बुधवार, 18 मार्च 2026

अपमान माँगकर लिया नहीं जाता, बस यही है जो आपको कभी भी, कहीं भी बिना शर्त मिल सकता है। एक आम आदमी के लिए यह तय करना मुश्किल है कि वह हवा में घुला प्रदूषण अधिक गटकता है, या अपमान का ज़हर!

शायद अपमान दिया ही इसलिए जाता है कि इसे देनेवाले को कुछ अच्छा महसूस हो, उसे लगे कि इससे उसका मान कुछ तो बढ़ गया है। अपमान माँगकर लिया नहीं जाता, बस यही है जो आपको कभी भी, कहीं भी बिना शर्त मिल सकता है।


 जब आप किसी से प्रेम करते हैं तो आप उनसे हर समय, हर पल बिल्कुल एकसमान रूप से प्यार नहीं करते हैं। यह नामुमकिन है। ऐसा दिखाना या जताना भी झूठ है।

इसके बावजूद हममें से ज़्यादातर लोग ऐसा अनवरत अनथक प्यार पाना चाहते हैं। इसकी वजह एक ही है। आम तौर पर सबके भीतर प्यार या फिर ज़िंदगी के उतार-चढ़ाव के बीच रिश्तों के ठहराव पर बहुत कम भरोसा बन पाता है।
होता भी ऐसा ही है। समुद्री ज्वार-भाटे से समझिए। अक्सर लोग ज्वार के समय उछल पड़ते हैं और किसी अनिष्ट की आशंका में भर भाटे पर काबू पाना चाहते हैं।
भावनाओं के बियाबान में हमें डर लगता है कि वह शिद्दत कभी वापस नहीं आएगी। हम स्थिरता की मियाद बचा लेना चाहते हैं। इसीलिए स्थायित्व पर, लगातार और हमेशा बने रहने पर ज़ोर देते हैं; जबकि प्यार में ज़िंदगी की ही तरह सिर्फ एक किस्म की निरंतरता ही संभव है।
वह संवृद्धि में, तरलता में और आज़ादी में है। ठीक जैसे नृत्य में डूबे नर्तकों का जोड़ा होता है। बीतते हुए समय में संगीत की लय पर मुश्किल से एक पैटर्न में सामने वाले छूते हुए और आज़ाद पर पार्टनर भी। ऐसे ही भावनाएं हमें छूकर निकल जाती हैं। साथ पर आज़ाद अगर आप उनमें किसी अवधि विशेष के लिए कैद भी हो गए तो वह कैद नहीं उससे बाहर आना ही बढ़ना है। क्योंकि अपने वास्तविक रूप में हमारी भावनाएँ और हमारे रिश्ते विराम के साथ जीवंत होते हैं।
भावनाओं की असली सुरक्षा और प्रेम की मर्यादा किसी स्वामित्व या अधिकार में नहीं है, न ही मांग या अपेक्षा है, यहाँ तक कि आशा में भी नहीं है। वह बस ज्वार-भाटे के स्वीकार और बदलाव की गरिमा को अपनाने भर की बात है।

#Humanemotion
#Monochrome

सोमवार, 9 मार्च 2026

 अनुवाद हमेशा मुश्किल दिनों में किसी दवा की गोली सा बनकर आता है।

पढ़िए लिथुवानिया की कवि औश्रा कज़िलियनटे की वसंत से सम्बंधित कविताएँ। इन कविताओं से बहुत रिलेट कर पाई इनदिनों।
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मनुष्य खिलते हैं
मनुष्य दुख से खिलते हैं
जबकि चेरी के पेड़ बस खिलते ही रहते हैं
उनकी पंखुड़ियाँ घूमती हैं, वे दीवारों पर चढ़ते हैं, छिपकलियों की तरह अपनी जीभ बाहर निकालते हैं, हमारे चेहरे चाटते हैं
वे बस्ता लादकर स्कूल जाते हैं, वहाँ उन्हें कुछ नहीं मिलता, लेकिन इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता
वे खाली कैफेटेरिया में लंच करते हैं, शहर के पार्कों में अपने कुत्तों को घुमाते हैं, लेकिन इससे कोई फर्क नहीं पड़ता
वसंत वसंत है क्योंकि यह सिर्फ़ वसंत है
और वहाँ, किनारे पर, बत्तखों का एक जोड़ा बैठा है, बस बैठा है
जबकि पानी पत्थरों के ऊपर से बह रहा है
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मैं बाहर गई
मैं बाहर गई
अपने कमरे के बीच में
वहाँ सड़कें खाली हैं, सब एक-दूसरे के पास से गुज़रते हैं
एक टेढ़ी-मेढ़ी बूढ़ी औरत, झुकी हुई
अपनी अंतिम ताकत से एक बैग घसीट रही है, वह वसंत से भरा हुआ है

 


जुड़ने के लिए कितना टूटना पड़ता है

ठीक से देख सकने के लिए अक्सर

बदलनी पड़ती है जगह,
मैं तुम्हें कितना बचा पाऊंगी
यह तो इसी से तय होगा
मैं ख़ुद को कितना बचा पाई हूँ

सोमवार, 23 फ़रवरी 2026

इंद्रप्रस्थ डायरी भाग-1

 



“एक दिन हम मिले ,मजे का दिन था और जगह अपनी इंद्रप्रस्थ नगरी ; जब तक बचपने के साथी रहेंगे कौन बूढ़ा होता है भला |”

दो सहेलियाँ मुद्दतों बाद मिली बतकही मे उलझी-सी ❤️ |

वैसे तो इंद्रप्रस्थ नगरी की तमाम तस्वीरें अच्छी हैं और स्मृतियों को दुहराकर अच्छा लग रहा पर बबीता के साथ की ये कुछ तस्वीरें कुछ बबीता ने कुछ मैंने और कुछ आग्रह पर वहाँ पर उपस्थित लोगों ने खींच दी सब तस्वीरें कमाल है। मन खुश हो जा रहा। जैसे जैसे हम बड़े हुए बबीता से दोस्ती पक्की हुई। पुरानी हुई और लगा जैसे जीवन यात्रा पर हम कहीं न कहीं समानांतर ही चल रहे। बाकी सबसे मिलकर ऊष्मास्मृतियां और अच्छा लगना होता है। उसके साथ अपना जैसा। यह अपने आप में एक सुंदर बात है।

वैसे शाम तक हम घूमते रहे । चटख तस्वीरें दिनों तक मन अच्छा रखेंगी। महीने साल-दर-साल स्मृतियों में जीवंत रहेंगी |  बनी रहो ऐसी ही ❤️..। बने रहेंगे हम भी ❤️ |

 










मंगलवार, 27 जनवरी 2026

 

कभी कोई परफ्यूम खोजों और न मिले तो मुझे पुकारना , मेरा मन तुम्हारी खुशबुओं  का अजायबघर है |




अपमान माँगकर लिया नहीं जाता, बस यही है जो आपको कभी भी, कहीं भी बिना शर्त मिल सकता है। एक आम आदमी के लिए यह तय करना मुश्किल है कि वह हवा में ...