शुक्रवार, 25 अक्तूबर 2013

मुझे सहजीवन और विवाह में बुनियादी फर्क नजर नहीं आता। फर्क है तो इतना कि विवाह के सिर पर कानून की छतरी और धर्म का चंदोवा टंगा है और सहजीवन(living relationship) बिना छतरी और चंदोवे के धूप और बारिश साथ झेलने और भोगने के रोमांस से नहाया हुआ है। विवाह एक परम ठोस सामाजिक व्यवस्था है: जँहा आल-औलाद, नैहर-ससुराल, पड़ोस-मुहल्ला, पोथी-पतरा, रीति-रिवाज एवं गहना- गुड़िया, कपड़ा-लत्ता, पेटी-बक्सा साथ में कदम-कदम पर बृहत्तर समाज खड़ा है। सहजीवन है खुले द्वार का पिंजड़ा, जब तक मिठास से निभे रहो वरना तुम अपने रास्ते, हम अपने। सिद्धांत: मैं इससे सहमत हूँ रिश्तों और पदों से तब तक ही जुड़ो, जब तक तुम्हें लगे कि तुम इन्हें व्यक्तित्व का सर्वोत्त्म दे रहे हो। अगर आपको देर से पता चलता है कि आप ऎसे दो धातु पिंड है जिनका एलॉय (alloy) बन ही नही सकता तो ऎसे बंधन को किसी बृहत्तर सरोकार के लिए ढोना व्यर्थ है। सहजीवन में आप इस बंधन को ढोने के लिए बाध्य नहीं है। किन्तु विवाह तो ऎसा फेविकॉल जोड़ है जो घसीट मारता है पर टूटता नहीं। 

शुक्रवार, 10 मई 2013

लोकनायक गोस्वामी तुलसीदास की समन्वय साधना




महात्मा बुद्ध के बाद भारत के सबसे बड़े लोकनायक महात्मा तुलसीदास थे। वे युग्स्रष्टा के साथ-साथ युगदृष्टा भी थे। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार:-"लोकनायक वही हो सकता है जो समन्वय कर सके। क्योंकि भारतीय जनता में नाना प्रकार की परस्पर विरोधिनी संस्कृतियाँ, साधनाएँ, जातियाँ, आचारनिष्ठा और विचार-पद्धतियाँ प्रचलित हैं। बुद्धदेव समन्वयकारी थे। गीता में समन्वय की चेष्टा है और तुलसीदास भी समन्वयकारी थे।" (हिन्दी साहित्य की प्रवृतियाँ-डॉ.जयकिशन प्रसाद खंडेलवाल-पृ.सं.२२३) लोकनायक उस महान व्यक्ति को कहा जा सकता है जो समाज के मनोविज्ञान को समझकर प्राचीनता का संस्कार करके नवीन दृष्टिकोण से उसमें उचित सुधार करके जातिगत संस्कृति का उत्थान करता हो। उस युग के संदर्भ में यह कहना सर्वथा उचित होगा कि गोस्वामी तुलसीदासजी की वाणी की पहुँच मानव-हृदय के समस्त भावों एवं मानव-जीवन के समस्त व्यवहारों तक दिखाई देती है। उनके काव्य में युग-बोध पूर्णरूपेण मुखरित हुआ है।

"कलि मल ग्रसे धर्म सब लुप्त भए सद्‍ग्रंथ।
दंभिन्ह निज मति कल्पि करि प्रगट किए बहुपंथ॥" 

इस प्रकार तुलसी अपनी समन्वय-साधना के कारण उस युग के लोकनायक थे। तुलसीदास में वह प्रगतिशीलता विद्यमान थी, जिससे वे परिस्थितियों के अनुकूल नवीन दृष्टिकोण अपना कर प्राचीनता का संस्कार कर सकें। इतनी विषमताओं में साम्य स्थापित करनेवाला पुरुष यदि लोकनायक नहीं होगा तो और कौन होगा? 
भक्ति शील और सौन्दर्य के अवतार तुलसी के राम:- तुलसी के राम सर्वशक्तिमान, सौन्दर्य की मूर्ति एवं शील के अवतार हैं। वे मर्यादापुरुषोत्तम हैं। 

"जब-जब होहि धरम के हानि। बाढ़हि असुर महा अभिमानी॥
तब-तब धरि प्रभु मनुज सरीरा। हरहिं सकल सज्जन भव पीरा॥"

अर्थात जब-जब समाज में विश्रृंखलता उत्पन्न होकर उसकी गति रुद्ध होती है तब-तब किसी एक महापुरुष का अविर्भाव होता है एवं गति-रुद्धता समाप्त होकर पारस्परिक सहयोग एवं समानता का वातावरण बनता है। रामराज्य भी इसी दिशा में एक कदम है। महाभारत के कृष्ण ने महाभारत का संचालन कर प्रतिकूल शक्तियों का उन्मूलन किया एवं ज्ञान, कर्म और शक्ति की एकता स्थापित की। कालातंर में कर्मकांड में हिंसा की प्रमुखता एवं ज्ञान और भक्ति का ह्रास होने पर बुद्ध अवतरित हुए। शांति, अहिंसा, मैत्री एवं प्रेम का विश्वव्यापी वातावरण तैयार हुआ जिसे साहित्य एवं इतिहास में बुद्धकाल के नाम से जाना गया। किंतु ८वीं शताब्दी में बौद्धधर्म भी कर्मकांड के जाल में फँसता चला गया, एवं दो शाखाओं में विभाजित हो गया व्रजयान और महायान। इन शाखाओं ने वाममार्गी साधना पर अधिक जोर दिया परिणामस्वरूप समाज में दुराचार एवं अव्यवस्था फैलने लगा। ठीक इसी समय जगदगुरू शंकराचार्य का प्रादुर्भाव हुआ। उन्होंने धार्मिक क्षेत्र में अद्वैत सिद्धांत की स्थापना की। जिससे कर्मकांड में उलझी जनता एवं समाज को थोड़ी बहुत राहत मिली, बाद में गोस्वामी तुलसीदास ने आदर्शहीन एवं विलासिता में मग्न समाज का उत्थान करने के लिए मर्यादा पुरुषोत्तम राम के चरित्र को मानस में उतारा। उन्होंने विशृंखल समाज को मर्यादा के बंधन में बाँधकर समन्वय की भावना उत्पन्न की और लोकधर्म का नवीन संस्कार किया। 

राम का लोकसंग्रही रूप एवं धार्मिक समन्वय:- तुलसी ने तत्कालीन बौद्ध सिद्धों एवं नाथ योगियों की चमत्कारपूर्ण साधना का खडंन करके राम के लोकसंग्रही स्वरूप की स्थापना की। राम के इस रूप में उन्होंने समन्वय की विराट चेष्टा की है। तत्कालीन समाज में शैवों, वैष्णवों और पुष्टिमार्गी तीनों में परस्पर विरोध था।  इस कठिन समय में तुलसीदास ने वैष्णवों के धर्म को इतने व्यापक रूप में प्रस्तुत किया कि उसमें उक्त तीनों संप्रदायवादियों को एकरूपता का अनुभव हुआ। मानस में तुलसी के इस प्रयत्न की झाँकी देखी जा सकती है। राम कहते हैं-
"शिव द्रोही मम दास कहावा। सो नर मोहि सपनेहु नहिं भावा॥
 संकर विमुख भगति चह मोरि। सो नारकीय मूढ़ मति थोरी॥"

इसी प्रकार उन्होंने वैष्णवों और शाक्त के सामंजस्य को भी दर्शाया है।

"नहिं तब आदि मध्य अवसाना।अमित प्रभाव बेद नहिं जाना।
भव-भव विभव पराभव कारिनि। विश्व विमोहनि स्दबस बिहारिनि॥"

पुष्टिमार्गी के ’अनुग्रह’ का महत्त्व भी दर्शनीय है-

"सोइ जानइ जेहु देहु जनाई। जानत तुमहि होइ जाई॥
तुमरिहि कृपा तुमहिं रघुनंदन। जानहि भगत-भगत उर चंदन॥"

यह तो हो गई तुलसीदास की तत्कालीन धार्मिक वातावरण एवं उसमें समन्वय स्थापित करने की बात।  इसका दूसरा पक्ष भी था उस युग में सगुण और निर्गुण उपासना का विरोध। जहाँ सगुण धर्म में आचार-विचारों का महत्त्व तथा भक्ति पर बल दिया जाता था वहीं दूसरी ओर निर्गुण संत साधकों ने धर्म को अत्यंत सस्ता बना दिया था। गाँव के कुँओं पर भी अद्वैतवाद की चर्चा होती थी; किंतु उनके ज्ञान की कोरी कथनी में भावगुढ़ता एवं चिंतन का अभाव था। तुलसीदास ने ज्ञान और भक्ति के विरोध को मिटाकर वस्तुस्थिति स्पष्ट कर दी।

"अगुनहिं सगुनहिं कछु भेदा। कहहिं संत पुरान बुधवेदा॥
अगुन अरूप अलख अज जोई। भगत प्रेम बस सगुन सी होई॥"

ज्ञान भी मान्य है किंतु भक्ति की अवहेलना करके नहीं। ठीक इसी प्रकार भक्ति का भी ज्ञान से विरोध नहीं है। दोनों में केवल दृष्टिकोण का थोड़ा-सा अंतर है। राम कहते हैं-

"सुनि मुनि तोहि कहौं सहरोसा। भजहि जे मोहि तजि सकल भरोसा॥
करौं सदा तिन्ही कै रखवारी। जिमि बालकहिं राख महतारी॥
गह सिसु बच्छ अनल अहिधाई। तह राखै जननी अरू गाई॥
प्रौढ़ भये तेहि सुत पर माता। प्रीति करे नहिं पाछिल बाता॥
मोरे प्रौढ़ तनय सम ग्यानी। बालक सुत सम दास अमानी॥
 जानहिं मोर बल निज बल नाहीं। दुह कहँ काम क्रोध रिपु आहीं॥
यह विचारि पंडित मोहि भजहि। पाएहू ग्यान भगति नहिं तजहीं॥"

हृदय की स्वच्छता पर बल:- तुलसीदास ने तत्कालीन धार्मिक संप्रदायवाद में बाह्याडंबर को प्रधानता न देते हुए हृदय की स्वच्छता पर बल दिया। तुलसी के राम ने संतों के जो लक्षण बताए हैं, उसके मूल में हृदय की स्वच्छता है। 
"निर्मल मन सोइ जन मोहि पावा। मोहि न कपट-छ्ल-छिद्र सुहावा॥"

यह उस समय की धार्मिक स्थिति की माँग थी। तुलसीदास धार्मिक नेता ही नहीं अपितु महान समाज-सुधारक भी थे। रामराज्य की कल्पना के द्वारा उन्होंने उस समय के विद्यमान राजनीतिक गंदगी को दूर करने का यथासंभव प्रयास किया। मुसलमानों की राजनीति से हिंदू जाति आक्रांत थी। इन विषम परिस्थितियों में तुलसीदास ने खलविनाशक राम के शक्तिशाली जीवन द्वारा लोकशिक्षा का पाठ पढ़ाया। किस प्रकार अत्याचार का घड़ा भरने पर अंतोगत्वा फूटता ही है, तथा उसके विरूद्ध विद्रोह होता है और शांति की स्थापना होती है, यह मानस में देखने को मिलता है। तुलसी दास ने रामराज्य की आदर्श कल्पना कर समाज के समक्ष यह उदाहारण प्रस्तुत किया कि राजा का आदर्श प्रजा-पालन एवं दुष्टों का विनाश है।
समाज की मर्यादा का निरूपण:-तुलसीदास ने समाज की मर्यादा का निरूपण लोक-जीवन के विविध संबंधों के माध्यम से दर्शाया है-’पिता-पुत्र’, ’माता पुत्र’, ’भाई-भाई’, ’राजा-प्रजा’, ’सास-बहू’, ’पति-पत्नी’ इत्यादि उन सभी की मर्यादा का वर्णन राम के महाकाव्यात्मक विस्तृत जीवन के अनेक प्रसंगों के माध्यम से किया। बदलाव युग की आवश्यकता एवं समय की माँग थी, पुरानी रूढ़ियों एवं सामाजिक मर्यादा के प्रति विद्रोह के स्वर सुनाई पड़ रहे थे।तुलसीदास ने इस विद्रोह को भली-भाँति सुना, देखा और समझा। तुलसी ने मानस में कहा भी है-
"बरन धरम नहिं आश्रम चारी। श्रुति विरोध रत सव नरनारी॥
द्विज श्रुति बंचक भूप प्रजासम। कोउ नाहिं मान निगम अनुसासन॥"

तुलसी का मानस स्वान्त: सुखाय होते हुए भी परजन-हिताय का संयोजक था। इसकी परिणति हमें संत के जीवन में देखने को मिलता है। 

’मुद मंगलमय संत समाजू। जो जग जंगम तीरथराजू॥"

तुलसीदास ने मानस में लोक और वेद, व्यवहार एवं शास्त्र का समन्वय प्रस्तुत किया है।

"चली सुगम कविता सरिता सो। राम विमल जस भरिता सो॥
सरजू नाम सूमंगल मूला। जाकि वेद मत मंजुस कूला॥"

चित्रकूट में भरत-राम मिलन के अवसर पर होने वाली सभा में तुलसी ने भरत के वचनों के द्वारा साधुमत, लोकमत, राजनीति एवं वेदमत के मध्य सुंदर समन्वय प्रस्तुत किया है। पं. रामचंन्द्र शुक्ल के अनुसार-" साधुमत का अनुसरण व्यक्तिगत साधन है, लोकमत लोकशासन के लिए है। इन दोनों का सामंजस्य तुलसी की धर्म भावना के भीतर है।" (हिन्दी साहित्य की प्रवृतियाँ-डॉ.जयकिशन प्रसाद खंडेलवाल-पृ.सं.२२६)
आध्यात्मिक क्षेत्र में समन्वय:-उस युग में ईश्वर प्राप्ति के साधनों की बहुलता थी। विभिन्न दर्शनों के मक्क्ड़जाल में जनता उलझी हुई थी। तुलसीदास ने द्वैत-अद्वैत, द्वैताद्वैत-तीनों सिद्वान्तों को भ्रम मानते हुए कहा-
"तुलसी दास परिहरै तीन भ्रम सो आपन पहिचानै।"

उनके ब्रह्म की मर्यादा विशिष्टाद्वैत से ही निर्मित है-

" सीया-राममय सब जग जानी। करहूँ प्रनाम जोरि जुग पानी॥"

काव्य शैली में समन्वय:- तुलसी पूर्णतया समन्यवादी थे। उन्होंने काव्य की भाषा-शैली पर भी समन्वय की मोहर लगा दी। उन्होंने अपने समय की तथा पूर्व प्रचलित सभी काव्य-पद्धतियों को राममय करने का सफल प्रयास किया। यहाँ तक की सूफियों की दोहा-चौपाई पद्धति, चन्द के छ्प्पय और तोमर आदि, कबीर के दोहे और पद, रहीम के बरबै, गंग आदि की कवित्त-सवैया-पद्धति एवं मंगल-काव्यों की पद्धति को ही नहीं वरन जनता प्रचलित सोहर, नहछू, गीत आदि तक को उन्होंने रामकाव्यमय कर दिया। इस प्रकार उन्होंने काव्य की प्रबंध एवं मुक्तक-दोनों शैलियों को अपनाया। उन्होंने तत्कालीन कृष्ण-काव्य की ब्रज-भाषा और प्रेम-काव्यों की अवधी भाषा-दोनों का प्रयोग कर अपने समन्वयकारी दृष्टिकोण का परिचय दिया।
स्वानत:सुखाय तुलसी रघुनाथ गाथा : लोककल्याण- तुलसी के काव्य में लोकसंग्रह की भावना अविच्छिन्न रूप से व्याप्त है। इसके जरिए तुलसी ने ’सत्यं शिवं सुन्दरं’ को साकार किया है। तुलसीदास ने अपने काव्य का सृजन स्वान्त: सुखाय किया या परांत सुखाय, यह भी विचारणीय है। स्वयं तुलसीदास ने लिखा है कि मैंने रघुनाथ-गाथा ’स्वान्त: सुखाय’ लिखा है। डॉ. श्यामसुन्दर के अनुसार-"तुलसीदासजी ने जो कुछ भी लिखा है, ’स्वान्त: सुखाय’ लिखा है। उपदेश देने की अभिलाषा से अथवा कवित्त्व-प्रदर्शन की कामना से जो कविता की जाती है उसमें आत्मा की प्ररेणा न होने के कारण स्थायित्व नहीं आता। तुलसी की रचना में उनके हृदय से सीधे निकले हुए भाव है, इसी कारण तुलसी का काव्य सर्वश्रेष्ठ है।"(हिन्दी साहित्य की प्रवृतियाँ-डॉ.जयकिशन प्रसाद खंडेलवाल-पृ.सं.२२७) तुलसी ने रामकाव्य की रचना का उद्देश्य ही लोककल्याण बताया है; यथा-
"कीरति भनिति भूति भलि सोई।
सुरसरि सम सब कहँ हित होई॥"


अर्पणा दीप्ति

रविवार, 21 अप्रैल 2013

समकालीन विमर्श से जुझती कहानियाँ



समकालीन विमर्श से जुझती कहानियाँ      
               
                                                              - अर्पणा दीप्ति


हिंदी साहित्य में कहानी की परंपरा काफी पुरानी एवं समृद्ध है। कहानी की उत्पत्ति कब और किस प्रकार हुई इस प्रश्न का निर्णायत्मक उत्तर देना कठिन है। हाँ ऎसी कल्पना अवश्य की जा सकती है कि कहानी की उत्पत्ति मनुष्य की उत्पत्ति तथा उसके सामाजिक रूप लेने के साथ हुई। मनुष्य की अपनी बात कहने की प्रवृति ने कहानी को जन्म दिया। इसी शृखंला की वर्तमान कड़ी है सतीश दुबे का कहानी संग्रह ’कोलाज’। हालॉकि इस संग्रह की कई कहानियाँ विगत वर्षों में विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से प्रकाशित होकर पाठकों तक पहुँच चुकी है। किंतु यहाँ यह कहना आवश्यक है कि शारीरिक अक्ष्मता तथा खराब स्वास्थ्य के बावजूद पिछले तीन दशकों से कथा साहित्य में निरंतर अपनी उपस्थिति  बनाए रखना वास्तव में कथाकार के लेखकीय जिजीवषा का अद्‍भुत प्रमाण है। कथा साहित्य के तीनों विधाओं में सतीश दुबे की उपस्थिति उनकी सृजनात्मक उर्जा से परिचित करवाती है। अपनी बात ’शायद’ में लेखक कहते हैं "मैं अपने को लिक्खाड़ या आशू लेखक नहीं मानता संभवत: इसलिए लेखन में ठहराव महसूस होने से मन बैचेन होने लगता है।" इसी लेखकीय बैचेनी का प्रमाण है ’कोलाज’(२०१३) की ताजातरीन सोलह कहानियाँ।

      इन कहानियों के जरिए लेखक ने वर्तमान जीवन में संबंधों की विसंगतियाँ, आधुनिक सोच से उत्पन्न अंतरद्वंद एवं कोलाहल को बखूवी उकेरा है। ’अकेली औरत’, ’सप्तश्रृंगी’, ’सुकूनी लम्हों के बीच,’ ’ठौर’ तथा ’गर्द के गुब्बारे’ आदि कहानियाँ पात्रों के मन:स्थिति को संपूर्ण मनोयोग के साथ चित्रित करती है। इस संग्रह की अधिकतर कहानी आम स्त्री की जीवन के विविध पहलूओं को अनुभव की आँखों से देखती और बयान करती है। बल्कि यह कहना सर्वथा उचित होगा कि लेखक ने इन पात्रों के जरिए स्त्री प्रश्नों का पड़ताल किया है।

     ’अकेली औरत’ की अनपढ़ पात्र फागुनी नशाबंदी के खिलाफ उठ खड़ी होती है। वह इस बात से बिल्कुल बेपरबाह है कि हो सकता है कल वह अपने जीवन के समर में अकेली पड़ सकती है, पति का साथ उससे छूट सकता है "यह आप नहीं आपका पुरुष बोल रहा है जो औरत को अपनी इच्छा की मुट्ठी में बंद करके रखना चाहता है।"(पृ.सं.२) फ्लैट में दाई का काम करते हुए फागुनी पूरी तेजस्विता के साथ पट्‍टी की अन्य औरतों के साथ नशाबंदी के जुलूस में शामिल होती है।

      जीवन के किसी मोड़ पर जीवनसाथी का साथ छूट जाने पर अक्सर स्त्रियाँ स्वयं को असहाय तथा अबला महसूस करती है। ’सप्तशृंगी’ की पात्र सुजाता इस मिथ को तोड़ती है। पति रविप्रकाश की असामयिक मृत्यु के पश्चात दिवंगत पति के व्यापारिक कारोबार एवं पारिवारिक जिम्मेदारियों को संभालने के लिए उसे अलग-अलग भूमिकाओं का निर्वाह करना पड़ता है। " उनके इस बदलते रूपों के मद्देनजर बाजार के व्यापारी वर्गों ने उन्हें सप्तशृंगी देवी की उपाधि तक दे डाली।"(पृ.सं.१४) सुजाता अपने पौत्र रजत को कहती है "बेटा परिस्थितियाँ आदमी हो या औरत सबको मौका पड़ने पर जिंदा रहने के लिए ताकतवर बना देती है।"(वही)

      कैरियर, बॉस और विदेश के बीच विस्मृत होते माता-पिता तथा परिवार की कहानी को दर्शाती है ’सुकूनी लम्हों के बीच’। इस कहानी के पात्र कपंनी तथा पैकेज के मकड़जाल में फँस जाते हैं। इनकी जिदंगी युवावस्था में काफी थकी-थकी सी लगती है। वर्तमान संदर्भ में इसे क्वार्टर लाइफ क्राइसेस भी कहा जा सकता है। कामयाबी हासिल करने वाली आज की युवा पीढ़ी आंतरिक सुकून नहीं  मिलने के कारण सरलता से अपराधित कारनामों की ओर अग्रसर होती है। माता-पिता तथा परिवार से संबंधों में पिछड़ापन जैसी मानसिकता पनपने के कारण इनका जीवन एक बिंदु पर केंद्रित हो जाता है। शिक्षा प्राप्त करने के बाद बच्चे स्वयं को माता-पिता से उत्कृष्ट समझने लगते हैं। ऎसी शिक्षा का क्या लाभ जो व्यक्ति को मालिक से नौकर बना दे! जो विदेश तक दौड़ गया वह उच्च और जो दौड़ नहीं पाया वह निम्न हो गया। भावनात्मक लगाव से दूर इनके जीवन में धन तो है लेकिन रौनक नहीं। सीकरी का संत’ उच्च शिक्षा तथा साहित्य अकादमियों में व्याप्त भ्रष्टाचार को दर्शाता है। "तुम्हे कौन सा अपने बचत खाते से देना है। एकलव्य शोधप्रबंध पर हस्ताक्षर कराने के बदले दस हजार गुरुदक्षिणा दे गया है उसमें से दे दो...।(पृ.सं.२९) इस कहानी के माध्यम से पुन: वर्तमान शिक्षा-प्रणाली तथा सरकारी तंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार पर लेखक ने पाठकों का ध्यान केंद्रित किया है।

      वर्तमान संदर्भ में ईमानदारी, सच्चाई तथा कर्तव्यनिष्ठ जैसे शब्द बेमानी हैं इसका उदाहारण  है ’हलकट’ का शिव। अपनी नौकरी गँवाकर उसे अपने नैतिक मूल्यों की रक्षा करनी पड़ती है। हालॉकि कथ्य में विवरण की बाहुल्यता है। वहीं जीवन की दो राहे भँवर में फँसी पत्रकार यश की कहानी 'चेहरे' यह दर्शाता है कि संघर्षशील व्यक्ति को अगर जीवन में कोई पराजित कर सकता है तो वह है उसका परिवार। यश अपनी पत्नी द्वारा लगाए गए चरित्रहीनता के आक्षेप से टूट सा जाता है किंतु अपने मित्र सदानंद द्वारा समझाने पर वह पुन: संभलता है। "जीवन रूपी नदी में अगर तुफानी बाढ़ आ जाए तो परिस्थिति विशेष में उसमें तैरने की कोशिश करने के बजाए तट पर बैठकर बाढ़ उतरने की प्रतीक्षा सब्र के साथ करनी चाहिए।"(पृ.सं.१३१) ’गर्द के गुब्बारे’ तथा ’अंतिम परत’ कथ्य में सामान्य दिखते हुए भी पाठकों पर अपना प्रभाव डालती है।

      विवाहित लड़कियों के लिए ’ठौर’ एक भ्रम भी है और एक दंश भी जो जीवन के अंत तक उन्हें बनजारे की सी मन:स्थिति में भटकाए रखता है। ऎसे में सबसे मर्मांतक होता है मायके के तरफ से अजनबियों सा व्यवहार। उसे हर हाल में हिम्मत कर ससुराल ही लौटना होता है। मायकेवालों की सहूलियत भी इसी में है कि लड़की ससुराल को अपना घर समझे तथा परायी लड़की की तरह बर्ताब को अपनी नियति। बचपन के घर-घरवाले खेल की तरह हमेशा स्त्री के जीवन में एक सुनहरा भ्रम बना रहता है कि आखिर उसका असली घर कौन सा है? इसी भ्रम तथा उपेक्षा की शिकार है ’ठौर’ की माइली। किंतु अंतत: वह समझ जाती है कि शादी के बाद ससुराल ही लड़की का अपना घर होता है। माइली अपनी माँ से कहती है-"छ्ड़ा-गाठन बाँधकर जिस आदमी के साथ तुमनें भेजा था, तब यही तो कहा था।"(पृ.सं.१३१)

     ’अंतराल’ में पुन: विवरणों की भरमार है, किंतु इस कहानी को इस मायने में उल्लेखनीय कहा जा सकता है क्योंकि यह जेंडरिंग की प्रक्रिया को दर्शाती है। कहानी की पात्र पंखुड़ी इस जेंडरिंग की प्रक्रिया की शिकार होती है। लेकिन वह अपने अधिकारों के प्रति सजग है समझौता करने के बजाए वह जिंदगी अपने शर्तों पर जीना चाहती है एवं इसमें कामयाब भी होती है। 'एन.फार.' की नीरजा आकस्मिक दुर्घटना में पति की मृत्यु हो जाने पर जिंदगी की नई पारी की शुरूआत कर पति के अधूरे सपने को पूरा करती है। उसके जीवन का मूलमंत्र था ’न पराजयं न पलायनं’।

     समर्पित, ईमानदार तथा कामयाब कर्मचारी असीत की कहानी है ’अपने अपने द्वीप’। अपनी मेहनत तथा लगन से वह अपने मालिक मि. नेहरा की कंपनी को एक नई उँचाई पर पहुँचाता है। ’फ्रेम का चित्र’ यह दर्शाता है कि मजहब प्रेम की राह में किस प्रकार रोड़े अटका सकता है। नीरव एवं सबिहा का प्यार इसी मजहबी सांप्रदायिकता का शिकार होता है अपने प्रेम को अमर बनाने के लिए साबिहा को अपने प्राणों की बलि देनी पड़ती है। नीरव इस धार्मिक कट्‍टरता को ढोने के लिए संसार में अकेला रह जाता है।

    यहाँ यह कहना सर्वथा उचित होगा कि इनमें से अधिकांश कहानियों को लघु उपन्यास का रूप दिया जा सकता था। कथाकार ने इन कहानियों को समेटने में शीघ्रता दिखाई है। कहानी के सत्य के को लेकर निर्मल वर्मा ने कहा था कि कहानी का सत्य झाड़ी में छिपे पंछी की तरह है। जिसके बारे में निश्चित रूप से कह पाना असंभव है, जब तक की वह छिपा है और उसे जीवत बाहर निकालना भी दूर्लभ है। आलोच्य संग्रह में वह पंछी ठीक सामने आ बैठा है।

     सतीश दुबे की शक्ति उनकी बहती हुई भाषा है इसका पुख्ता प्रमाण है कथ्य में शहरी तथा आँचलिक भाषा का समिश्रण। साथ ही यह भी कहना जरूरी है कि ये कहानियाँ पेन्सिल स्केच जैसी हैं। इन कहानियों के माध्यम से वर्तमान समाज कि विसंगतियों को दर्शाया गया है। इन कहानियों में विद्यमान अधिकांश अभिव्यक्तियाँ मन को छू लेती हैं। आशा है कि लेखकीय क्षमता एवं भरपूर संवेदना के साथ जीवन के विविध कालजयी कोलाजों को रेखांकित करती ये कहानियाँ हिंदी जगत में सराही जाएँगी एवं इसका भरपूर स्वागत होगा।

समीक्षीत कृति- कोलाज (कहानी संग्रह)
लेखक- सतीश दुबे
प्रकाशक-ज्योति प्रकाशन लोनी रोड गाजियाबाद-२०११०२
प्रथम संस्करण-२०१३
पृष्ठ संख्या-१८०
मूल्य-३९०/- मात्र    

रविवार, 24 मार्च 2013

आलेख


मातृत्व वरदान या अभिशाप

मातृत्व स्त्री जीवन की परिपूर्णता है, किंतु अगर उसे व्यापार बना दिया जाए; तो ’माँ’ की पवित्रता  के साथ इससे गन्दा एवं भद्दा मजाक और क्या हो सकता है? वर्तमान दौर में विज्ञान इतना विकसित हो चुका है कि मनुष्य के पास अपना ह्रदय तक नहीं बचा; ह्रदय भी यांत्रिक हो चुका है साथ ही साथ ज्ञान एवं विज्ञान भी अपचित। आज के बदलते परिवेश, तेज रफ़्तार से भागती जिन्दगी एवं उत्तर आधुनिक जीवन शैली में कामकाजी महिलाओं के पास इतना समय नहीं है कि वे माँ बनने के लिए अपने करियर को दाँव पर लगाने का जोखिम उठाएँ। वह सोचती हैं कि अगर कुछ पैसे खर्च करने से कोख किराए पर मिल जाता है तो इसमे बुराई क्या है?

वैसे तो किराए पर कोख खरीदने का प्रचलन सर्वप्रथम पश्चिमी देशों में शुरू हुआ। इसके लिए यह प्रावधान था कि ऐसी महिलाएँ जो किसी घातक बीमारी के कारण अपना बच्चा पैदा करने में असमर्थ हो; दूसरी स्त्री की सहमति से उसका कोख किराए पर खरीद सकती हैं। किराए पर कोख बेचने वाली स्त्री को "सरोगेटमदर" का नाम दिया गया।

यहाँ यह प्रश्न उठना स्वभाविक है कि सरोगेसी है क्या? अगर कुछ कारणवश माता-पिता अपने संतान को जन्म देने में असमर्थ हैं तब ऎसे में इस नि:संतान दंपत्ति का gamte किसी दूसरी स्वस्थ औरत के गर्भाशय में स्थापित कर दिया जाता है इस प्रक्रिया को 'सरोगेसी' तथा गर्भधारण करनेवाली महिला को 'सरोगेटमदर' कहा जाता है। इस तकनीक का फायदा क्या है? कोई स्त्री जिस पर समाज द्वारा बाँझ होने का ठप्पा लगा दिया जाता था, वह अब बाँझ नहीं कहलाँएगी एवं इस तकनीक के द्वारा वह अपना जैविक (bilogical ) बच्चा बनवा सकती है। पुरुष भी निःसंतान नहीं कहलाएँगे।

इस प्रक्रिया में जहाँ इसका एक पक्ष सकारात्मक है वहीं दूसरा पक्ष नकारात्मक भी है। कुछ सम्भ्रांत परिवार के पुरुषों का कहना है मैं नहीं चाहता कि मेरी पत्नी का फिगर ख़राब हो जाए। या फिर ग्लैमर की दुनियाँ से जुड़ी figur concious महिलाएँ लम्बे अरसे तक आकर्षक दिखने की चाह में अपने कोख से बच्चा पैदा करना नहीं चाहती, या फिर प्रसव पीड़ा को सहन करने के डर से अपने संतान को जन्म देने के बजाए बनवाने में ज्यादा आश्वस्त दिखती हैं। ऐसा करके ये माता-पिता baby selling को बढ़ावा दे रहें हैं। वे यह नहीं जानते कि ऐसा करने से बच्चे के साथ उनका blood bonding तो ख़त्म हो ही रहा है, साथ ही soul bonding भी नष्ट हो रहा है। नौ महीने तक बच्चे को अपने गर्भ में धारण करना तत्पश्चात फिर कठिन प्रसव पीड़ा झेलने के बाद संतान को अपनी गोद में लेकर सीने से लगाकर, दूध पिलाना माँ के लिए आनंद का अलौकिक क्षण होता है। माँ गर्भधारण से लेकर प्रसव पीड़ा की प्राणांतक तकलीफ इस एक क्षण में भूल जाती हैं। क्या कोख किराए पर खरीदनेवाली माताएँ प्रक्रति प्रदत इन अलौकिक सुखों से वंचित नहीं रह जाएँगी?

जहाँ कुछ बुद्धिजीवी वर्ग का मानना है कि सरोगेसी अनैतिक ( unethical ) है, वहीं उनमें से कई लोगों का यह भी मानना है कि यह एक प्रकार का व्यापर (barter ) है। अगर शिक्षा बेची जा सकती है किताव कापीं बेचे जा सकते हैं तो जरूरतमंद औरतें अपनी कोख क्यों नहीं बेच सकती है? अगर किसी चप्पल सीने वाली स्त्री या मजदूरी करके पेट पालने वाली स्त्री को नौ महीने के लिए अपनी कोख बेचने के एवज में दस लाख रुपया मिल जाता है तो इसमें बुराई क्या हैं? उन्हें भी तो सुनहरे सपने देखने का अधिकार है, अपना भविष्य संवारने का अधिकार है। चप्पल सीकर या मजदूरी करके  उम्र पर्यन्त वह दस लाख रुपये नहीं कमा सकतीं!


जरुरतमंद के मायने में यह गलत नहीं है। वहीं दूसरी तरफ इसमे कुछ जटिलताएं भी है अगर गर्भावस्था के दौरान यह पता चलता है कि बच्चा असामान्य(abnormal ) है, या फिर माँ की जान को खतरा है तो ऐसे में कानूनी माता-पिता अपनी जिम्मेदारियों से मुँह मोड़ लेते हैं। वे कहते हैं साहव हमने तो स्वस्थ एवं सामान्य बच्चे के लिए कोख किराएँ पर ली हैं न कि असामान्य बच्चे के लिए।  माँ की जान की जिम्मेदारी भी हमारी नहीं है। ऐसे में इन सब चीजों के लिए कानून बनना चाहिए। बच्चा स्वस्थ हो या अस्वस्थ, सामान्य हो या असामान्य कानूनी माता-पिता इसकी दायित्व लें। तथा गर्भावस्था के दौरान माँ की जिम्मेदारी भी कानूनी माता-पिता की होनी चाहिए। अपने दायित्त्व से पीछे हटने पर उनके लिए कानूनी तौर पर कठोर सजा का प्रावधान होना चाहिए।

भारत जैसे विकासशील देश में सरोगेसी व्यापार का शक्ल अख्तियार कर रहा है। सरोगेट इंडस्ट्री दिन दूनी रात चौगुनी फलफूल रही है। इसका मुख्य कारण यह है कि पश्चिमी देशों में जहाँ यह काफी खर्चीला है वहीं भारत जैसे गरीब देश में ब्रिटेन या अमेरिका के अपेक्षा एक तिहाई खर्चा करने पर कोख आसानी से खरीदा जा सकता है। अगर सरोगेसी को व्यापार में बदलने से रोकना है तो पश्चिमी देशों के जरिए होने वाले इस अवैध व्यापार पर भारत में कानूनी रोक लगनी चाहिए। विदेशियों पर प्रतिबंध लगने चाहिए।  भारतीय मातापिता भारत में ही सरोगेट मदर खोजें। तथा भारत में भी सरोगेसी की अनुमती उन्हें ही दिया जाए जो माँ ह्रदय रोग या किसी अन्य प्राण घातक बीमारी से पीड़ित हों। इस क्षेत्र में दान की वृहतर भावना को भी बढ़ावा मिलना चाहिए न कि इसे इकॉनोमिकली देखा जाना चाहिए। साथ ही अनाथ बच्चों को गोद लेने पर भी बल दिया जाना चाहिए। अमेरिका तथा ब्रिटेन जैसे देशों में सरोगेट मदर ही बच्चे की कानूनी माँ होती है, किंतु भारत में ऐसा प्रावधान नहीं है। विशेषज्ञों या डॉक्टरों का मानना है कि सरोगेट मदर का न तो अपना ओवेरी ( overy ) होता है न स्पर्म (sperm ) सिर्फ बच्चा माँ के गर्भाशय में पोषण प्राप्त करता है। ऎसे में बच्चे में माँ का अनुवांशिक या जेनेटिक गुण भी नहीं आता है। अगर बच्चे के जन्म के बाद माँ भावनात्मक तौर पर बच्चे से जुड़ती है तो भी बच्चे को अपने पास रखने का अधिकार उसे प्राप्त नहीं होता। अगर बच्चा बड़ा होकर जन्म देनी वाली माँ को ही अपना माँ मान बैठे, तो ऐसी परिस्थिती में बच्चा दिमागी तौर पर तनावग्रस्त हो सकता है।

कुछ लोगों का मानना यह है कि वास्तव में सरोगेसी भारतीय संस्कृति का अतिक्रमण है तथा इसके लिए भारतीय संस्कृति में कोई स्थान नहीं होना चाहिए, यह तो पाश्चात्य संस्कृति की देन है। किंतु संस्कृति को इतना संकुचित बना देना कट्टरवाद के अलावा और कुछ नहीं है। वस्तुत: सरोगेसी कांसेप्ट का विरोध नहीं करके उससे उत्पन होने वाली जटिलताओं का विरोध किया जाना चाहिए सरोगेसी मुख्य रूप से  फास्ट फ़ूड (fast food ) वाली पद्धति है, हमारे पास समय का अभाव है बाजार में बना बनाया खाना उपलव्ध है, बनाने से बेहतर खरीद लेना अच्छा है। ठीक उसी प्रकार कामकाजी महिलाएँ सोचती है बच्चा पैदा करने का समय हमारे पास है नहीं, ऎसे में बेहतर है पैसा देकर अपना बच्चा बनवा लिया जाए। ऐसी महिलाओं पर कानूनी रोक लगनी चाहिए। क्या ऐसी माँ जो समयाभाव के कारण कोख किराये पर खरीद रहीं हैं वे अपने बच्चे से भावनात्मक तौर पर कभी जुड़ पाएँगी कतई नहीं? इन महिलाओं की काउंसलिंग की जानी चाहिए एवं साफ्ट रीजन पर पाबंदी लगनी चाहिए। इस बात से बिलकुल इंकार नहीं किया जा सकता कि सरोगेसी ब्लैक &वाईट (black & white) नहीं बल्कि एक ग्रे एरिया ( grey area ) है

मंगलवार, 19 मार्च 2013

स्त्री लेखन और स्त्री की सामाजिक स्थिति


मैत्रेयी पुष्पाजी का साक्षात्कार
स्त्री के मानुषीकरण का लक्ष्य लेकर जो आवाजें हिंदी साहित्य में पूरे जोर के साथ उठी और उभरी हैं उनमें एक खास आवाज है- मैत्रेयी पुष्पा की। अपने पीएच.डी शोध कार्य के सिलसिले में विगत वर्ष मुझे मैत्रेयीजी के निवास स्थान नोयडा के महोगुनमार्फियस अपार्टमेंट में उनके साक्षात्कार का सुयोग मिला। वे इस बात से प्रसन्न थीं कि मैं हैदराबाद से उनसे मिलने आयी हूँ। यह जानकर उन्हें प्रसन्नता हुई कि मैंने उनके उपन्यास ’अल्मा कबूतरी’ एवं ’कस्तूरी कुंडल बसै’ पर एम.फिल. का शोधप्रबंध लिखा है। मैत्रेयीजी ने अपने आरंभिक जीवन तथा परिवार के बारे में बहुत सारी बातें बतायी। सरल, सहज और सादगी भरा व्यक्तित्व ऎसा लगा ही नहीं कि मैं इतने बड़े साहित्यकार से पहली बार मिल रही हूँ। हालॉकि मैं मन ही मन थोड़ी सी घबरायी हुई थी कि पता नहीं वह मुझ जैसी अदना सी शोधार्थी से बात करना पसंद करेंगी की नहीं। किंतु अपने आतिथ्य तथा स्नेह से ऎसा लगा मानो उन्होंने मुझे सर आँखो पर बिठा लिया। चाय की चुस्कियों के साथ साक्षात्कार का सिलसिला शुरू हुआ तथा मैंने अपने पूर्व निर्धारित प्रश्न उनके समक्ष रखे। वैसे तो यह साक्षात्कार हैदराबाद से प्रकाशित होनेवाली समाचार पत्र ’स्वतंत्र वार्ता’ तथा दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा खैरताबाद से प्रकाशित द्विभाषिक मासिक पत्रिका स्रवंति में प्रकाशित हो चुकी है। मेरे प्रश्न तथा मैत्रेयी पुष्पाजी के उत्तर यहाँ प्रस्तुत हैं।
अर्पणा: जब मैं विद्यालय मैं पढ़ती थी, तो साहित्य मैं स्त्री भावना जैसे कुछ प्रश्न हुआ करते थे (मैथिलीशरण गुप्त की नारी भावना, रामचरित मानस के नारी पात्र)। उसके बाद स्त्रीचेतना और स्त्रीवाद जैसे शब्द चलने लगे, फिर स्त्री विमर्श आया। इन सबमें क्या अंतर है और क्या संबंध है? कुछ ठीक-ठीक समझ में नहीं आता। आप इन सबको किस तरह देखती हैं?

मैत्रेयी पुष्पाजी: देखो तुमने जैसा पढ़ा है वैसे ही मैंने भी पढ़ा है। मैथिलीशरण गुप्त ने स्त्रियों के बारे में काफी अच्छे विचार रखे। उन्होनें काफी कुछ अच्छा स्त्रियों के बारे में लिखा। प्रेमचंद ने तो काफी हद तक स्त्रियों को मुक्ति दिलाने की कोशिश की। लेकिन ये तो पुरुषों के कलम से आया। औरत क्या चाहती है? सुभद्रा कुमारी चौहान को पता था, महादेवी वर्मा को पता था। लेकिन उन्होंने भी अपने लेखन को पुरुषों के कलम से ही लिखा। सुभद्रा कुमारी चौहान ने ’खुब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी’ में ’मर्द-मर्दानी’ शब्द का प्रयोग किया। महादेवी ने अपनी कविताओं में अपनी पीड़ा, दु:ख एवं तकलीफ को व्यक्त किया। जिसको उन्होंने संबोधित किया उसे उन्होंने रहस्यमय ही रहने दिया। कहानी की बात लें। हालांकि प्रेमचंद ने मुक्ति दिलाने की बहुत कोशिश की। तुम देखो ’मैला आँचल’ में रेणु ने भी दो टूक बातें कही-हालांकि वे मुक्ति के लेखक नहीं थे। ’मैला आँचल’ पर मैंने लिखा है ’मेरीगंज की औरतें’। तुम देखो ’मैला आँचल’ में मठ की संस्था ध्वस्त होती है, जात-पाँत की व्यवस्था धवस्त होती है। जो नियम बनाए पुरुषों ने बनाए औरतों ने नहीं बनाए। उनसे किसी ने नहीं पूछा कि वे क्या चाहती हैं? लेकिन औरत की आवाज को सबसे शक्तिशाली आवाज में कहा कृष्णा सोबती ने। चाहे वह ’जिन्दगीनामा’ हो या ’मित्रो मरजानी’। औरत जो चाहती थी उसे उसने दर्ज करना शुरु कर दिया। पुरुषों की कहानी भी तो बिना स्त्री के पूरी नहीं होती। ’गोदान’ में क्या है? ’त्याग्पत्र’ में क्या है? ’चित्रलेखा’ में क्या है? मुझसे पूछा गया कि मैंने इन उपन्यासों को क्यों ...? ठीक है ये जो लेखन आ रहा था, उसमें स्त्री चेतना या स्त्री भावना कैसे आया? मेरा मानना है कि स्त्री ने जब अपने बारे में सोचना शुरु किया, अपनी बात पुरुषों के बीच रखना शुरू किया और आपस में अपनी बात कहना शुरू किया वह स्त्री विमर्श है।
प्रश्न: स्त्री विमर्श की जब भी चर्चा होती है, तो सीमोन द बुआ और केट मिलेट की मान्यताओं पर चर्चा अधिक की जाती है। क्या भारत में स्त्री मुक्ति के प्रश्न पर विचार करने वाली महिलाएँ नहीं हुई? अगर यह कहा जाए कि यहाँ स्त्री का दमन अधिक हुआ तो फिर उसका प्रतिकार भी यहीं से पैदा होना चाहिए था? महादेवी वर्मा के जीवन और लेखन विशेष रूप से ’शृंखला की कड़ियाँ’ स्त्री विमर्श की दृष्टि से इसकी किस प्रकार व्याख्या की जा सकती है?

मैत्रेयी पुष्पाजी: ’द सेकेंड सेक्स’ से पहले छपी थी ’शृखंला की कड़ियाँ’, लेकिन हम ’शृंखला की कड़ियाँ’ का नाम नहीं लेते! कहते हैं यह महादेवी के साथ अन्याय है! लेकिन सीमोन द बुआ ने जैसा साफ दो टूक शब्दों में लिखा वैसा महादेवी ने नहीं लिखा। उन्होंने लिखा स्त्री को ऎसे रहना चाहिए, वैसे रहना चाहिए और दूसरी बात यह कि महादेवी तो कभी गृहस्थ जीवन में थी हीं नहीं, घरेलू स्त्री के दु:ख-तकलीफ को कैसे समझ पाती? अच्छा उन्होंने अपनी जितनी भी कविताएँ लिखी, उनमें अपने जीवन के खालीपन, दु:ख, तकलीफ और पीड़ा को व्यक्त किया। फिर हम कहते हैं कि सीमोन द बुआ का नाम ले रहें हैं, वर्जिनिया वुल्फ का नाम ले रहें है लेकिन ’शृखंला की कड़ियाँ’ का नाम नहीं लेते।

प्रश्न: ऎसा क्यों है कि १९९० के बाद केवल स्त्री लेखन ही नहीं सारे साहित्य लेखन में स्त्री केंद्र में आ गई है? क्या वास्तव में भारतीय समाज की स्त्री के प्रति दृष्टि में परिवर्तन हो रहा है?

मैत्रेयी पुष्पाजी: हाँ बिल्कुल १९९० के बाद साहित्य लेखन में स्त्री केंद्र में आ गई। स्त्रियों ने स्वयं कलम उठाई। अपनी आपबीती अपने अनुभव को उन्होंने स्वयं लिखना शुरू किया । पहले लड़की शादी के लिए पढ़ा करती थी, लेकिन बाद में उन्होंने कहना शुरू किया-मुझे पहले कैरियर बनाना है, बाद में शादी करनी है आज तुम देखोगी अच्छे से अच्छे क्षेत्रों में लड़कियाँ या महिलाएँ सबसे आगे हैं। तुमने तो ’चाक’ पढ़ा है; ’चाक’ की नायिका सारंग नैनी घरेलू स्त्री है, लेकिन अपने ऊपर हुए अत्याचार को वह झेल नहीं पाती तथा बाद में ग्रामीण राजनीति में आती है।

प्रश्न: स्त्री विमर्श की दृष्टि से किसी उपन्यास में आपके विचार से किन चीजों का होना जरूरी है?
मैत्रेयी पुष्पाजी: स्त्री विमर्श की दृष्टि से मेरे उपन्यास में जो है, वह सब कुछ होना चाहिए...(हँसते हुए)। हाँ मेरे विचार से स्त्रियाँ राजनीति में होनी चाहिए, क्योंकि तुम देखो आज भी पंचायत स्तर पर तो महिलाएँ आ चुकी हैं, प्रधान का पद उनके लिए प्रधानमंत्री के पद के बराबर है। लेकिन आज भी संसद में महिलाओं का ३३% आरक्षण का मुद्‍दा अधर में लटका हुआ है, लेकिन जल्दी ही उन्हें यह अधिकार भी मिल जाएगा।

प्रश्न: क्या काम जीवन से संबंधित पारंपरिक मानदंडों का उल्लघंन करना स्त्री विमर्श की अनिवार्य शर्त है? क्यों?

मैत्रेयी पुष्पाजी: देखो ये सब प्राकृतिक है। अगर काम नहीं होगा तो पति-पत्नी का संबंध नहीं होगा, सृष्टि का विकास रूक जाएगा। यह तो जरूरी है। अगर परंपरा का उल्लंघन किसी बहुत ही अच्छे काम के लिए किया जाए तो इसमें कोई बुराई नहीं है। 

प्रश्न: क्या लेखन को पुरुष लेखन और स्त्री लेखन के रूप में बाँटना उचित है? इससे क्या हासिल होता है? 

मैत्रेयी पुष्पाजी: पुरुष और स्त्री लेखन-दोनों का अपना क्षेत्र है। भावनात्मक तौर पर एक पुरुष जो अनुभव करेगा वह स्त्री कैसे समझ सकती है। मान लो कोई पुरुष किसी लड़की को देख रहा है, देखने पर उसके मन में क्या विचार उत्पन्न होता है-स्त्री इसकी अभिव्यक्ति नहीं कर सकती। ठीक उसी प्रकार स्त्रियों के मन में प्रेम की क्या परिभाषा है तथा मातृत्व के भाव आदि को पुरुष अभिव्यक्त नहीं कर सकता।

प्रश्न: क्या पुरुष कथाकारों और स्त्री कथाकारों के भाषा प्रयोग में कोई अंतर होता है?

मैत्रेयी पुष्पाजी: हाँ, बिल्कुल भाषा में अंतर होता है। अभी मैंने कहा है-फिर से कहती हूँ स्त्रियाँ भुक्त्भोगी होती हैं, अपने ऊपर हुए अन्याय और अत्याचार को जिस प्रकार वह व्यक्त कर सकती हैं, पुरुष नहीं कर सकता। ’कस्तूरी कुंडल बसै’ मैं तुमने पढ़ा होगा, मेरे पास विद्यालय जाने के लिए एक रुपया होता था और मैं उसे बस के कंडक्टर या ड्राइवर को नहीं देना चाहती थी ताकि दूसरे दिन भी स्कूल जा सकूँ। बदले में वे लोग मुझे इतनी बुरी तरीके से तंग किया करते थी कि मैं रो पड़ती थी। थोड़ी दूर जाने पर पुलिस स्टेशन आता था, मैं खिड़की से झाँका करती थी कि यहाँ उतरकर इनकी शिकायत पुलिसवालों से कर दूँगी। खिड़की से झाँककर मैं देखती थी, दो-तीन पुलिसवाले हाथ में बंदूक लिए घूमते रहते थे। उस जमाने में कोई महिला पुलिस नहीं हुआ करती थी। मैं सहमकर फिर से चुप बैठ जाती थी। मेरी हिम्मत नहीं होती थी कि मैं उतरकर उनकी शिकायत दर्ज करा सकूँ।