बुधवार, 30 नवंबर 2016

  
फिल्म (काग़ज़ की चिन्दियाँ ) पर मेरे विचार 
औरत की स्वतन्त्रता यूँ कहें तो शायेद ज्यादा ठीक होगा मानव मनोविज्ञान को दिखाने का सुंदर प्रयास है . लेकिन मेरा यह मानना है स्वतंत्रता और स्वक्षन्द्ता में जमीन आसमान का अंतर है . स्त्री को अपनी पहचान जरुर चाहिए उसे आज़ादी चाहिए लेकिन अगर औरत अति महत्वाकांक्षी हो जाती है तो उसे उसके दुष्परिणाम भी भुगतने पड़ते है , रही बात स्त्री देह की देह की आज़ादी की तो यह आगे बढ़ने की सीढी नहीं बल्कि उसका अपना अस्तित्व है जो मात्र पुरुष के उपभोग के लिय नहीं है , देह की शुचिता संबंधों का चयन इन सब पर सिर्फ औरत का ही अधिकार है , स्त्री हो या पुरुष एक मर्यादा दोनों के लिये ही है .स्वस्थ समाज की संरचना में स्त्री पुरुष दोनों की ही बड़ी भूमिका है .
एक बात और कहना चाहूंगी स्त्री कमजोर नहीं है पुरुष की देह संरचना जरुर बलिष्ठ बनाई है उपरवाले ने पर स्त्री को आत्मबल पुरुष से कहीं ज्यादा दिया है पीड़ा सहने की शक्ति स्त्री में ही होती है ,परंतु वर्षो से स्त्री अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रही है . परंतु मै यही कहना चाहूंगी औरत को कभी पुरुषों ने आज़ाद नहीं किया ना ही भविष्य में करने की उसकी मंशा दिखाई पड़ती है ,, जो कुछ भी औरतों ने हासिल किया वह स्वतन्त्रता उसे उसके स्वयं के संघर्ष से हासिल हुई ,
रही बात कमाने की तो वह उसकी योग्यतानुसार उसने स्वयं के लिए हासिल किया 
चाहे वह उच्चपदासीन महिला हो ,उद्यमी महिला ,लेखिका या फिर राजनीति में आई नेत्रियाँ हों ,,इसमें पुरुषों की दी हुई आज़ादी नहीं महिलाओं की योग्यता और पुरुषों का स्वार्थ है , स्त्री कमाती है तो बराबर की भागीदारी देती है घर चलाने में ,निर्बल आय वर्ग की मजदूर महिलायें भी यही भागीदारी निभाती है ,, यहाँ पुरुषों की दी हुई आज़ादी नहीं समान अधिकार है जो हासिल किये है आधी आबादी के कुछ हिस्से ने , 
स्त्री की आज़ादी मात्र आधुनिक परिधान पहन कर पार्टी में उन्मुक्त हो कर घूमना फिरना नही इसके लिए तो मूलभूत मुद्दों पर संघर्ष करना होगा उसे .
जैसे कोख पर माँ का अधिकार होना चाहिए सन्तान का जन्म कब हो बेटा हो या बेटी ? आज भी पुरुष अपनी ही चलाता है भूर्ण परिक्षण के इस दौर में वह ही निर्णय लेता है कोख में संतान पलेगी या नहीं ,कितना दुखद है जो औरत प्रसव की भयानक पीड़ा सह सकती है वह उसे जन्म देना है या नहीं इसका निर्णय नहीं ले सकती आखिर क्यूँ ? 
अब रही बात प्रेम के लिए उसके लिए कब और कहाँ बंधन लगा ,,कभी बंधन लगाया ही नहीं पुरुषों ने वरना पुरुष प्रेम किससे करता प्रेम करने के लिए पुरुषों को स्त्रियों की आवश्यकता होगी ही न ? वरना यही गीत सुनाई देगा { आदमी हूँ आदमी से प्यार करता हूँ } --- 
जब स्त्री पुरुष प्रेम में होंगे तो दैहिक स्वंत्रता की बात आती ही नहीं यह तो परस्पर प्रेम और विश्वास की बात है ,, 
स्त्री कभी साठ सत्तर के दशक में भी इस तरह की स्वतंत्रता की मोहताज़ नहीं थी 
स्त्री एवं नदी एक समान है अपने भीतर प्रेम और पीड़ा को समेटे हुए बहती रहती है ,परंतु नदी के तट जब जब बांधे गए वह वेग के साथ उन्हें तोड़ कर बह निकली है ,स्त्री को भी अपने ही बनाये हुए नियमो में अपनी सुविधानुसार बाँधने की पुरुष चेष्टा अवश्य करता है परंतु बाँध नहीं पाता -----
दोनों ही एक दुसरे के पूरक है .बहुत लम्बा विषय है इस पर चर्चा बहुत लम्बी खिंच सकती है .
आपको बहुत बहुत बधाई सतीश चित्रवंशी आपने इस विषय पर एक अच्छी फिल्म बनाई --
 

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