कुछ चीज़ों को छोड़ना अच्छी बात होती
है।
जैसे हर बात पर नहीं बोलना, चुप रहना और सोचना, एक विराम लेना। अच्छा होता है। वरना हमें पता ही नहीं कहां चले जा रहे,क्या बोले जा रहे क्या किए जा रहे।
पॉज या विराम अच्छा होता है। अवकाश
लेना अनिवार्य होना चाहिए। दूर से देख आप खुद को भी समझते हैं और अन्य लोगों को
भी।
अपने होने में हम बहते चले जाते हैं
और फिर समझ नहीं आता कि रास्ते में आए पत्थरों ने पानी को कितना मैला किया। उसके
लिए थिर होना पड़ता है। तभी समझ आता है कि कितनी धूल कितने कंकड़ बैठे। खुद को
पाने के लिए खुद को थामना होता है।
और एक उम्र में हमें जरूर लगता है कि
हम जैसे हैं अच्छे हैं, हमें कोई वैसे ही स्वीकारे जैसे हम
हैं पर इस बात को जितनी जल्दी समझ लिया जाए कि जैसे हम हैं वैसा काफी नहीं। हमें
लगातार खुद पर काम करना पड़ता है। और बदलाव बेहतरी के लिए हों तो और अच्छे। अपनी
धारणाओं, अपनी सीमाओं से टकराते रहना उनको
छोड़ना चाहिए। अच्छी बात होती है।
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