जुड़ने के लिए कितना टूटना पड़ता है
ठीक से देख सकने के लिए अक्सर
बदलनी पड़ती है जगह,
मैं तुम्हें कितना बचा पाऊंगी
यह तो इसी से तय होगा
मैं ख़ुद को कितना बचा पाई हूँ
स मय के लिए कुछ और तय नहीं सिवा इसके कि यह बीत जाता है लेकिन जो बीतता नहीं लौटता रहता है वह भी कोई समय ही था ज्यों तुम समय की तरह बीत चुके...
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