मंगलवार, 14 अप्रैल 2015

विवाह संस्था बनाम सपोर्ट सिस्टम



कई बार विवाह संस्था को इतना गरियाया जाता है, कि मुझे लगता है, हम ग़लत कर रहे हैं, एक कंपेनियनशिप में दरार डाल रहे हैं। एक बहुत बड़ा सपोर्ट सिस्टम, न केवल महिलाओं के लिए बल्कि पुरुषों के लिए, बच्चों के लिए है। घर एक सपोर्ट सिस्टम ही तो है।
मैं कई बार खुद पर संशय करती हूँ क्या कि मैं so called happily married के दायरे में आती हूँ इसलिए तो नहीं क्योंकि मैं इस संस्था के पक्ष में हूँ?  क्या शादियाँ हमेशा हैप्पी होतीं हैं? या इन्हें हैप्पी बनाया जाता है। हम भी भीषण तूफानों से गुज़रे हैं। पर सुबह होने पर कश्ती किनारे ही पाई है।
यह कतई सच नहीं कि अपनी शादी को हैप्पी बनाने में मैंने कोई त्याग - बलिदान किए हों! बल्कि मेरे बैटर हाफ़ ही बैटर रहे हैं हमेशा। उन्होंने ही डगमगाती नैया कि ज़्यादा पतवारें सहेजी हैं।
मैं शादी को लड़कियों की ज़रूरत या अंतिम विकल्प नहीं मानती। यह बिलकुल निजी निर्णय होना चाहिए। शादी नहीं करना भी बहुत सुखद ज़िंदगी दे सकता है अगर आप में अकेले चलने का जज्बा है तो। असफल होने पर शादी से निकल आना भी जायज़ बात है। लेकिन इसे सिरे से खारिज करना कतई उचित नहीं है।
सामाजिक विचलन, दहेज, सुंदर - असुंदर, देखना दिखाना, रिजेक्शन, घर के कामों का बंटवारा, शोषण, हिंसा आदि हमारे यहाँ विवाह से जुड़ कर इसे खारिज करने योग्य ज़रूर बनाते हैं। लेकिन अकेले चलते चलते किसी का साथ पाकर साथ चलने,  नीड़ बनाने और मां - पापा बनने के अहसास को मैं खारिज नहीं कर पाती।
हो सकता है मेरे ख्यालात पुराने हों!!

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