बुधवार, 22 जून 2011

फूले कदम्ब


फूले कदम्ब 
टहनी -टहनी  में कंदुक  सम झूले कदम्ब 
फूले कदम्ब | 
सावन बीता 
 बादल का कोप नहीं रीता 
जाने कब से तू बरस रहा 
ललचाई आँखों से नाहक 
जाने कब से तू तरस रहा 
मन कहता है, छू ले कदम्ब 
फूले कदम्ब 
फूले कदम्ब
     
                                                 नागार्जुन 

समय के लिए कुछ और तय नहीं

  स मय के लिए कुछ और तय नहीं सिवा इसके कि यह बीत जाता है लेकिन जो बीतता नहीं लौटता रहता है वह भी कोई समय ही था ज्यों तुम समय की तरह बीत चुके...