रविवार, 20 दिसंबर 2015

आखिर कब तक ???........



आज रविवार( 20 दिसंबर ) को  16 दिसंबर 2012 के निर्भया कांड का एक आरोपी जुबेनाइल होने के आधार छूट जायेगा. आम्बेडकर यूनिवर्सिटी , दिल्ली की शोधछात्रा ज्योति इस घटना को स्त्री के खिलाफ एक परिघटना मान रही हैं . साहित्य और समाज में घटित उद्धरणों से वे स्त्री की पीड़ा को समझने -समझाने की कोशिश कर रही हैं . सच है कि इस वीभत्स बलात्कार काण्ड के सबसे क्रूर आरोपी को जुबेनाइल होने के आधार पर मिली  छूट  से बन रहे आक्रोश और जुबेनाइल क़ानून में निहित मानवाधिकार का एक द्वंद्व तो है ही.  इस बीच एक अच्छी बात हुई कि अब तक जिस पीडिता का नाम छिपाया जा रहा था , काल्पनिक  निर्भया नाम से पुकारा जा रहा था , उसका नाम उसकी माँ ने सार्वजनिक किया , वह ज्योति सिंह थी. नाम छिपाने की परम्परा भी स्त्री विरोधी है , जो यौन हिंसा की शिकार स्त्री के ' इज्जत खो देने' की सोच से बनी थी , जिसका अर्थ होता है कि पीडिता ही अपराधी है. पीडिता को पीडिता मानने और नाम छिपाने की परम्परा को हतोत्साहित किया ही जाना चाहिए. 

                                                                                                                                         






16 दिसम्बर को निर्भया को नम आंखों से श्रद्धांजलि दी गई। प्रश्न  यह है कि2012 की रात बसंत विहार क्षेत्र में  हैवानियत की शिकार बनी निर्भया के साथ न्याय हुआ? उसका आरोपी तो नाबालिग होने के कारण बाहर आर हा है।तीन वर्ष पूरे हो  गए और लगता है जैसे कल की ही बात है, क्योंकि इस घटना को भूलने कामतलब ही नहीं बनता।भूला वही जाता है, जो एक बार हो लेकिन यह सिलसिला तो कभी थमा ही नहीं। हर रोज़ अखबारों में यह खबर मिल ही जाती है कि आज फिर किसी निर्भया को किसी दरिंदे ने अपनी हवस का शिकार बनाया। आंखों के सामने वे सारी तस्वीरें आ जाती हैं और यही प्रश्न करती है कि कब तक हमारी तस्वीरों के सामने मोमबत्तियां जलाई जाएंगी? कब तक बंद करो , बंद करो का नारा लगाते हुए लोग जंतर-मंतर पर इकट्ठा होंगे? कब तक न्याय की गुहारल गाई जाएगी? सब चुप हैं। इमराना, अरुणा, निर्भया सब पूछ रही हैं क्यों चुप हैं सब?

निर्भया की मां नेअपनी दिवंगत हो चुकी बेटी को याद करते हुए कहा ‘‘दुनिया भर में मेरी बच्ची को 16 दिसम्बर को श्रद्धांजलि दी गई । हालात बदलनी चाहिए।अपनी बिटिया की फोटों के आगे खड़े होने पर एक अपराध-बोध होता है कि तीन सालों के बाद भी इंसाफ अधूरा है। जिस दरिंदे ने बेटी को सबसे अधिक दर्द दिया, वह महज नाबालिग होने के चलते बाहर आ जाएगा।उसे सजा मिलती तो सही मायने में इंसाफ होता". पिता बद्रीनाथ ने कहा "हर दिन नाबालिग की रिहाई की बातें सुनकर डर लग रहा है कि आखिर क्या सच में कानून उसकी उम्र के चलते उसकी गुनाह की सजा नहीं दे पाएगा।’’1







इतनी दरिंदगी से अपने काम को अंजाम देने वाले मुजरिम को सिर्फ और सिर्फ जुबेनाइल के आधर पर छोड़ा जा रहा है।जुबेनाइल यानी जो सेक्सुअली अपरिपक्व हो।सोचने वाली बात यह है कि अपरिपक्व स्थिति में इस दरिंदे ने एक लड़की की इतनी दर्दनाक हालत कर दी , दस पन्द्रह साल बाद स्थिति क्या होगी सोचकर बदन सिहर उठता है।इतनी घिनौनी हरकत करने पर मुजरिम को जुबेनाइल के आधार पर छोड़ा जा रहा है। धन्य है हमारी न्याय व्यवस्था! अरुणा को बेदर्दी से बलात्कार कर मौत के घाट उतारने की कोशिश  की गई।बयालिस वर्ष वह कोमा में रही । घर परिवारवालों ने भी उसका साथ छोड़ दिया और उसका आरोपी महज सात साल की सजा काटकर छूट गया।क्या कुछ अपराध के लिए तयसुदा सजा के मानदण्ड बदलने की जरूरत नहीं है? निर्भया के साथ भी यही हो रहा है।उसके माता-पिता सरकार से , कानून से न्याय की मांग कर रहे हैं।आरोपी को ऐसी सजा मिले कि इस तरह का काण्ड करने की सोचने पर भी दरिंदा सिहर जाए।अगर ऐसा ही न्याय होता रहा जैसा कि हो रहा है तो फिर बंद कीजिए लड़कियों का बाहर निकलना क्योंकि जब वह सुरक्षित ही नहीं तो सब व्यर्थ है।







हर गली हर नुक्कड़ परआंखों में हवस लिए शिकारी ताक में बैठा हुआ है।स्कूल जाती, कालेज जाती,काम पर निकली लड़की के घर से निकलने का समय तय है लेकिन वह कितनी सुरक्षित लौटेगी यह तय नहीं। यह ऐसा छिपा हुआ राक्षस है, जो दिखाई नहीं देता।जिसके दंश औरत जाति के शरीरको कब लहूलुहानकर दे, कोई पता नहीं। नमिता सिंह ने इसलिए लिखा है ‘‘छिन्नमस्ता की प्रिया अकेली नहीं जो भाई के हवस का शिकार होती है या सोना चौधरी के ‘पायदान’ की आंचल जो गांव में बैठक के कमरे में रोज रात कोअपने भाई या उसके दोस्तों के हाथों कुचली जाती है।किसके पास रोते हुए जाए वह बच्ची , इमराना या रानी‐‐‐या कोईऔर‐‐‐।’’2 इस यातना से उबारने वाला कोई नहीं जिसका हाथ सिर पर सुरक्षा के लिए होनाचाहिए वही औरत से उसका औरतपन छीन लेना चाहता है।

अतः हम कह सकते हैं कि समय बदला, सत्ता बदली,सोंच बदली पर औरत की स्थिति अभी भी नहीं बदली।सचमुच वह पीड़ा भोगने के लिए अभिशप्त  है। यह सब देखकर तो यही लगता है कि जैसे हर तरफ पुरुष की चीत्कार है, हाहाकार है , जैसे वह चुनौतिपूर्ण शब्दों में  कह रहा हो कहां तक भागोगी समाज हमारा ,सत्ता हमारी है।किसी न किसी रूप में तुम भोगने ,सहने , पीडि़त होने के लिए अभिशप्त हो। प्रभा खेतान ने इसी सच की अभिव्यक्ति करते हुए लिखा ‘‘छिः मुझे नफरत है इस पुरुष  जाति से।नफरत है उससे जो मासूम, छोटी, नादान लड़की को भी नहीं छोड़ता‐‐‐क्या समाज स्त्री की रक्षा करता है? क्या पुरुष  की कामुक हवस का शिकार होने से मासूम लड़कियां बच पाती हैं?’’3 सचमुच स्त्री का लेखन उसके अनुभूति की सच्ची अभिव्यक्ति होती है।अनुभूति की सच्ची अभिव्यक्ति जब होती है तो वह रोम-रोमको झकझोर देती है।


निर्भया, अरुणा, इमराना, रानी‐‐‐ जाने कितनी ऐसी हैंजो जिनकी आत्मा न्याय का इंतजार कर रही हैं।जब तक इनके साथ न्याय नहीं होगा तब तक ये हर औरत में जिंदा रहेंगी। हमारे यहां इंसाफ और न्याय की हालत देखकर तो यही कहा जा सकता है कि ‘सुनो तुम चाहे जिसे चुनो मगर इसे नहीं इसे बदलो।’ हर बलात्कार पीडि़ता के माता-पिता इसी आस में जिंदगी काट रहे हैं कि कब उनकी मृतक बेटी को इंसाफ मिलेगा और हमारा कानून सिर्फ जुबेनाइल के आधार पर आरोपी को छोड़ रहा है।इसकी समीक्षा करने की जरूरत है। खासकर जब अपराध हत्या और बलात्कार जैसे जघन्य अपराध से जुड़ा हो।आकड़े बताते हैं कि निर्भयाकाण्ड के बाद फैले असंतोष और सामाजिक क्रांति के बाद भी कुछ नहीं बदला।


संदर्भ सूची-
1संपादक-ओमथानवी ,जनसत्ता, 17 दिसम्बर,2015 , पृ0सं0-3
2 सिंह नमिता- ‘कुचला जाता हर रोज आंचल’, संपादक-महेन्द्र मोहन गुप्ता, दैनिक जागरण, कसौटी अंक-2सिम्बर-2005, जमशेदपुर, पृ0सं0-1
3 खेतानप्रभा-छिन्नमस्ता, पहला संस्करण-199,एदूसरीआवृत्ति- 2004, राजकमलप्रकाशनप्रा0 लि0, नई दिल्ली-110002, पृ0 सं0-119

सोमवार, 7 दिसंबर 2015

बोझ नहीं आशीर्वाद दाता हैं बुजूर्ग

                                                                                                                                                          
                                                                                                               -अर्पणादीप्ति
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
मानवीय शरीर की क्षीण काया भी परिवार की मजबूत नींव के रूप में स्थान रखती है। जिस प्रकार एक पुरानी एवं मजबूत नींव मकान की विशालता का सबूत देती है। ठीक उसी तरह परिवार के वृद्धजन उस परिवार की संगठन शक्ति का उदाहरण होते है। जिन परिवारों में वृद्धों का आशीर्वाद बना रहता है, उन परिवारों की संपन्नता और सुख शांति अनुशासन की कहानी कहती दिखाई पड़ती है। परिवार के बुजुर्गों को बोझ मानने वाले अपने जीवन का  रसास्वादन सही रूप में नहीं कर पाते है। बुजुर्गों का अनुभव और उनकी संघर्ष यात्रा ही वह ताकत है, जिसके बल पर एक परिवार बुलंदी पर पहुंच सकता है। फिर वह परिवार रतन टाटा का हो या बिड़ला का, परिवार का मुखिया ही वह मार्ग दिखाता रहता है, जहां ऐश्वर्य के साथ आनंद की प्राप्ति होती रही है। वृद्धावस्था के प्रति उपेक्षा, अवमानना एवं घृणा का भाव पाश्विक सभ्यता का ही परिचायक हो सकता है। यह बात हमेशा ध्यान में रखनी होगी कि परिवार के वृद्धजन अनदेखी की श्रेणी में नहीं आते है। बल्कि वे अनुभव की भट्ठी में तपकर सही मार्ग दिखाते हैं । वे व्यापक व्यवहारिक प्रशिक्षण के बल पर परिवार के सबसे ज्यादा हितकर सदस्य होते है।
                             किसी भी परिवार में वृद्धों की अवहेलना या उनकी अनदेखी करना इस बात का प्रतीक है, उनकी संतानों ने शालीनता और मर्यादा का पाठ सही ढँग से नहीं पढ़ा है। बीमार वृद्ध माता-पिता अथवा किसी भी रिश्तेदारी से संबंध रखने वाले सदस्य की सेवा का अवसर उन्हें ही मिल पाता है, जो वास्तव में इसके हकदार होते है। इसे ऐसे भी कहा जा सकता है कि परिवारों में वृद्धों की छाया होना पुत्र पुत्रियों के लिए बड़ा ही  सौभाग्य सूचक होता है। इस दर्द को वे ही समझ सकते हैं , जिनके माता-पिता का साया समय से पहले ही उठ गया हो। जिन माता पिता ने जन्म से लेकर आत्म निर्भर होने तक प्रौढ़ता प्राप्त करने तक बच्चों का पालन पोषण किया, प्रशिक्षण एवं शिक्षा की व्यवस्था की, उन्हें सुरक्षा कवच प्रदान किया, मार्गदर्शन दिया, कदम कदम पर सहायक के रूप में खड़े होकर संबल प्रदान किया, उनके प्रति बच्चों के मन में कृतज्ञता का पैदा न होना यही सिद्ध करता है कि वे मनुष्यता के महान गुण से वंचित रह गये है। ऐसे लोगों को  अपने बच्चों से भी सेवा सुश्रूषा की उम्मीद नहीं करनी चाहिए, क्योंकि यह संसार का नियम है कि आप जैसा बीजारोपण करेंगे वृक्ष वैसा ही फल प्रदान करेगा।
     हमारी भारतीय संस्कृति और परंपरा में हमें ऐसी जवाबदारी का अहसास भी कराया गया है, जो पितृ ऋण से संबंध रखती है। ऐसा माना जाता है कि वृद्धावस्था में माता पिता की सेवा सुश्रूषा करने वाला पुत्र अपने पितृ ऋण से मुक्त तो होता ही है। साथ ही अपने लिए वृद्धावस्था की स्थिति में फिक्स्ड डिपाजिट की तरह कुछ धन भी जमा कर लेता है। यही कारण है कि उसका पुत्र भी अपने पिता के व्यवहार से माता पिता के प्रति संवेदना का भाव सहज ही सीख लेता है। आज दूषित और बदली हुई परिस्थितियों में लोग असभ्यता के उफान जैसे चक्रवात में फंसकर घर के अतिविशिष्ट सम्माननीय वृद्धों को अपनी रंगीन जीवनचर्या के बीच भार मानने लगे है। उनके लिए भरण पोषण की व्यवस्था को बड़ा उपकार समझ रहे है, उनके सुख दुख को, भावनात्मक उतार चढ़ाव को समझने की जरूरत महसूस नहीं कर रहे है, वे यह मान ले कि उनके द्वारा सामाजिक जवाबदारी एवं पारिवारिक उत्तरदायित्व का जो दरवाजा बंद किया जा रहा है। आने वाले समय में उन्हें इसी दरवाजे के बाहर गिड़गिड़ाना होगा। तब उन्हीं की नन्हा पुत्र जो अब जवाबदारी का पुतला है, उन्हें जो झिड़की लगाएगा उसे वे सह नहीं पाएंगें। यदि आने वाले उक्त समय की स्याह रात और न कटने वाली दुपहरी का दर्शन करना हो तो हमें अपनी नजरें पश्चिमी देशों में वृद्धों की जीवन की ओर घुमानी होगी। आज उन्हीं देशों में पुत्र पुत्रियों का भरा पूरा परिवार रहते हुए भी वृद्धजन एकाकीपन की पीढ़ी भोग रहे है, जिसमें उनका जीवन बड़ी हताशा में कट रहा है।
      हमारे देश के जवानों को इस बात पर गौर करना होगा कि हमारे अपने बुजुर्ग माता पिता जिस दारुण यंत्रणा से गुजरते हुए जीवन की संध्या में दिन बिता रहे है, उस अपराध का फल पूरा समाज को अवश्य ही मिलेगा। अपने सीमित साधनों में हमारे के लिए हर तकलीफ को कांटों की सेज पर सहते हुए सुविधाएं उपलब्ध कराने वाले हमारे बुजुर्गों ने स्वयं आत्मसंयम भरा जीवन जी कर हमें जो आनंद दिया है, वह कोई अपराध नहीं, जिसकी सजा उन्हें दी जाए। पश्चिमी सभ्यता में तो अब यह नियम ही बना दिया गया कि सेवानिवृत्ति के बाद सरकार उन्हें संभाले। ऐसे वृद्धों की बस्तियों में सरकार द्वारा मनोरंजन के साधन भी उपलब्ध कराये जाते है। इन सुविधाओं के बीच उन्हें यह दर्द सालता रहता है कि जिन बच्चों के लिए अपना जीवन खपाया आज वे ही हमसे किनारा कर रहे है। हमारी संस्कृति ऐसे विचारों से संबंधित नहीं है। हमारी सभ्यता में यह स्पष्ट है कि परिवार की परिभाषा में माता पिता का समावेश सर्वप्रथम माना जाता है। तब हम क्यों अपनी सभ्यता को लांघते हुए पश्चिमी दूषित हवा के वशीभूत होकर अपने वरिष्ठों की सेवा से भागे।
     परिवारों को बांधकर रखना ही भारतीय संस्कृति की पहचान है, न कि टूट कर  बिखर जाना। आज अपनी संकीर्ण विचारधारा के कारण जो लोग अपने वृद्ध माता पिता की  उपेक्षा कर रहे है, वे भी कल वृद्ध होंगे और उनके बच्चे भी उनके साथ उपेक्षापूर्ण व्यवहार ही करेंगे। कारण यह है कि जिस नींव के बल पर उनका पालन पोषण हुआ है, वे भी ऐसी ही नींव तैयार करेंगे। इसे हम वेद वाक्य की श्रेणी में रख सकते है, जिनके बूढ़े माता पिता के साथ रिश्ते गहरे तथा  स्नेहित होते है, उनके  वर्तमान तथा भविष्य दोनों ही उज्ज्वल होते है। सुनहरी किरणों के बीच स्याह स्थिति का निर्माण कभी नहीं होता है। बूढ़े माता पिता को भगवान से भी अधिक ऊंचा स्थान देते हुए उनके चरणों का प्रातः एवं सायं स्पर्श हर प्रकार की दुखों की अचूक दवा मानी जाती है।