सोमवार, 9 मार्च 2026

 अनुवाद हमेशा मुश्किल दिनों में किसी दवा की गोली सा बनकर आता है।

पढ़िए लिथुवानिया की कवि औश्रा कज़िलियनटे की वसंत से सम्बंधित कविताएँ। इन कविताओं से बहुत रिलेट कर पाई इनदिनों।
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मनुष्य खिलते हैं
मनुष्य दुख से खिलते हैं
जबकि चेरी के पेड़ बस खिलते ही रहते हैं
उनकी पंखुड़ियाँ घूमती हैं, वे दीवारों पर चढ़ते हैं, छिपकलियों की तरह अपनी जीभ बाहर निकालते हैं, हमारे चेहरे चाटते हैं
वे बस्ता लादकर स्कूल जाते हैं, वहाँ उन्हें कुछ नहीं मिलता, लेकिन इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता
वे खाली कैफेटेरिया में लंच करते हैं, शहर के पार्कों में अपने कुत्तों को घुमाते हैं, लेकिन इससे कोई फर्क नहीं पड़ता
वसंत वसंत है क्योंकि यह सिर्फ़ वसंत है
और वहाँ, किनारे पर, बत्तखों का एक जोड़ा बैठा है, बस बैठा है
जबकि पानी पत्थरों के ऊपर से बह रहा है
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मैं बाहर गई
मैं बाहर गई
अपने कमरे के बीच में
वहाँ सड़कें खाली हैं, सब एक-दूसरे के पास से गुज़रते हैं
एक टेढ़ी-मेढ़ी बूढ़ी औरत, झुकी हुई
अपनी अंतिम ताकत से एक बैग घसीट रही है, वह वसंत से भरा हुआ है

 


जुड़ने के लिए कितना टूटना पड़ता है

ठीक से देख सकने के लिए अक्सर

बदलनी पड़ती है जगह,
मैं तुम्हें कितना बचा पाऊंगी
यह तो इसी से तय होगा
मैं ख़ुद को कितना बचा पाई हूँ

  अनुवाद हमेशा मुश्किल दिनों में किसी दवा की गोली सा बनकर आता है। पढ़िए लिथुवानिया की कवि औश्रा कज़िलियनटे की वसंत से सम्बंधित कविताएँ। इन कवि...