मंगलवार, 19 जून 2018

विश्व साहित्य से सिमीं बहबहानी की ईरानी कविता

अर्पणा दीप्ति 

सिमीं बहबहानी 


मैं ऐसी स्त्री को जानती हूँ 


मैं ऐसी स्त्री को जानती हूँ जो घर के कोने में 
कपड़े धुलने और खाना बनाने के दरमियाँ 
अपनी रसोई में गुनगुनाया करती है 
मन को जगा देने वाली एक प्रेरक गीत |
उसकी आँखों में मासूमियत है पर एकाकी उदास है
उसकी आवाज थकी और लस्त-पस्त है 
उसकी उम्मीदें कल की आस पर टिकी हुई हैं |

मैं एक ऐसी स्त्री को जानती हूँ 
जो कुबूल करती है 
अपने दिल की बाजी हार जाना उसके सामने 
जाने वो इसके काबिल है भी या नहीं ?
वो धीरे-धीरे खुसर-फुसुर करती है 
कि चाहती हूँ भाग जाऊं यहाँ से कहीं दूर 
पर इसके फौरन बाद खुद से सवाल भी करती है ;
मेरे बच्चों के बाल कौन सवाँरेगा 
जब मैं चली जाउंगी |

एक स्त्री जो दर्द से गर्भवती है 
एक स्त्री जो जनती है पीड़ा के शिशु 
एक स्त्री बुनती है धागेदार कपड़े 
एकाकी सूनेपन के तानेबाने से |
कमरे के अँधेरे कोने में 
दिए से करती है ईश्वर की प्रार्थना |

एक स्त्री जंजीरों से आदतन घुली-मिली 
एक स्त्री जिसको जेल घर जैसा अपना घर लगता है 
वार्डन की ठंढी निगाहें बस
कुल मिलाकर यही उसके हिस्से की प्राप्ति है |

मैं एक ऐसी स्त्री को जानती हूँ .....
मैं एक ऐसी स्त्री को जानती हूँ 
जो निस्तेज और शिथिल पड़ जाती है तिरस्कारों से 
फिर भी गुनगुनाती रहती है कोई न कोई गीत 
इसी को कहते हैं किस्मत का फेर ......


इस स्त्री को हो जाता है अभ्यास गरीबी का 
इस स्त्री को रुलाई छुटती  है सोते वक्त 
डाह और विस्मय से चकित स्त्री 
समझ ही नहीं पाती कहाँ हुई है उस से चूक ......

एक स्त्री छुपती फिरती है 
बेतरह उभरी हुई नसों वाले पैर से 
एक स्त्री चौकन्ना होकर एकदम से ढांप देती है |

अपने दुखों की अन्दर अन्दर फैलती लपटें 
जिससे कुछ सामने न आए दुनिया के 
ये तो ऐसे ही उपरी सिरे तक लबालब होती है 
घातों -प्रतिघातों से 
मोड़ो-तोड़ो और ऐठ्नों से |

 मैं एक ऐसी स्त्री को जानती हूँ 
जो बिना नागा अपने बच्चों को 
किस्से और लोरियां गा-गाकर सुलाती हैं 
पर खुद अपने सीने में 
जानलेवा तरकशों  के  गहरे ही गहरे जज्ब करती है |

एक स्त्री घर से बाहर निकलने में डरती है 
कि घ का चिराग वही तो है 
सोचती है कि घर कितना भुतहा लगने लगेगा 
उसके चले जाने के बाद .........

ये स्त्री शर्मिन्दगी महसूस करती है 
भोजन से खाली-खाली है उसका टेबुल 
भूखे बच्चे को सुलाने के लिए 
उसकी पसंद की गाती है मीठी-मीठी लोरी .....|

मैं एक स्त्री को जानती हूँ 
जिसमे अब बची नहीं सुई भर भी जान है 
कि चल पाए एक  कदम भी 
 दिल रो-रो कर बेहाल 
अब इससे बदतर और क्या होगा.......

मैं सी ऐसी स्त्री को जानती हूँ 
जिसने जीता अपने अहम्  को बलपूर्वक 
हजारों  हजार बार 
और अंत में वो जब विजयी हुई तो ठहाका लगाकर हंसी 
और खूब स्वांग किया ठट्ठा किया 
दुष्टों का, भ्रष्टों का .....

एक स्त्री छेडती है तान 
एक स्त्री रहती है सुनसान 
एक स्त्री अपनी रात बिताती है 
अच्छी तरह देखभाल कर किसी सुरक्षित गली में ........|

एक स्त्री मशक्कत करती है दिन भर पुरुषों की तरह 
पड़ जाते हैं फफोले उसकी हथेलियों पर 
उसको यह भी याद नहीं 
कि वह तो पेट से है ....|

एक स्त्री अपनी मृत्यु शय्या पर है 
एक स्त्री बिलकुल मौत से सटकर खडी है 

उस स्त्री की स्मृति को कौन सुरक्षित रखेगा 
मैं नहीं जानती 
एक रात यह स्त्री बिलकुल चुपचाप 
उठकर चली जाएगी बाहरी दुनिया के.......
परर दूसरी स्त्री अवतरित होगी, लेगी इसका प्रतिशोध 
वेश्याओं जैसा सुलूक कर रहे मर्दों से ..........

मैं जानती हूँ ऐसी एक स्त्री को 

फारसी से अंगरेजी अनुवाद :-रोया मोनाजेम  
 


सोमवार, 21 मई 2018

मैं क्यों लिखती हूँ-भाग 3




बची रहेगी यह धरा जब तक हम-आप इस पर चहलकदमी करते रहेंगें !!

सामान्यत: मैं कविता लिखने से बचती हूँ | साहित्य के इस विधा में पूर्णता का अधिकार मुझे नहीं है  | पर कभी-कभी शब्द घनीभूत होकर जेहन पर इतने भारी हो जाते हैं तब मैं केवल माध्यम बन उन शब्दों को रास्ता भर देती हूँ | अपने आस-पास के समय को जब सम्वेदनशील होकर देखती हूँ , तो शब्दों की पीड़ाओं से भर जाती हूँ | या फिर यूँ कहूँ की शब्द जेहन में खदबदाते(उबलना) हैं जिससे हिय (कलेजा) के भीतर कुछ दाजने (जलना) सा लगता है | उस दाज को जब शब्द का रूप देकर पन्नों पर ढालने लगती हूँ तो मई-जून के तपते रेगिस्तान में पहली बारिश के बाद धीरे से उठती ठंढक महसूस होती है | ये शब्द कभी कहानी, कविता, रिपोर्ताज के आकार  में ढलने लगते हैं लेकिन पीड़ा बहुत निजी होती है वह डायरी में ही उतरती है |
अर्पणा दीप्ति 

अगर खुद से प्रश्न करूँ कि मैं कविता क्यों लिखती हूँ ? तो दो-चार वजह सामने आती है-कई बार तो कविताएँ बेहद निजी पलों की फुसफुसाहट होती है तो कुछ subtext सबटेक्स्ट होती है जिसे कभी सीधे-सीधे बोला या कहा नहीं गया ! कुछ कविताएं हमारे आसपास में फैली अव्यस्था और बेचैनी का प्रतिरूप होती है, तो कुछ सपाट बयानबाजी होती है, जिसमे साधारण मन के सुख-दुःख, खुशी-पीड़ा अभिव्यक्त करती हुई नजर आती है | किसी विदेशी कवि ने कहीं लिखा है कि “ जीवन और मृत्यु के बीच जो भी कुछ हमारा दैनंदिन क्षण होता है, वह भी प्राथमिक तौर पर काव्यात्मक ही होता है|” यानि भीतर और बाहर का सन्धिस्थल, कालहीनता में आंतरिक बोध और क्षणभंगुरता के बाह्य बोध के बीच |

सच कहूँ तो जब कविता पहली बार मोबाईल,लैपटाप,डायरी और रद्दी पैम्पलेट पर उतरती है तो वह रेगिस्तानी गाँव के लिए पहली बारिश से सनी मिट्टी की सौंधी खुशबू लिए होती | फिर धीरे-धीर क्राफ्ट और ड्राफ्ट के ट्रीटमेंट के साथ मेट्रो के सभ्य लोगों जैसी बन जाती है | नाईजेरियन कवि बेन ओकरी ने कहा था कि “हमे उस आवाज की जरूरत है जो हमारी खुशियों से बात कर सकें, हमारे बचपन और निजी राष्ट्रीय स्थितयों के बंधन से बात कर सके वह आवाज जो हमारे संदेह, हमारे भय से बात कर सके ; और उन अकल्पित आयामों से भी जो न केवल हमें मनुष्य बनाते हैं बल्कि हमारा होना भी बनाते हैं |” इस लिए कविता मेरे लिए स्वांत सुखाय पहले है जिसके साथ समाज,देश,और मानवता की चिंताएं सहजता के साथ आती है | कभी भी मैंने उद्देश्य, विचारधारा या वर्ग को ध्यान में रखकर लिखने का प्रयास नहीं किया |

तपते रेगिस्तान में जून की भीषण गर्मी में मटके के ठंढे जल को पीते हुए तृप्ति का अहसास मुसाफिर करता है ठीक वैसा ही अहसास बेचैन करती हुई पीड़ा रात के तीन बजे कागज पर उतरती कविता को देखकर होती है | पुन: यही कहूंगी विपरीत समय में एक सम्वेदनशील मन को यह मासूम कविताएँ ही ज़िंदा रखती है वरना यह क्रूर तपता परिवेश झुलसाने के लिए काफी है |       
    

रविवार, 20 मई 2018

मैं क्यों लिखती हूँ ? (भाग-2)




To write is thus to disclose the world and to offer it as a taste to the generosity of the reader-why write?

आलेख में ज्याँ पॉल सात्रं द्वारा लिखित ये पंक्तियाँ की इस प्रकार लिखना की दुनिया को उजागर किया जाए, तथा इसे पाठक की सदाशयता पर छोड़ा जाए की वह इस कार्य को अपने हाथ में लें |  सात्रं की ये पंक्तियाँ मुझे बहुत प्रिय है |
अर्पणा दीप्ति 

अक्सर मेरे मन में यह सवाल उठता है की मैं क्यों लिखती हूँ ? जब बिना लिखे हुए भी दुनिया में अधिकाँश लोग अपना जीवन बड़े आराम से जी रहें हैं, तब लिखने में मुझे अपना समय क्यों जाया करना चाहिए ? एक बिजनेसमैन सोचता है किस तरह कम समय ने अधिक से अधिक ग्राहकों के सम्पर्क में आकर वह अधिक मुनाफा कमा सके, एक डाक्टर सोचता है की कैसे कम समय में अधिक से अधिक मरीजों को निपटाकर अधिक पैसे इकट्ठे किये जा सकें | एक ट्यूटर सोचता है की कैसे समय का अधिकाधिक उपयोग कर विद्यार्थियों के अधिक से अधिक समूहों को पढ़ाने का प्रयोजन हो और अर्थोंमुख होने का कीर्तिमान बनाया जा सके | ऐसी सोच के आज के इस गतिमान प्रवाह में जहाँ अपने समय को अर्थ में बदलने की होड़ लगी हो तब एक लेखक के मन में यह विचार आना स्वाभाविक है कि मैं क्यों लिखती/लिखता हूँ ?


यह जानते हुए भी की लिखना अपने समय को अर्थ में बदल पाने की कला से कभी आबद्ध नहीं कर  सकता, उसके बावजूद भी अगर मैं लिखती हूँ तो इस लेखन का मेरे जीवन में गहरे निहितार्थ है | इस निहितार्थ में जीवन के उन सारे मूल्यों के नाभिनालबद्ध होने की गहरी आकांक्षा है जिसे मैं अपने जीवन के साथ-साथ दूसरों के जीवन के आस-पास देखना चाहती हूँ | लेखक-लेखिकाओं के ऊपर प्राय: यह आरोप लगाए जाते हैं कि वे यश की इच्छा के गम्भीर रोग से ग्रसित होते हैं और उनका लेखन इसी रोग का प्रतिफलन है | पर यह तथ्य सही प्रतीत नहीं होता, क्योकिं यश की दौड़ में आज का लेखक कहीं भी ठहरता हुआ नजर नही आता ! यह एक ऐसा दौर है जिसमे अमिताभ बच्चन, अनुष्का शर्मा, विराट कोहली सलमान खान, सोनम कपूर जैसे विचार शून्य सेलिब्रिटीज ने यश की लगभग समूची जगह को घेर सा लिया है | आज की यह दौर विचारशून्यता को पोषित करने का दौर है, जहाँ लेखक के लिए कोई जगह शेष नहीं है | इसके बावजूद मैं लिखती हूँ तो मेरा लिखना यशोगामी कैसे हो सकता है ? मेरे आस-पास क्या सब कुछ ठीक है ? जब देश-दुनिया की अधिकाँश आबादी ने अपने समूचे समय और जीवन को अर्थ उपार्जन और कामवासना की तृप्ति के लिए ही रख छोड़ा है ऐसे में भला सबकुछ कैसे ठीक हो सकता है ? मुझे यह भी मालूम है मेरे लिखने से सब कुछ ठीक नहीं हो सकता फिर भी मैं लिखती हूँ | इस लिखने में एक सूक्ष्म आकांक्षा है कि सबकुछ न सही, उसके रत्तीभर आकार का हिस्सा अगर ठीक हो सके तब मेरा लिखना सार्थक है | यह सोच मेरे दिमाग में आती-जाती है इसलिए भी मैं लिखती हूँ |

मेरा लिखना देश में किसानों की आत्महत्या को रोक नहीं सकता, मेरे लिखने से देश में हत्या और बलात्कार जैसे जघन्य अपराध नहीं रुक जाएंगे !  मेरे लिखने से देश में पसरी अराजकता खत्म नहीं हो जाएगी ! इन सबके बावजूद अगर मैं लिखती हूँ तो यह चाहती हूँ कि मेरे भीतर पसरी हुई बैचेनी थोड़ी कम हो जाए | मैं इसलिए लिखती हूँ कि इन बुराइयों का विरोध कर सकूं | इन बुराइयों के विरोध में उपजा मेरा लेखन उन बीज की तरह है जिसमे किसी दिन पेड़ बनने की सम्भावना मुझे नजर आती है | इसलिए भी मैं लिखती हूँ |


मैं सिर्फ अपने लिए नहीं आपके लिए भी लिखती हूँ कि आप मेरे लिखे को कभी समय निकालकर पढ़ सकें और अपनी खोई हुई मनुष्यता की ओर लौटने की कोशिश कर सकें | अगर आपके लिए पढना संभव न भी हुआ तो मेरे लिखने से दुनिया को कोई नुकसान भी नहीं होनेवाला है | क्योंकि मैं कोई अपराधी तो हूँ नहीं और न लोगों के दिल दिमाग में डर पैदा करने वाली शख्स हूँ | मैं तो बस लिखनेवाली बस एक अदना सी कलमकार हूँ, आपके लिए जिसे लेखक मान लेने की मजबूरी भी नहीं है | किन्तु मेरे लिखे से फिर भी आप अराजक होने की छवि से डर जाते हैं, तो इसका अर्थ है की मनुष्यता के पक्ष में इस डर को बनाए रखने के लिए मेरा लिखना कितना महत्वपूर्ण है | अराजक लोगों के इस डर ने ही तो दुनिया भर में शब्द और विचारों की महत्ता को स्थापित किया है | इस स्थापना को मैं और प्रगाढ़ करना चाहती हूँ | मैं पूरी दुनिया में मनुष्यता को बचाए रखने की पक्षधर हूँ इसलिए भी मैं लिखती हूँ |

क्रमश:
     


  

शनिवार, 19 मई 2018

परम में उसकी उपस्थिति -"मेरे न होने की इम्युनिटी तुम्हें पैदा करनी ही होगी ............" (संस्मरण)



ब्रह्म मुहूर्त में एक ललक और अलगाव के पीड़क पलों में उसे जो बात कह नहीं पाई थी ! वह उसी पल कविता में उपस्थित हो उठी थी | उसकी संभावित स्थायी अनुपस्थिति हम मिल रहे थे, उसकी आगत अनुपस्थिति के भुरभुरे मुहाने पर | वह क्रमशः अनुपस्थित हो रहा था मेरे परोक्ष अस्तित्व से मगर उपस्थति होता जा रहा था मेरे होने की तमाम अपरोक्ष वजहों की मूल में | बाहर मेरी देह और उसकी परछाई जितनी जगह घेरती है | वह उतनी जगह मेरी भीतर घेर रहा था, मेरी ही परछाई के मूल स्रोत को बेदखल करते हुए | बाहर कोहरा था, भीतर और भी घना , लेकिन दोनों कोहरों में गहरा फर्क था | ये अलगाव के आगत के क्षेपक क्षण थे असंगत-सा की उपस्थित था वह, अनुपस्थिति होने के बहुरुपात्मक प्रत्यक्षीकरण में | मेरे चेहरे पर दर्ज है आज भी उसकी बड़ी-बड़ी आँखे जो चाहती थी स्थान, काल, पात्र की सभी सीमाएं ध्वस्त हो जाए | समय-रथ के पहिए की धुरी ही टूट जाए |


 उसकी अनुपस्थिति जब मेरे आगे उपस्थित हुई , पटरियां खाली थी रेल जा चुकी थी | वही जंगल थे वही पगडण्डी थी नहीं था तो केवल वह योजक चिन्ह, जिससे जंगल जुड़ते थे मुझसे | रास्ते बनाती थी हमारा योग | जंगल वही थे, नदी के किनारे सुरखाबों के घोंसले भी वही थे , उनके अनुरंजनी नृत्य भी जारी होंगे | उस अथाह और परम उपस्थिति में योजक चिन्ह के अभाव में उसके साथ मैं भी अनुपस्थित हो गई | मन को ट्रेन्क्वेलाजयर देकर सुला दिया था | यह सोचकर की कुछ दिन बीत जाएगा, एक सतयुग, एक लंबा वनवास , जो प्रिय था स्वर्ण मृगों की कुलान्चों से भरा-भरा और केवट-शबरी-हनुमान भाव से ओत-प्रोत | स्मृतियाँ लिपट-लिपटकर पैरों से लिथड़ेन्गी | मौन चीख पड़ेगा, देह सिहर-सिहरकर रुन्दन करेगा | मन रूठकर पलटकर खड़ा हो जाएगा और समझदार प्रेम उसके भले की कामना करते हुए, उसका असबाव (समान) उठाकर स्टेशन तक छोड़कर लौट आएगा | उस अनुपस्थित प्रेम के कंधे पर टिक कर बिता दी जाएगी शेष वयस | 


    यायवारी हमारी नियति और चाव दोनों हैं | उपस्थित और अनुपस्थित के व्यतिक्रम हमारा पाथेय | बहुधा यह हुआ है कि हमने काटे हैं अनजान रास्ते एक दूसरे के | उसके उठकर जाने की उष्मा से भरी जगह पर मैं बैठी हूँ, और मेरी बगल के गली से वह समानंतर गुजरा है | एक बार तो धुल भरी आंधी में हम अनायास ही उपस्थित थे आमने-सामने मगर बिना पहचाने एक दूसरे को | हम दो यायावर एक दूसरे की यात्राओं में लगातार अनुपस्थित रहे थे लेकिन पटरियों और सडकों के निकट मोड़ पर धुन्धलों में भी रेलों, बसों की खिडकियों से दिखते रहे एक दुसरे को | हाथ में दिशानिर्देशक पट्टियां थामे | कह तो वो रही थी अपनी कहानी लेकिन महसुस मैं कर रही थी | ये शरीर बहुत दूर है | पर हमारी आत्मा की तरफ तुम्हारी आत्मा की एक खिड़की हमेशा खुलती है |

        किसी महागाथा में क्षेपक सी बीती उन रातों में मेरी आत्मा की लगभग सारी खिड़कियाँ खुली रह गई थी | नतीजन मुझे ठंढ लग गई थी , मैं खांसती और छींकती रह थी | एंटीहिस्टैमिनेकी दवाओं के रैपर सारे खाली थे वह होता तो खीजकर  कहता –“ अगर मेरी अनुपस्थिती तुम्हें बीमार बना सकती है तो मेरी उपस्थिती का भला कोई अर्थ रह जाता है ? तम्हे पैदा करनी होगी इम्युनिटी “ कुछ देर को सुला दो यह दर्द |”
     क्या यह केवल अनुपस्थिति थी ? यह उस उपस्थिति की सांद्रता थी जो ठोस होने के हद तक सान्द्र होने को थी| एक पूरा वातावरण था उसका होना | वह बस एक कमरे से उठकर चला गया था अपना असबाव बांधकर मगर वायुमंडलीय गोलक में बंध चुकी थी उसकी उपस्थिति | खूब एहतियात से बाँधा था अपना  सामान की कहीं कुछ छुट न जाए , किन्तु बहुत सारे जगहों पर वह खुद ही छुट गया था | पीछे छुट गया वह छोटा सा संसार उसकी स्मृतियों से ठसाठस,कि मुझे सांस लेने में दिक्कत हो रही थी | वे सारे सन्नाटे जो उसकी मुलायम समझाने वाली आवाज से अपदस्थ हुए थे , बुरी तरह चीख रहे थे | मेरे कान बस बहरे होने को थे | उसकी उपस्थिति से उसकी अनुपस्थिति को पुरी तरह संक्रमित कर दिया था | सुन्न पड़े मेरे वजूद से एक क्लीशे झर रहे थे जिसे मेरा मौलिक मन अपने कुरते से झाड़ने का प्रयास कर रहा था |

बुधवार, 2 मई 2018

मैं क्यों लिखती हूँ ?


खुद को प्रकट करना किसी के लिए आसन है तो किसी के लिए मुश्किल | जो कुछ मेरे भीतर है जिसका परिचय मैं दुनिया को देना चाहती हूँ क्या है वह जो मै आप सब को बताना चाहती हूँ, साझा करना चाहती हूँ ? कभी कहानी इसका माध्यम बनता है तो कभी कविता | कभी कुछ बातें डायरी में नोट कर लेती हूँ | लेकिन यह लिखना, कहना और बताना है क्या ?
  पतझड़ खुद को टूटी पत्तियों में अभिव्यक्त कर लेता है, निपाती उसके पेड़ और ठूंठ में , वसंत खिलती हुई कलियों में, समन्दर खुद को नीले रंग में तो कभी अपनी अथाह गहराई में | शायद मेरी भी अभिव्यक्ति की जिद जब ज्यादा आवेग में भर जाती है तो यही समन्दर खुद को तूफान में प्रकट कर लेती है |
हिमालय अपनी सफेद चादरों में, सदानीर नदिया अपनी दूर-दूर तक फैले कछारों में पानी को अपने अंक में समेटते हुए अपने अस्तित्व को जताती हैं | पक्षी गाते हुए, तो जुगनू अपने रोशनी  से रात के अँधेरे को काटते हुए,तितलियाँ अपने सुरमई और सुनहरे रंगों में खुद को अभिव्यक्त करते हुए मानो पलक झपकते ही उनके पंखो पर बिखरे रंग उनकी कहानी ही तो कहती है | मधुमक्खियाँ अपने को शहद में प्रकट करती हैं |
सर्दियों की एक अलसुबह ठंढी भोर में जब रात भर गिरती ओस की नन्हीं बूंदों से घास भारी होने लगती है, जब अपने घोसलें में सिकुड़ती चिड़ियाँ बस किसी तरह सुबह हो जाने का इन्तजार  करती है | रात भर की कठिन ड्युटी करने के बाद चाँद भी पलके झपकाने लगता है ठीक उसी समय दबड़े में दुबका मुर्गा जोरों से कुकड़ू कू  चिल्लाकर अपने उल्लास को प्रकट करता है मानो कह रहा हो जी हाँ मैं हूँ |
कैसे कहूँ की अपने को अभिव्यक्त करने के इतने खुबसूरत तरीके मेरे पास नहीं हैं | अपने खाली हाथ किसे दिखाऊं | लेकिन कुछ तो है जिसे मैं दिखाना चाहती हूँ “एक दुनिया” जिसे मैंने अपने आस-पास महसूस किया एक जीवन जिसे मैंने अपनी हथेलियों में सहेज लेना चाहा, जो खुद को जीने की आकांक्षा में प्रकट कर लेना चाहती है | उसके उम्मीदों से भरे हाथ उसकी जिजीविषा उसकी जद्दोजहद उसकी अपनी अस्मिता की तलाश मानो एक कहानी जता रही थी |
क्रमश:


शुक्रवार, 6 अप्रैल 2018

स्त्री लैंस से सम्वेदनाओं का वृहत्तर स्वरूप



                                -अर्पणा दीप्ति 


ॠषभदेव शर्मा एक सम्वेदनशील कवि हैं, उनकी कविता संग्रह “देहरी” स्त्री के बहुआयामी समस्याओं का पड़ताल तथा विरोध का तीव्रतम रूप है | “देहरी” का  मुख्य स्वर वह स्त्री है जो अशिक्षित है, निर्धन है, साधनहीन है, दलित है, मजदुर हैं | इन स्त्रियों का जीवन आक्रोश, कर्मठता, तथा विद्रोह से ओत-प्रोत है | इनके अन्दर स्वाभिमान है , वेदना की चिंगारी है जो हमेशा सुलगती रहती है |
“देहरी” का कवि चेतनशील है, जागरूक है, समकालीन आर्थिक, समाजिक, तथा राजनितिक परिस्थितियों पर पैनी नजर बनाये हुए है | कवि न तो स्त्री के प्रश्न को दरकिनार करता है न ही उसके शोषण और उत्पीड़न को | कवि सजग है, बदलाव की आकांक्षा की जिजीविषा लिए सतत प्रयत्नशील है | मानवीय मूल्यों का पक्षधर है | न तो वह अपनी कविता को सौन्दर्य का जामा-जोड़ा पहनाता है न ही अलंकार का लाग-लपेट | पाठकों के सामने जस की तस स्थिति में अपनी बात रखता है |

“परसों तुमने मुझे / चीखने वाली गुड़िया समझकर / जमीन पर पटक दिया /.........नहीं!/ मैं गुड़िया नहीं / मैं गाय नहीं / मैं गुलाम नहीं |    (गुड़िया-गाय-गुलाम पृ.1)

भाषा और भाव जब एक दुसरे से मिलते हैं तो वह काव्य का रूप लेता है | कवि ने स्त्री के चहूँमुखी शोषण को बड़े ही साफगोई से काव्य का रूप दिया है | कविता में उपस्थित स्त्री कहीं भी अपने आप को महिमामंडित नहीं करती है मानवी के रूप में ही पाठकों के सम्मुख आती है |

“ वे पृथ्वी हैं-/सब सहती हैं / चुप रहती हैं | (परम्परा पृ.77)

कवि ने बड़े ही बेवाकपना से उस स्त्री के आवाज को शब्द्वद्ध किया है जो सभ्यताओं के खंडहर होने की आशंका से शंकित है |

“क्यों अलगाते हो / पर्वत घाटी से / भाई को बहन से / माँ को बेटी से ??/ मुझे मेरा पीहर लौटा दो / मेरी मां मुझे लौटा दो / मेरा निंगोल चाक्कौबा | (निंगोल-विवाहित लड़कियों को घर बुलाना | चाक्कौबा-भोजन कराना ) मणिपुरी शब्द

अगर हम सभ्य हैं, सजग हैं, सतर्क हैं तो शोषण और अन्याय के खिलाफ प्रतिकार करना हमारा कर्तव्य है | सजगशील कवि भी अपने कर्तव्य से विमुख नहीं है | काव्य की भाषा प्रतिरोध की भाषा भी है |

“मैंने किताबें माँगी / मुझे चूल्हा मिला / ........मैंने सपने मांगे / मुझे प्रतिबन्ध मिला / मैंने सम्बन्ध मांगे मुझे अनुबंध मिला / ........./ कल मैंने धरती माँगी थी / मुझे समाधि मिली थी / आज मैं आकाश मांगती हूँ / मुझे पंख दोगे | (मुझे पंख दोगे पृ.18 )

जब शोषण अपने चरम पर पहुँचता है तो अबला भी सबला बनती है शक्ति का अवतार लेती है |

“मैंने कितने रावणों के नाभिकुंड सोखे / कितने दुर्योधनों के रक्त से केश सींचे / कितनी बार महिषमर्दिनी से लेकर दस्यू सुन्दरी तक बनी / कितनी बार......./ कितनी बार..../ -यमदूतों मुझे नरक में तो जीने दो !!
(न कहने की सजा पृ.87-88 )

कहने को तो ये कविताएँ स्त्रीवादी है लेकिन इस संग्रह की विशेषता यह है कि यह केवल स्त्री के इर्द-गिर्द न घुमकर पारिवारिक संरचना के बदलते स्वरूप, सामाजिक ढाँचे और मूल्यों के विघटन का स्वर है | इन कविताओं में स्त्री अपने-आपको अलग इकाई के रूप में न स्थापित करके धूरी की तरह चित्रित दीखती है |

“औरतें औरतें नहीं हैं / औरतें हैं संस्कृति / औरतें हैं सभ्यता | (औरतें औरतें नहीं हैं पृ. 93)

स्त्री की अनेक छवि इन कविताओं में देखने को मिलती है आदिवासी से लेकर घर-परिवार की महानगरों की गाँवों की कस्बों की –

“माँ धौंक रही / हवा से फुलाकर / धौकनी लगातार / भट्टी भी तप रही है / तप रहे हम दोनों /”
(गाड़िया लुहारिन का प्रेमगीत पृ. 112)

इन स्त्रियों के भीतर एक घुटन है, एक उबाल है, एक ललकार है जो चुनौती में बदल जाती है |

“ सुनो,सुनो / अवधूतों ! सुनो / साधुओं ! सुनो / इन चीखों को सुनो / इतिहास के खंडहर को चीरकर / आती हुई ये चीखें औरतों की हैं | (औरतें पृ.69 )

इस कविता संग्रह में यथार्थ है, प्रामाणिकता है, साहित्यक ईमानदारी है | समकालीन समस्याएं हैं | मानवीय सम्वेदना का आग्रह है, वर्तमान और भविष्य के लिए परिवर्तन की आकांक्षा है | कविता संग्रह में संकलित कविताएँ समाज और राष्ट्र में घटित आधी-आबादी के सम्वेदनाओं का व्यग्रतम अनुभूति है |
           

शनिवार, 31 मार्च 2018

आधुनिकता के आईने में कहानी



                                                                                                -अर्पणा दीप्ति 


श्री टी. वल्ली राधिका की कहानी संग्रह “पायोजी मैंने...” मूलतः तेलुगू कहानी  संग्रह है इसका हिन्दी अनुवाद आर.चन्द्रशेखर ने किया है | अनुदित हिन्दी संग्रह की भाषा बहुत ही सरल है | कपोल कल्पना से परे इसे दिन-प्रतिदिन की घटनाओं से लिया गया है | लेखिका स्वयं विज्ञान तथा टेक्नालजी की छात्रा तथा आईटी उद्यमी हैं | अत: इनकी कहानी के पात्र फैंटसी के ताम-झाम से पड़े बिना लाग-लपेट के निर्विकार दिखते हैं | संग्रह की कहानियों को पढने के बाद ऐसा प्रतीत होता है कि  ये हम सब की कहानी है | कहीं न कहीं हम भी इस कहानी के किरदार हैं | किसी कहानी का पात्र अमरुद का पेड़ है, तो किसी कहानी का पात्र दो दशक से काम करनेवाली घरेलू नौकरानी तो कहीं जीवन रूपी रथ को सहजता से खींचते हुए तथा सामंजस्य बिठाते हुए दम्पति है, तो कहीं मितव्यता का गुण सीखती ननद-भाभी | इस संग्रह में कुल मिलाकर बारह कहानी है | हर कहानी में स्त्री लैंस से भोगा तथा जीया गया समाज का वृहत्तर अंश है |

“सहधर्मचारिणी” गृहस्थ जीवन के ताने-बाने से बुनी हुई कहानी है तो “गुरुत्व” कहानी में यह दर्शाया गया है की किसी भी चीज पर विश्वास न करना, परिहास उड़ाना सामान्य सी बात है | किन्तु जब मनुष्य का सामना सच से होता है तो वह उस आलोक से आलोकित हो उठता है | यही इस कहानी की विशेषता है | चारदीवारी के पार खड़े अमरुद के पेड़ को कथा नायिका देखती है और नाराज होती हैं | एक दिन वह जब शाम को घर जल्दी लौटती हैं और सर उठाकर अमरूद के पेड़ को देखती हैं तो दंग रह जाती हैं-

“किस तरह वह कई जीव-जन्तुओं को आशियाना दे रहा.......सुरक्षा प्रदान कर रहा है......”(पृ.10)

 यानी कि किसी भी वस्तु को मात्र उसकी सतह से परखना उसके तलछट का सत्य नहीं है | उस सत्य से तभी परिचित हुआ जा सकता है जब उसे निकट से देखा-परखा जाए | यह कहानी गहरे सन्दर्भों में पर्यावरण के महत्ता को दर्शाती है |

“पायोजी मैंने....” की नायिका नित्या श्रेष्ठ-अश्रेष्ठ के मिथक को तोड़ते हुए उपनिवेशिक मानसिकता से मुक्त होने की दरकार रखती है | नित्या आत्मविश्वासी, तेजस्वी, सुलझे हुए विचारोंवाली निर्भीक और बेबाक स्त्री है | जाहिर है वह मात्र स्त्री देह नहीं मस्तिष्क भी है | नित्या ने हंसते हुए कहा-“मैं होती तो लाखों नहीं करोड़ों रूपये दिए जाएँ उस तरह डांस करने के लिए तैयार नहीं होती |” (पृ.74)
“मुक्ति” कहानी की भूमि कॉर्पोरेट जगत से निर्मित है | कहानी के दो मुख्य पात्र प्रिया और विनीत एक कम्पनी में प्रोजेक्ट मैनेजर हैं | यह कहानी यह दर्शाता है कि महत्वाकांक्षा के उड़ान को अतिस्वछंदता दे दी जाए तो उसका कोई अंतिम पड़ाव नहीं होता | सम्पूर्ण कहानी का मूलमंत्र एक वाक्य है- 

“चपलताओं और इच्छाओं का सांगत्य करने वाला मन.....इन्द्रियों का गुलाम बना मन.......क्रोध और लोभ का कारण बनता है |” (पृ.110)

अन्य कहानियाँ भी जैसे ‘सत्य के साथ’ ,’सीमाओं के बीच’ , ‘सत्य’ , ‘चयन’ , आदि अपनी सम्वेदनाओं के विस्तार और मूल्यों को अपनाने की ओर अग्रसर करती दिखाई देती हैं | कहानी के मुख्य छ: तत्व होते हैं-कथा-वस्तु, पात्र , चरित्र-चित्रण, भाषा-शैली, पूरक घटनाएँ, वार्ता और परिस्थितियां | इन छ: तत्त्वों का समावेश लेखिका ने अपनी कहानी में बखूबी किया है | इनकी हरेक कहानी एक संदेश लेकर खड़ी है जो आधुनिक परिवेश की विसंगतियों,विकृतियों विडम्बनओं एवं दरकते रिश्ते से जूझने के लिए जीवन का स्केच तैयार करती है | कहानी में कहीं भी भाषा का भदेशपना तथा किलिष्टता नहीं झलकता | जीवन में व्याप्त सहजता, मानवीय सम्वेदना, पारिवारिक सम्बन्धों की छावं, राग-द्वेष, खीझ-झुंझलाहट का का मनोवैज्ञानिक चित्रण इस कहानी संग्रह की विशेषता है | या यूँ कहिये मानवीय व्यवहार का मनोविज्ञान कहानी संग्रह में सर्वत्र विद्यमान है | भाषा की कड़ी भी जीवंतता तथा समग्रता से जुड़ी हुई है | श्रीवल्ली राधिका की कहानी भौतिक जगत से ली गई है | इनके स्त्रीपात्र कहीं भी स्त्रीपना से उठकर दैवी रूप धारण नहीं करती | आज के परिवेश में जब समाज दामिनी, गुड़िया,इमराना, भंवरीदेवी, निर्भया पर हुए अन्याय का बदल लेने के लिए सड़कों पर हैं वही श्रीवल्ली के स्त्रीपात्र बड़े ही साफगोई से अपने अस्तित्व को स्थापित करने में लगे हुए हैं | समग्र कहानी से जो निकलकर आया है वह यह कि समाज के साथ जो ‘स’ से जुड़ा हुआ है उसकी सकारात्मकता से हम क्यों अलग होते जा रहें हैं | हमारे पास अपार और अगाध है | कहानी संग्रह उम्दा तथा पठनीय है |