मुझे सहजीवन और विवाह में बुनियादी फर्क नजर नहीं आता। फर्क है तो इतना कि विवाह के सिर पर कानून की छतरी और धर्म का चंदोवा टंगा है और सहजीवन(living relationship) बिना छतरी और चंदोवे के धूप और बारिश साथ झेलने और भोगने के रोमांस से नहाया हुआ है। विवाह एक परम ठोस सामाजिक व्यवस्था है: जँहा आल-औलाद, नैहर-ससुराल, पड़ोस-मुहल्ला, पोथी-पतरा, रीति-रिवाज एवं गहना- गुड़िया, कपड़ा-लत्ता, पेटी-बक्सा साथ में कदम-कदम पर बृहत्तर समाज खड़ा है। सहजीवन है खुले द्वार का पिंजड़ा, जब तक मिठास से निभे रहो वरना तुम अपने रास्ते, हम अपने। सिद्धांत: मैं इससे सहमत हूँ रिश्तों और पदों से तब तक ही जुड़ो, जब तक तुम्हें लगे कि तुम इन्हें व्यक्तित्व का सर्वोत्त्म दे रहे हो। अगर आपको देर से पता चलता है कि आप ऎसे दो धातु पिंड है जिनका एलॉय (alloy) बन ही नही सकता तो ऎसे बंधन को किसी बृहत्तर सरोकार के लिए ढोना व्यर्थ है। सहजीवन में आप इस बंधन को ढोने के लिए बाध्य नहीं है। किन्तु विवाह तो ऎसा फेविकॉल जोड़ है जो घसीट मारता है पर टूटता नहीं।
शुक्रवार, 25 अक्टूबर 2013
सदस्यता लें
संदेश (Atom)
समय के लिए कुछ और तय नहीं
स मय के लिए कुछ और तय नहीं सिवा इसके कि यह बीत जाता है लेकिन जो बीतता नहीं लौटता रहता है वह भी कोई समय ही था ज्यों तुम समय की तरह बीत चुके...
-
महात्मा बुद्ध के बाद भारत के सबसे बड़े लोकनायक महात्मा तुलसीदास थे। वे युग्स्रष्टा के साथ-साथ युगदृष्टा भी थे। आचार्य हजारी प्रस...
-
अर्पणा दीप्ति यथार्थ मानव जीवन की सच्ची अनुभूति है जिसके द्वारा हम अपने जीवन में घटित होने वाले घटनाओं एवं भावनाओं का अनुभव करते हैं।...
-
भीष्म साहनी का 2000 ई.प्रकाशित उपन्यास " नीलू नीलिमा नीलोफर " प्रेम कहानी है । इस उपन्यास की कथा वस्तु बाल्यकाल की दो सखियाँ नीलू ...