रविवार, 8 अगस्त 2010

नीलू नीलिमा नीलोफर

भीष्म साहनी का 2000 ई.प्रकाशित उपन्यास " नीलू नीलिमा नीलोफर " प्रेम कहानी है । इस उपन्यास की कथा वस्तु बाल्यकाल की दो सखियाँ नीलू उर्फ नीलोफर तथा नीलिमा के ईर्द-गिर्द घूमती है। यह उपन्यास ऎसे समय के भारतीय समाज की कहानी प्रस्तुत करता है जो किसी धार्मिक डर से गैर मजहब में अपनी बेटी को विवाह करने से हीं नहीं रोकता बल्कि दूसरे धर्म के प्रति घृणा को दर्शाता है। यह घृणा इतनी ज्यादा है कि अपनी बेटी का भविष्य बर्बाद कर देने मे उसे कोई संकोच नहीं है ।

नीलू और नीलिमा नामक मुख्य पात्रों के अतिरिक्त इस उपन्यास में चार अन्य महिला पात्र हैं , जो औरत की विभिन्न स्थितियों का बयान करती हैं । नीलमा की दादी स्वयं अपने युग में पति और ससुराल द्वारा उपेक्षित और दमित रहीं हैं,लेकिन पोती किसी मुसलमान लड़के से शादी करे , यह उन्हें मंजूर नहीं । इतना ही नही हिन्दू पति के उत्पीड़न को भी यह मानकर नजर-अंदाज करती है कि ऎसा सब जगह होता है।

सामाजिक रीति-रिवाज तथा परम्पराओं की डोर में बंधी नीलू की माँ जहाँ अपनी बेटी को बहुत चाहती है तथा हिदू लड़के से उसके विवाह के अपराध को क्षमा कर देना चाहती है वहीं दूसरी तरफ अपने बेटे तथा परिवार के दूसरे सदस्यों के हिंसक विरोध के डर से अपनी बेटी को डाँटती है ।

नीलिमा के पति के बास की पत्नी मिसेज वर्मा इस बात का प्रतीक है कि भारतीय समाज में औरतों का स्वयं कोई कद नही होता बल्कि पति के कद से ही उनका कद निर्धारित होता है।

हमारे समाज मे औरत होने की पहली शर्त है उसका समर्पिता होना और इस समर्पण का कोई परिणाम नहीं, सीमा नहीं । समूचा उपन्यास एक ओर औरत की दारुण दशा को प्रस्तुत करता है तो दूसरी ओर उसके व्यक्तित्व के विभिन्न आयामों को स्थापित करता है तथा अनेक मामले में उसे पुरुष से श्रेष्ठ साबित करता है। एक बेटी की एक बेटे की तुलना में माता-पिता के प्रति अधिक वफादार सिद्ध करता है एवं एक पत्नी के रुप में अधिक संवेदनशील और पोषक सिद्ध करता है ।

उपन्यास की कथा वस्तु बचपन की दो सखियों नीलू (नीलोफर ) तथा नीलिमा की है । नीलू के पिता उदारवादी विचारधारा के हैं। मुस्लिम समाज में व्याप्त पर्दाप्रथा तथा संकीर्ण संस्कृति को दरकिनार करते हुए वे अपने बेटीको फाइन आर्ट की डिग्री लेने के लिए कालेज भेजते हैं । वहीं उसकी मुलाकात फाइनल ईयर के छात्र सुधीर से होती है। दोनो एक दूसरे को पसंद करने लगते हैं । परिवारवालों के मर्जी के खिलाफ नीलू कोर्ट में सुधीर से शादी कर लेती है। सुधीर का शराबी पिता नीलू को अपनाने से इंकार कर देता है। दोनों शिमला मे अपना आशियाना ढूँढ़ते हैं। लेकिन नीलू का भाई हमीद एक कट्टर मुसलमान है। वह नीलू को शिमला में ढूँढ़ निकालता है और उसे विश्वास दिलाता है कि वह उसके हिंदू पति सुधीर तथा उसके होने वाले बच्चे को दिल से अपना चुका है। नीलू हमीद के चालों से अनजान उसके साथ घर जाने के लिए राजी हो जाती है।

हमीद नीलू को देशी डाक्टर के पास ले जाकर जबर्दस्ती उसका गर्भपात करवा देता है एवं तरह-तरह की यातनाएँ देते हुए वापस घर ले जाता है। घर में एक अंधेरी कोठरी में बंदकर नीलू के साथ जानवरों से भी बदतर व्यवहार करता है। हमीद कहता है नीलू का पति सुधीर या तो कलमा पढ़ले,नही तो वह नीलू की दूसरी शादी मनियारी की दूकान करने वाले तीन बच्चों के बाप से करवा देगा।

नीलू की माँ भी नीलू को पीटती है। कहती है मेरी कोख ही खराब थी जो इस कुलच्छ्नी को जना । लेकिन माँ की मदद से नीलू घर से भागकर वापस सुधीर के पास शिमला पहुँचने में कामयाब हो जाती है।

उपन्यास की दूसरी मुख्य पात्र नीलिमा बहुत हीं खुबसूरत तथा खुले विचारोंवाली लड़की हैं। नीलिमा के पिता बैरिस्टर तथा आजाद ख्याल के इंसान हैं। नीलिमा अपने कालेज के साथी अल्ताफ को पंसद करती है। अल्ताफ रोज नीलिमाके घर टेनिस खेलने आया करता है। नीलिमा की दादी पुराने ख्याल की महिला है । उन्हें नीलिमा तथा अल्ताफ का मेल-जोल बिल्कुल पसंद नही है। वह हमेशा नीलिमा तथा अल्ताफ के मेल-जोल पर एतराज जताती है। नीलिमा के पिता कहते है कि नीलिमा की खुशी में ही उनकी खुशी है। किसी भी तरह बेटे को अपनी बात न मनवा पाने में असफल दादी कहती हैं- "मेरे जीते जी यह नहीं हो सकता है। मेरे आँख मूँद लेने के बाद तुम्हारे जो मर्जी में आए करना ।"

पिता और दादी में चल रहे द्वंद्व  से वाकिफ नीलिमा सुबोध नामक मध्यमवर्गीय तथा महत्वाकांक्षी लड़के से शादी कर लेती है। सुबोध को अपने कैरियर के अलावा दूसरी किसी बात का फिक्र नहीं है। शुरु-शुरु में वह नीलिमा को एक पार्टी से दूसरे पार्टीमें नुमाइश की तरह लोगों के सामने पेश कर रहा था । मानो वह आदमी नहीं टिकट से देखे जाने वाली वनमानस हो । नुमाइश की हर पार्टी में सुबोध नीलिमा को खुद तैयार करता -आज यह साड़ी पहनो , आज हरे रंग का मोतियों वाला जड़ाऊ हार पहनना । मानो कोई फैशन परेड हो रही हो। अपने रुप तथा अपनी वाकपटुता एवं हँसमुख स्वभाव की तारीफ सुनते नीलिमा थकती नहीं थी ।

सुबोध अपनी दिनचर्या का ऎसा पक्का मानो उसे कोई चाभी लगी हो , सभी काम समयानूकुल यहाँ तक की हँसना बोलना भी समय के हिसाब से करता था । पति के रुप में नीलिमा को एक टाइममशीन मिला जो अपनी पदोन्नति का रास्ता अपनी पत्नी के रुप के जरिए तय करना चाहता था नीलिमा के खुबसूरती का खुमार का दौड़ जल्दी ही खत्म हो जाता है तथा सुबोध के अत्याचार का सिलसिला शुरु हो जाता है ।

नीलिमा को अपनी मर्जी से एक पैसा खर्च करने का अधिकार नहीं था । सुबोध की मर्जी के बिना अगर वह कुछ कर लेती तो उसे सुबोध के कोप का शिकार होना पड़ता था । अगर शनिवार के दिन शाम में फ्रिज में बीयर की बोतल नहीं हो तो सुबोध ऎसा चुप्पी साधता मानो फ्रिज से भी ज्यादा ठंढ़ा हो गया हो ।अपनी बेटी को खुश रखने के लिए नीलिमा के पिता सुबोध की बदसलुकी को भुलाकर उसे कार तोहफे में देते हैं। लेकिन सुबोध का अत्याचार रुकने का नाम नहीं लेता । हद तो तब हो गई , जब सुबोध का बास मिस्टर वर्मा उनके घर के ठीक उपर वाले फ्लैट में रहने आ गए उनसे मिलने सुबोध तथा नीलिमा जब उनके घर जाने का निर्णय लेते हैं तब मिसेज वर्मा के घर के सामने अचानक सुबोध की नजर नीलिमा के नंगे पाँव पर जाती है। यह क्या ! सुबोध वहीं नीलिमा को एक चाँटा लगा देता है।

नीलिमा अपने आप को खत्म करने का निर्णय लेती है।गुसलखाने मे मोमबत्ती से अपने आप को आग लगा लेती है। बीयर के नशे में धुत्त सुबोध नीलिमा के चीख पुकार से अनभिज्ञ रहता है। नीलिमा शिमला अपने चाची तथा पिता के साथ अस्पताल मे अपना उपचार करवाती है । वहीं उसकी मुलाकात अपनी सखी नीलू से होती है। दोनो एक दूसरे को अपनी आपबीती सुनाते हैं।नीलिमा के पिता निर्णय लेते हैं कि नीलिमा उस घर मे वापस कभी नही जाएगी । दादी समझाती है-"पति पत्नी के मन मुटाव को तुम बहुत तुल दे रहे हो । ऎसी घटना किस घर मे नहीं घटती ? तेरे बाप ने मुझे मायके भेज दिया था और पूरे तीन साल तक मेरी खोज -खबर नही ली थी , पर मेरी गृहस्थी तो नही टूटी थी । नीलिमा के बच्चे हो जाए देखना कितना जल्दी सुबोध का मन बदल जाएगा । बहू से प्यार न करे अपने बेटे से तो प्यार करेगा । लड़की जून ही अभागी जुन होती है। उसे बहुत कुछ भोगना सहना पड़ता है । " (पृ.सं.134)

दादी माँ का यह मानना था कि " स्त्री दुःख भोगने के लिए संसार में आती है। उसे अपना सर्वस्व देना हीं देना है , जीवन से कुछ माँगना नहीं है । किसी चीज की अपेक्षा करनी नहीं है। स्त्री पराधीन होती है बेटा तुम नई रोशनी के लोग हो तुम्हें कोई क्या समझाए । तुम बराबरी की बात करते हो , पर बेटा बराबरी नाम की कोई चीज नहीं होती है। एक दूसरे को आँख दिखाने से कुछ नहीं होता घर में रहेगी तो उसका दर्जा माँ का तो होगा घरवाली का तो होगा पर बराबरी का नहीं होगा ।तलाक लेगी तो भी उसी की मिट्टी पलीद होगी । "

दादी माँ पुरातन पंथी ही नही थी उनमें वैराग्य भाव भी कूट-कूट कर भरा था । सच तो यह है कि उन्हें इस बात की अपेक्षा नहीं थी कि स्त्री का जीवन कभी सुखी हो सकता है। हर स्त्री को अपना भाग्य वहन करना है , यही कुछ वह जानती थी । यही कुछ जीवन के दसियों साल के अनुभव से उन्होनें सीखा था । हमारी बच्ची भोली है। उसने बता दिया होगा कि उसका उठना बैठना उस मुसलमान लड़के के साथ था और यह बात उस के दिल को काट मार गई होगी । धीरज रखो बेटा धीरज ही इसका इलाज है। नीलिमा के पिता अपने आप को गुनाहगार मानते हैं - " मैं हीं अंधा बना रहा । मैंने बेटी के इस विवाह को क्यों नहीं रोका ? " इधर स्त्री जीवन का यथार्थ धीरे-धीरे नीलिमा को घेर रहा था । नीलिमा एक सख्त निर्णय लेती है । वह वापस जाएगी सुबोध के पास गहरे आत्मविश्वास के साथ , अपने आप को किसी भी क्षण कमजोर नहीं होने देगी । चाहे जो हो जाए हालात के सामने घुटने नहीं टेकेगी । सुबोध नीलिमा का यह बदला रुप देखकर हैरान रह जाता है।

’नीलू नीलिमा नीलोफर ’ प्रेम कहानी है। प्रेम कहानियों में अड़चने उठती है, कभी आर्थिक विषमताओं के कारण , कभी जाति भेद के कारण , कभी पारिवारिक मतभेद के कारण । इस कहानी में भी अवरोध उठते हैं, परस्पर प्रेम के कोमल तंतुओं को कुचलने के लिए । अंतर केवल इतना है कि इस प्रेम कहानी मे उठने वाले अवरोध कुछ ऎसे पूर्वग्रह लिए हुए हैं जिनकी जड़ें  समाज में बहुत गहरी हैं और जिनकी भूमिका कभी -कभी दारुण भयावह रुप ले लेती है।

"इन अवरोधों से जूझना एक तरह से अपने परिवेश से जूझना भी है। इस परिवेश में अपने को खोजना भी है। अपने को पहचान पाने का प्रयास भी है ।" (आमुख)

इस उपन्यास में रिश्तों के अतीत तथा वर्तमान को जिन्दगी के भोगे अनुभव और संस्कार , नारी के ममत्व ,अपनत्व और उसके घनत्व के प्रभाव को पूरी सहजता के साथ प्रस्तुत किया गया है। दूसरी तरफ इस उपन्यास में पारिवारिक संबंधों में आई संवेदनशून्यता को बड़ी सहजता के साथ रेखांकित किया गया है।

अंत में उपन्यास इस निष्कर्ष पर पहुँचता हैकि औरतों के दमन में सिर्फ समाज के पिछड़े वर्ग हीं सक्रिय नहीं होते , बल्कि तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग भी शामिल है। इसी माहौल में उपन्यास के पात्र अपनी जिन्दगी का ताना बाना बुनते हैं।

1 टिप्पणी:

  1. अच्छा आलेख. स्त्री जीवन के वास्तविक यथार्थ को निम्न, मध्य और उच्च - तीनों आयामों के स्तर पर प्रस्तुत किया गया हैं जहां लगभग स्त्री की दशा दारुण हैं. स्त्री विमर्श संबंधी मुद्दों को समझने के लिए यह उपन्यास काफी महत्वपूर्ण हो सकता है.

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