गुरुवार, 14 अप्रैल 2011

सहजता में गहराई: 'अहसासों के अक्स'




डॉ.शकुंतला किरण की पुस्तक ’अहसासों के अक्स’ 108 कविताओं का संकलन है। कवयित्री ने अपनी इन कविताओं में जहाँ एक ओर वर्तमान मानव समाज में उपजी विसंगतियों एंव विकृतियों को अर्थपूर्ण स्वर प्रदान किया है, वहीं दूसरी ओर भक्ति गीतों के माध्यम से कोमल पक्षों को भी उजागर किया है। शकुंतला किरण का काव्य संग्रह चार खंडो में विभाजित है। पहला खंड गीत, दूसरा राजस्थानी कविताएँ,तीसरा अतुकांत कविताएँ और अंतिम भक्ति गीत। अपनी बात में कवयित्री स्वयं यह कहती नजर आती हैं कि-"निरंतर मूल्यविहीन होते जा रहे सामाजिक सरोकार, मानवीय-संबंधों की असहज व बोझिल होती जटिल संवेदनाएँ, राजनीतिक परिदृश्य पर उभरी विद्रूपताएँ आदि के प्रति आक्रोश की धधकती ज्वाला, मन के किसी कोने में दुबके छुपे काव्यबोध को जगाकर प्रेरित करने लगी, फलस्वरूप कुछ गीत/ कविताओं ने जन्म लिया ।" इन काव्य संग्रह को पढ़ने से ऎसा प्रतीत होता है कवयित्री मूलतः गीतकार है। उनके गीतों में पीड़ा है,अकुलाहट है,यही अकुलाहट उन्हें कवि बनाती है- 

" घावों का सागर अति गहरा,/सपनों पर विरहा का पहरा,/ फिर विरहिन के नयनों में यह-/ निंदिया क्यों घिर आई ।"
  (मुक्ति थी जिसके बंधंन में....पृ.सं.19)

पुस्तक का प्रारभं दोहों से किया गया है। यहाँ एक प्रश्‍नाकुल मन की बेचैनी देखी जा सकती है -

"शब्द तुम्हारे दे रहे, यूँ अब भी अधिकार।/अर्थ दूर क्यों जा बसे, सात समन्दर पार ॥"
(अर्थ दूर क्यों जा बसे....पृ.सं.11)


जहाँ एक तरफ कवयित्री व्यथित हैं वहीं दूसरी ओर जीवन के प्रति आस्थावान भी हैं।जिस प्रकार पतझड़ और वसंत का आना-जाना सृष्टि का चक्र है  ठीक उसी प्रकार सुख और दुख का आना-जाना मनुष्य के जीवन का चक्र है। शकुंतला किरण ने सृष्टि तथा जीवन के इस शाश्‍वत नियम को बड़े सहज भाव से अपने इस गीत में दर्शाया है -

"रिसने दो आँसू को, पीड़ा की आँख तुम,/फागुन की मस्ती से आओ, हम परिचय कर लें/ ........./ केसर और टेसू के, रंगों में भीग-भीग,/ इठलाती-सुधियों का आओ, हम संचय कर लें।"(बजने दो चंग....पृ.सं.16)

प्रकृति और मनुष्य का संबंध आदिकाल से रहा है । शकुंतला किरण ने अपने गीतों में इस परंपरा का निर्वाह बखुबी किया है। बड़ी सहजता के साथ उन्होंने प्रकृति का मानवीकरण किया है-

"सपन की पुष्प देहरी पर,खिली है चाँदनी जब से,/सुरों की सरगमी-फागुन,सुनाये रागिनी जब से,/ फुहारों की छुअन सुखे अधरों पर  लिख गई सावन/ हर इक पल हो गया ऋतुराज गंधित यामिनी जब से।" (सपन की पुष्प देहरी पर....पृ.सं.45)

आदमी चाहे विदेश में क्यों न हो वह अपनी मातृभाषा का मोह नही छोड़ पाता । शकुंतला किरण के राजस्थानी गीतों में मातृभाषा का यह मोह बड़े ही स्पष्‍ट एंव सरस रूप में दिखाई देता है। कहीं सास जँवाई को सीख देती नजर आती है तो कहीं बहुएँ सास-पुराण सुनाती दिखाई पड़ती है। ’कवि सम्मेलन री झाँकी’ तथा ’पाणीवाड़ा री झाँकी’आदि गीत भी हँसकर लोट-पोट होने पर विवश करते हैं।  इन गीतों में हास्य-व्यंग्य की प्रधानता है यथा-

"सुनो कवँरसा बाई नै म्हे, घणा लाड़ सू पाली पोसी।/भोली डारी छोरी म्हाँरी, सब बातां मे है संतोषी॥/सव कामां में तेज घणी, आ पण गुस्सा की है खारी।/थे मत बहस बराबर कर जो, कवँर साब आ विनती म्हारी॥" (सासू री सीख-जवाँई रे नाम पृ.सं.50)

अतुकान्त कविता की शृंखला में कवयित्री ने मूल्यविहीन होते हुए समाज,स्त्रियों की दयनीय स्थिति तथा मानव संबंधों को उकेरा है-

"इन जर्जर संबंधो में-/ अपनत्व खोजना/ठीक वैसा ही है-/ जैसे शवों में स्पंदन की चाह।" (संबंध-पृ.सं.-61)

स्त्रियों के चहुँमुखी शोषण एवं उनकी पराधीनता पर कवयित्री दुखी हैं । नारी विषयक विकृतियों एवं उनकी स्वतंत्रता का हनन करने वाले सभ्य समाज पर ‘अभिशप्त ’ कविता के माध्यम से कवयित्री ने जमकर प्रहार किया है-

"मैं/भेड़ों के झुण्ड से-/निकल भागने का /विद्रोह नहीं/  सिर्फ कुछ स्वतंत्रता से-/आगे-पीछे,/बिना किसी से सटे/चलना चाहती हूँ!/ ले..कि...न/ तुम्हारी कर्कश हाँक,/और लकड़ी,/बार-बार/झुण्ड में मिलकर,/सबसे सटकर,/ चलने को विवश कर देती है!/ यह कैसी नियति है! (अभिशप्त-पृ.सं.69)

कहने को तो हम आज स्त्री सशक्तीकरण की दौड़ में शामिल है। लेकिन क्या कामकाजी महिलाएँ घर के बाहर सुरक्षित है ? इस प्रश्न को कवयित्री ने ‘अंह की तुष्टि ’ में बड़ी ही सशक्त मुद्रा से उठाया है-

"चारो ओर बैठे हुए दैत्य/निगाहों में नाखुनों-/और अनर्गल प्रश्नो के चाकू से,/किसी मासुम व्यक्तित्व के चिथड़े-चिथड़े उड़ा,/उसे नंगा कर,/ अपने अहं की तुष्टि पर-/ठ....हा....के लगा रहे हैं।" (अहं की तुष्टि-पृ.सं.-74)

बदलते मूल्य, खंडित होते विश्वास एवं प्रगतिशील समाज में दहेज रूपी दानव ने आज भी कितनी ही लड़कियों को मौत की गोद में सुला रहा है। आज की शिक्षित युवा पीढ़ी भी दहेज रुपी दानव के चंगुल से मुक्त नही हो पाई है । उनकी तथाकथित मुक्ति केवल भाषण तथा कलम तक ही सीमित है। ‘अलविदा मेरे गुलाब ’ में कवयित्री हृदय को झकझोरने वाले कुछ प्रश्न पाठको के समक्ष रखती हैं-

"एम.ए. की डिग्री,बैंक की क्लर्की,/फिर भी न दहेज में स्कुटर?/न फरमाइश पर मित्रों के लिए शराब?/और इस भयंकर अपमान का बदला,/सिर्फ.....सिर्फ माधुरी की हत्या हीं तो-/हो सकता था!/बधाई लो मनु अपनी इस सफलता पर,/अहं पर /पुरुषार्थ पर,/ और उस स्कूटर व शराब के प्रतिष्ठित सवाल पर !!(अलविदा मेरे गुलाब पृ.सं.-76) 

जहाँ एक तरफ स्त्रियों पर हो रहे अत्याचार से कवयित्री दुखी हैं वहीं दुसरी तरफ उधार में दी गई सुविधाओं के विरुद्ध बगाबत करती हैं-

"विरासत में मिले-/सुविधाओं के पंख,/न मेरे पास है/न उधार लेना चाहती हूँ।" (पंख-पृ.सं.71)

इसी प्रकार शकुंतला किरण मूल्यविहीन राजनीति तथा सत्तालोलु्पों एवं भ्रष्टाचारियों पर भी जमकर प्रहार करने से नहीं चूकती हैं-

"इस बार.../अंधे धृतराष्ट्र के लिए/ गांधारी के साथ ही-/सभी प्रधान गण भी,/आँखों पर पट्टी बाँध,/स्वामी भक्ति में-/कुत्तों से भी आगे बढ़ते रहे!/ बेबस जनता को काटते रहे!" (अंधा राज-पृ.सं.-87)

आज की युवा पीढ़ी संवेदना शून्य तथा हृदयहीन हो चुकी है। संबंधों को भी नफा-नुकसान के तराजु पर तोला जा रहा है। वृद्ध असहाय माता-पिता के प्रति उदासीन होते युवाओं को भी कवयित्री ने जमकर लताड़ा है- 

"पद-यात्रा करते-करते,/जब चढाव पर-/श्रवण कुमार की आँखे/रुप और राशि में ही-/ अटक गई,/तो काँवड़ में बैठी माँ,/ अचानक 
उलट गई!/झाँका तो पाया कि-/कुँआ बहुत गहरा व अंधा है!/ और सूरज भी-/ साथ देने में,/आनाकानी कर रहा है। "  (अप्रत्यशित-पृ.सं.-89)

मार्क्स का सामाजिक समता का सिद्धांत सिर्फ किताबों तक ही सीमित हो चुका है। वर्तमान समाज में अमीरी-गरीबी की खाई इतनी गहरी हो चुकी है कि उसे पाटना नामुमकिन दिखता है। ‘गरीबी की सजा ’ में कवयित्री ने आम आदमी के कुछ ऎसे ही प्रश्न बड़े सहज ढंग से उठाए हैं-

"तुम नहीं जानते!/उनके बड़े-बड़े गुनाहो की उम्र भी,/हमारे छोटे-छोटे गुनाहों से-/बहुत कम होती है।..../अपने गुनाहों के कंबंल को ओढ़ा देते हैं/ठिठुरते गरीब व बेबस लोगों को-/साथ ही उन्हें कारावास में-/मुहैया करवा देते हैं/ दो वक्त की रोटी!" (गरीबी की सजा -पृ.सं.-104)

भक्ति गीतों में कवयित्री कहीं कान्हा के लिए श्रृंगार करती हैं तो कहीं विरहनी राधा बनी भी दृष्‍टिगोचर होती हैं-

"उद्धव से संदेश तुम्हारे,समझ नहीं हम पाते हैं।/मन तड़पत है आओ कान्हा, आँसू तुम्हे बुलाते हैं।।"                                                   (ये आँसू तुम्हे बुलाते हैं....पृ.सं.-104)

शकुंतला किरण की असली शक्ति उनकी गुरुभक्ति है। कवयित्री गुरु को ईश्‍वर के रूप में महसूस करती हैं-
"तुम ही हो ईश्‍वर गुरुवर,तुम परम ब्रह्म तुम ज्ञानी।/तुम ही तो ब्रह्मा,विष्णु ,तुम ही शिवशंकर दानी।                       (है आज गुरु पुनम तुम.....पृ.सं.110)

गुरुभक्ति में सराबोर कवयित्री की गुरु के प्रति समर्पण याचना भी अद‌‌भुत है-

"समर्पण निःशेष हो मेरा,तुम्ही आधार हो,/तुमसे तुमको माँगने की याचना स्वीकार हो ।( तुमसे तुमको माँगने की..... पृ.सं.110)

अपने काव्य संग्रह ‘अहसासों के अक्स’ में कवयित्री शकुंतला किरण ने दोहे,गीत,गजल, मुक्तक,राजस्थानी कविता तथा भक्ति गीतों आ के माध्यम से सशक्त काव्य अभिव्यक्ति का परिचय दिया है। कवयित्री की मातृभाषा राजस्थानी में लिखी गई कविताएँ अविस्मरणीय होगीं इसमें कोई दो राय नहीं। साथ ही इसमें कोई संदेह नही कि शकुंतला किरण के भक्तिगीत श्रेष्ठ राजस्थानी परंपरा की रचनाएँ हैं।  मीराबाई के पदों की तरह इन गीतों का भी गायन मंदिरों में हो सकता है। 




अंततः इस काव्य संग्रह की एक अन्य विशेषता यह है कि इसमें सहज भाषा में पर्याप्त गहराई भरी गई है। कवयित्री की काव्य प्रतिभा तथा भक्ति भावना हमेशा बनी रहे , इन्हीं शुभकामनाओं के साथ आशा है कि हिंदी जगत ‘अहसासों के अक्स ’ का स्वागत करेगा ।

                                                                                                                        - अर्पणा दीप्ति
                                                        
समीक्षित कृति-अहसासों का अक्स
कवयित्री - डॉ.शकुंतला किरण
प्रकाशक- संकेत प्रकाशन, 372/26,रामगंज, 
संस्करण-2009
पृष्ठ संख्या - 152  
मूल्य-35o रुपए