जुड़ने के लिए कितना टूटना पड़ता है
ठीक से देख सकने के लिए अक्सर
बदलनी पड़ती है जगह,
मैं तुम्हें कितना बचा पाऊंगी
यह तो इसी से तय होगा
मैं ख़ुद को कितना बचा पाई हूँ
अनुवाद हमेशा मुश्किल दिनों में किसी दवा की गोली सा बनकर आता है। पढ़िए लिथुवानिया की कवि औश्रा कज़िलियनटे की वसंत से सम्बंधित कविताएँ। इन कवि...
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