शनिवार, 23 मई 2026

THE PERSIDENT CAKE

 

युवा इराकी निर्देशक हसन हादी की डेब्यू फिल्म है- द प्रेसिडेंट्स केक। 90 के दशक का इराक अमरीकी बमबारी के बीच सद्दाम हुसैन का 50वां जन्मदिन मना रहा है। विदेशी हमले के बीच हर इराकी नागरिक को अपने राष्ट्रपति के लिए वफ़ादारी दिखानी है। उनके जन्मदिन के उल्लास में शामिल होना है। लगभग हर दूसरे दृश्य में सद्दाम के लिए जान दे देने की कसमें हैं, सद्दाम के आदमक़द कटआउट्स हैं, क्षत- विक्षत लोग हैं, अस्पतालों में दवा के अभाव में दम तोड़ रहे मरीज़ हैं और आग बरसाता हुआ आकाश है। अपनी बूढ़ी- बीमार दादी के साथ रह रही नौ साल की लमिया के हिस्से स्कूल मास्टर ने प्रेसिडेंट के जन्मदिन के दिन केक लाने की ज़िम्मेदारी दी है। उसके दोस्त सईद को फल लाने है। बुनियादी सुविधाओं के घोर अभाव और सीमित राशन उपलब्ध होने के उस दौर में केक लाने की ज़िम्मेदारी ने लमिया और उसकी दादी का जीवन तबाही के इस हाल में पहुँचा दिया है, जिसकी आप कल्पना नहीं कर सकते। बस साँस रोके उस प्यारी, भूरी- कत्थई सी आँखों वाली लड़की और उसके लाल कलगीदार दोस्त, बहुत समझदार मुर्गे- हिंडी की सलामती की दुआएँ माँगते रहते हैं।

फ़िल्म आपदा, घोर संकट की स्थिति में भी मनुष्यता के निचले होते स्तर को भी दिखाती है, जहाँ संसाधनों पर कब्ज़ा जमाए लोग नीचता के इस स्तर पर खड़े दिखाई देते कि इंसान कहलाने लायक ही नहीं लगते। वहीं कुछ जुगनुओं से दिपदिप लोग भी दिखते हैं, जिन पर प्यार आता है, इंसानियत पर भरोसा जमता है।

फ़िल्म का अंत, जन्मदिन का दिन, स्कूल में उल्लास है, मास्टर केक खा रहा है, तभी वहाँ अमरीकी बम गिरता है। दो बच्चे मृत्यु भय से बचने के लिए आँखों की पलकें पहले किसकी गिरेंगी, वाला खेल खेलते हैं, और उनकी आँखें हैं कि छलकती ही जा रही हैं।

और इन सबके बीच आते हैं, राष्ट्रपति सद्दाम, चमकते- दमकते, अपने जन्मदिन का विशालकाय केक काटते हुए---

अंत बिना कुछ कहे भी बहुत कुछ कह जाता है, देशों के बारे में, वहाँ की जनता के बारे मे, राष्ट्रप्रेम के बारे में और उनके ताकतवर सम्राटों के बारे में।

पहली फुरसत में यह फ़िल्म देखिए। फ़िल्म हिंदी में भी उपलब्ध है- नेटफ्लिक्स पर

 


शुक्रवार, 20 मार्च 2026

मन वसंत जीवन वसंत हर्ष राग उल्लास सब वसंत

 







वसंत की एक ही बात लुभावनी है कि इसमें रंग अपने सबसे उत्कृष्टतम रूप में उभर जाते हैं। मुझे रंगों का यह मेल-जोल इतना अच्छा लगता कि किसी भी उदासी या दुख में थोड़ी देर फूलों के पास खड़ी रहती हूँ। मन बदलने लगता है।
आप क्या करते हैं?

समय के लिए कुछ और तय नहीं

 मय के लिए कुछ और तय नहीं

सिवा इसके कि यह बीत जाता है
लेकिन जो बीतता नहीं
लौटता रहता है
वह भी कोई समय ही था
ज्यों तुम समय की तरह बीत चुके हो मुझ से
लेकिन तुम्हारा नाम लौटता रहता है
मुझतक
कभी घाव, कभी दंश
कभी उपहास की तरह
मैं समय की किसी बीत रही धड़कन पर उँगली रखकर
वहाँ तुम्हारे नाम का बीतना रोक नहीं पाती
--------
# कविता पाठ

# कलमकारों की दुनिया


बुधवार, 18 मार्च 2026

अपमान माँगकर लिया नहीं जाता, बस यही है जो आपको कभी भी, कहीं भी बिना शर्त मिल सकता है। एक आम आदमी के लिए यह तय करना मुश्किल है कि वह हवा में घुला प्रदूषण अधिक गटकता है, या अपमान का ज़हर!

शायद अपमान दिया ही इसलिए जाता है कि इसे देनेवाले को कुछ अच्छा महसूस हो, उसे लगे कि इससे उसका मान कुछ तो बढ़ गया है। 


 जब आप किसी से प्रेम करते हैं तो आप उनसे हर समय, हर पल बिल्कुल एकसमान रूप से प्यार नहीं करते हैं। यह नामुमकिन है। ऐसा दिखाना या जताना भी झूठ है।

इसके बावजूद हममें से ज़्यादातर लोग ऐसा अनवरत अनथक प्यार पाना चाहते हैं। इसकी वजह एक ही है। आम तौर पर सबके भीतर प्यार या फिर ज़िंदगी के उतार-चढ़ाव के बीच रिश्तों के ठहराव पर बहुत कम भरोसा बन पाता है।
होता भी ऐसा ही है। समुद्री ज्वार-भाटे से समझिए। अक्सर लोग ज्वार के समय उछल पड़ते हैं और किसी अनिष्ट की आशंका में भर भाटे पर काबू पाना चाहते हैं।
भावनाओं के बियाबान में हमें डर लगता है कि वह शिद्दत कभी वापस नहीं आएगी। हम स्थिरता की मियाद बचा लेना चाहते हैं। इसीलिए स्थायित्व पर, लगातार और हमेशा बने रहने पर ज़ोर देते हैं; जबकि प्यार में ज़िंदगी की ही तरह सिर्फ एक किस्म की निरंतरता ही संभव है।
वह संवृद्धि में, तरलता में और आज़ादी में है। ठीक जैसे नृत्य में डूबे नर्तकों का जोड़ा होता है। बीतते हुए समय में संगीत की लय पर मुश्किल से एक पैटर्न में सामने वाले छूते हुए और आज़ाद पर पार्टनर भी। ऐसे ही भावनाएं हमें छूकर निकल जाती हैं। साथ पर आज़ाद अगर आप उनमें किसी अवधि विशेष के लिए कैद भी हो गए तो वह कैद नहीं उससे बाहर आना ही बढ़ना है। क्योंकि अपने वास्तविक रूप में हमारी भावनाएँ और हमारे रिश्ते विराम के साथ जीवंत होते हैं।
भावनाओं की असली सुरक्षा और प्रेम की मर्यादा किसी स्वामित्व या अधिकार में नहीं है, न ही मांग या अपेक्षा है, यहाँ तक कि आशा में भी नहीं है। वह बस ज्वार-भाटे के स्वीकार और बदलाव की गरिमा को अपनाने भर की बात है।

#Humanemotion
#Monochrome

सोमवार, 9 मार्च 2026

 अनुवाद हमेशा मुश्किल दिनों में किसी दवा की गोली सा बनकर आता है।

पढ़िए लिथुवानिया की कवि औश्रा कज़िलियनटे की वसंत से सम्बंधित कविताएँ। इन कविताओं से बहुत रिलेट कर पाई इनदिनों।
----------
मनुष्य खिलते हैं
मनुष्य दुख से खिलते हैं
जबकि चेरी के पेड़ बस खिलते ही रहते हैं
उनकी पंखुड़ियाँ घूमती हैं, वे दीवारों पर चढ़ते हैं, छिपकलियों की तरह अपनी जीभ बाहर निकालते हैं, हमारे चेहरे चाटते हैं
वे बस्ता लादकर स्कूल जाते हैं, वहाँ उन्हें कुछ नहीं मिलता, लेकिन इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता
वे खाली कैफेटेरिया में लंच करते हैं, शहर के पार्कों में अपने कुत्तों को घुमाते हैं, लेकिन इससे कोई फर्क नहीं पड़ता
वसंत वसंत है क्योंकि यह सिर्फ़ वसंत है
और वहाँ, किनारे पर, बत्तखों का एक जोड़ा बैठा है, बस बैठा है
जबकि पानी पत्थरों के ऊपर से बह रहा है
---------------
मैं बाहर गई
मैं बाहर गई
अपने कमरे के बीच में
वहाँ सड़कें खाली हैं, सब एक-दूसरे के पास से गुज़रते हैं
एक टेढ़ी-मेढ़ी बूढ़ी औरत, झुकी हुई
अपनी अंतिम ताकत से एक बैग घसीट रही है, वह वसंत से भरा हुआ है

 


जुड़ने के लिए कितना टूटना पड़ता है

ठीक से देख सकने के लिए अक्सर

बदलनी पड़ती है जगह,
मैं तुम्हें कितना बचा पाऊंगी
यह तो इसी से तय होगा
मैं ख़ुद को कितना बचा पाई हूँ

THE PERSIDENT CAKE

  युवा इराकी निर्देशक हसन हादी की डेब्यू फिल्म है- द प्रेसिडेंट्स केक। 90 के दशक का इराक अमरीकी बमबारी के बीच सद्दाम हुसैन का 50 वां जन्मदिन...