सोमवार, 10 दिसंबर 2012

अल्मा कबूतरी में सामाजिक यथार्थ


अर्पणा दीप्ति

यथार्थ मानव जीवन की सच्ची अनुभूति है जिसके द्वारा हम अपने जीवन में घटित होने वाले घटनाओं एवं भावनाओं का अनुभव करते हैं। अपनी इन्द्रियों के द्वारा समाज में होने वाले सभी प्रकार के क्रियाकलापों का अनुभव करना एवं ज्यों का त्यों कहना यथार्थ है। सामाजिक यथार्थवाद का अर्थ होता है-समाज की वास्तविक अवस्था का यथार्थ चित्रण।साहित्य लेखन और जीवन का यथार्थ दरसल एक ही कोण की दो भुजाएँ हैं। अगर मन का भावनात्मक रूप सहित्य है तो उसी की बुद्धिगत परिकल्पना यथार्थ है। युगीन यथार्थ को पहचानने के लिए जीवन के मूल स्रोतों से संबंध स्थापित करना पड़ता है।, उनसे उलझना पड़ता है। इसे सिर्फ बाहर से बाहर समझना मुश्किल है। यथार्थ हमेशा समाज से जुड़ा रहता है। वह व्यक्तिगत, समाजगत और विश्व से संबंधित है। व्यक्ति का अस्तित्व समाज से और समाज का अस्तित्व विश्व से है। डॉ. त्रिभुवन सिंह के अनुसार 

"सामाजिक यथार्थवाद का अर्थ होता है समाज की वास्तविक अवस्थाओं का यथार्थ चित्रण। परंतु साहित्य के अंदर किसी भी वस्तु का चित्र उतार कर रख देना कठिन होता है क्योंकि सहित्यिक चित्र कैमरा द्वारा लिया गया चित्र नहीं होता है, बल्कि वह साहित्यकार की सूची के द्वारा चित्रित किया गया ऎसा चित्र है जिसमें साहित्यकार के अनुभव एवं कल्पना के सुंदर रंग ढले होते हैं। सामाजिक विषमताओं, भ्रष्टाचारों तथा वैयक्तिक स्वार्थों से आक्रांत, पीड़ित समाज की दयनीय परिस्थितियों को उसके वास्तविक रूप में समाज के सामने प्रस्तुत करना सामाजिक यथार्थवाद का प्रधान लक्ष्य है। सामाजिक यथार्थवादी साहित्यकार समाज और व्यक्ति के पारस्परिक संबंधों उसके प्रत्येक आचार-विचारों तथा उसकी राष्ट्रीय, आर्थिक एवं नैतिक अवस्थाओं का मूल्याकंन तत्कालीन परिस्थितियों के आधार पर करता है। वह केवल समाज जैसा है, वैसा ही उसका वर्णन मात्र नहीं कर देता, बल्कि उसको इस रूप में प्रस्तुत करता है जिससे पाठक युग के सत्य एवं समाज में होने वाले कार्यव्यापारों के औचित्य तथा अनौचित्य को सरलता से परख कर सकें और उन मर्यादाओं का अनुकरण कर सकें, जिस पर चलकर एक आदर्श समाज की स्थापना हो सके।" ( हिंदी उपन्यास और यथार्थवाद : प्रो. त्रिभुवन सिंह-पृ.१७) 

मैत्रेयी पुष्पा कृत ’अल्मा कबूतरी’ (२०००) में यथार्थ पानी में तेल की तरह साफ दिखता है।इस उपन्यास के माध्यम से कथाकार ने एक ऎसे विषय को उठाया है जिससे अधिकांश लोग अपरिचित हैं। अगर परिचित हैं तो उनके डरावने और अपराधित कारनामों से, उनके भीतर छिपी मानवीय संवेदनाओं और उत्पीड़न से नहीं। यह उपन्यास बुंदेलखंड की कबूतरा जनजाति के माध्यम से समाज में ’जन्मजात अपराधी’ घोषित की गई तमाम जनजातियों का ’दस्तावेज’ प्रस्तुत करता है। १८७९ ई. के अधिनियम के तहत अंग्रेजों ने इन्हें जन्मजात अपराधी घोषित कर दिया था। वास्तव में अपने देश को अपनी नागरिकता को बचाने के लिए वे अपनी ताकत भर अंग्रेजों से लड़े थे। इसलिए इन्हें सजा के तौर पर १८७९ ई. के अधिनियम के तहत अंग्रेजों ने इन्हें ’जन्मजात अपराधी’ घोषित कर दिया था।  यह प्रथा आज तक चली आ रही है। डॉ. डी. एन मजमूदार के अनुसार-

"नर विज्ञान और रक्त विज्ञान द्वारा जो भी आँकड़े प्राप्त हुए हैं उन से केवल यह पता चला है कि वे विशुद्ध जातियाँ नहीं हैं, अन्य जातियों के मिश्रण से बनी है और उनमें ’बी’ रक्त का बाहुल्य है। इसके अतिरिक्त उनकी शारीरिक बनावट और शारीरिक रक्त का कोई दोष नहीं है, क्योंकि उनकी शारीरिक बनावट और शारीरिक रक्त में अन्य जातियों की अपेक्षा कोई विशेष अंतर नहीं है।"(भारत की जन जातियाँ-डॉ.शिव तोष दास-पृ.सं.१७४)

मैत्रेयी पुष्पा ने 'अल्मा कबूतरी' की कथावस्तु के लिए एक ऎसी जनजाति को चुना जिन्हें समाज मे अब तक कोई स्थान नहीं मिल सका है। कथावस्तु का चयन करते समय मैत्रेयी पुष्पा के मस्तिष्क में शायद यह बात रही हो कि हिंदी कथा साहित्य में इस विषय की ओर कम ध्यान दिया गया हो। यह ठीक है कि प्रेमचंद ने अपने कथा साहित्य में अपेक्षित वर्ग को स्थान दिया। लेकिन उन लोगों में और आदिवासियों में बहुत फर्क है। साथ ही मैत्रेयी पुष्पा ने अल्मा कबूतरी  में नायक को न चुनकर नायिका को चुना है।

’अल्मा कबूतरी’ नायिका प्रधान उपन्यास है अत: लेखिका ने इस उपन्यास को लिखते समय समाज के यथार्थ चित्रण के साथ-साथ आदिवासियों खासकर महिला आदिवासियों की समस्याओं को मुख्य रूप से रेखांकित किया है। मुख्य रूप से उपन्यास का ताना-बाना स्त्री शोषण तथा स्त्री संघर्ष से बुना गया है। इसके अलावे उपन्यास की अन्य प्रमुख समस्याएँ द्रष्टव्य है यथाः-
१.जात-पात तथा ऊँच-नीच की समस्या
२.अनैतिक संबंधों की समस्या
३.अंधविश्वास की समस्या
४.निर्धनता एंव बेरोजगारी की समस्या
५.अशिक्षा
भारत में आज भी कुछ ऎसी अभागी जनजातियाँ हैं जो आजादी का अर्थ नहीं जानती उनके पास न तो अपना जमीन है और न ठिकाने का घर। औपनिवेशिक शासन ने उन्हें ’जरायमपेशा’ जाति घोषित कर न केवल तथाकथित ’सभ्य समाज’ के नजरों में उपेक्षा और घृणा का पात्र ही नहीं बल्कि पुलिस अत्याचार का नरमचारा भी बना दिया। यद्यपि देश के आजाद होने के बाद इन जातियों को समान नागरिकता का अधिकार प्राप्त तो हो गया, पर जीविकोपार्जन का कोई सम्मानजनक साधन उपलब्ध नहीं होने के कारण इनके पुरुष अपराधकर्म और स्त्रियाँ देह व्यापार के लिए विवश होती है। मैत्रेयी पुष्पा ने ’अल्मा कबूतरी’ में इस कटु यथार्थ को गहरी संवेदना तथा जबर्दस्त सृजनात्मकता के साथ प्रस्तुत किया है।
१९३६ में जनजातियों की संपूर्ण स्थिति को देखते हुए जवाहरलाल नेहरू ने एक अधिनियम बनाने की घोषणा की जिसमें उन्हें अपराध से मुक्त घोषित किया गया था। १९५२ में प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने इस घोषणा को लागू भी किया। देश को स्वतंत्र होकर ६२ वर्ष बीत चुके हैं लेकिन स्थिति आज भी ज्यों की त्यों बनी हुई है। ’अल्मा कबूतरी’ को पढ़ने के बाद पाठक वर्ग का यथार्थ की एक ऎसी दुनियाँ से साक्षात्कार होता है जँहा स्त्रियाँ अपने आपको बेचकर अपने बच्चों का पालन पोषण करती हैं और इनके पुरुष इन बच्चों की सलामती के लिए अपना जान तक कुर्बान करने से पीछे नहीं हटते। वहीं समानातंर में स्त्रियों का एक ऎसा वर्ग भी है जो ऎशो आराम से जीता है जिन्हें लेखिका ने ’कज्जा’ का नाम दिया है। ये कज्जा वर्ग के पुरुष अपनी कामवासना की पुर्ति के लिए कबूतरी स्त्रियों का इस्तेमाल करते हुए उनका शोषण करते हैं और उन्हें मुहरे की तरह बाजी पर भी लगा देते हैं। उपन्यास पढ़कर ऎसा प्रतीत होता है कि अपराधी कबूतरा जनजाति नहीं बल्कि अपराधी अपने को सभ्य कहनेवाला असभ्य और बर्बर समाज है जो इन जनजातियों को ’अपराधी’ बने रहने पर विवश कर देता है; वे उठना चाहे तो न उठने दे, पढ़ना भी चाहे तो न पढ़ने दे। सभ्य समाज का कानून और पुलिस उन्हें अपराधी और असभ्य इसलिए बनाए रखना चाहती है ताकि उन्हीं के रू-ब-रु वे अपने को सभ्य और सुसंस्कृत कर सके।

(अ) "हम लोग न खेतों के मालिक न मजूर सो गोह खाते-खाते होंठ चिपचिपा गए हैं। देखें तो धरती मैया कैसी-कैसी चीजें देती हैं? जमीन में हमारा हिस्सा नहीं।"(अल्मा कबूतरी-मैत्रेयी पुष्पा-पृ.सं.५८)
(आ)"बच्चे गाँव से दूर पड़े घूरों को कुरेद आए। कुछ चिथड़े उखाड़ लाए। उन्होंने ने चिथड़े घर के भीतर माँ-काकियों के पास फेंक दिए। नहीं देखा कि वे चिथड़े गंदगी में लिथड़े है या माहवारी.....। फायदा भी क्या था दूसरा सहारा न था। माँ-काकियों के नंगे बदन रह-रहकर आँखों में छा जाते।"(वही-पृ.४७)

मुख्यत: बुंदेलखंड में बसनेवाली कबूतरा जनजाति के जीवन को उपन्यास का विषय बनाया गया है, जो अपनी वंश की परंपरा रानी पद्‍यमिनी और झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई की अंगरक्षिका झलकारी बाई से जोड़ते हैं।

"हम सब एक लकड़ी नहीं बँधे हुए गट्‍ठर हैं। तोड़ने से न टूटेंगे! चित्तौड़ से लेकर झाँसी की रानी का साथ निभाने की सजाएँ भोगो। भोगेंगे।"(पृ.सं.१७५)

 इसके साथ ही लेखिका ने समानांतर ’सभ्य’ समाज से जिन्हें वे ’कज्जा’ कहकर पुकारती हैं, शोषकवर्ग के रूप में इनका चित्रण बड़ी ही सफलता से किया है। वस्तुत: ’कज्जा’’कबूतरा’ का द्वंद ही ’अल्मा कबूतरी’का केंद्रीय विषय है। भूरी उसके बेटे रामसिंह और उसकी बेटी अल्मा की कहानी उनके अपमान, संघर्ष और पीड़ा की कहानी है। इन पात्रों ने सभ्य समाज से संघर्ष कर अपना सबकुछ दाँव पर लगा देने के बावजूद ’लहूलुहान’ कबूतरा ही रहते हैं। इसका कारण यह है कि पूरी व्यवस्था ही अपनी पूरी शक्ति के साथ उनके विरोध में खड़ी है। भूरी कज्जा समाज से टक्कर लेती है। वह शरीर का सौदा करके भी अपने बेटे को पढ़ा लिखाकर इस योग्य बनाना चाहती है, कि वह समाज मे सम्मान की जिंदगी जी सके।

"पतिविरता लुगाई अपने आदमी के संग सती होती है। मैं अपने मर्द की ब्याहता खुद को तब माँनूगी, जब रामसिंह को पढ़ा लिखाकर इसी कचहरी के दरवाजे खड़ा कर दूँगीं। भले इस सफर में मुझे दस मर्दों के नीचे से गुजरना पड़े।"(पृ.सं.७४)

 भूरी विद्या को महत्त्व देते हुए कहती है कि

 "विद्या रतन के आगे देह का खजाना कुछ भी नहीं।"(वही)

 बस्ती की सबसे पहली माँ थी भूरी जिसने बेटे को कुल्हाड़ी-डंडा नहीं थमा कर पोथी-पाटी पकड़ाया। अपने बेटे को सभ्य बनाने के लिए भूरी कबुतरा जीवन तथा बदनामी का बोझ ढ़ोने को तैयार थी। पर ऎसा नहीं हो पाता है। भूरी का बेटा रामसिंह कबूतरा बनकर ही जीने को अभिशप्त है। वह धीरे-धीरे अपनी संघर्ष की क्षमता खोकर पुलिस का दलाल बन जाता है और बेटा सिंह डाकू के नाम पर पुलिस द्वारा प्रायोजित मुठभेड़ में मारा जाता है। एक कबूतरा के ’सभ्य’ बनने की कोशिश का यह अंजाम दिखाकर लेखिका ने यथार्थ को उसके ’नग्नतम’ रूप में पेश करने का प्रयास किया है। 

 अल्मा की कहानी इस स्थिति के प्रति नारी के विद्रोह की कहानी है। वह अपने पिता के साथ रहती है, अपने साथ रहते राणा को बच्चे से मर्द बनाती है।, कुँआरी माँ बनने का साहस दिखाती है, आततायियों को साहस के साथ झेलती है, पशुओं से भी बदतर जिंदगी जीने को बाध्य होती है पर हार नहीं मानती।

(अ)"इज्जत बचानी नहीं गँवानी है, जान रखनी नहीं देनी है....भागकर कहाँ तक जाएगी फिर कोई ऎसा खतरनाक हाथ आएगा  नए नंगा करेंगे। हर आदमी की एक ही भूख।"(पृ.सं.३०७)
(आ)"पाप के खिलाफ लड़ने के लिए अपने देह से पाप को गुजार देना कितना जरूरी था।"(पृ.सं.३६८) उसकी कहानी को एक आकस्मिक मोड़ देकर अल्मा कबूतरी से श्रीमती अल्मा शास्त्री तथा बबीना विधानसभा सीट का संभावित प्रत्याशी बना दिया जाता है।

वस्तुत: ’अल्मा कबूतरी’ की नायिका अल्मा नहीं भूरी-कदमबाई तथा अल्मा का समुच्च्य है, जिसमें तमाम अन्य स्त्री पात्र भी सिमट जाते हैं। इस तरह कुल एक और एक ही स्त्री मूर्ति प्रतिष्ठित होती है ’अल्मा’। यह नामकरण तक प्रतीकात्मक है-अल्मा यानि ’आत्मा’

अब प्रश्न यह उठना स्वभाविक है कि क्या भूरी, कदम, अल्मा दलित है? क्या अल्मा कबूतरी दलित गाथा है? नहीं! दरअसल अल्मा, कदम, भूरी दलित नहीं हो सकती। ये तीनों हीं स्त्रियाँ महाकाल से टकराने में सक्ष्म है। ये तीनो पग-पग पर उत्पीड़ित होती हैं, उनका एक-एक सपना टूटता है फिर भी वे चुनौतियों से टकराती हुई संघर्ष करती है। भूरी, कदमबाई तथा अल्मा तीनों एक ही किरदार के विभिन्न अवस्थाओं के रूप हैं। जहाँ शुरूआती नायिका कदमबाई बदलाव की हताशा भरी छटपटाहट को खोलती है, वहीं भूरी विद्रोह का अंकुर प्रस्फुटित करती है, लेकिन उसे तार्किक बिंदु पर पहुँचाती है अल्मा। जहाँ वह सत्ता को वरण करने से इंकार नहीं कर पाती है। वही सत्ता जिसने भूरी और कदम ही नहीं अल्मा का भी अमानवीय शोषण किया; अस्मिता को कुचला तब भी इनकी संघर्ष यात्रा को रोक नहीं सकी। अंतत: अल्मा भी सत्तासीनों के दायरे में शामिल होकर उसी का हिस्सा बन जाती है। वही सत्ता जिसने रानी पद्‍मिनी से लेकर झाँसी की रानी की विश्वास पात्र झलकारीबाई तक की बलि ली तो यह विजय है या आत्मसमर्पण! विजय भले ही नहीं सही पर आत्मसमर्पण कतई नहीं। हालाँकि इस बिंदु पर आकर अल्मा कबूतरी की कथा विश्राम ग्रहण करती है।

’अल्मा कबूतरी’ स्वातंत्र्योत्तर भारत में निरंतर राजनैतिक नैतिकता के क्षरण की कहानी है। वस्तुत: जहाँ पुलिसवाले अपनी अंगुलियों और हथेलियों से डंडा खेलने में व्यस्त हैं, जहाँ ज्ञान पाकर नफरत कमाई जाती है, सच्ची बातों से बचकर समाचार पत्र ईमान बेचने लगे हैं। पढ़े-लिखे लड़के कुत्तों से ज्यादा वफादार है तथा पेट की आग बुझाने के लिए अपना जमीर तक बेचने को तैयार हैं, जहाँ खुबसूरत शरीर बदसूरत भविष्य गढ़ता है वहाँ आक्रोश तक निरर्थक है। इन सभी पहलुओं को मैत्रेयी पुष्पा ने बड़े ही बेबाक तरीके से अल्मा कबूतरी में दर्शाया है।

वहीं इस उपन्यास में कई पात्रों में द्वंद दिखाई देता है। मुख्य रूप से अनेक संदर्भों में मंसाराम, कदमबाई, राणा, भूरी, रामसिंह आदि पात्र द्वंद में पड़ जाते हैं। इस उपन्यास में जहाँ एक तरफ समाज शास्त्र मौजूद है तो वहीं दूसरी तरफ यथार्थ का दस्तावेज भी अपने पूर्ण साक्ष्य के साथ उपलब्ध है। मैत्रेयी पुष्पा के लेखन की सबसे बड़ी विशिष्टता यह है कि वे लोक जीवन एवं सामान्य-जीवन से कथा वस्तु का चुनाव करती हैं तथा स्त्रीपात्र को उसके केंद्र में रखती हैं। मैत्रेयी पुष्पा ने अपने सभी उपन्यासों में नायिकाओं को विजय की स्थिति में पहुँचाया है अल्मा भी इनसे अछूता नहीं रहती। यह उपन्यास अपराधी जनजाति यानी क्रिमिनलाइब्स से संबंधित है एवं अपराधी जनजाति कबूतरा के समाज की मुख्यधारा में शामिल होने की प्रक्रिया पर आधारित है। यदि गैर समाजशास्त्रीय शब्दों में कहा जाए तो इनकी नियति उस ’त्रिशंकु समाज’ की है जो अवांछित बने रहकर गुजरबसर करते हैं। इन्हीं अवांछित लोगों की कथा है ’अल्मा कबूतरी’’अल्मा कबूतरी’ में अल्मा चाहे जितना संघर्ष करती है, लेकिन अंतत: एक मुकाम हासिल करती है। इस प्रकार वह किसी जनजाति विशेष की नहीं रह जाती। उसकी आशा-आकांक्षा -जिजीविषा जाति से भी आगे जाकर लिंग भेद तक को लाँघती है|

संदर्भ:
हिंदी उपन्यास और यथार्थवाद-डॉ. त्रिभुवन सिंह, ओमप्रकाशबेरी प्रकाशन, बनारस-१९५५
भारत की जनजातियाँ-डॉ. शिवतोष दास, किताबघर प्रकाशन, नई दिल्ली १९८३
अल्मा  कबूतरी में सामाजिक यथार्थ-एम.फिल शोधप्रबंध-२००८-अर्पणा दीप्ति 



बुधवार, 26 सितंबर 2012

इतिहास एवं समय की दस्तक ....कितने पाकिस्तान?


इतिहास एवं समय की दस्तक ....कितने पाकिस्तान?

हिंदी के तमाम उपन्यासकारों की श्रेणी में युगचेता कथाकार कमलेश्‍वर का उपन्यास ’कितने पाकिस्तान’ समकालीन उपन्यास जगत में मील का पत्थर साबित हुआ है। इस उपन्यास ने हिंदी कथा साहित्य तथा साहित्यकारों को वैश्विक रूप प्रदान किया। विष्णु प्रभाकर के अनुसार "कमलेश्‍वर ने उपन्यास के बने बनाए ढाँचे को तोड़ कर लेखकीय अभिव्यक्ति के लिए दूर्लभ द्वार खोलकर एक नया रास्ता दिखाया।" इस रचना में लेखक ने इतिहास और भूगोल की सीमाओं को तोड़ने का प्रयास कर मनुष्य की वास्तविक समस्याओं एवं चिंताओं को सामने रखने का सफल प्रयास किया है। इस पुस्तक के प्रथम संस्करण की भूमिका में कमलेश्‍वर ने लिखा है कि ’मेरी दो मजबूरियाँ भी इसके लेखन से जुड़ी है। एक तो यह कि कोई नायक या महानायक सामने नहीं था, इसलिए मुझे समय को ही नायक, महानायक और खलनायक बनाना पड़ा।’ इस उपन्यास ने आज के टूटते मानवीय मूल्यों को सँजोने तथा दहशत की जिंदगी में मानवता की खोज की है।

       कमलेश्‍वर ने इतिहास की गहराई में जाकर तथ्यात्मक सामग्री एवं वर्क के आधार पर तटस्थता और निष्पक्ष रूप से बँटवारे की समस्या का हल ढूँढकर नवमानवता की कल्पना को साकार रूप प्रदान करने का प्रयास किया है। आज के दहशतवाद और पूँजीपतिवाद की दुनिया से नवमानवतावाद रूपी हीरे की तलाश की है जो केवल अपने चमक के बलबूते पर दुनिया को अचंभित करता है। 

       धर्म मनुष्य को सच्चाई एवं मानवता की राह दिखाता है। पर धर्म के ठेकेदारों ने धर्म की राह  को पूरी तरह बदलकर इसका प्रयोग स्वार्थ सिद्धि के लिए किया। इस संदर्भ में धर्म सच्चाई एवं मानवता का मार्गदर्शक न होकर कट्‍टरता एवं क्रुरता का प्रतीक बन गया। भारत का इतिहास गवाह है कि इस विशाल महाकाय देश का बँटवारा भी धर्म ने ही किया है। अगर इस धार्मिक कट्‍टरता को नहीं रोका गया तो पाकिस्तान बनने का सिलसिला यूँ हीं चलता रहेगा।

        ’कितने पाकिस्तान’ एक ऎसे समय की सच्ची दास्तान है जब धार्मिक उन्माद ने लाखों हिंदू-मुसलमान के खून की नदियाँ बहाई, उनके घर लूटे एवं जलाए गये तथा माँ-बहन एवं बहू-बेटियों के आबरू लूटे गए। ये जख्म इतने गहरे थे कि इसे न हिंदू भूल पाए न ही मुसलमान। पाँच हजार वर्ष की सभ्यता एवं संस्कृति को फिरंगियों तथा सौदागरों ने रेगिस्तान बना दिया एवं जाते-जाते भारत के सीने में विभाजित पाकिस्तान रूपी खंजर भी भोंक दिया। भारत में जो भी विदेशी आए भारतीय सभ्यता ने उनको आत्मसात किया। मुसलमान आए उन्हें अपना धरती पुत्र मानकर भरण-पोषण किया किंतु आगे चलकर वे शासक बन बैठे, इसे भी स्वीकार किया। इतिहास इस बात का गवाह है कि मुगल शासकों ने सत्ता के लोभ में अपने ही परिवार के लोगों का कत्लेआम किया। कमलेश्‍वर ने इसे आधार बनाकर बाबर से लेकर औरंगजेब के क्रूर काल को गवाह के रूप में उपस्थित कर उन मुर्दों को इंसानी समय के अदालत में पेश किया जिन्होंने भारतीय इतिहास और संस्कृति को एक नया मोड़ दिया। वस्तुतः हिंदू-मुस्लिम झगड़े की नींव बाबरी मस्जिद में छिपी थी। "बाबर बर्बर था! दरिन्दा था... उसने आते ही अयोध्या में हमारा रामजन्म भूमि मंदिर तोड़ा था और वहीं बाबरी मस्जिद बनबाई थी। पाकिस्तान बनना तो उसी दिन से शुरू हो गया।"(पृ.सं.६६)  कमलेश्‍वर ने इस बात को सामने लाने का प्रयास किया है कि हम बाबर को बड़ा गुनाहगार मानते है किंतु झगड़े का जड़ बाबर न होकर इब्राहिम लोदी था। इस झगड़े ने १९४७ तक आते-आते देश के अखंडत्व को खंडित कर दिया।

      कमलेश्‍वर ने इतिहास के उस समय का बयान लिया है जहाँ मानवता बार-बार कराह रही थी। अत्यंत बर्बरता एवं कट्‍टरता के साथ मानवता को सूली पर चढ़ा दिया गया। "औरगंजेब अगर अकबर के रास्ते पर चला होता तो आज हिंदुस्तान का ही नहीं दुनिया का नक्शा दूसरा होता और इस्लाम  विश्व धर्म की एक सर्वव्यापी शक्ति का अगुआ होता, लेकिन औरंगजेब यह नहीं कर पाया...।" (पृ.सं.१३३) बर्बर बादशाह औरंगजेब ने सत्ता के हवस में अपने पूरे परिवार को जीते जी सूली पर लटका दिया। दाराशिकोह जैसे मानवतावादी भाई को काफिर कहकर सिर धड़ से अलग कर दिया लेकिन दाराशिकोह फिर भी जनता के नजरों में जनराजा ही बना रहा। "हर समय ऎसे ही होते रहा है कि हर सदी में एक दाराशिकोह के साथ एक औरंगजेब भी पैदा होगा। इस दस्तूर को बदलना होगा, नहीं तो मेरे साथ-साथ तुम सबका भविष्य भी डूब जाएगा।.....अगर मैं मर गया तो तुम्हारे सारे सपने समाप्त हो जायेंगे।" (पृ.सं.२५२) कमलेश्‍वर ने इस बात पर चिंता व्यक्त किया है कि यदि हमनें इस सच्चाई के साथ झूठे दस्तूर को नहीं बदला तो कल हमारे अस्तित्व पर प्रश्न चिन्ह उपस्थित हो जाएगा, हमारा भविष्य अंधकारमय होगा। औरंगजेब ने जिसका सहारा लेकर सत्ता भोगी वही राह अंग्रेजों ने चुनी और हिंदू-मुसलमान को लड़वाते रहे।

       भूख और अपमान दुनिया के दो मूल दुख हैं लात पेट पर परे या पीठ पर चोट बराबर लगती है। वस्तुत: भूखा रखना भी एक राजनीति है घर में और घर के बाहर भी। यदि भर पेट भोजन मिले तो संभव है, मन मस्तिष्क स्वस्थ होकर अपनी सामाजिक स्थिति पर विचार करे। समता और क्षमता का प्रश्न उठ खड़ा हो। भारतीय जनमानस को कंगाल बनाकर अंग्रेजों ने भूख, जाति और नस्ल की राजनीति बखूबी खेली। अंग्रेज भिखारी की तरह आए और यहाँ की तमाम जनता को भिखारी बनाकर चले गए। जाते-जाते देश के दो टुकड़े भी कर गए। लेखक ने अंग्रेजों की इस मनोवृति पर करारा प्रहार किया है। "इन अंग्रेजों के बच्चों को सोचना चाहिए ... सदियों पहले सौदागर की तरह सलाम करते आए थे, वैसे ही सलाम करो और अपने मुल्क लौट जाओ पर.... जो कमा लिया वो तुम्हारी किस्मत ले जाओ पर... जो हमारा वो तो खुशी-खुशी छोड़ जाओ।" (पृ.सं.२८७)
        इस देश की विडंबना यह रही है कि माउंट बेटेन तथा उनके सहायकों ने जिस देश की सभ्यता, संस्कृति और इतिहास को न कभी देखा और न जाना तो देश का बँटवारा किस आधार पर किया।  "वर्ग तो बड़ा यथार्थ है ही पर जाति, लिंग, नस्ल और धर्म भी शोषण के भयावह हथियार रहे हैं।"(स्त्री-मुक्ति:साझा चूल्हा ; अनामिका ; पृ.सं.९) सच्चाई तो यह है कि अंग्रेज विभाजन चाहते थे। इस तथ्य से जिन्ना भी अवगत थे कि अंग्रेजों के चले जाने के बाद पाकिस्तान नहीं मिलेगा। इसलिए मजहब की नस्ल का बखूबी उपयोग कर नफरत का पाकिस्तान बना "वक्त गवाह है जिन्ना की नसों में बहता खालिस हिंदुस्तानी खून जम गया था और उन्होंने एकाएक महसूस किया था कि आपसी जिदों छोटे-छोटे अपमानों और प्रतिस्पर्धात्मक अहंकार से जन्मी खालिश कैसे एक चुनौती बन जाती है और वह कौम के सपनों को तोड़ कर जाती एक मुकाबले को छुपाते हुए, अपने तरफदारों को कैसे एक विकलांग और धर्मांध सपना सौंप देती है।" (पृ.सं.५६) वस्तुतः वे भूल चुके थे कि नफरत की बुनियाद पर कोई भी मुल्क अधिक दिनों तक नहीं टिकता। पाकिस्तान एक मजहबी उसूलों की मिसाल ही तो है। मजहब के नाम पर लुटा गया एक इलाका! जिस मुल्क कहा गया। मुल्क तो टूटेगा, टूटकर रहेगा और वही हुआ बांग्लादेश का जन्म! जिन्ना को कामयाबी मिली! विभाजन हुआ पर क्या मिला आम आदमी को, उनके नसीब में तो भीख माँगना ही लिखा था। विभाजन के बाद बचा क्या सिवाय भूखमरी एवं बेरोजगारी के? "यही तो दो हिस्सों में बँट गए। भिखमंगे कबीर की विरासत है और तकसीम हो गए मुल्कों का नसीब बँटवारे ने मानवता को दफन कर दिया। यह दफन की परंपरा औरंगजेब से आज तक हम सँजोये हुए हैं। बदले की भावना तीव्र से तीव्रतर होती गयी। मजहब की आग ने चिंगारी का रूप लेकर इंसानियत का हवन किया है। जब तक हम मजहब के नफरत को दफनाएँगे नहीं, तब तक मानवतावादी विश्व नहीं बनेगा।"(पृ.सं.२५८)  इनसान की पहचान मजहब के सहारे करने की इच्छा मनुष्य में बलवती हो रही है। इनसान और इनसान की कुदरती पहचान के बीच यह हिंदुस्तान और पाकिस्तान,सीरिया, लेबनान जैसे नाम कहाँ से आ जाते हैं? अब तक हमने कई आघात सहे हैं अगर इस नफरत की आग को अभी भी नहीं रोका गया तो अनेकानेक पाकिस्तान का जन्म होगा। विश्व के अधिकतर देशों में नफरत का एक पाकिस्तान बनाने की कोशिश जारी है! क्या हुआ बोस्निया में? क्या हुआ साइप्रस में? क्या हुआ तब के टूटे सोवियत युनियन में और अब के बने रशियन फेडरेशन में? क्या हो रहा है आज के अफगानिस्तान में? हर व्यक्ति नफरत के सहारे अपने ही लोगों के खिलाफ एक दूसरा पाकिस्तान को जन्म देने की तैयारी कर रहा है। विश्व का इतिहास इस बात का गवाह है कि पाकिस्तान से पाकिस्तान पैदा होता है। पता नहीं आज की मानवता किस दिशा में कदम बढ़ा रहा है। अपने ही लोगों के खिलाफ लड़कर सफलता के कौन से शिखर को छूना चाहता है! मजहब के सहारे नए देश का निर्माण की यह भूख वड़ा ही वीभत्स रूप लेगी। जब तक धर्म, जाति एवं नस्ल की सर्वोच्चता तथा विश्व शक्ति बनने का नशा नहीं टूटता तब तक दूसरा पाकिस्तान बनने का सिलसिला यूँ चलता रहेगा। परिणामस्वरूप वही होगा जो नागासाकी और हीरोशिमा में हुआ था। धर्म और सत्ता को सियासी कानून के लिए नफरत में बदला जाता है तो एक नहीं तमाम पाकिस्तान पैदा होते हैं। कमलेश्वर बार-बार यह कह रहे हैं कि अगर हमनें समय की दस्तक और मानवता की कराह को नहीं सुना तो बहुत महँगा पड़ सकता है। जितना जो कुछ टूट गया है उसे भूल जाँए जो बेहतर जो टूटने के बाद बचा है उसे टूटने से बचाएँ। देश इंसानियत के आधार पर बने न कि धर्म के आधार पर। जरूरत से ज्यादा इस दुनिया का बँटवारा हो चुका है अब और नहीं।

       विगत तिरसठ वर्षों का इतिहास गवाह है कि हिंदुस्तान में पाकिस्तान से ज्यादा मुसलमान हैं और पाकिस्तान से ज्यादा इस्लाम समझने वाले लोग हैं। हिंदुस्तान इन मुसलमानों को अपना धरती पुत्र मानकर सहेजे हुए है। इस देश ने धर्मनिरपेक्षता की नई संस्कृति का पाठ पूरे विश्व को सिखाया है। यहाँ की विविधता में एकता, सामयिक संस्कृति ने विश्व के सामने एक नया आदर्श उपस्थित किया है।

       कमलेश्‍वर ने बड़े ही कठोर शब्दों में अंग्रेजों के कूटनीति का भी पर्दाफाश किया है। अंग्रेजों ने व्यापार के साथ अपनी आत्मा को मुक्ति देने का झूठा नाटक किया। आत्मा मुक्ति का अभियान इन पांखडियों ने घोड़ों पर बारूद लादकर किया। वास्तव में ये तो आत्माओं को गुलाम करने निकले थे। इनके इसी हवस ने पुरातन सभ्याताओं को ध्वस्त किया। अगर इतिहास के पन्नों को खंगाला जाए तो बौद्ध धर्म भी भारत से निकलकर समस्त एशिया में फैला था लेकिन कहीं भी खून की एक बूंद तक नही गिरी। बौद्ध साधु घोड़ों पर चढ़कर बारूदी आक्रमण करने वाले योद्धा नहीं थे। वे हिमालय जैसा पर्वत पैदल पार कर चुके थे। उनके हाथ में भाले, तलवार और बंदूकें नहीं थीं। उनके पास था शांति, अहिंसा और करूणा का संदेश एंव हाथ में बौद्धि वृक्ष।

       कमलेश्‍वर ने वर्तमान में बढ़ता हुआ बाजार, मुक्त व्यापार के नाम पर नव साम्राज्यवाद की स्थापना पर भी गहरी चिंता व्यक्त किया है। भुमंडलीकरण के इस दौर में मानवता तो नदारद हो गयी है। विदेशी सौदागरों की जमात ने अपना साम्राज्य फैलाकर हिंदुस्तान को जकड़ लिया था, वे ही फिरंगी अब विश्व को अपने शिंकजे में लेना चाहते हैं। सभी को ज्ञात है कि बाजार के लिए ही साम्राज्य बनाए जाते हैं एवं बाजार की नाभि साम्राज्य से जुड़ी होती है। इस साम्राज्य का मुख्य आधार है बाजार ! बाजार! और बाजार!  वर्तमान दौर में इसका नाम बाजारवाद है। बाजारवाद के नाम पर फिर से नये जाल फैलाकर मानवता की आत्मा को गुलाम बनाया जा रहा है। क्या हुआ जापान के उस दो नगरों का जिनको अणु परीक्षण करके उड़ा दिया गया। आज भी हीरोशिमा की कराह सुनाई देती है। "मेरे ऊपर जो परमाणु बम गिराया था वह दुर्घटना नहीं युद्ध समाप्त करने के नाम पर सोचा समझा परीक्षण था। मानव जाति पर किया गया जघन्य आक्रमण.... अरे दरिंदो ! देखो मेरे इस क्षार-क्षार हुए शरीर को। नागासाकी के क्षत-विक्षत भूगोल को, माँ के कोख में विकलांग हो गई संतानों को, प्रचण्ड तापमान में पिघलकर वाष्प की तरह उड़ जाने वाले लाखों मनुष्यों को, जल-जलकर मुँह तक आकर न निकलने वाली मृत्यु की चीत्कारों की .... घुटती साँसों में दम तोड़ती बेबस उसाँसों को, हिचकी लेती हिचक-हिचक करती जिंदगी को, देखो मुझे मैं हीरोशिमा हूँ। मैंने खुद झेला है मानव विनाश के मृत्यु को। परमाणु नाभकीय संकट को जन्म देने वाले जितने अपराधी हैं, मैं उन्हें उनकी कब्रों में चैन से सोने नहीं दूँगा। वे सभी वैज्ञानिक चाहे फ्राँस के हो या जर्मनी, ब्रिटेन या रूस के वे मानवद्रोही और जघन्य अपराधी हैं इन्हें कब्रों मै चैन से सोने की ऎय्याशी बख्शी नहीं जा सकती।"(पृ.सं.३०५) भौतिक विकास के नाम पर काफी नुकसान किया जा रहा है। आज संसार की तमाम प्रयोगशालाओं में भीषणतम मौत का उत्पादन शुरू करने की होड़ लगी हुई है। सफल परीक्षण के बाद अब युद्ध में रत राजनीतिक सत्ताएँ मौत का थोक उत्पादन करना चाहती हैं। कुछ करना होगा नहीं तो ब्रह्मांड से पृथ्वी का नामोनिशान मिट जाएगा, क्योंकि, सृष्टि के नियमों के अनुसार जो जन्म लेता है वह मरता है, जो जिस काम के लिए बना है उसे वह पूरा कर जाता है, वैसे ही परमाणु बम जो बना रहें है वह शांति के लिए न होकर विध्वंस के लिए ही है, जितने भी बम बनेंगे वे सब के सब इस पृथ्वी को नेस्तानाबूद करने के लिए काफी हैं।

       अंत में यही कहा जा सकता है कि हम उस भयावह विभाजन को रोकने में कामयाब नहीं हो पाये पर अब हमें मजहब का, बाजार का, व्यापार का तथा परमाणु परीक्षण का नकाब पहनकर मौत का मंजर तैयार करने वालों को बेनकाब करना जरूरी है। भले ही देश का बँटवारा सरहद से हुआ है पर मानवता तथा नैतिकता को दुनिया की कोई भी सरहद विभाजित नहीं कर सकती। इसलिए मानवता तथा नैतिक मूल्यों का जतन करना आज की प्रमुख माँग है। जिससे मानवता एवं भाईचारे का बीज पुनः अंकुरित हो जाए। बौद्धिक विमर्श पर लिखा गया इस उपन्यास को आखिरकार कहीं रूकना तो था सो रूक गया पर मन का जिरह अभी भी जारी है। हालॉकि अच्छी पुस्तकें हर काल में सामने आती हैं, आती रहेंगी, इस पुस्तक के लिए यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि जिस मुकाम पर यह पहुँची है, वहाँ हमेशा बनी रहेगी। 

        

अर्पणा दीप्ति
समीक्षित कृति : कितने पाकिस्तान
लेखक  :  कमलेश्वर
 संस्करण-२००८
प्रकाशक: राजपाल एंड सन्ज,
कश्मीरी गेट नई दिल्ली-०६



सोमवार, 27 अगस्त 2012


आत्म सत्य का औपन्यासिक दस्तावेज : कस्तूरी कुडंल बसै

अर्पणा दीप्ति

हिंदी कथा-लेखन के क्षेत्र में जिन कतिपय महिला लेखिकाओं ने सर्वाधिक ख्याति अर्जित की है उनमें मैत्रेयी पुष्पा एक सम्मानित नाम है। १९९० में प्रकाशित ’स्मृति दंश’ तथा १९९३ में प्रकाशित ’बेतवा बहती रहे’ जैसे उपन्यासों के माध्यम से पुरुष वर्चस्व प्रधान समाज में अत्याचार झेलती स्त्री की करूण गाथा प्रस्तुत की तो १९९४ में ’इदन्नम्म’ में उस करूणा को जुझ और संघर्ष में बदलते हुए दिखाया। १९९७ में प्रकाशित ’चाक’ की नायिका सारंग नैनी शोषण और अत्याचार को चुनौती देने के लिए ग्रामीण राजनीति में प्रवेश करती है एवं ’झूलानट’ की शीलो विवाह संस्कार की निरर्थकता को समझकर अपनी नियति को बदलने वाली अद्‍भुत जिजीविषा संपन्न स्त्री है। २००० में प्रकाशित ’अल्मा कबूतरी’ में लेखिका ने सभ्य कहे जाने वाले असभ्य और बर्बर समाज का तल्ख चित्रण किया है। विजन, अगनपाखी और औपन्यासिक आत्मकथा ’कस्तूरी कुडंल बसै’ २००२ में पुरुष समाज की रूढ़ियों से तय की गई नियति के प्रति स्त्री का विद्रोह एक स्पष्ट विमर्श के रूप में उभरकर सामने आया है।

      जैसा कि इस उपन्यास के आवरण पर लिखा है ’हर आत्मकथा एक उपन्यास है और हर उपन्यास एक आत्मकथा।’ दोनों के बीच सामान्य सूत्र है ’फिक्शन’। जो तत्त्व किसी आत्मकथा को श्रेष्ठ बनाता है वह है उन अंतरंग और लगभग अनछुए अकथनीय प्रसंगों का अन्वेषण और स्वीकृति जो व्यक्ति की कहानी को विश्‍वसनीय और आत्मीय बनाते हैं। हिंदी साहित्य में महिला रचनाकारों की गिनी-चुनी आत्मकथाएँ ही सामने आई हैं। इन्हें पढ़ते हुए कबीर की उक्ति ’सीस उतारै भूंई धरै’ की याद आती है यह साहसिक तत्त्व ’कस्तूरी कुडंल बसै’ में दिखाई देती है। 

      ’कस्तूरी कुडंल बसै’ अपने लिए जगत बनाती विद्रोही स्त्री कस्तूरी के जीवन संघर्ष  की दास्तान है। पुरुष वर्चस्वीय सामाजिक बंधन में, स्वतंत्र और आत्मनिर्भर होने के प्रयास में स्त्री को किन-किन समस्याओं से गुजरना पड़ता है, स्त्री के इसी जद्‍दोजहद का आख्यान इस उपन्यास में प्राप्त होता है। कस्तूरी अभावग्रस्त ब्राह्मण परिवार की छोटी लड़की है। संग सोने और बैठने की शर्त पर जो खाने ओढ़ने का प्रबंध करता है, वह पति है। ऎसी रूढ़िगत मर्यादाओं के तहत कस्तूरी की मर्जी के खिलाफ उसकी शादी बूढ़े एवं बीमार हीरालाल से हो जाती है। पति के मौत पर रेशम कुँवर की तरह सती होने के बजाए वह ढ़ाई मील दूर इग्लास की पाठशाला में पढ़ने जाती है। डेढ़ साल की बच्ची को बूढ़े और अपाहिज ससुर को सौंपकर वह निडर अपनी राह बनाती है। इस निडर, बहादुर, दृढ़ संकल्पी माँ की बेटी के रूप में मैत्रेयी, इस उपन्यास में अपनी अलग भूमिका निभाती है।
      उपन्यास का आरंभिक वाक्य है- ’मैं ब्याह नहीं करूँगी’ सोलह वर्षीय लड़की कस्तूरी का यह वचन माँ के कानों पर धमाका मारता है। रात में अपनी चाची द्वारा पूछे जाने पर वह कहती है-"डर! डर ही तो लगता है ब्याह से बड़ा डर लगता है।" (पृ.सं.१०) ये दोनों वाक्य विवाह रूपी संस्था की संरचना में जो खोखलापन और खोट है, इसकी ओर इशारा करते हैं। अंतत: सामाजिक मान-मर्यादाओं के पालन, कुल परिवार की हिफाजत के लिए विवश होती कस्तूरी की शादी हीरालाल से होती है।

      ससुराल में मुँह दिखाई रस्म में औरतों से वह चिढ़ जाती है। एक बूढ़ी का कथन उसे आतंकित करता है-"ओ आठ सौ की घोड़ी, तू मुँह नहीं दिखाती तेरी यह मजाल! कस्तूरी सब कुछ समझ लेती है कि ब्याह के नाम पर जो खरीददारी चलती है, उसमें वह कैसे बिकाऊ चीज बन गई है। वह खरीदी गयी घोड़ी से ज्यादा कुछ नहीं, यह सोचते ही घोड़ी घूँघट नहीं मारा करती, झटके से घूँघट उतार फेंका। औरतें सन्न रह जाती हैं।"(पृ.सं.१७) औसत भारतीय स्त्री की भूमिका अदाकर अपने आपको गुलामी के बोझ तले दबाना वह पसंद नहीं करती। असल में रीति रिवाजों और आचार-व्यवहार के व्यवस्था के समर्थन में बेटियों को ’कंडीशनिंग’ करने में माँ रूपी ’सिस्टम’ का बड़ा हाथ है। 

      कस्तूरी औसत नारी के रूप में जीवनयापन करना नहीं चाहती। अपने पति की मृत्यु के पश्चात घर की सारी जिम्मेदारी कस्तूरी पर आ जाती है। ऎसे में एक जोखिम भरा निर्णय कस्तूरी के पढ़ाई का प्रण। "बिना घूँघट के बहू हाथ में किताब कापी भरा झोला"(पृ.सं.३०) लोग जो चाहे सोचे, कस्तूरी बेफिक्र है। आत्मविश्‍वास से भरा पूरा निर्णय। स्त्री मुक्ति के दौर में अपमान और शोषण के खिलाफ लड़ने के लिए लड़ैत और कठकरेज होना आवश्यक है। "नंगे पाँवो रास्ता नापती स्त्री की सारी दौलत किताब-कापियाँ हो गईं, जिन की झोली लटकाए वह सूरज और चंद्रमा के साथ समय की परिक्रमा करती रही और धरती के सारे दोषों से दूर होती जाती।"(पृ.सं.३२)

      पितृसत्तात्मक समाज की स्त्री के प्रति जो अनीतियाँ हो रही हैं, उसकी शिकार रही कस्तूरी उनके विरोध की शक्ति अर्जित करती है उसके लिए शिक्षा ही एकमात्र उपाय रहा। अपने पैरों पर खड़े होने की अदम्य आकांक्षा उसे अब मुसीबतों को झेलने के लिए सुसज्जित करती है। आत्मनिर्भर होने का यह निर्णय उसके परिवार की भलाई पर लक्षित है। अति संकटपूर्ण रास्ते से वह अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए कटिबद्ध है। "यह राँड क्या हुई, साँड हो गई। न बच्ची पर ममता न बूढ़े ससुर का रहम। पढ़ाई-लिखाई का भजन करती हुई दोनों को रौंद रही है।"(मिथिला की लोकोक्ति का अनुवाद) यह गाँव की स्त्रियों की प्रतिक्रिया है। लेकिन पढ़लिखकर जब वह नौकरी पा जाती है तो उनकी नजर में देवी बन जाती है।

     ’कस्तूरी कुडंल बसै’ की आरंभिक टिप्पणी में लेखिका कहती है, "यह हमारी कहानी है। मेरी और मेरी माँ की। आपसी प्रेम, घृणा, लगाव और दुराव की अनुभूतियों से रची कथा में बहुत सी बातें ऎसी हैं जो मेरे जन्म के पहले घटित हो चुकी थी, मगर उन बातों को टुकड़े-टुकड़े में माताजी ने जब तब बता डाला इसकी फलश्रुति स्वरूप यह उपन्यास पाठकों के सामने है।" कस्तूरी और मैत्रेयी के बीच के संबंधों में जो कुछ घटित होता है, उसके द्वारा जो कथा-विस्तार संभव होता है, असल में स्त्री अस्मिता के तहत होनेवाली आकांक्षाओं और संवेदनाओं का आख्यान है यह। ’कस्तूरी कुडंल बसै’ एक कठकरेज लुगाई के रूप में बेरंग कपड़े, उजरा सूना चेहरा, नंगे बूचे हाथ, बैरोनक खुरदरे पाँव कस्तूरी का यह रूप दरसल में स्त्री के साज शृंगार के खिलाफ एक मुहिम है। "सुख पति के जमाने में क्यों नहीं था ? इस सवाल से कस्तूरी अक्सर जुझने लगती है। स्त्री के जीवन में बचपन से लेकर म्रुत्युपर्यंत पुरुष का साया ही सुख माना जाता है जबकि उसको कभी सुरक्षा तक महसूस नहीं हुई।" (पृ.सं.३५) क्या ये मान्यताएँ कस्तूरी के संदर्भ में झुठी थी या फिर मान्यता केवल मानने भर तक ही सीमित थी?

      कस्तूरी स्त्री संघर्ष का जो बीड़ा उठाते है उसे कहीं अंजाम पर पहुँचा देने में वह सफल होती है। उसे अपनी बेटी पर बड़ी आशा-अभिलाषाएँ थी- वह स्त्री के सशक्तिकरण की मशाल अपने हाथ में ले लेगी। लेकिन यह गलत साबित हुआ। बी.ए. में पढ़ने वाली मैत्रेयी माँ से कहती है-"माताजी मेरी शादी करा दो।"(पृ.सं.५८) कस्तूरी के सारे सपने, संकल्प टूट जाते हैं। कस्तूरी चाहती है कि उसकी बेटी पढ़ लिखकर स्वावलंबी बने। पुरुष सत्तात्मक समाज के दकियानूस आचार-विचारों के खिलाफ लड़ती कस्तूरी बेटी की परवरिश में असफल हो जाती है। "कस्तूरी के जीवन में बहुत शोरगुल मचे हैं, मगर ऎसा हंगामा कभी हुआ नहीं। तब भी नहीं हुआ जब वह विवाह के योग्य लड़की थी और घरवालों ने उसे दो पीतल के कलशों के तरह ही बेच दिया था, कलशे बनिया को कस्तूरी आदमी को। इसके बाद भी नहीं, जब मुँह दिखाई के समय औरतों ने उसे आठ सौ में खरीदी घोड़ी कहा था। उस दिन भी नहीं जब बीस दिन जीकर उसका बेटा मर गया था और उस रात को पति उसी घर में पर स्त्री के संग.... तब भी नहीं जब पति का स्वर्गवास हो गया और तब भी नहीं जब भाई दिलासा देने की जगह लूट मचाने लगा। इतनी  इतनी विपदाएँ टूटीं वह न दहलीं न हिलीं। फिर आज क्या हुआ? क्या उनके जीवन में मैत्रेयी ही सबसे बड़ा स्थान पा गई है?"(पृ.सं.११४) बढ़ती उम्र में बेटी के लिए माँ की ओर से जो कुछ शारीरिक और मानसिक विकास के लिए आवश्यक है, वह सब ढ़ोने में कस्तूरी पराजित हो जाती है। वह अपने जीवन संघर्ष में यह भूल जाती है कि स्त्री के रूप में एक ’करेक्टर कोड’ जो माताएँ अपनी बेटियों को बचपन से देती आ रही है, वह चाहे गलत हो या सही उसे देने में कस्तूरी पिछड़ती रही।

      मैत्रेयी के व्यक्तित्व निर्माण में माँ के रूप में कस्तूरी का रोल कहाँ तक सही रहा, यह सोचने का विषय है। बचपन से ही माँ की ममता और प्यार से मैत्रेयी वंचित रही। पढ़ाई-लिखाई में उसकी रूचि नहीं रही। ग्रामीण परिवेश में अनियंत्रित और बेसहारा मैत्रेयी के लिए जीवन संघर्षपूर्ण रहा। माँ अपनी तरह बेटी अपनी तरह। मैत्रेयी के लिए बड़ी समस्या यह रही कि वह लड़की है। कस्तूरी ने जिस जगह में रहकर मैत्रेयी के लिए पढ़ने का इन्तजाम किया वहाँ उसका अपना कोई नहीं था। इस स्थिति में उसका बिगड़ जाना स्वाभाविक था। बचपन से वह जिन पुरुषों के संपर्क में आई, इन सबने उसका शोषण किया। साइकिल वाला जगदीश से लेकर डी.बी. कॉलेज के प्रिन्सिपल तक। इसी परिवेश में मैत्रेयी माँ से अपनी शादी की अपील करती है।

      बेटी के लिए वर की तलाश में निकली कस्तूरी के सम्मुख बहुत सारी मुसीबतें खड़ी होती है। पहले ही हमारा समाज ब्याह जैसे सामाजिक रस्मों के प्रति सामंती मूल्य मर्यादाओं का पक्षपाती है। लेकिन मैत्रेयी के प्रसंग में माँ कस्तूरी प्रगतिशील विचारधारा की स्त्री है। वह ग्रह, कुंडली तथा खानदान के बदले लड़के की डिग्री और पेशे के बल पर शादी करा देना चाहती है। किंतु एक विधवा होने के नाते और अपने नये विचारों के नाते कस्तूरी को जगह-जगह अपमानित होना पड़ता है। इंजीनियर अयोध्या प्रसाद के साथ शादी तय होती है किंतु मैत्रेयी के स्वस्थ विचार पर वह रिश्ता टूट जाता है। और अंत में डाक्टर के साथ शादी हो जाती है। लेकिन यहाँ विडंबना यह है कि लड़की को देखे बिना डाक्टर ब्याह के लिए हाँ कर देता है दहेज के बारे में वह बेफिक्र है। क्योंकि मैत्रेयी इकलौती बेटी है, यह उसको पता है। यहाँ शोषण का तरीका बिल्‍कुल साफ है, किंतु सलीके से किया जाता है।

      उपन्यास के आरंभ में कहा गया है कि हम माँ बेटी की कहानी है। किंतु इसमें माँ और बेटी का चरित्र बिल्कुल अलग है। जहाँ माँ एक तरफ स्त्री की स्वतंत्रता और अस्मिता की मुहिम चलाती रही है तो वहीं दूसरी ओर बेटी इसके विपरीत विवाह संस्था की सुरक्षा में आकर्षित होकर पूर्णता और आत्मविस्तार की कामना करती है। माँ की ममता और प्यार की अभाव में बचपन से पलती आयी मैत्रेयी का पुरुषों से कोई परहेज नहीं रहा। उनके लिए जीवन की सारी चेतना और विद्रोह प्रेम एवं देह संबंधों के इर्द-गिर्द घूमता रहा। कहीं अन्यत्र लेखिका कहतीं हैं "श्‍लीलता की रक्षा के लिए मैं जिंदगी तबाह कर दूँ, ऎसा दबाब मानने से मैं इनकार करती हूँ" (सुनो मालिक सुनो, लक्ष्मण रेखा की चुनौतियाँ, पृ.१) 

        ’कस्तूरी कुंडल बसै’ स्त्री पक्षधरता के उपान्यासों में ऊँचा स्थान अलंकृत करता है। स्वतंत्रता, समता, स्वत्वानवेषण और स्वालंबन की जो चर्चा स्त्री मुक्ति आंदोलन के प्रसंग में जोरों पर हो रही है उस वैचारिक मुद्‍दो को अपनी नायिका के जीवन संघर्षों के माध्यम से उजागर करने में मैत्रेयी पुष्पा पूर्णतः सफल रहीं हैं। दो पीढ़ियों  के विचार, मूल्य संकल्पनाएँ, धर्म, जाति, कुलसंप्रदाय आदि धारणाएँ इस उपन्यास में सर्वत्र बिखरी पड़ी हैं।  स्त्री की शक्ति उसके अपने अंदर ही छिपी हुई होती है जैसे कस्तूरी मृग के नाभि में। किंतु इस शक्ति को पहचाने बिना जीवन में जो कुछ घटित होता है उसे नियति मानकर गुलाम की जिंदगी नारी के लिए अभिशाप है। जागो, शक्ति संभालो और जीवन जियो स्त्री के लिए मैत्रेयी का यही संदेश है।





        

शनिवार, 18 अगस्त 2012

उपन्यासों में स्त्री विमर्श


लज्जा

अर्पणा दीप्ति

'लज्जा' नारीवादी लेखिका 'तस्लीमा नसरीन' का बहुचर्चित विवादास्पद उपन्यास है। इस उपन्यास के प्रकाशन से न केवल बांग्लादेश में हलचल मची बल्कि भारत में काफी उफान उठा। सीमापार (भारत) के लोगों ने जहाँ इस उपन्यास को सिर माथे से लगाया वहीं बांग्लादेशी कट्‍टरवादी सांप्रदायिक ताकतों (कठमुल्लाओं) ने लेखिका के विरूद्ध फतवा जारी करके सजा-ए-मौत मुकर्रर कर दी। कारण यह है कि उपन्यास बांग्लादेशी हिंदू विरोधी मानसिकता तथा सांप्रदायिकता पर कठोर प्रहार करता है, एवं वहाँ के नरक का लोमहर्षक चित्रण करता है जो वहाँ रहने वाले हिंदूओं की नियति बन चुका है।
       वस्तुत: 'लज्जा' को पढ़ना दुधारी तलवार पर चलने जैसा है। लज्जा जहाँ एक ओर मुस्लिम सांप्रदायिकता को बेनकाब करती है वहीं हिंदू सांप्रदायिकतावादी ताकतों की भी बखिया उधेड़ती हुई नजर आती है।

       'लज्जा' की शुरूआत ६ दिसंबर १९९२ को भारत में कारसेवकों द्वारा अयोध्या स्थित बाबरी मस्जिद का ढ़ाँचा गिराए जाने एवं बांग्लादेशी मुसलमानों की आक्रामक प्रतिक्रिया से होती है।

        उपन्यास की कथावस्तु सुरंजन तथा माया के इर्द-गिर्द घूमती है। सुरंजन हिंदू परिवार से है तथा मुसलमान लड़की परवीना से प्रेम करता है। लेकिन दोनों के बीच मजहब दीवार बनकर खड़ा हो जाता है एवं सुरंजन को अपने प्यार से हाथ धोना पड़ता है। माया सुरंजन की बहन है जिसका दंगाईयों द्वारा अपहरण कर लिया जाता है। सुरंजन के माता-पिता (किरणमयी तथा सुधामय) अपनी बेटी माया तथा बेटे सुरंजन से बहुत प्यार करते हैं। माया की तलाश में कथावस्तु आगे बढ़ती है। एक दस बर्षीय बच्ची मादल को देखकर किरणमयी सोचती है "काश उसकी बेटी भी दस बरस की होती तो दंगाई उसे उठा न ले जाते।"(पृ.सं १२६) सुरंजन सोचता है, "वे लोग माया को क्यों उठा कर ले गए? माया हिंदू है इसलिए? और कितने बलात्कार, कितने खून, कितनी धन-संपदा के बदले हिंदूओं को उस देश में जिंदा रहना पड़ेगा; कछुवे की तरह सिर गड़ाए। कितने दिन तक? (पृ.सं. १२६) सुरंजन अपने आप से इस प्रश्न का जबाव चाहता है लेकिन उसे जबाव मिल नहीं पाता।

        सुरंजन का मित्र हैदर माया की तलाश जारी रखने से इसलिए मना कर देता है, क्योंकि वह अवामी लीग का सदस्य है तथा अपने हिंदू मित्र की मदद उसकी तरक्की के राह में रोड़े अटका सकती है। कोई भी समाज या राष्ट्र किसी व्यक्ति विशेष का देन नहीं हो सकता ठीक उसी प्रकार बांग्लादेश का उदभव भी वहाँ के नागरिकों का सामूहिक प्रयास था- "बांग्लादेश का निर्माण यूँ ही नहीं हो गया हिंदू, बौद्ध, क्रिश्चियन, मुसलमान सभी का इसमें समान त्याग है, लेकिन किसी एक धर्म को राष्ट्रधर्म घोषित करने का अर्थ होता है दूसरे व्यक्ति के मन में अलगाववाद को जन्म देना।"(पृ.सं.११२)  इसका पुख्ता प्रमाण इन बातों से मिलता है जब माया स्कूली बच्चों से तंग आकर अपने भाई सुरंजन से कहती है "अब मैं हिंदू नहीं रहूँगी वे मुझे हिंदू कहकर चिढ़ाते हैं।" प्रति उत्तर में पिता सुधामय कहते हैं-"तुम हिंदू हो किसने कहा? तुम मनुष्य हो मनुष्य से बड़ा इस दुनिया में कोई नहीं।"(पृ.सं.१०२) वस्तुत: धर्म का राजनैतिक इस्तेमाल पाकिस्तान बनने के साथ ही शुरु हो चुका था लेकिन वही धर्म का बंधन पाकिस्तान को एक नहीं रख सका। यह भी अक्षरश: सत्य है कि बांग्ला-मुक्ति संग्राम धर्म निरपेक्ष संघर्ष था लेकिन धर्मनिरपेक्षता का यह सिद्धांत स्वातंत्र्य बांग्लादेश में ज्यादा समय तक टिक नहीं पाया तथा पाकिस्तान का अनुसरण करते हुए बांग्लादेश को भी मुस्लिम राष्ट्र बनाने पर जोर दिया गया।

        ये वही सुधामय थे जिन्होंने चौंसठ में अयूबशाही के विरूद्ध नारा लगाया था "पूर्वी पाकिस्तान डटकर खड़े होओ।" (पृ.सं. १०२) लेकिन बदले में देश से उन्हें क्या मिला? किरणमयी ने पचहत्तर के बाद सिंदूर लगाना छोड़ दिया तथा सुधामय ने धोती पहनना छोड़ दिया। बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद स्थिति और भी बद से बदतर होती गयी एवं वहाँ के हिंदूओं ने यह मान लिया की उनकी नियति में अब अपमान तथा आँसूओं के सैलाब के सिवा कुछ भी नहीं है। "हिंदूओं का बलात्कार के लिए अब किसी गली कुचे में जाने की जरूरत नहीं पड़ती वह खुलेआम किया जा सकता है।"(पृ.सं. १४५)
        
        स्त्री विमर्श की दृष्टिकोण से उपन्यास की पात्र किरणमयी का चरित्र एक परंपरागत स्त्री का है जिसे अपने पति ने भी कम दुख नहीं दिए। उसे पुजा करने तथा गाना गाने का शौक था लेकिन सुधामय ने साफ शब्दों में कह दिया था इस घर में यह सब नहीं चलेगा। "इक्कीस बर्षों से वे किरणमयी के सतीत्व का पहरा भर देते रहे। उन्हें क्या जरूरत थी अपनी पत्नी के सतीत्व का उपभोग करने की?"(पृ.सं.१३०) 

        प्राय: युद्ध तथा दंगों की आखिरी शिकार औरतें ही होती हैं। अपनी बहन माया के प्रतिशोध का बदला लेने के लिए सुरंजन एक मुस्लिम वेश्या शमीमा को घर ले आता है। सुरंजन की आँखों के सामने चलचित्र की भाँति दृश्य उभरने लगता है किस प्रकार दरिन्दों ने माया का बलात्कार पशुवत किया होगा। शमीमा के साथ वह उसी क्रुरता से पेश आता है। "शमीमा के गले की खरोंच से खून निकल रहा है। कातर दृष्टि से शमीमा कहती है दस ही रुपया दे दीजिए सुरंजन पहले उसे फटकार लगाता है लेकिन अंतत: उसे दया आ जाती है दरिद्र लड़की पेट की आग बुझाने के लिए शरीर बेचती है। पैसों से एक मुट्ठी भात तो खा लेगी पता नहीं कितने दिनो से भूखी होगी।"(पृ.सं.१६४)

        उपन्यास का अंत हताशा से भरा है। सुरंजन सुधामय से कहता है हम भारत जाएँगे। सुधामय सुरंजन को फटकार लगाता है "अपना देश छोड़कर भागने में लज्जा नहीं आती है? देश! देश को धोकर पानी पीयेंगे पिताजी? देश ने आपको क्या दिया है? क्या दिया है? क्या दे रहा है मुझे? माया को क्या दिया है आपके देश ने? माँ को क्यों रोना पड़ता है? आपको क्यों रात-रात भर कराहना पड़ता है? मुझे क्यों नींद नहीं आती है?"(पृ.सं. १७३) यह हताशा सुरंजन तथा उसके देशभक्त पिता सुधामय की ही नहीं बल्कि संपूर्ण मानवता की हताशा है।

        इस उपन्यास को पढ़ने पर मन में बार-बार एक प्रश्न उठता है आखिर कब तक धर्म और राजनीति का अनुचित समिश्रण होता रहेगा। धार्मिक बर्बरता का शिकार आखिर कब तक लाखों-कड़ोरों निसहाय एवं निरपराध लोग बनते रहेंगे। मानवता के लिए इससे बड़ी लज्जा और क्या हो सकती है। क्यों इस उपमहाद्वीप की आत्मा एक नहीं है? हमें एक दूसरे की भावनाओं का ख्याल रखते हुए प्रेम तथा सौहाद्र्पूर्ण समाज की रचना करनी होगी जिसमें सभी संप्रदाय के लोग शांति एवं सम्मानपूर्वक जी सकें।

रविवार, 29 अप्रैल 2012

रविवार, 29 जनवरी 2012