मंगलवार, 14 अप्रैल 2015

विवाह संस्था बनाम सपोर्ट सिस्टम



कई बार विवाह संस्था को इतना गरियाया जाता है, कि मुझे लगता है, हम ग़लत कर रहे हैं, एक कंपेनियनशिप में दरार डाल रहे हैं। एक बहुत बड़ा सपोर्ट सिस्टम, न केवल महिलाओं के लिए बल्कि पुरुषों के लिए, बच्चों के लिए है। घर एक सपोर्ट सिस्टम ही तो है।
मैं कई बार खुद पर संशय करती हूँ क्या कि मैं so called happily married के दायरे में आती हूँ इसलिए तो नहीं क्योंकि मैं इस संस्था के पक्ष में हूँ?  क्या शादियाँ हमेशा हैप्पी होतीं हैं? या इन्हें हैप्पी बनाया जाता है। हम भी भीषण तूफानों से गुज़रे हैं। पर सुबह होने पर कश्ती किनारे ही पाई है।
यह कतई सच नहीं कि अपनी शादी को हैप्पी बनाने में मैंने कोई त्याग - बलिदान किए हों! बल्कि मेरे बैटर हाफ़ ही बैटर रहे हैं हमेशा। उन्होंने ही डगमगाती नैया कि ज़्यादा पतवारें सहेजी हैं।
मैं शादी को लड़कियों की ज़रूरत या अंतिम विकल्प नहीं मानती। यह बिलकुल निजी निर्णय होना चाहिए। शादी नहीं करना भी बहुत सुखद ज़िंदगी दे सकता है अगर आप में अकेले चलने का जज्बा है तो। असफल होने पर शादी से निकल आना भी जायज़ बात है। लेकिन इसे सिरे से खारिज करना कतई उचित नहीं है।
सामाजिक विचलन, दहेज, सुंदर - असुंदर, देखना दिखाना, रिजेक्शन, घर के कामों का बंटवारा, शोषण, हिंसा आदि हमारे यहाँ विवाह से जुड़ कर इसे खारिज करने योग्य ज़रूर बनाते हैं। लेकिन अकेले चलते चलते किसी का साथ पाकर साथ चलने,  नीड़ बनाने और मां - पापा बनने के अहसास को मैं खारिज नहीं कर पाती।
हो सकता है मेरे ख्यालात पुराने हों!!

बुधवार, 8 अप्रैल 2015

पुस्तक चर्चा
स्त्री की संवेदनाओं को चित्रित करती कविताएँ : ‘पृथ्वी तन्हा है’
-डॉ. अर्पणा दीप्ति



"पृथ्वी तन्हा है" (2013) कवयित्री नीरा अस्थाना का पहला काव्य संग्रह है। इस संग्रह को पढ़ने से ऎसा प्रतीत होता है कि कविता नीरा के लिए सहज और स्वाभाविक है। मानो ऎसा लगता है कि नीरा की संवेदनाएँ बड़ी गहन हैं। वे अपनी कविताओं में स्वयं को जीती हैं, अपनी भावनाओं को शब्दों में पिरोती हैं एवं उसे काव्य का रूप देती हैं। कवयित्री की कविता में दर्द है और यही दर्द इन्हें अभिव्यक्ति के द्वार तक ले जाता है। नीरा जब तक सोचती हैं तब तक उनकी कविता व्यक्तिनिष्ठ है किन्तु जैसे ही वह सोच के दायरे से बाहर निकलती हैं कविता व्यापक जीवन-जगत के यथार्थ से जुड़ती नजर आती है। इस संग्रह की पहली कविता ’गरीब स्त्री के आत्मकथन’ में कवयित्री कहती हैं- "मुझ बदनसीब का कुछ नसीब नहीं,/ मुझ गरीब का कोई अरमान नहीं/कोई गिला नहीं, कोई शिकवा नहीं/ कोई कल्पना नहीं?"(1)


नीरा की कविता की संवेदना माँ से शुरू होकर एक आम स्त्री के संघर्ष से जुड़ जाती है। ’माँ’ एवं ’अहसास’ शीर्षक कविताओं  में इस दर्द एवं संघर्ष को महसूस किया जा सकता है -"जीवन में मैंने क्या पाया/ जो तूने दिया, बस वही पाया/ ऎ माँ तेरे इस प्यार के बदले/ये जग मुझसे चाहे जो ले ले।" (पृ.2, माँ)"कुछ देखा; सुना और महसूस  भी किया;/ माना जीवन का मोल, और कुछ बेगार भी किया।/.... लब कुछ बोलने को था बेकरार, दिल ने चुप इसे किया/ यूँ तो हम भी थे बेकार, किसने जीवन साकार किया। (पृ.76  अहसास)

’बड़ा है इतना संसार’ कविता में कवयित्री समस्त विश्व की पीड़ा को चित्रित करती नजर आती हैं-"बड़ा है इतना यह संसार बड़ा/ पर लगता क्यों इतना निस्सार!/ क्यों इसमें हँसी के कहकहे भी/ दिखते दु:ख की सिसकियों में लिपटे? (पृ.3)’मन-गगरी’ कविता में कवयित्री ने मन के दर्द को चित्रित किया है-"मन-गगरी है इतनी भारी/ उठा पाना है जिसको मुश्किल।/ जब हिली तो छलक पड़ी ये/ आँखों के रस्ते निकली ये। (पृ.6 )’वसंत के फूल’ कविता में काव्याकुल अधीर मन मानो बेसब्री से वसंत का इंतजार कर रहा हो-"जीवन के इस निस्सार पतझड़ में/ वसंत के फूल कब महकाओगे? (पृ.5)

इस काव्य संग्रह में कवयित्री का प्रकृति से जुड़ाव वसंत के फूल, कोयल, नदियाँ, झरने आदि के रूप में यत्र-तत्र दृष्टिगोचर होता है यथा-"एक सुहाना क्षण/ श्यामल उषा का शृंगारित वर्ण/ सुहाना मौसम और तारों का रंग/ सहसा प्रकट हुआ दिवस का स्वर्ण रंग।" (पृ.82, प्रकृतिमय)
वर्तमान समय की ज्वलंत समस्या बेरोजगारी तथा उससे भ्रमित हो रही युवा पीढ़ी की विडंबना को भी कवयित्री ने ’बेरोजगार नवयुवक’ में दर्शाया है-"वह मुझे मिला/फटे हाल-सा/ जर्जर होता कुर्त्ता/ टूटी हुई चप्प्ल/....... कभी आतंकित और कभी आतंकवादी-सा!/हाथों में डिग्रियों का बडंल लिये,/ वह आज का बेरोजगार नवयुवक था।"(पृ.86 )

बाजारवाद एवं भूमंडलीकरण के दौर में नैतिक मूल्यों का अधोपतन अपनी चरमसीमा पर पहुँच चुका है। मानवता की आत्मा मानो मर चुकी है- “मानव मूल्यों को बिखरते हुए देखा है।/मानव को मानवता में गिरते हुए देखा है।/ रोशनी की उँगलियों के निशान बनते हुए देखा है।/ तुम्हें उन निशानों में बिलखते हुए देखा है।" ( पृ.88, मैंने देखा है) मानव जीवन क्षणभंगुर है। जीवन और मृत्यु सृष्टि का नियम है किंतु यह भी उतना ही शाश्वत सत्य है कि इन घटनाओं से प्रभावित हुए बिना सृष्टि चक्र निर्बाध रूप से चलता रहता है- "फूल खिलते रहेंगे/ पक्षी गाते रहेंगे/.....नदियाँ कलकल करती बहती रहेंगी/ सूरज क्षितिज पर यूँ ही मुस्कुराता रहेगा।/.....सिर्फ.....मैं न रहूँगी/ मैं न रहूँगी..... ( पृ.  91 मैं न रहूँगी )

नीरा एक जागरूक कवयित्री हैं| वे प्रदूषित होते पर्यावरण के प्रति चिंतित हैं। कवयित्री का मानना है वृक्ष  है तो जीवन है तथा समस्त धरा सुंदर है। खासकर भारतीय संस्कृति में पीपल के पेड़ का अपना पौराणिक एवं धार्मिक महत्त्व है। ’मुझे याद आता है पीपल’ कविता में कवयित्री ने पीपल के वृक्ष के धार्मिक महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए यह दर्शाया है कि पीपल का वृक्ष पर्यावरण को स्वच्छ रखने में काफी मददगार है। वहीं ’देश के कर्णधार’ कविता में कवयित्री  युवापीढ़ी को प्रेरित करती नजर आती हैं।

इसमें कोई दो राय नहीं होनी चाहिए कि यह काव्य संग्रह स्त्री के अन्तर्मन को अलग-अलग पहलुओं में विचारों का मंथन करवाता नजर आता है। स्त्री जो बोल नहीं पाती है उसे शब्द का रूप देती है। पृथ्वी यहाँ स्त्री का प्रतीक ही तो है। पृथ्वी की तन्हाइयों का अहसास करवाना इस काव्य संग्रह की विशेषता है। स्त्री के दु:ख को अभिव्यक्त करती ये कविताएँ स्त्री विमर्श के वर्तमान परिप्रेक्ष्य में अपनी एक अलग पहचान बनाएगी।
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पृथ्वी तन्हा है/ कवयित्री- नीरा अस्थाना/ मंगल प्रकाशन, दिल्ली/ प्रथम संस्करण – 2013/ पृ.संख्या-111/ मूल्य-150 रु.


बुधवार, 25 मार्च 2015

आज के डेक्कन क्रानिकल समाचार पत्र में दक्षिण की प्रख्यात अभिनेत्री से YSR congress  की नेत्री बनी रोजा का बड़ा ही ऊटपटाँग बयान पढने को मिला।ऎसा लगता है रोजा सस्ती लोकप्रियता पाने के लिए किसी हद तक जा सकती हैं। औरतों से जुड़ी हुई बहुत सारी समस्याएँ एवं मुद्‍दे हैं जिन पर ध्यान दिया जा सकता है तथा सकारात्मक ढंग से इसे सदन में इसे उठाया जा सकता है। सुर्खियों में बने रहने के लिए यह चारित्रिक एवं नैतिक अधो:पतन की पराकाष्ठा नहीं तो और क्या है। 

शनिवार, 16 अगस्त 2014

“His sophism as moralist, sociologist and legislator reaches new heights…. Seduced by a false religion, beheld as a criminal, I reduce our labour to very little. Let us creat few laws; but let them be good…..”

अर्थात इस पंक्ति में साद का दर्शन यह  है कि सबसे पहले एक नैतिक शुन्य तैयार करो, फिर उसे नई चेतना से भरो-चेतना जिसे प्रभुतासंपन्न लोग अपनी सुविधा, अपनी शर्तों पर तैयार नियमावलियों से ’मैनुफैक्चर’ करते हैं। (सीवर ऎंड वेनहाउस: द माक्यु द साद, पृ.११३) हिंदी में प्राय: सब मूल्य स्त्रीलिंग ही हैं, समाज चाहता है कि इन सारे मूल्यों का निवेशन सिर्फ स्त्री में हो! क्योंकि स्त्री संस्कृति की प्रहरी है; संस्कृति जो कि संप्रभुओं की क्रीतदासी है। यह तर्क कहीं से भी न्यायोचित नहीं दीखता। अगर दुनिया की सारी उच्चशयता का ठीका स्त्रियाँ ले भी ले तो वे प्रेम करने लायक अर्थात अपनी नैतिक कद-काठी का पुरुष कहाँ से पाएँगी ? अपने से कमतर पुरुष से स्नेह तो किया जा सकता है, उस पर ममता तो लुटाई जा सकती है, किंतु प्रेम नही किया जा सकता।

शुक्रवार, 1 अगस्त 2014





जीवन की कटुताएँ

दुर्घटनाओं का गरल पिया 
स्थितियों का विष ! कितना तीखा
जीवन की कटुताएँ तीखी
इनके सम्मुख विष भी फीका
    
उफ्फ ! मन है या यह रणस्थली
घनघोर युद्ध, कैसा स्वर है
यह शोर कहाँ है ? किधर कहाँ ?
मन के भीतर या बाहर है ?

संकल्पों का वह सत्य आज मर चुका,
सत्य का यह पार्थिव स्वरूप जल जाने दो
यह सत्य अरे जो शाश्वत था किन्तु इसको 
तन और गलाने दो, कुन्दन बन जाने दो।

सन्देह नपुंसकता की एक घोषणा है,
संदेह दृष्टि का दोष,
संदेह दृष्टि का जाल नये बुन-बुनकर 
किम्वदंतियाँ नित नई गढ़ता रहता।

लांछन बनकर कहीं सिर चढ़ा तो 
कहीं पुछल्ला बन लीक पीटता रहता है
बिच्छु सा कहीं डंक से यह छू लेता
उफ्फ- पीड़ा से सारा तन दहता है।

उजला जो चरित मिला उस पर ही दोष मढ़ा
संदिग्ध अक्षरों से लिख डाले लेख नये
कुछ नई भ्रान्तियाँ देने को यह फुसफुसा रहा
इसके स्वर भी संदिग्ध !

संदेह तुम्हारा अपना हो या जनता का
संदेह अग्नि में धू-धू-धू-धू जलती हूँ मैं
लो राम अब चलती हूँ मैं

शुक्रवार, 25 अक्टूबर 2013

मुझे सहजीवन और विवाह में बुनियादी फर्क नजर नहीं आता। फर्क है तो इतना कि विवाह के सिर पर कानून की छतरी और धर्म का चंदोवा टंगा है और सहजीवन(living relationship) बिना छतरी और चंदोवे के धूप और बारिश साथ झेलने और भोगने के रोमांस से नहाया हुआ है। विवाह एक परम ठोस सामाजिक व्यवस्था है: जँहा आल-औलाद, नैहर-ससुराल, पड़ोस-मुहल्ला, पोथी-पतरा, रीति-रिवाज एवं गहना- गुड़िया, कपड़ा-लत्ता, पेटी-बक्सा साथ में कदम-कदम पर बृहत्तर समाज खड़ा है। सहजीवन है खुले द्वार का पिंजड़ा, जब तक मिठास से निभे रहो वरना तुम अपने रास्ते, हम अपने। सिद्धांत: मैं इससे सहमत हूँ रिश्तों और पदों से तब तक ही जुड़ो, जब तक तुम्हें लगे कि तुम इन्हें व्यक्तित्व का सर्वोत्त्म दे रहे हो। अगर आपको देर से पता चलता है कि आप ऎसे दो धातु पिंड है जिनका एलॉय (alloy) बन ही नही सकता तो ऎसे बंधन को किसी बृहत्तर सरोकार के लिए ढोना व्यर्थ है। सहजीवन में आप इस बंधन को ढोने के लिए बाध्य नहीं है। किन्तु विवाह तो ऎसा फेविकॉल जोड़ है जो घसीट मारता है पर टूटता नहीं। 

शुक्रवार, 10 मई 2013

लोकनायक गोस्वामी तुलसीदास की समन्वय साधना




महात्मा बुद्ध के बाद भारत के सबसे बड़े लोकनायक महात्मा तुलसीदास थे। वे युग्स्रष्टा के साथ-साथ युगदृष्टा भी थे। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार:-"लोकनायक वही हो सकता है जो समन्वय कर सके। क्योंकि भारतीय जनता में नाना प्रकार की परस्पर विरोधिनी संस्कृतियाँ, साधनाएँ, जातियाँ, आचारनिष्ठा और विचार-पद्धतियाँ प्रचलित हैं। बुद्धदेव समन्वयकारी थे। गीता में समन्वय की चेष्टा है और तुलसीदास भी समन्वयकारी थे।" (हिन्दी साहित्य की प्रवृतियाँ-डॉ.जयकिशन प्रसाद खंडेलवाल-पृ.सं.२२३) लोकनायक उस महान व्यक्ति को कहा जा सकता है जो समाज के मनोविज्ञान को समझकर प्राचीनता का संस्कार करके नवीन दृष्टिकोण से उसमें उचित सुधार करके जातिगत संस्कृति का उत्थान करता हो। उस युग के संदर्भ में यह कहना सर्वथा उचित होगा कि गोस्वामी तुलसीदासजी की वाणी की पहुँच मानव-हृदय के समस्त भावों एवं मानव-जीवन के समस्त व्यवहारों तक दिखाई देती है। उनके काव्य में युग-बोध पूर्णरूपेण मुखरित हुआ है।

"कलि मल ग्रसे धर्म सब लुप्त भए सद्‍ग्रंथ।
दंभिन्ह निज मति कल्पि करि प्रगट किए बहुपंथ॥" 

इस प्रकार तुलसी अपनी समन्वय-साधना के कारण उस युग के लोकनायक थे। तुलसीदास में वह प्रगतिशीलता विद्यमान थी, जिससे वे परिस्थितियों के अनुकूल नवीन दृष्टिकोण अपना कर प्राचीनता का संस्कार कर सकें। इतनी विषमताओं में साम्य स्थापित करनेवाला पुरुष यदि लोकनायक नहीं होगा तो और कौन होगा? 
भक्ति शील और सौन्दर्य के अवतार तुलसी के राम:- तुलसी के राम सर्वशक्तिमान, सौन्दर्य की मूर्ति एवं शील के अवतार हैं। वे मर्यादापुरुषोत्तम हैं। 

"जब-जब होहि धरम के हानि। बाढ़हि असुर महा अभिमानी॥
तब-तब धरि प्रभु मनुज सरीरा। हरहिं सकल सज्जन भव पीरा॥"

अर्थात जब-जब समाज में विश्रृंखलता उत्पन्न होकर उसकी गति रुद्ध होती है तब-तब किसी एक महापुरुष का अविर्भाव होता है एवं गति-रुद्धता समाप्त होकर पारस्परिक सहयोग एवं समानता का वातावरण बनता है। रामराज्य भी इसी दिशा में एक कदम है। महाभारत के कृष्ण ने महाभारत का संचालन कर प्रतिकूल शक्तियों का उन्मूलन किया एवं ज्ञान, कर्म और शक्ति की एकता स्थापित की। कालातंर में कर्मकांड में हिंसा की प्रमुखता एवं ज्ञान और भक्ति का ह्रास होने पर बुद्ध अवतरित हुए। शांति, अहिंसा, मैत्री एवं प्रेम का विश्वव्यापी वातावरण तैयार हुआ जिसे साहित्य एवं इतिहास में बुद्धकाल के नाम से जाना गया। किंतु ८वीं शताब्दी में बौद्धधर्म भी कर्मकांड के जाल में फँसता चला गया, एवं दो शाखाओं में विभाजित हो गया व्रजयान और महायान। इन शाखाओं ने वाममार्गी साधना पर अधिक जोर दिया परिणामस्वरूप समाज में दुराचार एवं अव्यवस्था फैलने लगा। ठीक इसी समय जगदगुरू शंकराचार्य का प्रादुर्भाव हुआ। उन्होंने धार्मिक क्षेत्र में अद्वैत सिद्धांत की स्थापना की। जिससे कर्मकांड में उलझी जनता एवं समाज को थोड़ी बहुत राहत मिली, बाद में गोस्वामी तुलसीदास ने आदर्शहीन एवं विलासिता में मग्न समाज का उत्थान करने के लिए मर्यादा पुरुषोत्तम राम के चरित्र को मानस में उतारा। उन्होंने विशृंखल समाज को मर्यादा के बंधन में बाँधकर समन्वय की भावना उत्पन्न की और लोकधर्म का नवीन संस्कार किया। 

राम का लोकसंग्रही रूप एवं धार्मिक समन्वय:- तुलसी ने तत्कालीन बौद्ध सिद्धों एवं नाथ योगियों की चमत्कारपूर्ण साधना का खडंन करके राम के लोकसंग्रही स्वरूप की स्थापना की। राम के इस रूप में उन्होंने समन्वय की विराट चेष्टा की है। तत्कालीन समाज में शैवों, वैष्णवों और पुष्टिमार्गी तीनों में परस्पर विरोध था।  इस कठिन समय में तुलसीदास ने वैष्णवों के धर्म को इतने व्यापक रूप में प्रस्तुत किया कि उसमें उक्त तीनों संप्रदायवादियों को एकरूपता का अनुभव हुआ। मानस में तुलसी के इस प्रयत्न की झाँकी देखी जा सकती है। राम कहते हैं-
"शिव द्रोही मम दास कहावा। सो नर मोहि सपनेहु नहिं भावा॥
 संकर विमुख भगति चह मोरि। सो नारकीय मूढ़ मति थोरी॥"

इसी प्रकार उन्होंने वैष्णवों और शाक्त के सामंजस्य को भी दर्शाया है।

"नहिं तब आदि मध्य अवसाना।अमित प्रभाव बेद नहिं जाना।
भव-भव विभव पराभव कारिनि। विश्व विमोहनि स्दबस बिहारिनि॥"

पुष्टिमार्गी के ’अनुग्रह’ का महत्त्व भी दर्शनीय है-

"सोइ जानइ जेहु देहु जनाई। जानत तुमहि होइ जाई॥
तुमरिहि कृपा तुमहिं रघुनंदन। जानहि भगत-भगत उर चंदन॥"

यह तो हो गई तुलसीदास की तत्कालीन धार्मिक वातावरण एवं उसमें समन्वय स्थापित करने की बात।  इसका दूसरा पक्ष भी था उस युग में सगुण और निर्गुण उपासना का विरोध। जहाँ सगुण धर्म में आचार-विचारों का महत्त्व तथा भक्ति पर बल दिया जाता था वहीं दूसरी ओर निर्गुण संत साधकों ने धर्म को अत्यंत सस्ता बना दिया था। गाँव के कुँओं पर भी अद्वैतवाद की चर्चा होती थी; किंतु उनके ज्ञान की कोरी कथनी में भावगुढ़ता एवं चिंतन का अभाव था। तुलसीदास ने ज्ञान और भक्ति के विरोध को मिटाकर वस्तुस्थिति स्पष्ट कर दी।

"अगुनहिं सगुनहिं कछु भेदा। कहहिं संत पुरान बुधवेदा॥
अगुन अरूप अलख अज जोई। भगत प्रेम बस सगुन सी होई॥"

ज्ञान भी मान्य है किंतु भक्ति की अवहेलना करके नहीं। ठीक इसी प्रकार भक्ति का भी ज्ञान से विरोध नहीं है। दोनों में केवल दृष्टिकोण का थोड़ा-सा अंतर है। राम कहते हैं-

"सुनि मुनि तोहि कहौं सहरोसा। भजहि जे मोहि तजि सकल भरोसा॥
करौं सदा तिन्ही कै रखवारी। जिमि बालकहिं राख महतारी॥
गह सिसु बच्छ अनल अहिधाई। तह राखै जननी अरू गाई॥
प्रौढ़ भये तेहि सुत पर माता। प्रीति करे नहिं पाछिल बाता॥
मोरे प्रौढ़ तनय सम ग्यानी। बालक सुत सम दास अमानी॥
 जानहिं मोर बल निज बल नाहीं। दुह कहँ काम क्रोध रिपु आहीं॥
यह विचारि पंडित मोहि भजहि। पाएहू ग्यान भगति नहिं तजहीं॥"

हृदय की स्वच्छता पर बल:- तुलसीदास ने तत्कालीन धार्मिक संप्रदायवाद में बाह्याडंबर को प्रधानता न देते हुए हृदय की स्वच्छता पर बल दिया। तुलसी के राम ने संतों के जो लक्षण बताए हैं, उसके मूल में हृदय की स्वच्छता है। 
"निर्मल मन सोइ जन मोहि पावा। मोहि न कपट-छ्ल-छिद्र सुहावा॥"

यह उस समय की धार्मिक स्थिति की माँग थी। तुलसीदास धार्मिक नेता ही नहीं अपितु महान समाज-सुधारक भी थे। रामराज्य की कल्पना के द्वारा उन्होंने उस समय के विद्यमान राजनीतिक गंदगी को दूर करने का यथासंभव प्रयास किया। मुसलमानों की राजनीति से हिंदू जाति आक्रांत थी। इन विषम परिस्थितियों में तुलसीदास ने खलविनाशक राम के शक्तिशाली जीवन द्वारा लोकशिक्षा का पाठ पढ़ाया। किस प्रकार अत्याचार का घड़ा भरने पर अंतोगत्वा फूटता ही है, तथा उसके विरूद्ध विद्रोह होता है और शांति की स्थापना होती है, यह मानस में देखने को मिलता है। तुलसी दास ने रामराज्य की आदर्श कल्पना कर समाज के समक्ष यह उदाहारण प्रस्तुत किया कि राजा का आदर्श प्रजा-पालन एवं दुष्टों का विनाश है।
समाज की मर्यादा का निरूपण:-तुलसीदास ने समाज की मर्यादा का निरूपण लोक-जीवन के विविध संबंधों के माध्यम से दर्शाया है-’पिता-पुत्र’, ’माता पुत्र’, ’भाई-भाई’, ’राजा-प्रजा’, ’सास-बहू’, ’पति-पत्नी’ इत्यादि उन सभी की मर्यादा का वर्णन राम के महाकाव्यात्मक विस्तृत जीवन के अनेक प्रसंगों के माध्यम से किया। बदलाव युग की आवश्यकता एवं समय की माँग थी, पुरानी रूढ़ियों एवं सामाजिक मर्यादा के प्रति विद्रोह के स्वर सुनाई पड़ रहे थे।तुलसीदास ने इस विद्रोह को भली-भाँति सुना, देखा और समझा। तुलसी ने मानस में कहा भी है-
"बरन धरम नहिं आश्रम चारी। श्रुति विरोध रत सव नरनारी॥
द्विज श्रुति बंचक भूप प्रजासम। कोउ नाहिं मान निगम अनुसासन॥"

तुलसी का मानस स्वान्त: सुखाय होते हुए भी परजन-हिताय का संयोजक था। इसकी परिणति हमें संत के जीवन में देखने को मिलता है। 

’मुद मंगलमय संत समाजू। जो जग जंगम तीरथराजू॥"

तुलसीदास ने मानस में लोक और वेद, व्यवहार एवं शास्त्र का समन्वय प्रस्तुत किया है।

"चली सुगम कविता सरिता सो। राम विमल जस भरिता सो॥
सरजू नाम सूमंगल मूला। जाकि वेद मत मंजुस कूला॥"

चित्रकूट में भरत-राम मिलन के अवसर पर होने वाली सभा में तुलसी ने भरत के वचनों के द्वारा साधुमत, लोकमत, राजनीति एवं वेदमत के मध्य सुंदर समन्वय प्रस्तुत किया है। पं. रामचंन्द्र शुक्ल के अनुसार-" साधुमत का अनुसरण व्यक्तिगत साधन है, लोकमत लोकशासन के लिए है। इन दोनों का सामंजस्य तुलसी की धर्म भावना के भीतर है।" (हिन्दी साहित्य की प्रवृतियाँ-डॉ.जयकिशन प्रसाद खंडेलवाल-पृ.सं.२२६)
आध्यात्मिक क्षेत्र में समन्वय:-उस युग में ईश्वर प्राप्ति के साधनों की बहुलता थी। विभिन्न दर्शनों के मक्क्ड़जाल में जनता उलझी हुई थी। तुलसीदास ने द्वैत-अद्वैत, द्वैताद्वैत-तीनों सिद्वान्तों को भ्रम मानते हुए कहा-
"तुलसी दास परिहरै तीन भ्रम सो आपन पहिचानै।"

उनके ब्रह्म की मर्यादा विशिष्टाद्वैत से ही निर्मित है-

" सीया-राममय सब जग जानी। करहूँ प्रनाम जोरि जुग पानी॥"

काव्य शैली में समन्वय:- तुलसी पूर्णतया समन्यवादी थे। उन्होंने काव्य की भाषा-शैली पर भी समन्वय की मोहर लगा दी। उन्होंने अपने समय की तथा पूर्व प्रचलित सभी काव्य-पद्धतियों को राममय करने का सफल प्रयास किया। यहाँ तक की सूफियों की दोहा-चौपाई पद्धति, चन्द के छ्प्पय और तोमर आदि, कबीर के दोहे और पद, रहीम के बरबै, गंग आदि की कवित्त-सवैया-पद्धति एवं मंगल-काव्यों की पद्धति को ही नहीं वरन जनता प्रचलित सोहर, नहछू, गीत आदि तक को उन्होंने रामकाव्यमय कर दिया। इस प्रकार उन्होंने काव्य की प्रबंध एवं मुक्तक-दोनों शैलियों को अपनाया। उन्होंने तत्कालीन कृष्ण-काव्य की ब्रज-भाषा और प्रेम-काव्यों की अवधी भाषा-दोनों का प्रयोग कर अपने समन्वयकारी दृष्टिकोण का परिचय दिया।
स्वानत:सुखाय तुलसी रघुनाथ गाथा : लोककल्याण- तुलसी के काव्य में लोकसंग्रह की भावना अविच्छिन्न रूप से व्याप्त है। इसके जरिए तुलसी ने ’सत्यं शिवं सुन्दरं’ को साकार किया है। तुलसीदास ने अपने काव्य का सृजन स्वान्त: सुखाय किया या परांत सुखाय, यह भी विचारणीय है। स्वयं तुलसीदास ने लिखा है कि मैंने रघुनाथ-गाथा ’स्वान्त: सुखाय’ लिखा है। डॉ. श्यामसुन्दर के अनुसार-"तुलसीदासजी ने जो कुछ भी लिखा है, ’स्वान्त: सुखाय’ लिखा है। उपदेश देने की अभिलाषा से अथवा कवित्त्व-प्रदर्शन की कामना से जो कविता की जाती है उसमें आत्मा की प्ररेणा न होने के कारण स्थायित्व नहीं आता। तुलसी की रचना में उनके हृदय से सीधे निकले हुए भाव है, इसी कारण तुलसी का काव्य सर्वश्रेष्ठ है।"(हिन्दी साहित्य की प्रवृतियाँ-डॉ.जयकिशन प्रसाद खंडेलवाल-पृ.सं.२२७) तुलसी ने रामकाव्य की रचना का उद्देश्य ही लोककल्याण बताया है; यथा-
"कीरति भनिति भूति भलि सोई।
सुरसरि सम सब कहँ हित होई॥"


अर्पणा दीप्ति

समय के लिए कुछ और तय नहीं

  स मय के लिए कुछ और तय नहीं सिवा इसके कि यह बीत जाता है लेकिन जो बीतता नहीं लौटता रहता है वह भी कोई समय ही था ज्यों तुम समय की तरह बीत चुके...