीं रहूँगी वे मुझे हिंदू कहकर चिढ़ाते हैं।" प्रति उत्तर में पिता सुधामय कहते हैं-"तुम हिंदू हो किसने कहा? तुम मनुष्य हो मनुष्य से बड़ा इस दुनिया में कोई नहीं।"(पृ.सं.१०२) वस्तुत: धर्म का राजनैतिक इस्तेमाल पाकिस्तान बनने के साथ ही शुरु हो चुका था लेकिन वही धर्म का बंधन पाकिस्तान को एक नहीं रख सका। यह भी अक्षरश: सत्य है कि बांग्ला-मुक्ति संग्राम धर्म निरपेक्ष संघर्ष था लेकिन धर्मनिरपेक्षता का यह सिद्धांत स्वातंत्र्य बांग्लादेश में ज्यादा समय तक टिक नहीं पाया तथा पाकिस्तान का अनुसरण करते हुए बांग्लादेश को भी मुस्लिम राष्ट्र बनाने पर जोर दिया गया।

        ये वही सुधामय थे जिन्होंने चौंसठ में अयूबशाही के विरूद्ध नारा लगाया था "पूर्वी पाकिस्तान डटकर खड़े होओ।" (पृ.सं. १०२) लेकिन बदले में देश से उन्हें क्या मिला? किरणमयी ने पचहत्तर के बाद सिंदूर लगाना छोड़ दिया तथा सुधामय ने धोती पहनना छोड़ दिया। बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद स्थिति और भी बद से बदतर होती गयी एवं वहाँ के हिंदूओं ने यह मान लिया की उनकी नियति में अब अपमान तथा आँसूओं के सैलाब के सिवा कुछ भी नहीं है। "हिंदूओं का बलात्कार के लिए अब किसी गली कुचे में जाने की जरूरत नहीं पड़ती वह खुलेआम किया जा सकता है।"(पृ.सं. १४५)
        
        स्त्री विमर्श की दृष्टिकोण से उपन्यास की पात्र किरणमयी का चरित्र एक परंपरागत स्त्री का है जिसे अपने पति ने भी कम दुख नहीं दिए। उसे पुजा करने तथा गाना गाने का शौक था लेकिन सुधामय ने साफ शब्दों में कह दिया था इस घर में यह सब नहीं चलेगा। "इक्कीस बर्षों से वे किरणमयी के सतीत्व का पहरा भर देते रहे। उन्हें क्या जरूरत थी अपनी पत्नी के सतीत्व का उपभोग करने की?"(पृ.सं.१३०) 

        प्राय: युद्ध तथा दंगों की आखिरी शिकार औरतें ही होती हैं। अपनी बहन माया के प्रतिशोध का बदला लेने के लिए सुरंजन एक मुस्लिम वेश्या शमीमा को घर ले आता है। सुरंजन की आँखों के सामने चलचित्र की भाँति दृश्य उभरने लगता है किस प्रकार दरिन्दों ने माया का बलात्कार पशुवत किया होगा। शमीमा के साथ वह उसी क्रुरता से पेश आता है। "शमीमा के गले की खरोंच से खून निकल रहा है। कातर दृष्टि से शमीमा कहती है दस ही रुपया दे दीजिए सुरंजन पहले उसे फटकार लगाता है लेकिन अंतत: उसे दया आ जाती है दरिद्र लड़की पेट की आग बुझाने के लिए शरीर बेचती है। पैसों से एक मुट्ठी भात तो खा लेगी पता नहीं कितने दिनो से भूखी होगी।"(पृ.सं.१६४)

        उपन्यास का अंत हताशा से भरा है। सुरंजन सुधामय से कहता है हम भारत जाएँगे। सुधामय सुरंजन को फटकार लगाता है "अपना देश छोड़कर भागने में लज्जा नहीं आती है? देश! देश को धोकर पानी पीयेंगे पिताजी? देश ने आपको क्या दिया है? क्या दिया है? क्या दे रहा है मुझे? माया को क्या दिया है आपके देश ने? माँ को क्यों रोना पड़ता है? आपको क्यों रात-रात भर कराहना पड़ता है? मुझे क्यों नींद नहीं आती है?"(पृ.सं. १७३) यह हताशा सुरंजन तथा उसके देशभक्त पिता सुधामय की ही नहीं बल्कि संपूर्ण मानवता की हताशा है।

        इस उपन्यास को पढ़ने पर मन में बार-बार एक प्रश्न उठता है आखिर कब तक धर्म और राजनीति का अनुचित समिश्रण होता रहेगा। धार्मिक बर्बरता का शिकार आखिर कब तक लाखों-कड़ोरों निसहाय एवं निरपराध लोग बनते रहेंगे। मानवता के लिए इससे बड़ी लज्जा और क्या हो सकती है। क्यों इस उपमहाद्वीप की आत्मा एक नहीं है? हमें एक दूसरे की भावनाओं का ख्याल रखते हुए प्रेम तथा सौहाद्र्पूर्ण समाज की रचना करनी होगी जिसमें सभी संप्रदाय के लोग शांति एवं सम्मानपूर्वक जी सकें।