गुरुवार, 27 दिसंबर 2018

“तुम मिली......जीने को और क्या चाहिए”





था बिछोह दो दशकों का भारी,
विलग हो हुई अधूरी;
बस साँसे थी तन में ,
शक्तिहीन मन-प्राण |

थे कुछ शिकवे और शिकायत ,
उस अनंत सत्ता से ;
बनी फरियादी किया फरियाद ,
याद किया तुम्हें जब-जब ,
नयन-नीर-सजल
अधीर मन प्राण |

हुई आज पुनः सम्बल
पाकर तुमको-
एक क्षण सहसा चौंकी !
कहीं दिवा स्वप्न तो नहीं !!


बातें कर तुमसे बहुत रोई ,
होती जो तुम साथ मेरे ;
मिलकर हम देते जग को नई दिशा,
एक नया क्षितिज एक नया उजियारा ||

हाँ ! वो तुम्हीं तो थी
करती थीं मुझमे नव उर्जा का संचार ;
विलग हो हुई स्वप्न विहीन आँखे |


थे पथ दिशाहीन;
था संघर्षरत तन,
पथ पर थे अंगारे ,
झुलस रहा था मन-प्राण,

काश होती जो तुम ,
पथ के शूल बनते फूल ,
अंगारे देती शीतलता |

उहापोह में नन्हा अंकुर आया भीतर ;
हुआ नाभिनाल आबद्ध ,
हुई ममत्व से सम्बलित |

क्या भुलूँ क्या याद करूं ?
कहाँ-कहाँ से गुजर गई ?
अस्तित्व के जद्दोजहद में,
वय के चार दशक बीत चुके हैं,
पांचवे की दहलीज पर हूँ खड़ी |


शब्द तुम्हारे मैंने सहेजे
बना सम्बल जब-जब टूटी मैं;
अश्रुपूरित नयन पढ़ती थी संदेशा ,
गिरती थी, बिखरती थी, बढ़ती थी आगे ;
बस है यही कहानी ||

तुम नहीं बदली बिल्कुल;
आज भी हो वैसी हीं,
विधि के ये एहसान नहीं कम;
पाया तुमको फिर से

आओ बैठे कुछ क्षण;
मैं बोलूं तुम सुनना ,
दो दशकों का दूँ ;
तुमको लेखा-जोखा,
तुम कुछ अपनी कह लेना;
मैं सुनाऊं सबसे ज्यादा ||

तुम्हारी चंद पंक्तियाँ पुन: तुमको-
“जब याद आए मेरी मिलने की दुआ करना|”

मेरी दुआ कुबूल हुई |

तुम्हारी मानस की चौपाई-
“जेहि के जेहि पर सत्य सनेहू / सो तेहि मिलहि न कछु संदेहू ||”

और तुम मुझे मिली |

“तुमने कहा था ये बातें सिर्फ दोस्ती के सम्बन्ध में नहीं सपनों के सम्बन्ध में भी लागू होती है , सपने देखना कभी नहीं छोड़ना |”
दिनांक -4-6-1998 (महरानी रामेश्वरी महिला महाविद्यालय छात्रावास दरभंगा)
अर्पणा दीप्ति




गुरुवार, 6 दिसंबर 2018

स्मृति शेष



आख़िरी मुलाक़ात 3 सितम्बर 2018 सुबह 9 बजे








माँ जैसे आपको पता था, आप इस धरती पर अधिक दिन नहीं रहेंगी इसलिए आप बिल्कुल छोटी बच्ची बन गई थी | जैसे ही हमें पता चला आप डाक्टर के निगरानी में हैं अनुराग ने कहा माँ-पापा आप पटना फ्लाईट से चले जाइए | अस्पताल में मुझे और बेटा को देखकर हाथ पकड़ कर आप बहुत रोई थीं  | मैंने कहा आप ठीक हो जाइयगा अब हम आ गए हैं , और सचमुच आपका स्वास्थ्य सुधरता गया, आप घर आ गई | एक सप्ताह बाद आपने मुझसे कहा अब मैं ठीक हूँ तुम लोग जाओ | अनुराग को खाने-पीने में कठिनाई हो रहा होगा | 3 सितम्बर शाम पांच बजकर चालीस मिनट पर  पटना से हैदराबाद के लिए फ्लाईट था | आपने बाबूजी से कहा दुलहिन और मणि विमान से चला जायगा और डेढ़ घंटे में पहुंच जाएगा |  हाँ साथ ही आप ने ये भी कहा था  मुझे चाय पिलाओ कुछ अच्छा खिला दो ? साग बनाओ और एक रोटी चालाकी नहीं करना देखो तुम मुझे ठग कर दो रोटी खिलाती हो मैं सब जानती हूँ ! आपने बड़े प्रेम से चेताया था मुझे?  बड़े ही चाव से आपने भोजन की थाल को देखा फिर रोटी का उल्ट-पलट कर मुआयना किया संतुष्ट होने के बाद बेटा (मेरे पति) से कहा खाना अच्छा बनाती है बिल्कुल मेरे जैसा | हँसते हुए बेटा से कहा बहुत सीधी-सपाटी है बिलकुल मेरे जैसी सम्भाल कर रखना इसे कोई तकलीफ न हो| बेटा ने कहा न दीदी (माँ) बहुत जिद्दी है तुझे नहीं न पता | मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए आपने मुझे आशीषा बेटे के तरफ देखकर हंसने लगी |  रोटी खाने के बाद बेटा के साथ थाल में चावल खाने की इच्छा जाहिर की थी, मुझसे कहा एक निवाला खिला दो | जा रही हो मेरा मालिश कौन करेगा करके जाओ ? अच्छे से मुझे नहला दो गर्मी बहुत है | सिंदूर लगा दो आज साड़ी भी पहना दो |  हालांकि ससुराल से मेरा आना-जाना न के बराबर था | आजीविका तथा अध्ययन-अध्यापन में व्यस्त रही | पड़ोसियों ने आप से कहा आपकी बेटी बहुत सेवा करती है | शायद वे मुझे जानते नहीं थे ! उनसे मुखातिब होते हुए आपने कहा- नहीं ये मेरी मंझली बहु है परिवार तथा गाँव में सबसे पढ़ी-लिखी मणि की दुलहिन है |  मिथिला से है, मधुबनी की मेरा पोता मेरे बेटा से भी लम्बा है परिवार में सबसे बड़ा | आपके मुखमंडल पर एक अलग ही आभा, एक तेज, एक ऐसा संतुष्टि जिसे आज से पहले मैंने कभी नहीं देखा | सचमुच मां अप्रतिम सुंदर दिखी उस दिन आप | अपने पुराने अंदाज में दरवाजा पर कुर्सी पर बैठ गई आप मानो यह कहना चाह रही थी जाना है तो जाओ मैं तुम्हारे बिना भी रह लूंगी | लेकिन आप ह्रदय से रो रही थी मैं जानती थी | आप मेरे कमरे में आई और कहा तुम्हें बहुत काम करना पड़ रहा है, एक सुबह से तुम काम कर रही हो कुछ खा लो और हाँ काजु भुन दो ठीक वैसे ही काली मिर्च डालकर जैसे अनुराग के लिए बनाती हो ? और हां सुनो ! खाना बनाने वाली को सिखा दो | मैं हंस पड़ी थी;- मैंने कहा आप खत्म होने से चार दिन पहले मुझे बता दीजियेगा मैं हैदराबाद से आपको कुरियर कर दूंगी | आप रो पड़ी थी आँख में आंसू लेकर कहा कहाँ सुनते हैं तुम्हारे ससुर आजकल ! कहती हूँ- काजु-बादाम मंगवा दीजिये खाने से शरीर में ताकत होगा | कहते हैं भात-रोटी खाइए उससे ताकत होगा | काजू-बादाम आप नहीं पचा पाएंगी और महंगा भी मिलता है | मैंने इनसे  कहा इन्होंने बगल के दुकान से एक किलो काजू एक किलो बादाम तथा एक आधा किलो फूल मखान मंगवा कर रख दिया | मेरे कमरे में एक जाली का अलमारी रखा था मानो वह अलमारी न हो आपकी तिजोरी हो उसकी चाभी हमेशा आपके पास रहती थी  पहली बार आपने वह चाभी मुझे दिया और कहा ठीक है ये सब इस में बंद कर दो, और चाभी बाबूजी को दे दो |  हमलोगों के हैदराबाद आने के ठीक एक सप्ताह बाद आपने बेटा से फोन पर सम्वाद करते हुए अपने स्वास्थ्य पुन: बिगड़ने की सूचना दी | अन्न से शत्रुता कर लिया आपने, नींद के पथ पर कांटे बो दिए आपने, अंतिम समय में पारिवारिक अवसाद  से व्यथित हो रहीं थीं | व्यथा के फफोले आपकी आत्मा पर स्पष्ट दिख रहा था | पृथ्वी अपने धूरी पर घूम रही थी, सूरज आसमान में चक्कर काट रहा था | लेकिन आपके तुणीर से जीवन रिक्त हो रहा था | महाप्रयाण के लिए एकदम तत्पर थीं आप | 22 सितम्बर की रात का  अपना रंग था , काला घना |  आप तो जिंदादिल थीं फिर आपके जीवन में अवसाद की ऐसी रात क्यों आई जिसकी कोई सुबह नहीं थी | रोशनी पर ग्रहण लग चुका था | 23 सितम्बर की भोर का उजियारा मौत के साए में सिसक रहा था आप सारे बन्धनों से मुक्त हो चुकीं थीं | हम दोनों रोते रहे चुप कराने का किस्सा खत्म हो चुका था | कुछ नहीं बचा था सिसकियों के सिवा .........   




बुधवार, 17 अक्तूबर 2018

मैकिसम गोर्की और उनकी कालजयी रचना “माँ”



-अर्पणा दीप्ति 


वर्ष 2018 सोवियत साहित्य के पितामह एवं महान लेखक मैकिसम गोर्की के जन्म के 150 सौ वर्ष पूरे होने के कारण विशिष्ट है साथ ही साथ ही उनकी कालजयी रचना “माँ” उपन्यास के 112 वर्ष पुरे होने के वजह से भी उल्लेखनीय है | मुमताज हुसैन ने अपने एक साहित्यक लेख में लिखा “शेक्सपियर के बाद दुनिया के अधिकाँश लोग गोर्की का ही नाम लेंगे |”
प्रसिद्ध लेखक ख्वाजा अहमद अब्बास ने बड़े ही दिलचस्प तरीके से गोर्की की लोकप्रियता और पाठकों पर उनके प्रभाव को व्यक्त किया | 1968 में सोवेत्स्काया कुल्तुरा (सोवियत सांस्कृतिक) पत्र में छपे लेख में लिखा था –“ दुनिया के किन तीन लेखकों ने आपको सबसे अधिक  प्रभावित किया ?ऐसा प्रश्न पूछने पर आपको उत्तर मिलेगा-
क.   मैकिसम गोर्की, थामस मन, और बर्नाड शा |
ख.  लाय टालस्टाय, हेबरट वेल्स, और मैकिसम गोर्की |
ग.   गोल्स वर्दी, फ्रांस काफ्का और मैकिसम गोर्की | 


यानि की हर तीन नाम में से एक नाम अवश्य मैकिसम गोर्की का होगा | स्वयं प्रेमचन्द ने गोर्की के निधन पर अपनी पत्नी से कहा –“जब घर घर शिक्षा का प्रसार हो जायगा तो क्या गोर्की का प्रभाव घर-घर न हो जाएगा | वे भी तुलसी सुर की तरह घर-घर न पूजे जायेंगे ?
          अब बात गोर्की की कालजयी रचना “माँ” की |  “माँ” महज एक उपन्यास नहीं बल्कि सोवियत साहित्य की बुनियाद का पहला पत्थर है | 1906 में गोर्की द्वारा लिखा गया इस उपन्यास में क्रांतिकारी मानवता की बहुआयामी झलक देखने को मिलता है | यह पुरी दुनिया की समूची मेहनतकश और मुक्तिकामी जनता के लिए लिखा गया एक अत्यंत महत्वपूर्ण दस्तावेज है जिसने असंख्य लोगों की चेतना को झकझोरा था | इसे पढने के बाद बहुत से लोग प्रगतिशील एवं वामपंथी आन्दोलन से जुड़े थे | इस उपन्यास का केन्द्रीय विषय 1905 से पूर्व सोवियत संघ मजदुर वर्ग का जीवन, निरंकुश राजतंत्र, और पूंजीपति वर्ग के खिलाफ उनका संघर्ष, उनकी क्रांतिकारी चेतना में वृद्धि तथा इस क्रांति से आगे आए पथ-प्रदर्शक एवं क्रांतिकारी नेताओं को चित्रित किया गया है |
         उपन्यास की कथावस्तु सच्ची घटनाओं के तानेबाने से बुना गया है | इस उपन्यास को रूस के परम्परागत साहित्य और समाजवादी आन्दोलन से प्रेरित नव साहित्य का सेतु कहा जा सकता है |
     उपन्यास का नायक पावेल रूसी क्रांतिकारी साहित्य का एक लोकप्रिय नाम है | इस उपन्यास से प्रभावित होकर दुनिया के कई देशों के माता-पिता ने अपने बच्चों का नाम पावेल रखा | पावेल के माँ पेलागेया निलोवाना जो कि उपन्यास की केन्द्रीय पात्र है पुलिस के हत्थे चड्ढ जाती है उसके हाथ में वह सूटकेस है जिसमे पावेल के भाषण
तथा पर्चे हैं | पुलिस के अत्याचार से वह टूटती नहीं है कहती है “बेवकूफों तुम जितना अत्याचार करोगे हमारी नफरत उतनी बढ़ेगी |”
    मां कोई काल्पनिक उपन्यास नहीं है गोर्की ने इसमें क्रांतिपूर्व रूस के झंझावती दौर के जीते-जागते पात्रों से सजाया है | उनके उपन्यास के नायक पावेल महान अक्टूबर समाजवादी क्रान्ति के सैनिक प्योत्र जालमोव थे और पेलागेया निलोवना उनकी माँ आन्ना किरील्लोवना थीं | प्योत्र बोल्शेविक पार्टी के सक्रिय कार्यकर्ता थे | जारशाही अदालत ने उन्हें साइबेरिया में निर्वासन की सजा दी थी | गोर्की की मदद से प्योत्र साइबेरिया से भाग निकले थे | 1905 में क्रान्ति के समय मास्को के हथियारबंद मजदूर दस्तों के संगठन में भाग लिया | जानलेवा बीमारी  तथा डाक्टरों के मनाही के बावजूद प्योत्र क्रांतिकारी संगठन के लिए काम करते रहे | उन्होंने अपने क्रांतिकारी जीवन तथा गोर्की से मुलाकातों के संस्मरण लिखे साथ ही गोर्की के ‘माँ’ उपन्यास के पाठकों से पत्र व्यवहार भी करते रहे |   
    प्योत्र जालोमोव बहुत साल तक ज़िंदा रहे 1955 में 78 साल की उम्र में उनकी मृत्यु हुई | उनकी माँ आन्ना किरील्लोवना ने भी काफी लंबी उम्र पाई | उनके बारे में गोर्की ने लिखा है-सोमोर्व में पहली मई के जुलूस के लिए सजा पानेवाले प्योत्र जालोमोव की मां का ही रूप पेलागेया निलोवना थी | वे गुप्त संगठन में काम करती थी और भिक्षुणी के भेष में साहित्य ले जाती थी | आन्ना किरील्लोवना का जन्म 1849 में एक मोची के घर में हुआ था | उनकी जिन्दगी काफी कठिन रही | पति की मृत्यु के बाद तो ख़ास तौर पर उन्हें बहुत बुरा वक्त देखना पड़ा | उनके सात बच्चे थे वे ‘विधवा घर’ के अँधेरे और ठंढे तहखाने में अपने बच्चों के साथ रहती थीं | माँ की कर्मठता और श्रमप्रियता ने ही परिवार और बच्चों को बचाया | बच्चे धीरे-धीरे बड़े होते गए , कुछ काम करने लगे कुछ पढ़ते रहे | प्योत्र क्रांतिकारी मंडल में शामिल हो गए | जल्द ही पूरा जालोमोव परिवार क्रांतिकारी आन्दोलन में हिस्सा लेने लगा |
यह सच है की रूस के ‘गोर्की’, भारत के ‘प्रेमचन्द’ तथा चीन के ‘लू शुन’ तीनों लेखकों ने ‘कला कला के लिए’ (Art for Art) के सिद्धांत को अस्वीकार किया | गोर्की लेखन कार्य को लेखक का निजी मामला मानने को हरगिज तैयार नहीं थे | यही कारण है कि केवल शब्दों में मानवता की दुहाई देनेवाले लोगों के ढोंग का भी उन्होंने पुरजोर विरोध किया | उन्होंने साफ और सीधे शब्दों में पूछा “ किसके साथ हैं आप कला के धनी ?”  “आम मेहनतकश लोगों के साथ जो जीवन के नए रूपों का  निर्माण करने के पक्ष में हैं, या उन लोगों के पक्ष में जो गैर जिम्मेदार लुटेरों की जात जो ऊपर से नीचे तक सड़ गई हैं |” ठीक उसी तरह जैसे मुक्तिबोध पूछते थे “पार्टनर तुम किस और हो ? पार्टनर तुम्हारी पालटिक्स क्या है ?”        
    गोर्की के इसी आह्वान ने मजदुर बस्ती की धुएं और बदबूदार हवा में हर रोज फैक्टरी के भोंपू का काँपता हुआ कर्कश स्वर में भी छोटे-छोटे मटमैले घरों से उदास लोग सहमे हुए तिलचट्टे की तरह बाहर आ जाते हैं .....और फिर पुतलों की भाँती चल पड़ते हैं | गंदे चेहरे पर कालिख पुते और फिर मशीन के तेल से दुर्गन्ध छोड़ते हुए शरीर |  

क्रमश:   





मंगलवार, 19 जून 2018

विश्व साहित्य से सिमीं बहबहानी की ईरानी कविता

अर्पणा दीप्ति 

सिमीं बहबहानी 


मैं ऐसी स्त्री को जानती हूँ 


मैं ऐसी स्त्री को जानती हूँ जो घर के कोने में 
कपड़े धुलने और खाना बनाने के दरमियाँ 
अपनी रसोई में गुनगुनाया करती है 
मन को जगा देने वाली एक प्रेरक गीत |
उसकी आँखों में मासूमियत है पर एकाकी उदास है
उसकी आवाज थकी और लस्त-पस्त है 
उसकी उम्मीदें कल की आस पर टिकी हुई हैं |

मैं एक ऐसी स्त्री को जानती हूँ 
जो कुबूल करती है 
अपने दिल की बाजी हार जाना उसके सामने 
जाने वो इसके काबिल है भी या नहीं ?
वो धीरे-धीरे खुसर-फुसुर करती है 
कि चाहती हूँ भाग जाऊं यहाँ से कहीं दूर 
पर इसके फौरन बाद खुद से सवाल भी करती है ;
मेरे बच्चों के बाल कौन सवाँरेगा 
जब मैं चली जाउंगी |

एक स्त्री जो दर्द से गर्भवती है 
एक स्त्री जो जनती है पीड़ा के शिशु 
एक स्त्री बुनती है धागेदार कपड़े 
एकाकी सूनेपन के तानेबाने से |
कमरे के अँधेरे कोने में 
दिए से करती है ईश्वर की प्रार्थना |

एक स्त्री जंजीरों से आदतन घुली-मिली 
एक स्त्री जिसको जेल घर जैसा अपना घर लगता है 
वार्डन की ठंढी निगाहें बस
कुल मिलाकर यही उसके हिस्से की प्राप्ति है |

मैं एक ऐसी स्त्री को जानती हूँ .....
मैं एक ऐसी स्त्री को जानती हूँ 
जो निस्तेज और शिथिल पड़ जाती है तिरस्कारों से 
फिर भी गुनगुनाती रहती है कोई न कोई गीत 
इसी को कहते हैं किस्मत का फेर ......


इस स्त्री को हो जाता है अभ्यास गरीबी का 
इस स्त्री को रुलाई छुटती  है सोते वक्त 
डाह और विस्मय से चकित स्त्री 
समझ ही नहीं पाती कहाँ हुई है उस से चूक ......

एक स्त्री छुपती फिरती है 
बेतरह उभरी हुई नसों वाले पैर से 
एक स्त्री चौकन्ना होकर एकदम से ढांप देती है |

अपने दुखों की अन्दर अन्दर फैलती लपटें 
जिससे कुछ सामने न आए दुनिया के 
ये तो ऐसे ही उपरी सिरे तक लबालब होती है 
घातों -प्रतिघातों से 
मोड़ो-तोड़ो और ऐठ्नों से |

 मैं एक ऐसी स्त्री को जानती हूँ 
जो बिना नागा अपने बच्चों को 
किस्से और लोरियां गा-गाकर सुलाती हैं 
पर खुद अपने सीने में 
जानलेवा तरकशों  के  गहरे ही गहरे जज्ब करती है |

एक स्त्री घर से बाहर निकलने में डरती है 
कि घ का चिराग वही तो है 
सोचती है कि घर कितना भुतहा लगने लगेगा 
उसके चले जाने के बाद .........

ये स्त्री शर्मिन्दगी महसूस करती है 
भोजन से खाली-खाली है उसका टेबुल 
भूखे बच्चे को सुलाने के लिए 
उसकी पसंद की गाती है मीठी-मीठी लोरी .....|

मैं एक स्त्री को जानती हूँ 
जिसमे अब बची नहीं सुई भर भी जान है 
कि चल पाए एक  कदम भी 
 दिल रो-रो कर बेहाल 
अब इससे बदतर और क्या होगा.......

मैं सी ऐसी स्त्री को जानती हूँ 
जिसने जीता अपने अहम्  को बलपूर्वक 
हजारों  हजार बार 
और अंत में वो जब विजयी हुई तो ठहाका लगाकर हंसी 
और खूब स्वांग किया ठट्ठा किया 
दुष्टों का, भ्रष्टों का .....

एक स्त्री छेडती है तान 
एक स्त्री रहती है सुनसान 
एक स्त्री अपनी रात बिताती है 
अच्छी तरह देखभाल कर किसी सुरक्षित गली में ........|

एक स्त्री मशक्कत करती है दिन भर पुरुषों की तरह 
पड़ जाते हैं फफोले उसकी हथेलियों पर 
उसको यह भी याद नहीं 
कि वह तो पेट से है ....|

एक स्त्री अपनी मृत्यु शय्या पर है 
एक स्त्री बिलकुल मौत से सटकर खडी है 

उस स्त्री की स्मृति को कौन सुरक्षित रखेगा 
मैं नहीं जानती 
एक रात यह स्त्री बिलकुल चुपचाप 
उठकर चली जाएगी बाहरी दुनिया के.......
परर दूसरी स्त्री अवतरित होगी, लेगी इसका प्रतिशोध 
वेश्याओं जैसा सुलूक कर रहे मर्दों से ..........

मैं जानती हूँ ऐसी एक स्त्री को 

फारसी से अंगरेजी अनुवाद :-रोया मोनाजेम  
 


सोमवार, 21 मई 2018

मैं क्यों लिखती हूँ-भाग 3




बची रहेगी यह धरा जब तक हम-आप इस पर चहलकदमी करते रहेंगें !!

सामान्यत: मैं कविता लिखने से बचती हूँ | साहित्य के इस विधा में पूर्णता का अधिकार मुझे नहीं है  | पर कभी-कभी शब्द घनीभूत होकर जेहन पर इतने भारी हो जाते हैं तब मैं केवल माध्यम बन उन शब्दों को रास्ता भर देती हूँ | अपने आस-पास के समय को जब सम्वेदनशील होकर देखती हूँ , तो शब्दों की पीड़ाओं से भर जाती हूँ | या फिर यूँ कहूँ की शब्द जेहन में खदबदाते(उबलना) हैं जिससे हिय (कलेजा) के भीतर कुछ दाजने (जलना) सा लगता है | उस दाज को जब शब्द का रूप देकर पन्नों पर ढालने लगती हूँ तो मई-जून के तपते रेगिस्तान में पहली बारिश के बाद धीरे से उठती ठंढक महसूस होती है | ये शब्द कभी कहानी, कविता, रिपोर्ताज के आकार  में ढलने लगते हैं लेकिन पीड़ा बहुत निजी होती है वह डायरी में ही उतरती है |
अर्पणा दीप्ति 

अगर खुद से प्रश्न करूँ कि मैं कविता क्यों लिखती हूँ ? तो दो-चार वजह सामने आती है-कई बार तो कविताएँ बेहद निजी पलों की फुसफुसाहट होती है तो कुछ subtext सबटेक्स्ट होती है जिसे कभी सीधे-सीधे बोला या कहा नहीं गया ! कुछ कविताएं हमारे आसपास में फैली अव्यस्था और बेचैनी का प्रतिरूप होती है, तो कुछ सपाट बयानबाजी होती है, जिसमे साधारण मन के सुख-दुःख, खुशी-पीड़ा अभिव्यक्त करती हुई नजर आती है | किसी विदेशी कवि ने कहीं लिखा है कि “ जीवन और मृत्यु के बीच जो भी कुछ हमारा दैनंदिन क्षण होता है, वह भी प्राथमिक तौर पर काव्यात्मक ही होता है|” यानि भीतर और बाहर का सन्धिस्थल, कालहीनता में आंतरिक बोध और क्षणभंगुरता के बाह्य बोध के बीच |

सच कहूँ तो जब कविता पहली बार मोबाईल,लैपटाप,डायरी और रद्दी पैम्पलेट पर उतरती है तो वह रेगिस्तानी गाँव के लिए पहली बारिश से सनी मिट्टी की सौंधी खुशबू लिए होती | फिर धीरे-धीर क्राफ्ट और ड्राफ्ट के ट्रीटमेंट के साथ मेट्रो के सभ्य लोगों जैसी बन जाती है | नाईजेरियन कवि बेन ओकरी ने कहा था कि “हमे उस आवाज की जरूरत है जो हमारी खुशियों से बात कर सकें, हमारे बचपन और निजी राष्ट्रीय स्थितयों के बंधन से बात कर सके वह आवाज जो हमारे संदेह, हमारे भय से बात कर सके ; और उन अकल्पित आयामों से भी जो न केवल हमें मनुष्य बनाते हैं बल्कि हमारा होना भी बनाते हैं |” इस लिए कविता मेरे लिए स्वांत सुखाय पहले है जिसके साथ समाज,देश,और मानवता की चिंताएं सहजता के साथ आती है | कभी भी मैंने उद्देश्य, विचारधारा या वर्ग को ध्यान में रखकर लिखने का प्रयास नहीं किया |

तपते रेगिस्तान में जून की भीषण गर्मी में मटके के ठंढे जल को पीते हुए तृप्ति का अहसास मुसाफिर करता है ठीक वैसा ही अहसास बेचैन करती हुई पीड़ा रात के तीन बजे कागज पर उतरती कविता को देखकर होती है | पुन: यही कहूंगी विपरीत समय में एक सम्वेदनशील मन को यह मासूम कविताएँ ही ज़िंदा रखती है वरना यह क्रूर तपता परिवेश झुलसाने के लिए काफी है |       
    

रविवार, 20 मई 2018

मैं क्यों लिखती हूँ ? (भाग-2)




To write is thus to disclose the world and to offer it as a taste to the generosity of the reader-why write?

आलेख में ज्याँ पॉल सात्रं द्वारा लिखित ये पंक्तियाँ की इस प्रकार लिखना की दुनिया को उजागर किया जाए, तथा इसे पाठक की सदाशयता पर छोड़ा जाए की वह इस कार्य को अपने हाथ में लें |  सात्रं की ये पंक्तियाँ मुझे बहुत प्रिय है |
अर्पणा दीप्ति 

अक्सर मेरे मन में यह सवाल उठता है की मैं क्यों लिखती हूँ ? जब बिना लिखे हुए भी दुनिया में अधिकाँश लोग अपना जीवन बड़े आराम से जी रहें हैं, तब लिखने में मुझे अपना समय क्यों जाया करना चाहिए ? एक बिजनेसमैन सोचता है किस तरह कम समय ने अधिक से अधिक ग्राहकों के सम्पर्क में आकर वह अधिक मुनाफा कमा सके, एक डाक्टर सोचता है की कैसे कम समय में अधिक से अधिक मरीजों को निपटाकर अधिक पैसे इकट्ठे किये जा सकें | एक ट्यूटर सोचता है की कैसे समय का अधिकाधिक उपयोग कर विद्यार्थियों के अधिक से अधिक समूहों को पढ़ाने का प्रयोजन हो और अर्थोंमुख होने का कीर्तिमान बनाया जा सके | ऐसी सोच के आज के इस गतिमान प्रवाह में जहाँ अपने समय को अर्थ में बदलने की होड़ लगी हो तब एक लेखक के मन में यह विचार आना स्वाभाविक है कि मैं क्यों लिखती/लिखता हूँ ?


यह जानते हुए भी की लिखना अपने समय को अर्थ में बदल पाने की कला से कभी आबद्ध नहीं कर  सकता, उसके बावजूद भी अगर मैं लिखती हूँ तो इस लेखन का मेरे जीवन में गहरे निहितार्थ है | इस निहितार्थ में जीवन के उन सारे मूल्यों के नाभिनालबद्ध होने की गहरी आकांक्षा है जिसे मैं अपने जीवन के साथ-साथ दूसरों के जीवन के आस-पास देखना चाहती हूँ | लेखक-लेखिकाओं के ऊपर प्राय: यह आरोप लगाए जाते हैं कि वे यश की इच्छा के गम्भीर रोग से ग्रसित होते हैं और उनका लेखन इसी रोग का प्रतिफलन है | पर यह तथ्य सही प्रतीत नहीं होता, क्योकिं यश की दौड़ में आज का लेखक कहीं भी ठहरता हुआ नजर नही आता ! यह एक ऐसा दौर है जिसमे अमिताभ बच्चन, अनुष्का शर्मा, विराट कोहली सलमान खान, सोनम कपूर जैसे विचार शून्य सेलिब्रिटीज ने यश की लगभग समूची जगह को घेर सा लिया है | आज की यह दौर विचारशून्यता को पोषित करने का दौर है, जहाँ लेखक के लिए कोई जगह शेष नहीं है | इसके बावजूद मैं लिखती हूँ तो मेरा लिखना यशोगामी कैसे हो सकता है ? मेरे आस-पास क्या सब कुछ ठीक है ? जब देश-दुनिया की अधिकाँश आबादी ने अपने समूचे समय और जीवन को अर्थ उपार्जन और कामवासना की तृप्ति के लिए ही रख छोड़ा है ऐसे में भला सबकुछ कैसे ठीक हो सकता है ? मुझे यह भी मालूम है मेरे लिखने से सब कुछ ठीक नहीं हो सकता फिर भी मैं लिखती हूँ | इस लिखने में एक सूक्ष्म आकांक्षा है कि सबकुछ न सही, उसके रत्तीभर आकार का हिस्सा अगर ठीक हो सके तब मेरा लिखना सार्थक है | यह सोच मेरे दिमाग में आती-जाती है इसलिए भी मैं लिखती हूँ |

मेरा लिखना देश में किसानों की आत्महत्या को रोक नहीं सकता, मेरे लिखने से देश में हत्या और बलात्कार जैसे जघन्य अपराध नहीं रुक जाएंगे !  मेरे लिखने से देश में पसरी अराजकता खत्म नहीं हो जाएगी ! इन सबके बावजूद अगर मैं लिखती हूँ तो यह चाहती हूँ कि मेरे भीतर पसरी हुई बैचेनी थोड़ी कम हो जाए | मैं इसलिए लिखती हूँ कि इन बुराइयों का विरोध कर सकूं | इन बुराइयों के विरोध में उपजा मेरा लेखन उन बीज की तरह है जिसमे किसी दिन पेड़ बनने की सम्भावना मुझे नजर आती है | इसलिए भी मैं लिखती हूँ |


मैं सिर्फ अपने लिए नहीं आपके लिए भी लिखती हूँ कि आप मेरे लिखे को कभी समय निकालकर पढ़ सकें और अपनी खोई हुई मनुष्यता की ओर लौटने की कोशिश कर सकें | अगर आपके लिए पढना संभव न भी हुआ तो मेरे लिखने से दुनिया को कोई नुकसान भी नहीं होनेवाला है | क्योंकि मैं कोई अपराधी तो हूँ नहीं और न लोगों के दिल दिमाग में डर पैदा करने वाली शख्स हूँ | मैं तो बस लिखनेवाली बस एक अदना सी कलमकार हूँ, आपके लिए जिसे लेखक मान लेने की मजबूरी भी नहीं है | किन्तु मेरे लिखे से फिर भी आप अराजक होने की छवि से डर जाते हैं, तो इसका अर्थ है की मनुष्यता के पक्ष में इस डर को बनाए रखने के लिए मेरा लिखना कितना महत्वपूर्ण है | अराजक लोगों के इस डर ने ही तो दुनिया भर में शब्द और विचारों की महत्ता को स्थापित किया है | इस स्थापना को मैं और प्रगाढ़ करना चाहती हूँ | मैं पूरी दुनिया में मनुष्यता को बचाए रखने की पक्षधर हूँ इसलिए भी मैं लिखती हूँ |

क्रमश: