बुधवार, 7 जनवरी 2026

 

साल 2025 बीत चुका है और नया साल का आगमन हो चुका है | गुज़रते और आते इन सालों की संधि पर खड़े होकर अपने समय के कुछ रचनाकारों-चिंतकों की साहित्य की दुनिया की कुछ चुनिंदा पुस्तकों को  पिछले साल पढ़ा और उनकी क्या ऐसी अनोखी बात रही कि वह जेहन में रह गई|

अर्पणा दीप्ति




 

 




इस शहर में इक शहर था’

जादवानी का उपन्यास विस्थापन से उपजे हेरवे की कहानी है, जिसमें तीखा दर्द भरती है,अनकही छूटी बचपन की मुहब्बत. खास बात, हेरवे का मरकज़ लाहौर नहीं, सिंध का कस्बा शिकारपुर है. सबसे दर्दीला है, छूटी सिंधी भाषा का दंश, जो जब सुनने को मिल जाए, वापस आया जीव, रस में डूब जाए.

मैंने पढ़ी, आनंद आया, आगे क्या होगा जानने की बेताबी हुई. छूटी महबूबा के दर्शन होंगे? हुए तो बात कही न जा सकी. कोई अड़चन नहीं थी, बस यही अड़चन थी.



जब से आंख खुली है

जब से आंख खुली है, तंगहाली और भयावह स्थितियों में काम करने वाले खदान मजदूरों की आत्मकथा है, जिनमें लेखक समेत छोटे बच्चे शामिल हैं. पर लिखी इस अंदाज़ में गई है कि भयावह से भयावह हालात में भी, लालित्य और जिजीविषा खोज ली गई है. यूं कि रोने को तत्पर मुझ-सा पाठक भी, एक बारगी मुस्करा दे और समझे कि लो, ये तो अभाव के त्रासद विवरण के बीच, जिंदगी जीने का गुर सिखा गई. वह न सीखा और रो कर रह दिए तो माफ़ कीजिए, कुछ और पढ़ लें तो बेहतर होगा.

 

 




 


 

Living to Tell the Tale’

गैब्रियल गार्सिया मारकेज द्वारा अपने आरंभिक 30 वर्षों के जीवन के बारे में लिखी यह किताब एक लेखक के जुनून, समर्पण और मुश्किल हालातों में भी उसके लेखक बनने के सपने के ज़िंदा रहने की कथा है. कई अद्भुत चीज़ों के बीच इस किताब की जो सबसे अनोखी बात है कि इसे पढ़ना केवल एक विलक्षण लेखक की आत्मकथा पढ़ना भर नहीं है- इसका स्वरूप तथ्यात्मक चीज़ों से परे जाता है और उस दुनिया के आसपास घूमता है, जो लगभग उतनी ही रहस्यमयी लगती है जितना कि उसे लिखने वाला.

 

 




रचना का गर्भगृह’

कृष्णा सोबती के उपन्यासों से अधिक उनके कथेतर गद्य ने मुझे प्रभावित किया. आर. चेतनक्रांति द्वारा संपादित कृष्णा सोबती के लेखों की यह किताब एक लेखक के तौर पर हमारी प्राथमिकताओं, प्रतिबद्धताओं और आवश्यक निर्णयों को रेखांकित करते हुए हमें स्त्री -पुरुष के खांचे से अलग ‘लेखक- नागरिक’ की समदर्शी और लोकतांत्रिक अवधारणा से जोड़ती है. इन लेखों को पढ़ते हुए हम लेखक के तौर पर अपनी ज़िम्मेदारियों के प्रति सजग और संवेदनशील होते हैं.




मदर मैरी कम्स टू मी 

अरुंधति रॉय द्वारा अपनी मां मेरी रॉय पर लिखे गए संस्मरण (memoir) मदर मैरी कम्स टू मी  ने किया. मां से जुड़ी यादों को लिखती हुई अरुंधति ने पूरी निर्ममता, ईमानदारी और निर्भीकता से अपने जीवन की परतें भी खोली हैं. एक व्यक्ति और लेखक के रूप में अपनी असुरक्षाओं, उद्देश्यों और प्रतिबद्धताओं को उन्होने जिस बेबाकी और संजीदगी से पाठकों के सामने रखा है, वह दुर्लभ और अनुकरणीय है.

किताब पढ़ते हुए हम कई जगह उनके निजी निर्णयों और चुनावों से असहमत हो सकते हैं; यहां तक कि निर्णायक भूमिका में भी आ सकते हैं, लेकिन उनकी दुस्साहसी स्वीकरोक्ति एक मनुष्य और लेखक के तौर पर उनकी छवि को और उदार ही बनाती है. अपनी असुरक्षाओं, निर्णयों, मां और परिवार के अन्य सदस्यों के बारे में उनका निरपेक्ष लेकिन बहुत ही रोचक और विनोदपूर्ण वर्णन किताब से अंत तक बांधे रखता है.



 

रविवार, 4 जनवरी 2026

 

कुछ चीज़ों को छोड़ना अच्छी बात होती है।

जैसे हर बात पर नहीं बोलना, चुप रहना और सोचना, एक विराम लेना। अच्छा होता है। वरना हमें पता ही नहीं कहां चले जा रहे,क्या बोले जा रहे क्या किए जा रहे।

पॉज या विराम अच्छा होता है। अवकाश लेना अनिवार्य होना चाहिए। दूर से देख आप खुद को भी समझते हैं और अन्य लोगों को भी।

अपने होने में हम बहते चले जाते हैं और फिर समझ नहीं आता कि रास्ते में आए पत्थरों ने पानी को कितना मैला किया। उसके लिए थिर होना पड़ता है। तभी समझ आता है कि कितनी धूल कितने कंकड़ बैठे। खुद को पाने के लिए खुद को थामना होता है।

और एक उम्र में हमें जरूर लगता है कि हम जैसे हैं अच्छे हैं, हमें कोई वैसे ही स्वीकारे जैसे हम हैं पर इस बात को जितनी जल्दी समझ लिया जाए कि जैसे हम हैं वैसा काफी नहीं। हमें लगातार खुद पर काम करना पड़ता है। और बदलाव बेहतरी के लिए हों तो और अच्छे। अपनी धारणाओं, अपनी सीमाओं से टकराते रहना उनको छोड़ना चाहिए। अच्छी बात होती है।

 



शनिवार, 29 नवंबर 2025







जीवन में लोग गुलाब की तरह मिलते हैं। मोहक रंग, मनभावन खुशबू और कोमल पंखुड़ियों जैसे। ठीक है कि उनके साथ कुछ कांटे भी होते हैं पर कठिन है कांटो के डर से गुलाब से दूर होना।

शुक्रवार, 14 नवंबर 2025

मेरी सहेली के इंस्टाग्राम की स्टोरी थी ये तस्वीर। सच पूछिए तो ऐसा आसमान अब किस्मत वालों को नसीब है। हमें कहा! ये नदी ये आसमान और नीला रंग तस्वीर में देख हम आहें भर सकते हैं।

अच्छा पर्यावरण भी अब लग्ज़री है। हम गरीबों को नहीं है हासिल। 


चाँद का पहाड़


इतने दिनों से किताबों पर लिखने/बोलने और अब रील बनाने के बाद मुझे पहली बार किताब किसी प्रकाशक ने भेजी। दोस्त या लेखक ने नहीं,प्रकाशक ने। मुझे लगा था कि यह किताब जैसी भी होगी मैं आपको सच सच बताऊंगी। तो कल यह अनुवाद मिला और मैंने इसे उलट पलट के देखा तो भाषा में रवानी दिखी। कहानी तो पता ही थी। शाम को व्यस्तता के बाद भी पढ़ गई लेकिन कल इसके बारे में पोस्ट करने जैसा मन/माहौल नहीं था।
जयदीप शेखर का यह अनुवाद बेशक बहुत उम्दा है। बंगाल के प्रभाव में कई शब्द उसी तरह से इस्तेमाल किए गए हैं जैसा मूल में होगा। पर आज की किशोर पीढ़ी के लिए अमूमन सहज सरल भाषा है। पढ़ते हुए हिंदी की अपनी किताब ही महसूस हो रही है। 149 रुपए मूल्य हैं और amazon से आसानी से उपलब्ध है। एक ही शिकायत है मेरी कि इसका size बहुत ही छोटा है। अगर फॉन्ट थोड़े बड़े होते और किताब कुछ और चित्रों के साथ कुछ सामान्य आकर की होती तो निस्संदेह इसका मूल्य ज्यादा होता पर छठी से दसवीं तक के किशोरों को आकर्षक भी लगती। बच्चों की किताबों की तरह नहीं पर किशोरों की किताबों की तरह इसे छापना चाहिए।
कल मेरे हाथ में इसे देख मेरी दो बांग्ला भाषी छात्राओं ने बताया कि यह किताब उन्होंने पढ़ी है पर चांदेर पहाड़ नाम से बंगला में। मैंने कहा वही तो मूल है। सोचिए अभी भी बांग्ला वाले अपनी भाषा की किताबें अपनी अगली पीढ़ी को पढ़ाते/बताते हैं। यहाँ हिंदी के लेखकों की भावी पीढ़ी ही हिंदी पढ़ने/लिखने/बोलने से कोसों दूर जा रही है/चली गई है।
खैर! इस bookmark पर लगे scaner को scan करके यह किताब आप आसानी से खरीद सकते हैं। मैं क्लोज़ तस्वीर दे रही हूँ। उम्दा और रोचक साहित्य पढ़िए-पढ़वाइए।

बुधवार, 29 अक्टूबर 2025

छठ पर्व मूलभावना और पूर्वाग्रह

 


आप बिहार को, बिहारियों को , उसके पर्व त्योहार , रीति रिवाज को गाली दीजिए, आलोचना करिए, कोई कुछ नहीं कहेगा. बिहारी ही समर्थन करने कूद जाएगा. सबको पोलिटिकली करेक्ट कहलाना जो है.

बहुत दिक़्क़त है भाई. बिहार , बिहारी और छठ से.

होली , दीवाली आते ही भाई लोग क्यों रंगीन हो उठते हैं और जगमगा उठते हैं?

किस पर्व के मूल में स्त्री विरोध नहीं?

होलिका दहन बंद हो. रावण दहन भी. हम तो दोनों के विरोधी हैं.

और दीवाली क्यों मनाते हो? सीता के आगमन पर दीये जलाते हो?

कौन लौटा था विजय पथ पर?

हमको कोई विरोध नहीं.

होली मनाना जरुरी है? किसके लिए? किस स्त्री की उपलब्धि पर?

दुर्गा पूजा और गणेश पूजन में नदियों का क्यों हाल बुरा करते हो?

बहुत आसान है बिहार की आलोचना. क्योंकि हम सुन लेते हैं और आत्मालोचन करने लगते हैं.

मैं भी मानती हूँ कि हर पर्व के मूल में स्त्री पक्षधरता नहीं है, उसकी मुश्किलें हैं. सारा बोझ उसके कंधे पर है.

लेकिन छठ में मैंने जो बचपन से देखा है, वो अनुभव बता सकती हूँ.

मेरे यहाँ छुट्टी लेकर देश परदेस से लड़के लौटते रहे हैं.

छठ सहयोग का पर्व है सामाजिकता का |




व्रती में इतना दम कहां कि वो कोई काम कर सके.

सामूहिकता का पर्व इसीलिए कहते हैं कि काम का बोझ सब पर पड़ता है, सिर्फ स्त्रियों पर नहीं.

अब आते हैं - छठ के मूल भाव पर.

सूरज की पूजा, प्रकृति की पूजा, फल फूल और नदी का साहचर्य. सब बढ़िया है लेकिन मूल भाव पुरुष समर्थक था. अब बदला है.

सिर्फ छठ ही नहीं, तीज , जितिया , करवा चौथ इत्यादि.

छठ पूजा अपने परिवार के लिए की जाती है जिसमें पुरुषों के नाम पर अरग देते रहे हैं. मैंने पिछले दस सालों में नियम बदलते देखा है. अब लड़कियों के नाम पर भी अरग देते हैं. जितिया करती हैं माँएँ.

जो धर्म और रीति रिवाज समय के साथ नहीं सुधरते , उन्हें वक्त ख़ारिज कर देता है,

आप आलोचना का टूल लेकर बैठे जुगाली करते रहिए. बात सुधार की होनी चाहिए, दुरदुराने से कुछ नहीं होता.

हर पर्व में , हर पूजा -पाठ में पाखंड है. उन्हें सुधारने की जरुरत है. लेकिन कैसे?

मेरी दोस्त की एक बात हमेशा याद रहती है- धर्म का सांस्कृतिक पक्ष स्वागत योग्य है.

जिसमें उत्सव है, चमक -दमक और सामूहिकता है.

अब अगली आलोचना क्रिसमस की करेंगे न आप लोग?

अगले महीने ही है जब सारी दुनिया लाल सफेद रंगों से ढँक जाएगी.

जिंगल बेल … सुनाई देगा. वहाँ भी एक पुरुष की वापसी होगी और सारी स्त्रियाँ डिनर बनाएँगी, कुकीज़ बनाएँगी.

सैंटा आएगा …. उपहार बांटने. कितना बड़ा हसीन फरेब है न ! बच्चे इसी में खुश ! हम उनसे ये ख़ुशियाँ कैसे छीन लेंगे ? क्रिसमस की सुबह वे अपने सिरहाने टटोलेंगे और उपहार ढूँढेंगे. उनको सच्चाई तब बता पाओगे?

और हाँ…  मैं छठ करती हूँ जितिया और तीज भी ||


जिसको जो अच्छा लगता है, जिसमें खुशी मिलती है, वो करे.

बात जब भी हो, खूबियों और कमियों दोनों पर हो.

पूर्वग्रह से भर कर नहीं।

 

शुक्रवार, 3 अक्टूबर 2025

गिरते हुए आप कहाँ अटक रहे हैं यह भी बहुत महत्वपूर्ण है।

 मैंने आसानी से उन चीजों की तलाश छोड़ दीं जो मुझे पसंद रहीं और उन पर राज़ी होना सीख लिया नियति मेरे रस्ते में लाती गई। इसमें कोई बुराई नहीं! इंसान भाग्य को रोता है पर नियति को स्वीकारता भी है। कर्म अपने हाथ में है और कुछ प्रारब्ध भी है।

खैर! इस भूमिका के पीछे बात इतनी ही है कि बचपन में फोटोग्राफी का एक शौक चढ़ा। लगा आगे भी की जाएगी। मेरी सबसे प्यारी सखी ने एक कैमरा खरीद कर दिया था जब मैं पहली बार दिल्ली जा रही थी। उस ट्रिप या उसके बाद भी कुछ कुछ तो करती रही पर नियमित नहीं रही। इसलिए शौक या स्किल कुछ अधिक विकसित हुआ नहीं। एक और कमी है मुझमें फ्रेम बनाने का धैर्य या रोशनी और छाया के खेल को पकड़ने का हुनर भी नहीं। फिर भी शौक ज़ोर मारता है कभी कभी।
इसीलिए यह भी करती हूँ।




गिरते हुए आप कहाँ अटक रहे हैं यह भी बहुत महत्वपूर्ण है।
अर्पणा

समय के लिए कुछ और तय नहीं

  स मय के लिए कुछ और तय नहीं सिवा इसके कि यह बीत जाता है लेकिन जो बीतता नहीं लौटता रहता है वह भी कोई समय ही था ज्यों तुम समय की तरह बीत चुके...