शुक्रवार, 15 मार्च 2019

मेरे महबूब शहर की यात्रा- यायावरी बिहार






मेरे लिए यात्रा करना रोमांच से कुछ कम नहीं | बचपन से पापा के साथ यात्राओं का सुदीर्घ अनुभव रहा है | ख़ासतौर पर बात जब अपनी माटी की हो | रोजीरोटी के चक्कर में घर से बेघर हुई लेकिन मन तो अपनी माटी से जुड़ा है | मन का एक कोना अभी भी कहता है “रहना नहीं देस बिराना” लेकिन क्या किया जाए यह जीवन है जीने के लिए समझौता जरूरी है | मैं भी अरसे से समझौतावादी हो चुकी हूँ |


अब बात यात्रावृतांत की-इसबार सफर के लिए मैंने रेलगाड़ी को चुना | इसके पीछे दो मुख्य कारण है एक आपको भिन्न-भिन्न संस्कृति अलग-अलग व्यवसाय के लोग मिलेंगे, दूसरा प्रकृति के विहंगम छटा का सुलोचन दर्शन होगा | हमारी यात्रा 5 मार्च रात के दस बजे सिकन्दराबाद दरभंगा एक्सप्रेस से शुरू हुई |एक बात तो तय है भारतीय रेल आज भी तनाव विमुक्त बड़े ही आराम से चलती है | रात के दस के बजाए ग्यारह बजे ट्रेन सिकन्दराबाद से रवाना हुई | ट्रेन में मुट्ठी भर यात्री सुरक्षा कारणों से मन आशंकित बीच-बीच में जब भी नींद खुली हमारी गाड़ी किसी न किसी स्टेशन पर आराम फरमा रही थी सुबह पांच बजे कोच के अटेंडेंट से पता चला की हम अपने निर्धारित समय से पांच घंटे लेट हो चुके है | भारतीय रेल तेरी जय हम बड़े ही आराम से पहुँचने वाले हैं यह तय था | हमारी सामने वाली बर्थ यात्री विहीन बगल के कम्पार्टमेंट से एक मराठी सम्भ्रांत बुजुर्ग महिला बीच-बीच में आकर गप्पे मार लेती थीं | गप्प क्या कहिये भारतीय रेल को कोस लेतीं थी मैं भी उनके हाँ में हाँ मिला देती थी | ट्रेन में कैटरिंग की सुविधा नहीं थी चाय के लिए काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा | खैर जैसे तैसे चाय के नाम पर गरम पानी और चीनी के घोल जैसी चाय से संतुष्ट होना पड़ा |


इन्तजार की घड़ियाँ खत्म हुई 6 मार्च शाम पांच बजे भिलाई में टीवी टुडे नेटवर्क के भूतपूर्व एंकर पूण्य प्रसून वाजपेयी अपनी पत्नी बिटिया तथा रिश्तेदारों के साथ हमारे सहयात्री बने | उस समय हम अपने मोबाइल में आजतक में लाइव डिबेट देख रहे थे | खैर जब हमारी डिबेट समाप्त हुई वे लोग भी अपने बर्थ के साथ स्थायमान हो चुके थे | उनके एक रिश्तेदार थे जिन्हें बच्चे भी मौसाजी कह रहे थे और बड़े भी मौसाजी रिश्ता हमें कुछ समझ में नही आया | मौसाजी पिताजी यानी कि ससुरजी के पास आकर बैठ गए बड़े ही आदर भाव से पिताजी के पाँव छुआ | और देश की मौजूदा राजनीति पर चर्चा करने लगे | चर्चा का विषय था air strike तथा आगामी लोक सभा चुनाव,पिताजी तो पुरे मोदी के रंग में रंगे थे | वैसे हम बिहारियों की यह खासियत है देश की मौजूदा राजनीति पर चर्चा करते हुए आपको पढ़ा-लिखा बुद्धिजीवी वर्ग से लेकर रिक्शावाला एवं पानवाला भी मिल जायगा | बातचीत का सिलसिला रात के ग्यारह बजे तक चलता रहा | श्रीमती वाजपेयी ने पूछा ये आपके ससुर हैं हमने कहा हाँ | सुबह छ: बजे ट्रेन रांची के हटिया स्टेशन पहुंची | सहयात्रियों का गंतव्य आ चुका था उन्हें सेमीनार में भाग लेना था | हम सबने एक दुसरे को हाथ जोड़ा | मौसाजी ने बड़े ही श्रद्धा से पुन: पिताजी के पाँव छुए | ये हम बिहारियों की संस्कृति है हम बड़े-बूढों का आशीर्वाद पाँव छुकर हमेशा लेते हैं | पूण्य प्रसून जी जब आजतक नेटवर्क में थे घोर मोदी विरोधी थे शायद यही वजह रही उनके नौकरी छोड़ने की | कल की चर्चा में बड़े ही खामोशी के साथ वे पिताजी का मोदी प्रेम सुन रहे थे | चलते-चलते उन्होंने एक मास्टर स्ट्रोक दे मारा पिताजी से कहा अभी जो हमने एक दुसरे का हाथ जोड़कर अभिवादन किया यह राष्ट्रभक्ति है कल की परिचर्चा व्यक्तिभक्ति थी | बड़ा ही अच्छा और यादगार सफर अच्छे लोगों से मुलाक़ात | हम भी सात घंटे बिलम्ब अपने महबूब शहर यानी कि दरभंगा पहुंच गए | आगे का वृतांत अगले आलेख में |
अर्पणा दीप्ति  
      

मंगलवार, 26 फ़रवरी 2019

कैफियत मन की

अजब है कैफियत मन की 
बिना बादल बरसता है ,
बिना बोले गरजता है ,
कभी तो राख हो जाता है 
कभी ज्वाला कभी चन्दन |

कभी बहता है पानी सा ,
कभी ये आग हो जाता ,
न हो तो कुछ नहीं होता ,
जो हो तो हिमालय हो |

कभी कहता नहीं कुछ भी ,
कभी बेलाग हो जाता है 
कभी दिखता है सिंदूरी ,
कभी होता कस्तुरी |

कभी ये मैं  भी हो जाता ,
कभी ये तू भी हो जाता,
कि सब कुछ व्यर्थ सा लगता ,
कभी मोह में पड़ता |

नया हर अर्थ सा लगता ,
कभी हंसता है  होठों सा ,
कभी नयनों की जलधारा ,
कभी संसार को जीता , 
कभी खुद ही से सब हारा ,
क्योंकि अजब है कैफियत मन की ....

अर्पणा दीप्ति 

रविवार, 10 फ़रवरी 2019

URI:-THE SURGICAL STRIKE








यह फ़िल्म 2016 की वास्तविक घटना पर आधारित है, फ़िल्म के निर्देशक आदित्य धार ने भी कहा है कि उनकी यह फ़िल्म श्रद्धांजली है उन नवोदित देशभक्तों तथा राष्ट्रवादियों को जिन्होंने देश के लिए अपने प्राणों की बलि दी है | समूची फिल्म में स्क्रीनप्ले को पांच अध्याय में विभाजित किया गया है | फ़िल्म की शुरुआत जून 2015 से होती है | हालांकि फ़िल्म वास्तविक घटना पर आधारित है लेकिन समय तिथि और वर्ष में कुछ बदलाव किया गया है | निर्देशक आदित्या धार ने वास्तविक घटना में कहीं-कहीं आवश्यकतानुसार परिवर्तन किया है | फ़िल्म शुरू होती है पाक अधिकृत कश्मीर में भारतीय सेना द्वारा सर्जिकल स्ट्राइक से |


अब बात निर्देशन की आदित्या धार की यह पहली डेब्यू शानदार रही | जहाँ शार्ट सेलेक्सन जबर्दस्त वहीं वहीं स्क्रीन प्ले भी उतना ही लाजबाव | अब बात विक्की कुशाल की अभिनय का –


फ़िल्म संजू में शानदार गुज्जू की भूमिका, मनमर्जीयां में अमृतसरी लापरवाह रोमियों टपोरी टाइप पंजाबी मुंडा, उरी में समर्पित,ट्रेन्ड मिलिट्री आफिसर विहान सिंह शेरगिल की जबर्दस्त भूमिका में | फ़िल्म में तीन फिजिकल फाईट सीन है जिसे विक्की कुशाल ने अपने दमदार अभिनय से एकदम नैचुरल बना दिया है | यम्मी यामी गौतम इंटेलिजेंस आफिसर कीर्ति कुल्हाड़ी एयरफोर्स पाइलट की छोटी भूमिका में काफी इफेक्टिव हैं | परेशरावल द्वारा राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार तथा सर्जिकल स्ट्राइक के इंचार्ज की भूमिका में शानदार अभिनय | रजीत कपूर सिल्वर बिग तथा बियर्ड में प्रधानमंत्री की कुर्सी को बखूबी सम्भाला है | मनोहर परिकर राजनाथ सिंह भी उनके साथ दिखे हैं | लाइफ ओके के डेली सोप देवों के देव महादेव के  मोहित रैना निडर साहसी जांबाज मेजर करण कश्यप की भूमिका में शानदार |



फ़िल्म का फर्स्ट हाफ बहुत ही शानदार वहीं सकेंड हाफ जरा सा सुस्त या थोड़ा भारी भरकम अंतिम समय में DRDO द्वारा आविष्कार शुरू करना Intelligence gathering में थोड़ा फिल्मी ड्रामा दिखा straitergy की कमी इत्यादि | फ़िल्म के बीच-बीच में भावनात्मक stuff भी आपको देखने को मिल जाएगा | मेरे हिसाब से यह आवश्यक है की war drama जैसी फिल्मों में एक्शन के साथ-साथ दर्शकों को emotion भी परोसा जाए | अन्यथा लगातार माड़-धाड़ से फ़िल्म बोझिल हो जाती हैं |


जहाँ आस्कर विनिंग अमेरिकन फ़िल्म zero Dark Thirty में एक आदमी (ओसामाबिन लादेन) के लिए मिशन को अंजाम दिया जाता है ,वहीं ‘URI THE SURGICAL STRIKE’ में फौज आतंकियों के उस समूह को टारगेट करते हैं जो सुरक्षित घरों में छिपे हुए हैं | इसलिए सकेंड हाफ में कुछ ज्यादा सस्पेंस तो है नहीं उनके घरों में घुसकर उन्हें मारना है बस |



इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं की बाजारबाद, एवं भूमंडीकरण के इस दौर में परिवार के साथ देखने लायक साफ-सुथरी फिल्में आनी बंद हो चुकी है | उरी साफ सुथरी फ़िल्म है जिसे आप अपने पुरे परिवार माँ,बहन,भाई,बच्चों के साथ बैठकर देख सकते हैं | फ़िल्म प्रेरणादायक, ह्रदय को छू लेनेवाला, सच्चाई,दमदार अभिनय तथा देशभक्ति से ओत-प्रोत पूरा पैसा वसूल है | फ़िल्म में थंडर बैक ग्राउंड, साउंड मिक्सिंग, डिजाईन तथा स्पेशल इफेक्ट सभी ऑथेंटिक है | इसलिए फ़िल्म में बंदूक हरेक जगह आग उगलती है जहाँ बंदुक नहीं वहां आफिसर विहान सिंह शेरगिल तो है हीं |
     

    
अर्पणा दीप्ति  

बुधवार, 30 जनवरी 2019

एक भेंट ऐसा भी



बागबान बड़े प्यार से अपने बाग़ की बागवानी करता है ;जब उसका पौध लहलहाता है फलता-फूलता है,बागवान खुशी से झूम उठता है | आज अपनी भी स्थिति कुछ ऐसी ही थी | मेरा विद्यार्थी नवीन मेरे घर आया | जनाब भारतीय सेना में है, जम्मू-कश्मीर में बरखुरदार की पोस्टिंग है | जब ये बारहवीं कक्षा में था ;- हमेशा मुझसे डांट खाता था | बड़ा ही आलसी और सुस्त किस्म का था | बैक बेंचर तथा कक्षा में सोना इसका पंसदीदा काम था | मैं इसे हमेशा लम्बा चौड़ा भाषण देती थी कहती थी hibernation से निकलो खाना और सोना जानवरों का काम है हम मनुष्य बुद्धिजीवी हैं | तब जाकर कुछ क्षण के लिए सक्रिय हो जाता था | तेलंगाना निजामबाद से होने के कारण इसकी हिन्दी में दक्खिनी पुट है | बड़े ही इत्मीनान भाव से कहता था ‘मैम आप टेंशन नको लो’ मैं कुछ करूंगा ! वाकई इसने कर दिखाया !! भारतीय सेना में अधिकारी है लेकिन आज भी उतना ही आलसी ! घर आता है चेहरे पर जटा-जुट अच्छे से उगा लेता है | इसकी बानगी आप मेरे साथ इसकी आज की तस्वीर में देख सकते हैं | 
फोन पर जब भी बात करता है इसका पहला सम्बोधन ‘जय हिन्द’ मैम ही रहता है | भारत-पाकिस्तान के सरहद पर बन्दा फिलहाल तैनात है | पहली पोस्टिंग इसने वहीं लिया है | बड़ी ही निगेबान है इसकी आँखे | एकदम चौकन्ना और चौकसी से दुश्मनों से देश की हिफाजत करता है | आतंकियों से बाएं पाँव में गोली खाकर फिलहाल अपने घर पर तीन महीने से स्वास्थ्य लाभ कर रहा है | कल जब इसने फोन किया तो इसने कहा मैम  सिकन्दराबाद कैंटोनमेंट में मुझे कुछ आवश्यक काम है; आप घर पर रहेंगी क्या ? मैं आप से मिलना चाहता हूँ | मैंने कहा बिल्कुल तुम्हारा अपना घर है आ जाओ | तीन बजे इसने फोन किया; गूगल देवता के माध्यम से मैंने अपने फ्लैट का लाइव लोकेशन इसे भेज दिया | आधे घंटे में बरखुरदार मेरे घर पर हाजिर | पाँव छुने के साथ जय हिन्द मैम उसका चिरपरिचित अभिवादन |  मेरे घर में एक सेकेण्ड भी बैठा नहीं रसोई में मेरे पीछे आकर खड़ा हो गया | मैंने कहा पाँव ठीक नहीं है जाकर बैठ जाओ मैं आती हूँ| हँसते हुए कहने लगा हम फौजियों के लिए ये छोटी-मोटी बात है |  फिर डाइनिंग टेबल पर उसका पसंदीदा कचौरी-आलू और  इलायची अदरक वाली चाय दुनिया जहां की बातें | हाँ चाय वह प्याला में डालकर फूंक-फूंककर पी रह था ! मैंने पूछा ये क्या है ? ऐसे क्यों चाय सर-सर कर पी रहे हो ? कप में आराम से पीओ | हँसने लगा कहा मैम डीयुटी में इतना समय नहीं मिलता और चाय भी एक ही बार मिलता है | इसलिए ऐसे ही आदत हो गया है | आप भी ऐसे पीकर देखो | फिर हमने भी अपनी चाय प्याला में डाल दी और सर-सर के ध्वनि का आनन्द लेते हुए चाय पीने लगे| कक्षा में यह सबसे लम्बा था इसलिए यह अपने मित्र मंडली में पट्ठा फेम से जाना जाता था | आज भी तो ऐसे ही है बिलकुल नहीं बदला | जब चलने लगा मैंने कहा अपना ख्याल रखना घर पहुँचते ही टेक्स्ट कर देना | चिरपरिचित अंदाज में उसने कहा मैम आप टेन्शन नहीं लो | 

प्यार से एक चपत मैंने उसके पीठ पर लगा दिया | ढेर सारा आशीष, खुब तरक्की करो, आगे बढ़ो कर्मयोगी बनो मेरे फौजी – शुभकामनाएं              

शनिवार, 26 जनवरी 2019

“भारतीय इतिहास का लोमहर्षक और काला अध्याय:- दलित महिलाओं द्वारा छाती ढंकने के अधिकार का आन्दोलन १२५ वर्ष तक चला ||”



दुनिया में जाति, धर्म, वर्ण व्यवस्था , लिंग, नस्ल,रंग के नाम पर क्रूर अमानवीय अत्याचारों का लम्बा इतिहास रहा है | भारत में अछूत, अवर्ण, दलित, छोटी जाति  काफी हद तक तक समाज के मुख्य धारा में शामिल हो चुकें हैं | लेकिन कहीं-कहीं अभी भी समाज में इन जातियों को लेकर विक्षिप्त मानसिकता विद्यमान है | हरियाणा के झज्जर में मारी गाय की खाल उतारते दलित की हत्या या फिर गत वर्ष गुजरात के ऊना की लोमहर्षक घटना, जिसमे सरेआम दलित युवक को निवस्त्र कर कार से बांधकर घसीटते हुए लाठियों से पीटा गया | आज भी कई ग्रामीण इलाकों में दलितों को घोड़ी पर न चढ़ने देना, कुँए से पानी न भरने देना तथा सार्वजनिक श्मशान में मृत शरीर को न जलाने देना जैसी प्रथा विद्यमान है |

   अछूत या अस्पृश्य महिलाओं की हालत तो समाज में और भी खराब है | दक्षिण भारत में इन्हें देवदासी के नाम पर ईश्वर को समर्पित किया जाता था और पुजारी वर्ग द्वारा निरंतर इनका यौन शोषण किया जाता था | हालांकि आजाद भारत में इस प्रथा को गैरकानूनी घोषित कर दिया गया है और इसके लिए सजा का प्रावधान है | उस समय के तथाकथित समाज में महिलाओं को पुरुषों से कमतर आंका जाता था | पितृसत्ता का मानना था की महिलाओं में पुरुषों से कम दिमाग होता है | शिक्षा उनके लिए वर्जित थी | तत्कालीन समाज में ऐसी अवधारणा थी कि तीन आर (R) अर्थात रीडिंग, राइटिंग और अर्थमेंटिक पढने वाली महिलाएं विधवा हो जाएंगी |

    19वीं सदी के प्रारम्भ में त्रावनकोर राज्य में अवर्ण-अछूत महिलाओं पर एक ऐसा कर लगाया गया जिसके बारे में आज भी सोचकर रूह काँप जाती है | यह भारतीय इतिहास का एक ऐसा काला अध्याय है जिसे जानकार आँखें-आत्मा शर्म  और ग्लानि से भर जाती है | त्रावनकोर साम्राज्य में एज्वा,शेनार,या श्नारस, नाडार जैसे अछूत जाती की महिलाएं थीं जिन्हें सदियों से शरीर के ऊपरी भाग पर वस्त्र पहनने की अनुमति नहीं थी उन्हें कमर से लेकर गरदन तक के उपरी भाग को अनावस्त्र रखना होता था या यूँ कहिये उन्हें छाती ढंकने की अनुमति नहीं थी | अगर इन जातियों में से कोई महिला शरीर के उपरी भाग में कोई वस्त्र पहनना या ओढना चाहे तो उसे राज्य को टैक्स देना पड़ता था | इस प्रथा को मलयालम में “मुलाक्करम” कहा जाता था | लड़कियों के स्तन विकसित होते ही उन पर इस कर की जिम्मेदारी आ जाती थी | वहीं विधवाओं को “मुंडू”  नामका मोटा वस्त्र धारण करना अनिवार्य था |

    इस पर त्रावणकोर राज्य के ‘चेरथला’ गाँव में अछूत ‘एजवा’ जाती की एक साहसी महिला  “नंगेली” ने सन 1803 में मुलाक्करम (brest tax) का डटकर विरोध किया | अपनी अपने शरीर के उपरी हिस्से को अनावृत रखने से इंकार  किया | जब राज्य के कर अधिकारी, जिसे ‘प्रथावियार’ कहा जाता था ने कर के लिए दवाब बनाया तो उस महिला ने अपने स्तन काटकर पेड़ के पत्तों पर रखकर उसे सौंप दिया | अधिक खून बह जाने के कारण एज्वा जाती के उस महिला की मृत्यु हो गई |

      उसका पति चिरुकंदन इस घटना से अत्यंत दुखी हुआ | उसने भी इस कुप्रथा तथा अपनी पत्नी के वियोग में अपनी पत्नी के चिता में कूदकर प्राण त्याग दिए | इस घटना के बाद इस घृणित प्रथा का विरोध शुरू हुआ | कई आन्दोलन हुए तब जाकर राजा ने स्तन टैक्स को समाप्त किया | उस महिला के निवास स्थान का नाम ‘मुलाचिमारम्बू’ पड़ा, मलयालम में इसका अर्थ होता है छातीवाली महिला का निवास | प्रसंगवश केरल के इस चेरथला कस्बे से हमारे आज के नेता ए.के.एंथनी, व्यालार रवि और क्रिकेटर प्रसन्ना आते हैं |

  राजा द्वारा नंगेली से टैक्स वसूली के बदले स्तन काटकर देने की यह घटना 1803 की है | कुछ इतिहासकार मानते हैं कि जब इस टैक्स का व्यापक विरोध शुरू हुआ तो 1812 में टैक्स लेना बंद करा दिया गया लेकिन स्तन ढंकने पर रोक जारी रही | नंगेली के वियोग में उसकी चिता में जलकर मरनेवाला उसका पति पहला सती पुरुष था | आज नंगेली की स्मृति में चेरथला में कोई स्मारक नहीं है जिस जगह पर वह निवास करती थी वह जमीन टुकड़ो में बंटकर कई लोगों की सम्पत्ति हो गई है |

       इस घृणित प्रथा पर पड़ताल करने पर पता चलता है कि इस प्रथा के पीछे सामाजिक वर्ण व्यवस्था थी | निम्न वर्ग की महिलाओं को सार्वजनिक रूप से शरीर का उपरी भाग अनावृत रखना होता था साथ ही वर्ण व्यवस्था के अंतर्गत कुछ उच्च समुदाय जैसे नायर आदि की महिलाएं अछूतों के सामने शरीर का उपरी वस्त्र धारण कर सकती थीं लेकिन उन्हें नम्बूदरीपाद ब्राहमण समाज के सामने शरीर के उपरी हिस्से का वस्त्र धारण करने की अनुमति नहीं थी |वहीं उच्च नम्बूदरीपाद ब्राह्मण केवल और केवल भगवान की मूर्ति के समक्ष उपरी वस्त्र नहीं पहनते थे |

  महिलाओं को उपरी वस्त्र धारण करने के अधिकार को लेकर निम्नजाति के समुदाय को 125 सालों की लम्बी लड़ाई लड़नी पड़ी | इस कुप्रथा को निरंतर जारी रखनेवालों के अपने एक तर्क थे | आखिरकार इस घृणित कुप्रथा का अंत हुआ तथा कैसे एक समाज को मानवीय गरिमा मिली, इसका इतिहास जानना समझना और पढ़ना वास्तव में एक अनुभव होगा |

  ब्रिटेन से ईस्टइण्डिया कम्पनी के भारत में आने के बाद ईसाई मिशनरियों का आगमन हो चुका था | वर्ण व्यवस्था की क्रूरता से समाज के निचले तबके की हालत बेहद दयनीय थी | वे मिशनरियों के माध्यम से ईसाई बनने लगे | उस समय के ईसाई समाज में धार्मिक तथा समाजिक रूप से बराबरी, सेवा, और समाजिक समरसता थी |

    इसे लेकर वहां पुराने परम्परा और रीति-रिवाज तथा नवाचार से तनाव और टकराव बढ़ गया | नाडार और एज्वा आदि महिलाओं के हकों के लिए इनके  समाज में बैचेनी थी | लोगों के इस बैचेनी को भांपकर त्रावनकोर के राजा के दीवान कर्नल जान मुनरो ने 1813 में धर्मान्तरित अछूत ईसाई महिलाओं को कमर से उपरी भाग गर्दन तक कपड़े पहनने की इजाजत दे दी | कर्नल जान मुनरो के इस आदेश को उच्च वर्ण के लोगों ने राजा के परिषद में चुनौती दी | तर्क यह दिया गया कि इससे वर्ण-भेद के सामाजिक प्रथा का ताना-बाना टूट जाएगा | नीची जातियां ऊँची जातियों की बराबरी करेगी | अत: इन महिलाओं को कमर के उपर वस्त्र पहनने की अनुमति नहीं दी जा सकती है | उधर अनुमति नहीं मिलने से नाडार ,एजवा जाती की महिलाओं ने ईसाई धर्म स्वीकार करना शुरू कर दिया और उन जैसे लंबे वस्त्र भी पहनना शुरू कर दिया |

  1822 में अछूत ईसाई महिलाओं को सार्वजनिक रूप से बुरी तरह से प्रताड़ित किया गया | मामला फिर से राजा के कोर्ट में गया | प्रश्न था कि पूरा कपड़ा पहनना ईसाई धर्म का अनिवार्य हिस्सा है ? मिशनरी चार्ल्स मिड ने यह साबित किया कि यह जरूरी है | कोर्ट ने बात मान ली और इन महिलाओं को उपरी वस्त्र पहनने की अनुमति मिल गई |

  1827 में फिर से इन महिलाओं को सरेआम प्रताड़ित किया गया | उनके वस्त्र उतारे गये उन्हें बेइज्जत किया गया | मारा-पीटा गया, ईसाई मिशनरी,चर्च और स्कूलों को जलाया गया | मिशनरियों ने त्रावणकोर के राजा से न्याय की मांग की |1829 में त्रावनकोर की रानी ने घोषणा की इन धर्मान्तरित नाडार ,शेनार और एज्वा महिलाओं को कोई राहत नहीं दी जाएगी | अन्य दलित महिलाओं के समान इन्हें भी सामाजिक व्यवस्था में उपरी कपड़े पहनने का कोई अधिकार समाज में नहीं है | समाज में जबर्दस्त बैचेनी थी आन्दोलन हो रहे थे | उधर समाज में ऊपरी हिस्सा ढकने वाले वस्त्रों को पहनने का चलन भी अछूत महिलाओं में बढ़ता जा रहा था और उनपर आक्रमण भी बढ़ते जा रहे थे | मिशनरियों पर भी हमले बढ़ गए | लेकिन कुप्रथा ज्यों की त्यों रही | राजा के तात्कालिक दीवान ने दो टूक शब्दों में कह दिया कि 1829 का रानी का आदेश ही लागू माना जाएगा | ऊपरी वस्त्र पहननेवाले महिलाओं को दंडित किया जाएगा |

  इस आदेश के विरुद्ध लोग पुन: राजा के पास गये | राजा से असंतुष्ट होकर 1859 में (तब देश में कई स्थान पर अंग्रेजों का शासन था) मद्रास के गवर्नर चार्ल्स ट्रेवेलियन के पास मिशनरी के अधिकारी जेम्स रसेल, जान एब्स ,जान काक्स और फ्रेडरिक ने अपील की | अंग्रेज गवर्नर चार्ल्स ट्रेवेलियन ने इस पर अपना आदेश दिया, उस आदेशानुसार त्रावनकोर के राजा के दीवान ने राजज्ञा का प्रकाशन 26 जुलाई 1859 किया | आदेशानुसार अछूत नाडार,शेनार, और एज्वा तथा अन्य अछूत महिलाएं भी ईसाई नाडार,शेनार और एजवा महिलाओं की तरह कपड़े पहन सकती हैं या तो ये नीची जाति की मुकावटीगल (मछुआरनों) के समान मोटे कपड़े से ऊपरी भाग ढंक सकती है | लेकिन फिर भी उन्हें ऊँचे स्वर्ण वर्ण की महिलाओं के समान कपड़े पहनने का अधिकार नहीं होगा |  

  नाडार महिलाओं ने इन प्रतिबन्ध को अनदेखा किया और वस्त्रों की ऐसी शैली विकसित की जो की उच्च वर्ग की हिन्दू महिलाओं के जैसी थी | उच्च वर्ग मिशनरियां और दलित वर्ग सब 26 जुलाई के आदेश से संतुष्ट नहीं थे | सबों ने इसका विरोध किया | ईसाई इसे समानता के अधिकारों के विरोध में मानते थे ,ब्राह्मण इसे धर्म में दखल मानते थे | मद्रास के तात्कालिक गवर्नर ने उस वक्त सामाजिक सुधार और चेतना पर जो आदेश दिया उसमें लिखा कि इन अछुत महिलाओं के सन्दर्भ में सतत जारी यह प्रक्रिया अन्यायपूर्ण प्रकृति की है | आने वाली दुनिया हम पर रोएगी कि हमने इस अवसर को अपने हाथों से जाने दिया |आखिरकार1865 के आदेश द्वारा सबको ऊपरी वस्त्र पहनने की आजादी मिली |
           
      अछूत महिलाओं को उचित वस्त्र न पहनने देने के विरोध में दलित समाज सुधारक अयंकली ने (1863-1941) ब्रिटिश शासन में त्रावनकोर में खूब काम किया | उन्होंने लोगों को संगठित कर सशक्त तरीके से इस कुप्रथा का विरोध किया | समाज में जागृति के लिए स्कूलों की स्थापना पर जोर दिया |
    
     एज्वा समुदाय में पैदा हुए अधायात्मिक संत नारायण गुरु (1854-1928) ने भी केरल समाज के वंचित तबके की महिलाओं के उत्थान के लिए खूब काम किया | उन्होंने सुधार आन्दोलन का नेतृत्व किया, जातिवाद को खारिज किया और अधायात्मिक स्वंत्रता और समाजिक समानता के नए मूल्यों को बढ़ावा दिया | नारायण गुरु ने धार्मिक तीर्थयात्रा का लक्ष्य वंचितों में शिक्षा,स्वच्छता, भगवान की भक्ति, समाजिक संगठन, कृषि, व्यापार,हस्तशिल्प,और तकनीकी प्रशिक्षण का प्रचार करना बताया | 1822 में रवीन्द्रनाथ टैगोर ने नारायण गुरु से मिलकर कहा कि उन्हें ऐसा कोई व्यक्ति नहीं मिला जो नारायण गुरु से अधिक या उनके समकक्ष भी अध्यात्मिक प्रतिभा रखता हो |

   ऐसे लोगों के अथक प्रयासों,कानून बनने के वाबजूद भी महिलाओं के ऊपरी वस्त्र पहनने का विरोध 1924 तक होता रहा | सामाजिक व्यवस्था की बेडी में जकड़े एक बीमार समाज में एक आन्दोलन 125 सालों तक महिलाओं के ऊपरी वस्त्र पहनने के लिए आंदोलित रहा क्या यह हमारी अंतरात्मा को झकझोरता नहीं है ?

       समय के अंतराल से दक्षिण भारत की इन अस्पृश्य जातियों में से कई धर्म परिवर्तन कर ईसाई बने | कई जाति परिवर्तन कर क्षत्रिय बनने से उच्च जाती में आ गए | आर्थिक स्थिति बेहतर होने से नये काम धंधे, बेहतर नौकरियों आदि के कारण अब नाडार, एज्वा, जैसी जातियां और इनके सरनेम दक्षिण भारत में दलित नहीं माने जाते हैं | समय तो बदला लेकिन आज भी देश में कई स्थानों पर इन दलित जातियों पर अत्याचार, उत्पीड़न, के समाचार आते रहते हैं | इन जातियों के विभिन्न क्षेत्रों में आरक्षण से जहां उनकी आर्थिक स्थिति बेहतर हुई है, वहीं राजनैतिक कारणों से समाज में गहरा तनाव भी बढ़ा है |

अर्पणा दीप्ति            
    
    

बुधवार, 16 जनवरी 2019

मैं छठीहारिन (संस्मरण )


चित्र साभार ;-अनुराग सिंह के कैमरा से 

मेरा मानना है कि छठ महापर्व एक डीटाक्स प्रासेस है मानसिक और शारीरिक दोनों | अंत में यह कठिन व्रत आपको बिलकुल शांत सरल और तरल कर देता है मानो जैसे आपके भीतर उगी हुई नागफनी समतल हुई जा रही है हौले हौले ........तमाम नुकीलापन जो आपके वजूद में मौजूद है, आहिस्ता-आहिस्ता चिकना हुआ जा रहा है |

       
       मुझे आज भी याद है;-आज से पांच साल पहले जब मैंने छठ शुरू किया यह बिल्कुल अनप्लांड था | मेरी बचपन से आदत है मैं कोई भी चीज पहले से प्लान नहीं करती हूँ | बस चंद घंटे और मैंने निर्णय लिया मुझे छठ व्रत करना है | पहली बार छठ करने के बाद मेरी अनुभूति कुछ ऐसी थी मेरे आँख, मन और रूह को खाद.....पानी मिला हो ! हाँ .....मैं भूख से बेहाल अवश्य हुई थी |
               

    चित्र साभार-डा.पूजा किशोर कुणाल के कैमरा से
        
इस पर्व को करते समय मुझे मेरी दादी का मुस्कुराता चेहरा:-सब चीजों को अमनिया(पवित्र) बनाए रखने से लेकर दौउरा,सूप, सुपली, कुरनी, कोसिया,कसार,ठेकुआ, उखियार (sugarcane) केला, नारियल मौसम में मिलनेवाले सभी फल तथा सब्जी मटिया सेनुर, पीपा सेनुर के इंतजाम में व्यस्त अकेली परेशान होती मेरी माँ मुझे याद आती है | उन दिनों में मेरा लड़कपन,अल्हड़पना या नादानी जो भी कहिए पर्व त्यौहार या लोकरिवाज में बिल्कुल विश्वास नहीं करती थी | अपनी माँ को परेशान होते देख दादी को पोंगा पंडिताइन कह देती थी | माँ-दादी दोनों समवेत स्वर में कह बैठती थी ई साधारण पवनी नहीं है हाथ जोड़ो;धीरज रखो आदित्य बाबा से गोहार लगाओ | हमारे साथ बैठकर गीत गाओ |


     हमेशा की तरह इसबार भी कार्तिक मास में छठ पवनी समाप्त होने के बाद मैं मुड़-मुड़कर छठ घाट को देख रही थी ......लौटते हुए मैंने घाट पर क्या छोड़ा है ?....... आश्वस्त हूँ कुछ मिट्टी के दीए, फूल-माला चावल का बना पिसा हुआ अइपन, कुछ हवन की आम की लकड़ियाँ कुछ मूर्ति विसर्जित नहीं की.... पॉली पैक नहीं.... इतना इकोफ्रेंडली कोई त्यौहार नहीं | बीतता हुआ छठ उदास कर जाता है .....सजे सूप दौउरा खाली औंधे पड़े हैं........दीए बुझ गए हैं ....मगर कपूर,घी, धूप मिली हुई; गमगम महकता हुआ छठवाला कमरा जरा सा सूना लग रहा था | छठ गीतों की थकी हुई टेर..... सुखा हुआ घोरुआ सिंदूर एवं अइपन का कटोरा .....घर में बड़े,बूढ़े या बच्चे के जमात में हम तीन ही तो हैं जो की अलसाए पड़े हुए हैं |

चित्र साभार;-मणिशंकर सिंह 
 दादी तो अब हमारे बीच में नहीं है लेकिन छठ के गीतों से मेरा ख़ास जुड़ाव है एक नास्टेलजिया (nostalgia) से गुजरती हूँ इन गीतों को सुनते हुए | संझा पराती गाने के लिए फुआ मुझे हमेशा पकड़ने के फिराक में रहती थी ............गीत की लम्बाई इसके हाईस्केल और धीमे पेस को देखते हुए परिवार के बांकी बच्चे भाग लेते थे लेकिन मैं इत्मीनान से दादी,चाची के बगल में बैठ उनके चैलेन्ज को स्वीकार करती थी| आज स्मिता राजन के स्वर में यह गीत सुनकर पुनः यादें ताजा हो गई |
छठ लोक गीत;-आदरणीय स्मिता राजन दीदी 


 ....जाने कौन सा टीस हम सबके कंठ से समवेत फूटता ..... और यह गीत हम सबके बीच तरल सा बहता रहता | एक और गीत था आदित्य होऊ न सहाय........दीनानाथ होऊ न सहाय |इन गीतों को सुनकर अब ऐसा महसूस होता है की पानी में खड़ी वह तिरिया मैं हीं हूँ ....अंचरा पसारकर अहिवात की कामना करते हुए ......या फिर गोद गजाधर पूत ....हाँ रूनकी-झुनकी धिया तो नहीं है इस बात का मलाल आज भी कलेजा को सालता है ......नैहर सासुर की सुख-शान्ति की कामना..... भाई-भतीजा ....मांगती हुई निर्मल काया से मनसा पूरन की आस लगाए भाव से आदित्य होऊ न सहाय गीत सुनती हूँ | टोका-टाकी के बंधन से आजाद हो चुकी हूँ जिम्मेदारी अब स्वयं के कंधे पर आन पड़ी है |  
अर्पणा दीप्ति      

मंगलवार, 8 जनवरी 2019

मेरे शब्द जिन्दा लोगों के लिए








शब्द एक महत्त्वपूर्ण तथा आवश्यक औजार ही तो है जिसे व्यक्ति सम्वाद करता है | शब्द एकत्रित हो वाक्याकर रूप लेती है भाषा कहलाती है | भाषा साहित्य की अमूल्य उपलब्धी है | भाषाविज्ञान के अंतर्गत इसका विस्तृत एवं विशद अध्ययन किया जाता है | जो व्यक्ति सम्वाद विज्ञान से जुड़े हुए हैं उन्हें यह अच्छे से ज्ञात है; मनुष्य के जीवन में शब्द का कितना अहम स्थान है | सार्थक  शब्दों का  चयन आपके सम्वाद में गलतफहमी पैदा होने से बचाता है | सही समय में प्रयोग किया गया सही और सटीक शब्द आपको आशावान, सहयोगी तथा न्यायपूर्ण बनता है

        आप अपने अनुभवों के आधार पर स्वयं को परख सकते हैं | अगर आप पेशे से डाक्टर या वकील हैं तो क्या आपके अच्छे शब्दों ने आपके मुवक्किल या रोगी का मनोबल बढ़ाया? या फिर आपका निन्दा या उनके अन्दर कमियों को  ढूंढने वाले शब्दों ने उनके मनोबल को गिराया है ? आप किन शब्दों का चयन किन परिस्थितयों में करते हैं यह आप पर निर्भर करता है:-प्रशंसा या निंदा, अच्छा या बुरा, सहमती या असहमति ?


 अब कुछ बातें वर्तमान सन्दर्भ में मनुष्य के जीवन शैली तथा उसके बदलते एवं खंडित होते मूल्यों की:-
साहित्य की किसी भी विधा से हमेशा यह अपेक्षा रहती है कि वह मनुष्यों के संस्कारों को परिष्कृत करे, उसमें मानवीय मूल्यों की चिंता हो,परिष्कृत जीवनशैली हो, जिन्दगी के नैतिक फैसले के साथ-साथ न्याय और अन्याय की संघर्ष भूमि हो ! किन्तु वर्तमान सन्दर्भ में ये सारी बातें बेमानी दीखती है | मनुष्यता का नैतिक क्षरण हो चूका है , वह सपने तो देखता है लेकिन उसके सपने क्षणभंगुर रेत पर बने उस घरौंदे के मानिंन्द है जिसमें नैसर्गिकता तो है, किन्तु उंचाई और गहराई नहीं | जहाँ एक तरफ जीवन में आनंद उपेक्षित हो गया है वहीं रोटियाँ उसके दोनों आँखों के बेहद समीप आकर खड़ी हो गई है ; इतना समीप कि उसके आगे उसे कुछ सूझता नहीं है |  उसकी मुस्कान धूमिल हो चुकी है, हाय-हाय करते वह पीड़ा में जी रहा है ; सम्वेदनाओं में पल रहा है | मनुष्य की पीड़ा और संघर्ष दोनों एकाकार हो चूका है | जीवन की छोटी से छोटी घटना को हर कोण से जांचा-परखा जाने लगा है | मानो आस्था-विश्वास और मनुष्यता नोच ली गयी हो | समाज की उपभोक्तावादी संस्कृति में झूठ,फरेब, छल, दगाबाजी, दोमुहपना, रिश्वत,दलाली, भ्रष्टाचार जैसे अनैतिक आचरणों को सार्वजनिक रूप से स्वीकृति का ठप्पा लग गया है | आज के भूमंडीकरण के दौर में ये तो बात हुई मनुष्यता की |


अब किस्सागोई शब्द का ! शब्द तो हमारे बीच बहुल मात्रा में है जिसमे मनुष्य के भाव,उनकी उत्तमता उनकी अनुत्तमता का स्वरूप, मनोवेगों का प्रवाह, उसका क्रोध, उसकी करुणा, दया-प्रेम तथा उसके अंत:करण के सौन्दर्य को हम देख पाते हैं |


     वह शब्द हीं तो है जिसके द्वारा हमें इतिहास, वैज्ञानिकता, दर्शन, अमानवीय व्यवहार, मानवीय चेतना, माधुर्यता, दीन-दुखियों की पीड़ा, आनन्द-क्लेश एवं मानव जीवन पर परिस्थितजन्य प्रभाव की यथार्थता सुन्दरता कोमलता आदि का बोध होता है |


  शब्द जिन्दा होते हैं; इनमे अद्भुत प्राण शक्ति होती है और एक आत्मा भी ! शब्द की सत्ता और महत्ता को न तो हम नकार सकते है और न ही इनकार कर सकते हैं | हमारे बुजूर्ग हमेशा हमे अपशब्द कहने से रोकते हैं | उन्हें शब्द की सत्ता तथा  उसकी ताकत का भान था | चूंकि वे आशीर्वाद और अभिशाप के लिए प्रयोग किए जानेवाले शब्दों की ताकत को जानते थे |


दक्षिणी प्रशांत महासागर में सोलोमन द्वीप एक देश है ;जो हजारों द्वीपों को मिलाकर बना है | इस द्वीप समूह के आदिवासी समाज में एक अद्भुत और अनोखी प्रथा का प्रचलन है | ये आदिवासी अभिशाप जादू का अभ्यास विशालकाय पेड़ों को सुखाने के लिए करते हैं | अगर पेड़ अति विशाल है जिसे कुल्हाड़ी से काटना असम्भव है किन्तु अगर इसे काटना अनिवार्य है तो आदिवासी उस पेड़ को घेर लेते हैं ;उसके चारो तरफ घूमते हुए गालियाँ देते हैं , नकारात्मक रूप से श्राप देते हुए पेड़ पर चिल्लाते है | यह नकारात्मक  ऊर्जा पेड़ में जीवन शक्ति को नुकसान पहुंचाती है जिसके परिणामस्वरूप कुछ दिनों में पेड़ मरकर/सुखकर जमीन पर गिर जाता है | हमारे शास्त्रों में भी कहा गया है मनुष्य के जिह्वा में सरस्वती का निवास होता है | हम जैसा सोचते है जिन शब्दों का प्रयोग करते हैं हमारा व्यक्तित्व उसी के अनुरूप निखरता है | सकारात्मक शब्द सकारात्मक ऊर्जा लेकर आता है नकारात्मक शब्द  नकारात्मक ऊर्जा हमारे अन्दर भरता है |

संस्कृत में कहा गया है :-“वचनम् किम दरिद्रता” |

मनुष्य अगर ज्ञान से समृद्ध है किन्तु वह सही शब्दों का चयन सही जगह पर नहीं कर पाता है तो उसका ज्ञान व्यर्थ है | कुछ लोग अच्छे वक्ता होते हैं; उन्हें यह अच्छे से पता होता है कि शब्दों के साथ कैसे छेड़छाड़ कर सही क्रम में सजाकर वजनदार बनाकर सही जगह पर उसका इस्तेमाल कर श्रोता को अपने तरफ आकर्षित किया जा सकता है |

                          
                         शब्द इतना वजनी होता है कि  वह आपकी आत्मा को छलनी कर सकता है ; आपको मरने के लिए छोड़ सकता है, पुनः जीवित भी कर सकता है | शब्द में इतनी शक्ति होती है कि वह आपको अपने तरफ आकर्षित कर सकता है; प्रेम तथा घृणा का पात्र बना सकता है; आपको छल सकता है ; आसानी से आपको प्रभावित कर सकता है | शब्द इतना बलशाली होता है कि वह आपको राजा-रंक दोनों बना सकता है | भले ही आप राजा के पुत्र क्यों न हो –आप अपने को अभिव्यक्त करना नहीं जानते ! अपने शब्दों द्वारा प्रभावपूर्ण सम्वाद नहीं कर सकते, आदेश देना या शासन करना नहीं जानते- तो आप अच्छे शासक बनने योग्य नहीं हैं | हमेशा यह याद रखना होगा कि शब्द लोगों को बाँट सकता है; जोड़ सकता है; तन और मन दोनों को आहत कर सकता है सुकून भी पहुंचा सकता है | हमे परिस्थति विशेष का अवलोकन करते हुए सही, सटीक एवं उपयुक्त शब्दों का चयन करना चाहिए |
अर्पणा दीप्ति