मंगलवार, 26 फ़रवरी 2019

कैफियत मन की

अजब है कैफियत मन की 
बिना बादल बरसता है ,
बिना बोले गरजता है ,
कभी तो राख हो जाता है 
कभी ज्वाला कभी चन्दन |

कभी बहता है पानी सा ,
कभी ये आग हो जाता ,
न हो तो कुछ नहीं होता ,
जो हो तो हिमालय हो |

कभी कहता नहीं कुछ भी ,
कभी बेलाग हो जाता है 
कभी दिखता है सिंदूरी ,
कभी होता कस्तुरी |

कभी ये मैं  भी हो जाता ,
कभी ये तू भी हो जाता,
कि सब कुछ व्यर्थ सा लगता ,
कभी मोह में पड़ता |

नया हर अर्थ सा लगता ,
कभी हंसता है  होठों सा ,
कभी नयनों की जलधारा ,
कभी संसार को जीता , 
कभी खुद ही से सब हारा ,
क्योंकि अजब है कैफियत मन की ....

अर्पणा दीप्ति 

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