बुधवार, 28 जुलाई 2010
शुक्रवार, 16 जुलाई 2010
'प्रेम ज्योति का सूरज' के मुख्य सरोकार
प्रेम ज्योति का सूरज " कवयित्री ज्योति नारायण का पहला कविता संग्रह है। 2003 में , सूरज नारायण प्रकाशन हैदराबाद द्वारा प्रकाशित प्रथम संस्करण में कुल 110 पॄष्ठ तथा 102 कविता हैं। ज्योति नारायण की कविता की विशेषता यह है कि इसे अत्यंत सहज एवं सरल भाषा में लिखा गया है तथा इसमें विचारों और भावनाओं को बिना लाग लपेट के सीधे-सीधे प्रकट किया गया है । कविता में गहराई खोजने वालों को इस संकलन से कुछ निराशा भी हो सकती है क्योंकि इसमें अभिधा की प्रधानता है।
इन कविताओं को पढ़ने से पता चलता है कि कवयित्री अपने समाज और समय के प्रति जागरूक हैं। स्त्री रचनाकारों के बारे में प्रायः यह कहा जाता है कि वे घर और चूल्हे तक ही सीमित रहती हैं । लेकिन कवयित्री ज्योति नारायण के गॄहिणी होते हुए भी उनका काव्य संसार घर और चूल्हे तक सीमित नहीं है बल्कि समाज ,राजनीति ,जीवन और जगत के बारे में वे अपने स्वतंत्र विचार रखती हैं। जो भी चारो तरफ घटता है उससे प्रभावित होतीं हैं, द्रवित होती हैं और इसलिए कविता लिखती हैं। हर्ष और विषाद दोनों हीं उनकी कविताओं में है। कुछ कविताओं में किशोर स्त्री का उत्साह,उल्लास और हर्ष दिखाई देता है____
"मै मन के बाग में मोरनी सी मुस्काती ,
नभ पे बदरी बन छा जाती ,
कभी बुँदिया बन बरस जाती ,
फिर नदिया बन लहरा जाती। " (उम्र सारी जी जाती- पॄ.32)
दूसरी तरफ ऐसी कविताएँ भी हैं जिनमें वे बहुत खिन्न और अपने आप में सिमटी या अवसादों से घिरी प्रतीत होती हैं _____
"मैं आवाज भी हूँ और मौन भी
मैं दर्द भी हूँ और मौज भी ,
..................................
मुझमे नहीं किसी का ओज
न ही हूँ मैं किसी की खोज ।" (मैं-पॄ.32)
बनावटी मुखौटों से आहत कवयित्री उजले दर्पण की तलाश करती नजर आती हैं______
"दिखावे के लिए चेहरे पर लिपटा आवरण नहीं
पर दिल में बसने के लिए उजला दर्पण तो चाहिए ।"
(उजला दर्पण तो चाहिए-पॄ.30)
मैं यहाँ जोर देकर यह कहना चाहूँगीं कि ज्योति नारायण के इस संकलन की कविताओं का पहला सरोकार राष्ट्रीयता है। इसीलिए कवयित्री भारत के गौरवशाली अतीत तथा सीमाप्रहरियों पर गर्व करती नजर आती हैं_______
"उबड़ - खाबड़ कठिन रास्तों पे चलते हुए,
सीना ताने आगे-ही-आगे खड़े रहे। " (सीमा प्रहरी-पॄ.3)
कवयित्री का मानना है कि युद्ध की विभीषिका अंततः निर्दोष स्त्रियों एवं मासूम बच्चों को ही भुगतनी पड़ती है_______
"कोई बिंदिया कोई कंगना गोद क्यों खाली हुई,
जंग ही फिर जंग यहाँ सभ्यता ही कलंकित हुई।
(पुरनम-पुरनम हुई-पॄ.4)
कश्मीर की समस्या और आतकंवाद के रूप में हमारे ऊपर थोपे गए युद्ध के लिए कौन जिम्मेदार है? केसर और सेब कब तक धूल में मिलते रहेगें ? बर्फ कब तक अंगार बनेगा ? आखिर कब तक इन सबको चुप रह कर सहन किया जा सकता है ?_______
"आग उगलती ये पहाडियाँ,
धुआँ-धुआँ हो रही वादियाँ।"(कश्मीर की व्यथा-पृ.9)
कवयित्री देश की हालत पर चिन्ता जताती हुई कृष्ण से प्रश्न कर रही हैं ________
" हे कृष्ण ! कुरुक्षेत्र का क्यों वह युद्ध हुआ ,
तुमने आखिर को है क्या दिया । " (हे कृष्ण -पृ.13)
कवयित्री का दूसरा सरोकार समाज से संबंधित है। सामाजिक विसंगतियाँ , महँगाई, भ्रष्टाचार एवं राजनीतिक पाखंड से वे काफी विचलित प्रतीत होती हैं। भारत के सामान्य नागरिक का प्रतिनिधित्व करते हुए वे इन विसंगतियों पर आक्रामक तेवर भी अपनाती हैं। कवयित्री एक तरफ जहाँ कलम को तलवार बनाने की बात कहती हैं तो वहीं दूसरी तरफ सीधी सादी जनता को कचरा और मलबा न बने रहने के लिए ललकारती नजर आती हैं_____
"राजनीति हो गयी यहाँ ढकोसले
पूँजींपतियों के ही है फैसले
सीधी-सादी जनता तो बनके
रह गयी है कचरे और मलबे । "(ऎसा क्यों हो रहा है ?-पृ.18)
इस प्रकार इन कविताओं का राजनीतिक सरोकार भी द्रष्टव्य है। कवयित्री एक स्थान पर राजनेताओं से अपील करती नजर आती हैं कि देश को धर्म संबंधी विवाद में न घसीटें ,कौमी दंगों में न लपेटें तथा भाषा की लकीर न खीचें । वहीं कवयित्री यह भी प्रश्न उठाती हैं कि क्या भारत देश की धरती फिर से पहले जैसी हो जाएगी तथा क्या पहले जैसा रामराज्य मिल पाएगा ? इससे रचनाकार की अभीष्ट सामाजिक राजनीतिक व्यवस्था का भी पता चलता हैअर्थात उन्हें देश में रामराज्य चाहिए ।
कवयित्री का अगला सरोकार स्त्री विमर्श विषयक है। उन्होंने समाज की नारी विषयक विकृतियों और स्वयं नारी की विवशताओं पर चोट की है। वे स्त्री शोषण एवं पराधीनता पर दुखी नज़र आती हैं_______
" घर की ही दहलीज पर
बिछे हुए हैं साही के काँटे
आँगन की फुदकती गौरेया की
हम नोचने लगे हैं पाँखे । " (साही के काँटे-पृ.21)
जैसा कि प्रो. ऋषभदेव शर्मा ने इस पुस्तक की भूमिका में लिखा है पितृसत्ता यदि स्त्री को आकांक्षाओं का आकाश नहीं दे सकती तो कम से कम उससे इच्छा रूपी जमीन को तो न छीने क्योंकि वास्तव में स्त्री तो वह बाद में है पहले मनुष्य है। ज्योति नारायण की भी माँग है कि स्त्री को सबसे पहले मानवी का दर्जा दिया जाना चाहिए_____
"सृष्टि की रचयिता की मैं हूँ एक रचना
बस औरत से पहले इंसान बने रहने की मेरी भावना ।"
(मेरी भावना-पृ.31)
इन कविताओं में कई जगह स्त्री की परंपरागत छवि का चित्रण दिखाई देता है। यह छवि घर की चारदीवारी में कैद ऎसी औरत की है जो पति और परिवार के लिए मंगल-दीप सजाती है, परंतु स्वयं दरवाजे के पीछे अंधेरे में खड़ी रह जाती है______
" घर की ड्योढ़ी के अंदर
चौखट पर दरवाजे के पीछे खड़ी
जो जला रही थी दिया। (नारी-पृ.44)
कवयित्री यह भी नहीं भूल पाती कि मानव इतिहास में दमयंती , सीता, उर्मिला जैसी पतिव्रता स्त्रियों को पुरुषों की उपेक्षा का शिकार होना पड़ा है। वे मानती हैं कि इन सब के पीछे पुरुषों का अज्ञान, अहं और हठ था।
कवयित्री के सरोकारों में प्रकृति, प्रेम तथा शृंगार का भी महत्वपूर्ण स्थान है । जहाँ कवयित्री ने देश , समाज तथा अनेक वर्तमान समस्याओं को उजागर किया है, वहीं प्रकृति, प्रेम तथा शृंगार के चित्रण मे भी वे पीछे नहीं हैं । कवयित्री कहीं कोयल की कूक से पुलकित नजर आती हैं तो कहीं बौराये आम के मंजर में विभोर हो जाती हैं । वे होली के अबीर गुलाल से सराबोर सतरंगी इंद्रधनुष बनाती नजर आती हैं तो चंद्रप्रभा संग पूर्णिमा का चाँद बन दमकती भी दिखाई देती हैं _______
"पूनम का चाँद रजनी का
देता है यूँ घूँघट उघार
रुप सौंदर्य झलक उठता
झाँकता है मन के द्वार ।" (पूर्णिमा का चाँद-पृ.93)
राधा के नख-शिख शृंगार का वर्णन भी कवयित्री ने सहज और सुंदर ढ़ंग से किया है______
" नख-शिख तक कर शृंगार
कान्हा बिन राधा हुई उदास
दर्पण में छवि निहार
बोल उठा तब प्रतिबिंब पुकार ।" (शृंगार गीत-पृ.103 )
इस प्रकार अपने समस्त अनुभव , भाव ,विचार तथा अनुभूतियों को कवयित्री ज्योतिनारायण ने कविताओं मे बाँधने का बड़ा ही सहज तथा सरल प्रयास किया है। यही शुभकामना है कि उनकी रचनात्मकता कस्तूरी की खुशबू की तरह दूर-दूर तक फैले । अपनी बात में स्वयं कवयित्री यह कहती नजर आती हैं -" कवि हमेशा अपने ’ मैं ’ में जीता है और अपनी कविता में ही आत्मसात रहता है । इस तरह एक दिन कवि मर जाता है और कविता जिंदा रहती है।'' लेकिन मेरी कामना है कि कवि और कविता दोनों जीवित रहें और दीर्घायु हों।
सोमवार, 5 जुलाई 2010
बुधवार, 17 मार्च 2010
"उर्वशी, अपने समय का सूर्य हूँ मैं"
राष्ट्रीयता एवं स्वतंत्रता के सजग प्रहरी,जन चेतना के गायक तथा काल के चारण कहे जानेवाले राष्ट्रकवि ’दिनकर’ की प्रतिभा सूर्य के समान तेजस्वी थी , जिसने युग के दिगन्त को प्रकाशित कर दिया। उनके हृदयमंडल से निकली ’हुंकार’ ने सुप्त जनता को जगा दिया। उनका जीवन संघर्षों की अमिट कहानी रहा लेकिन उनकी अन्तराग्नि की प्रज्वलित ज्योति कभी बुझने नहीं पायी।
राष्ट्रकवि रामधारीसिंह’ दिनकर’ का जन्म २३ सितम्बर १९०८ को बिहार के मुंगेर जिला के सिमरिया गाँव में किसान परिवार में हुआ। जब वे दो वर्ष के थे , उनके पिता की मृत्यु हो गई । दिनकर ने अपने जीवन में अच्छे-बुरे सभी दिन देखे और आर्थिक वर्गभेद की वास्तविकता को अनुभव से जाना। बी.ए. करने के बाद छोटे-बड़े पदों पर कार्य करते हुए वे अत्यंत प्रतिष्ठापूर्ण उच्च पदों तक पहुँचे। उन्होंने कई बार विश्व साहित्य सम्मेलनों में भारत का प्रतिनिधित्व किया। भारत सरकार के हिंदी सलाहकार समिति के अध्यक्ष पद पर रहते हुए हिंदी की यथासंभव सेवा की। राज्यसभा के मनोनीत सदस्य तथा भागलपुर विश्वविद्यालय के कुलपति भी रहे। १९५९ मे भारत सरकार ने पद्मभूषण से सम्मानित किया। आपको ’उर्वशी’ महाकाव्य के लिए ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया।उनका निधन १९७४ में हुआ|
उनका रचनाकाल सन १९२७ ई. से अप्रैल १९७४ ई. ( देहावसान वर्ष )तक अर्थात कुल ४७ वषों तक रहा । दिनकर का काव्य अपने युग का दर्पण है, युग चेतना का प्रतिबिंब है। आलोचकों की धारणा है कि उनके काव्य में सागर का गंभीर गर्जनभरा उन्मत्त ज्वार, प्रभंजन का अबाध प्रवेग तथा क्रांति की भीषण ज्वाला है।
दिनकर के कवि व्यक्तित्व को उस अंगार की भाँति माना गया है ,जिस पर इन्द्रधनुष खेल रहे हैं । एक ओर अंगार जैसी आन्तरिक जलन और तपन जो युग की अनास्था और विकृतियों को भस्म कर देने को उद्यत है, तो दूसरी ओर प्रकृति के संघात से उत्पन्न मनोहारी इन्द्रधनुष । सुन्दर और संघर्ष का न जाने कैसा मेल ?उनके साहित्य के अनुशीलन से इस कथन की सत्यता प्रमाणित होती है कि आग और मिट्टी के ताप में तपकर पकी हुई उनकी कविताएँ लोहा बनकर टंकार करती हैं । ओज इस टंकार का प्रमुख अवयव है।
उनका राष्ट्र , मनुष्य और आहत मानवता के प्रति प्रेम अटूट था । सामाजिक विषमताओं के प्रति उनके आक्रोश और विद्रोह ने उनकी कविताओं को उनके अपने युग के लिए तो प्रासंगिक बनाया ही,आने वाले समय के लिए भी उन्हें शाश्वत प्रासंगिकता प्रदान कर दी। उनकी अनेक कविताऎँ उनकी संघर्षशीलता की पुष्टि करती है।
कहा जाता है कि दिनकर के काव्य में मिट्टी, आग और लोहे की त्रिवेणी प्रवाहित हो रही है जिसमें स्नान करके पाठक संघर्ष की दीक्षा प्राप्त कर लेता है ।
मिट्टी वाली कविता कृषक, मजदूर और दलित वर्ग के जीवन का आइना है जिसमें सामंती शोषण को देखकर हृदय चीत्कार कर उठता है -
"श्वानों को मिलता दूध - वस्त्र भूखे बालक अकुलाते हैं ।
माँ की हड्डी से चिपक ठिठुर जाडे़ की रात बिताते हैं ॥"
कवि ने किसान और मजदूर को देवता माना है और धार्मिक पाखंड पर गहरी चोट की है-
" आरती लिए तू किसे खोजता मूरख/
मंदिर राजप्रासादों में , तहखानों में ।
देवता कहीं मिट्टी कूट रहे/
देवता हैं कहीं खेत -खलिहानों में ।"
आग वाली कविताएँ राष्ट्रप्रेम के प्रचंड भाव से रची गई हैं जिनमें विडंबनाओं के सामने सीना खोले ललकार की मुद्रा में कवि अडिग खड़ा है-
" कह दे शंकर से आज करें वे प्रलय नृत्य फिर एक बार ।
सारे भारत में गूँज उठे हर-हर बम का फिर महोच्चार ।"
यही वह आग है जो मानवों को सदा उष्ण रखती है। दिनकर कहते हैं -
"मानवों का मन गले पिघले अनल की धार है ।"
और पुरुरवा के शब्दों में अपना परिचय इस प्रकार देते हैं-
''मर्त्य मानव की विजय का तूर्य हूँ मैं
उर्वशी अपने समय का सूर्य हूँ मैं
अन्धतम के भाल पर पावक जलाता हूँ
बादलों के शीश पर स्यंदन चलाता हूँ ।"
करुणा और अहिंसा जैसे उच्च भाव आज की दुनियाँ में अप्रासंगिक होते जा रहे हैं - इस तथ्य को दिनकर ने 'कुरुक्षेत्र' में पूरे आत्मविश्वास के साथ स्थापित किया है। बापू से अत्यंत प्रभावित होने के बावजूद उनके विचारों के विरुद्ध खडे़ होने का जो साहस ’दिनकर’ने दिखाया है वह उनकी दूरदृष्टि का परिचायक तो है ही युगवाणी भी है-
"क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो ।
उससे क्या जो दन्तहीन विषरहित विनीत सरल हो ।"
’दिनकर’ यह समझ चुके थे कि विश्व में ''शक्तिशाली की विनम्रता'' ही सम्मान पाती है। वे मानते थे कि आदर्श के नाम पर कायरता और दुर्बलता ओढ़े रहना आत्महन्ता प्रवृति के सिवा और कुछ नहीं है। उनकी ओज से परिपूर्ण कविताएँ झनझनाती तलवारों के रूप में लोहे का प्रतिनिधित्व करती हैं । यह लोहा पौरुष का भी प्रतीक है ।यह पौरुष ’रश्मिरथी’ के कृष्ण के सदृश विराट तथा सर्वशक्तिमान है तथा यही भारतीयता की अपराजेयता का आधार है-
"जंजीर बढ़ाकर साध मुझे,/
हाँ, हाँ दुर्योधन ! बाँध मुझे/
यह देख गगन मुझमें लय है,
यह देख पवन मुझमें लय है,/
मुझमें विलीन झंकार सकल,
मुझमें लय है संसार सकल।
अमरत्व फूलता है मुझमें,
संहार झूलता है मुझमें ।
उदयाचल मेरा दीप्त भाल,/
भूमंडल वक्षस्थल विशाल,/
भुज परिधि-बंध को घेरे हैं,/
मैनाक-मेरु पग मेरे हैं।/
दिपते जो ग्रह-नक्षत्र-निकर,/
सब हैंमेरे मुख के अन्दर ।
भूलोक, अतल पाताल देख,/
गत और अनागत काल देख,/
यह देख,जगत का आदि-सृजन,/
यह देख,महाभारत का रण,/
मृतकों से पटी हुई भू है,/
पहचान, कहाँ इसमें तू है।
अंबर मॆं कुंतल -जाल देख,/
पद के नीचे पाताल देख,/
मुट्ठी में तीनों काल देख,/
मेरा स्वरुप विकराल देख,/
सब जन्म मुझी से पाते हैं,
फिर लौट मुझी में आते हैं।
जिह्वा से कढ़ती ज्वाल सघन,/
साँसों में पाता जन्म पवन,
पड़ जाती मेरी दृष्टि जिधर,/
हँसने लगती है सृष्टि उधर ।/
मैं जभी मूँदता हूँ लोचन,/
छा जाता चारो ओर मरण ।
बाँधने मुझे तो आया है,/
जंजीर बड़ी क्या लाया है/
यदि मुझे बाँधना चाहे मन,
पहले तो बाँध अंनत गगन ।/
सूने को साध न सकता है, /
वह मुझे बाँध कब सकता है?"
(रश्मिरथी;पृ.२०-२१)
सदस्यता लें
संदेश (Atom)
समय के लिए कुछ और तय नहीं
स मय के लिए कुछ और तय नहीं सिवा इसके कि यह बीत जाता है लेकिन जो बीतता नहीं लौटता रहता है वह भी कोई समय ही था ज्यों तुम समय की तरह बीत चुके...
-
महात्मा बुद्ध के बाद भारत के सबसे बड़े लोकनायक महात्मा तुलसीदास थे। वे युग्स्रष्टा के साथ-साथ युगदृष्टा भी थे। आचार्य हजारी प्रस...
-
अर्पणा दीप्ति यथार्थ मानव जीवन की सच्ची अनुभूति है जिसके द्वारा हम अपने जीवन में घटित होने वाले घटनाओं एवं भावनाओं का अनुभव करते हैं।...
-
भीष्म साहनी का 2000 ई.प्रकाशित उपन्यास " नीलू नीलिमा नीलोफर " प्रेम कहानी है । इस उपन्यास की कथा वस्तु बाल्यकाल की दो सखियाँ नीलू ...
