शुक्रवार, 20 मार्च 2026

समय के लिए कुछ और तय नहीं

 मय के लिए कुछ और तय नहीं

सिवा इसके कि यह बीत जाता है
लेकिन जो बीतता नहीं
लौटता रहता है
वह भी कोई समय ही था
ज्यों तुम समय की तरह बीत चुके हो मुझ से
लेकिन तुम्हारा नाम लौटता रहता है
मुझतक
कभी घाव, कभी दंश
कभी उपहास की तरह
मैं समय की किसी बीत रही धड़कन पर उँगली रखकर
वहाँ तुम्हारे नाम का बीतना रोक नहीं पाती
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# कविता पाठ

# कलमकारों की दुनिया


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