शुक्रवार, 14 नवंबर 2025

चाँद का पहाड़


इतने दिनों से किताबों पर लिखने/बोलने और अब रील बनाने के बाद मुझे पहली बार किताब किसी प्रकाशक ने भेजी। दोस्त या लेखक ने नहीं,प्रकाशक ने। मुझे लगा था कि यह किताब जैसी भी होगी मैं आपको सच सच बताऊंगी। तो कल यह अनुवाद मिला और मैंने इसे उलट पलट के देखा तो भाषा में रवानी दिखी। कहानी तो पता ही थी। शाम को व्यस्तता के बाद भी पढ़ गई लेकिन कल इसके बारे में पोस्ट करने जैसा मन/माहौल नहीं था।
जयदीप शेखर का यह अनुवाद बेशक बहुत उम्दा है। बंगाल के प्रभाव में कई शब्द उसी तरह से इस्तेमाल किए गए हैं जैसा मूल में होगा। पर आज की किशोर पीढ़ी के लिए अमूमन सहज सरल भाषा है। पढ़ते हुए हिंदी की अपनी किताब ही महसूस हो रही है। 149 रुपए मूल्य हैं और amazon से आसानी से उपलब्ध है। एक ही शिकायत है मेरी कि इसका size बहुत ही छोटा है। अगर फॉन्ट थोड़े बड़े होते और किताब कुछ और चित्रों के साथ कुछ सामान्य आकर की होती तो निस्संदेह इसका मूल्य ज्यादा होता पर छठी से दसवीं तक के किशोरों को आकर्षक भी लगती। बच्चों की किताबों की तरह नहीं पर किशोरों की किताबों की तरह इसे छापना चाहिए।
कल मेरे हाथ में इसे देख मेरी दो बांग्ला भाषी छात्राओं ने बताया कि यह किताब उन्होंने पढ़ी है पर चांदेर पहाड़ नाम से बंगला में। मैंने कहा वही तो मूल है। सोचिए अभी भी बांग्ला वाले अपनी भाषा की किताबें अपनी अगली पीढ़ी को पढ़ाते/बताते हैं। यहाँ हिंदी के लेखकों की भावी पीढ़ी ही हिंदी पढ़ने/लिखने/बोलने से कोसों दूर जा रही है/चली गई है।
खैर! इस bookmark पर लगे scaner को scan करके यह किताब आप आसानी से खरीद सकते हैं। मैं क्लोज़ तस्वीर दे रही हूँ। उम्दा और रोचक साहित्य पढ़िए-पढ़वाइए।

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