शुक्रवार, 23 फ़रवरी 2018

अद्भुत अनोखा अकल्पनीय बेमिसाल “लेखकों की दुनिया”








2018 में प्रकाशित ‘लेखकों की दुनिया’ हिन्दी साहित्य का  एक बेशकीमती किताब है | यह किताब आपको दुनिया के उन तमाम लेखकों का दर्शन करवाता है जिनसे या तो आप अनभिज्ञ हैं या उनमें से कुछेक की जानकारी आपके पास है | 250 पृष्ठ की किताबवाले नयी दिल्ली से प्रकाशित यह पुस्तक दुनिया के तमाम लेखकों की झलकियों को सहेजे हुए है | हाँ सभी कालखंड के सभी लेखकों की जानकारी तो उपलब्ध नहीं है लेकिन तमाम प्रमुख लेखकों की जानकारी इसमें समाहित है | क्या आप सोच सकते हैं इन लेखकों को अलग से एक-एक कर पढ़ना कितना मुश्किल है ? 250 पृष्ठों में इनका संशोधन कर एकत्रित करना कितना कठिन है लेकिन इन सबको एक जगह एकत्र कर अनोखा और अद्भुत कार्य किया है लेखक सूरज प्रकाशजी ने |

कैसे होते हैं लेखक ? कैसी होती है उनकी अजीबो-गरीब दुनिया ? उनका दिनचर्या, उनका दुःख तकलीफ, जिन्हें वह अपने अन्दर समाहित कर दुनिया को अपना सर्वोत्तम देकर जाते हैं | हर लेखक की शैली अलग-अलग |

      अब बात करते हैं भाग एक 'लेखकों की दुनिया अजब-गजब' की | अजीबो-गरीब तरीके से लिखने वाले कुछ लेखक की अर्नेस्ट हेमिंग्वे, चार्ल्स डिकेंस, वर्जीनिया वुल्फ, आचार्य नगेन्द्र आदि खड़े होकर लिखते थे | एडमंड रोस्ता अपने बाथटब में बैठकर कविता लिखते थे तो दिविक रमेश शहतूत के पेड़ पर बैठकर कविता लिखते थे | सर वाल्टर स्काट घोड़े के पीठ पर सवार होकर कविता रचते थे | चेखव को घड़ी सामने रखकर लिखने की आदत थी तो अमेरीकी लेखक जान शीवर अंडरवियर में कहानी लिखते थे क्योंकि उनके पास एक ही सुट हुआ करती थी | रांगेय राघव पैर में रस्सी बांधकर पंखा चलाते थे और खूब सिगरेट पीते हुए लिखा करते थे | अमृता प्रीतम, बालजाक, तालस्ताय, दोस्तोवस्की रात में लिखते थे |

       घोस्ट राइटिंग करने वाले लेखक दुनिया के हर भाषा में आपको मिल जायेंगे जिन्होंने नाम बदलकर लेखन किया है | इनमें फर्नादो पेसाओ आजीवन 75 अलग-अलग नामों से लिखा तो ओ हेनरी ने 14 अलग नामो से लिखा | तंगी के दिनों में जार्ज बर्नाड शा ने भी नाम बदलकर लिखा | भारतीय लेखको में अमृतलाल नागर, राही मासूम रजा आदि शुरुआती दिनों में रवीन्द्र नाथ ठाकुर ने भी नाम बदलकर कविता लिखा |
                                  दुनिया भर में ऐसे लेखकों की भी कमी नहीं जिन्होंने अलग-अलग कारणों से आत्महत्या की | भारत में यह आंकड़ा विश्व साहित्य के अपेक्षा कम है | यहाँ केवल छ: प्रसिद्ध साहित्यकारों के बारे में बताया जाता है |
        कहते हैं सरस्वती और लक्ष्मी दोनों  का निवास एक साथ नहीं होता | यह भारतीय लेखकों के विषय में बिल्कुल सही है | लेकिन दुनिया के अन्य भाषा के लेखक भी इससे अछूते नहीं रहे | दाने-दाने  को उन्हें भी मोहताज होना पड़ा | भारतीय लेखकों में अन्नाभाऊ , गुरदयाल सिंह, सत्यार्थीजी, प्रेमचन्द मधुसुदन दत्त, मुक्तिबोध, राहुल सांस्कृत्यायन आदि | विदेशी लेखकों में गोर्की,एडगर एलन पो, ओ हेनरी, चार्ल्स डिकेंस आदि | आर्थिक तंगी में जीते हुए भी इन्होंने दुनिया को अपना सर्वश्रेष्ठ दिया |  
       विश्व साहित्य तथा हिन्दी साहित्य में भी ऐसे लेखकों की संख्या अधिक रही जो पारिवारिक और सामाजिक दबाव को झेल नहीं पाए तथा विक्षिप्त हो गए | कईयों को तो पागलखाने में भर्ती करवाया गया तो कुछ स्वस्थ होकर वापस  आये, तो कुछेक ने अवसाद में आत्महत्या कर ली | कुछ बायोपोलर डिसआर्डर का शिकार हो गए | जिस कारण यह साहित्य को जितना दे सकते थे नहीं दे पाए | इनमें अर्नेस्ट हेमिंग्वे, एडगर एलन पो, लियो तालस्ताय, अन्नाभाऊ साठे देवेन्द्र सत्यार्थी, राहुल सांस्कृत्यायन लिस्ट तो काफी लम्बी है |

बहुत कम उम्र पानेवाले लेखक भी हुए जिन्होंने कम समय में खूब लिखा और विश्व साहित्य को समृद्ध किया | ऐसे भी लेखक हुए जिन्होंने सौ साल की उम्र को पार किया और उसके बाद भी पढ़ने लिखने में लगे रहे | कुछ ऐसे बाल लेखक  भी हुए जिन्होंने 11 या 12 वर्ष के कम उम्र में लेखन कर विश्व साहित्य में काफी नाम कमाया | इनमें ज्योति और सुरेश गुप्ता जुड़वा भाई का नाम उल्लेखनीय है | जब वे ग्यारह वर्ष के थे 700 पृष्ठ की फेंटसी लिखी भारत में यह पुस्तक बेस्ट सेलर रही |

                     इनके अलावे ऐसे भी लेखक हुए जिन्होंने लेखन कर्म को अपना साधना समझा | किसी भी हालात में अपनी लेखनी को अनवरत ज़िंदा रखा | पुस्तक में दिए गए सभी लेखकों का नाम लेना तो सम्भव नहीं है कुछ लेखकों के नाम है जिनमे अज्ञेय ब्रिटिश सेना में रहे, कबीर जुलाहे थे, कमलेश्वर रात की पाली में चौकीदारी करते थे | जयशंकर प्रसाद तम्बाकू का खानदानी काम करते थे | तसलीमा नसरीन एम.बी.बी.एस. डाक्टर हैं | गोर्की ने बचपन में बोरा उठाकर कचरा तक बीना, जान स्टन बैक टूअर गाइड थे | जैम्स जायस गाते थे | बेबी हालदार झाडु-पोछा करनेवाली घरेलू नौकरानी थी | मराठी लेखक लक्ष्मण राव दिल्ली में हिन्दी भवन के बाहर फुटपाथ पर चाय बेचते थे | लक्ष्मण राव गायकवाड का तो जन्म ही चोर-उच्चकों की बिरादरी में हुई थी |

        विश्व साहित्य में ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं जहाँ लेखको ने एक से अधिक भाषाओं में रचना की है | खासतौर से भारत में अधिकाधिक संख्या में ऐसे लेखक हुए जिन्होंने एक से अधिक भाषाओं में रचना की | बाबा नागार्जुन ने मैथिली, हिन्दी और संस्कृत में रचनाएं की तो राजकमल चौधरी मैथिली और हिन्दी दोनों भाषाओं के रचनाकार थे | अमृता प्रीतम और गुरुदयाल सिंह हिन्दी और पंजाबी दोनों भाषाओं में रचनाएँ की | राहुल सांस्कृत्यायन कई भाषाओं में लिखते और अनुवाद भी करते रहे |
                  कुछ ऐसे भी लेखक हुए जीते जी जिनसे सफलता मुंह फेरे रही | मरने के बाद वे साहित्य जगत के सरताज बने | इनमें सर्वप्रथम विश्व साहित्य में प्लेटो का नाम आता है | “रिपब्लिक” को उनके मरने के बाद ही ख्याति मिली | ऐन फ्रेंक, जान केनेडी, हैनरी डेविड, एडिथ होल्डन एडगर पो, फर्नादों पेसाओ आदि | भारतीय साहित्य में मुक्तिबोध, भुवनेश्वर तथा राजकमल चौधरी को जीते जी बहुत संघर्ष करना पड़ा मृत्यु के बाद इनके लेखन को ख्याति मिली |

  इसके अलावा खतरनाक और हत्यारे लेखक भी हुए तो कुछ आत्महन्ता भी | तो कुछ ऐसे लेखक भी हुए जिन्होंने अपने जीवन में सिर्फ लिखा और लिखा |
      वहीं विश्व साहित्य के इतिहास में ऐसे भी लेखक हुए जिन्होंने एक ही किताब लिखकर अपनी अलग पहचान बनाई हालाकि बाद में ये विस्तृत लेखन भी करते रहे लेकिन प्रसिद्धि इन्हें अपनी इकलौती किताब के बदौलत ही मिली | इनमें अरुंधती राय का ‘गाड आफ स्माल थिंग्स’ , अन्ना सेवेल का ‘ब्लैक ब्यूटी’, आस्कर वाइल्ड का ‘द पिक्चर आफ डोरियाँ ग्रे’, मीना लायॅ का ‘इन्सेल’ आदि प्रमुख है |

अब बात भाग दो “लेखकों की दुनिया और दुनिया के लेखक” की
इस खंड में दुनिया भर के लेखकों की जानकारी भाग एक के अपेक्षा अधिक विस्तार से दी गयी है | दरभंगा के तरौनी में जन्मे बाबा नागार्जुन यायावर तथा फक्कड़ प्रवृति के लेखक थे | अपने लेखन में वह अपने पैनी तथा धारदार व्यंग के लिए जाने जाते थे | ब्रिटेन की महारानी के भारत आगमन पर बाबा ने देश का अपमान समझते हुए तीखी कविता लिखी –“आओ रानी हम ढोयेंगे पालकी/ यही हुई है राय जवाहर लाल की |” इमरजेंसी के दौरान इन्होंने इंदिरागांधी को बाघिन तक कह डाला | ऐसा कहा जाता है की इंदिराजी बाबा की कविताओं को  बहुत पसंद करती थीं |

   इस्मत आपा उर्दू की पहली बोल्ड लेखिका थीं | स्त्रियों के सवाल के साथ-साथ उन्होंने सामाजिक कुरीतियों पर भी जमकर कलम चलाई | 1941 में इनके द्वारा लिखी गई कहानी ‘लिहाफ’ ने ने भारतीय साहित्य जगत में खलबली मचा दी | कहानी में इन्होंने समलैंगिकता के मुद्दे को उठाया | उन पर अश्लीलता परोसने का आरोप लगा, मुकदमा चलाया गया | इस कहानी को हिन्दुस्तानी साहित्य में लेस्बियन प्यार की पहली कहानी माना जाता है |

  ज्याँ पाल सार्त्र की लेखन शैली बड़ी ही अजीब थी जब वे हाथ से लिखते हुए थक जाते तो वे पैर से लिखना शुरू कर देते | इन्होंने गम्भीर लेखन के अलावा कई फिल्मे भी लिखी 1964 में इन्होंने ये कहते हुए पुरस्कार लेने से मना कर दिया कि लेखक को खुद को संस्थान नहीं बनने देना चाहिए | 1980 में फेफड़े के ट्यूमर के कारण इनकी मृत्यु हुई | वहीं सिमोन अपने आपको दार्शनिक नहीं मानती थीं लेकिन उन्होंने उपन्यास, जीवनी, आत्मकथा, राजनैतिक लेखन के अलावा स्त्री विमर्श आदि पर विपुल लेखन किया | 1949 में इनके द्वारा औरतों के पक्ष में लिखी गई ‘The Second Sex’ एक ऐतिहासिक दस्तावेज है | बाद में प्रभा खेतान ने इसका हिन्दी अनुवाद किया यह पुस्तक हिन्दी साहित्य में “स्त्री उपेक्षिता" के नाम से उपलब्ध है | सार्त्र और सिमोन बिना विवाह किये आजीवन एक दुसरे के साथ रहे और मरने के बाद एक ही जगह दफनाए भी गए|  
  
वर्जीनिया अंगरेजी की प्रमुख लेखिका मानी जाती हैं लन्दन के साहित्य जगत में इनका काफी नाम है | 1900 में उन्होंने लिखना शुरू किया | इनकी रचनाओं का 50 से अधिक भाषा में अनुवाद हुआ | वर्जीनिया ने 1912 में लियोनार्ड वुल्फ से शादी की वीटा नामक एक महिला से भी इनके समलैंगिक सम्बन्ध रहे | 1941 में आर्थिक तंगियो से परेशान होकर 59 वर्ष की आयु में गले में भारी पत्थर बांधकर  नदी में डूबकर इन्होंने आत्महत्या कर ली | वुल्फ का शव तीन सप्ताह बाद ही मिल पाया था |
        कहानियों के साथ अनोखा प्रयोग करनेवाले रमेश बक्षी का जीवन भी विवादों से घिरा रहा | शराब तथा कई महिलाओं से प्रेम प्रसंग ने इनके कैरियर को बार-बार ध्वस्त किया | घर की तलाश में वह जीवन भर भटकते रहे | लेकिन घर बनाए रखने की कला उन्हें आती ही नहीं थी | उनके चिता को अग्नि उनके बचपन के मित्र प्रभाश जोशी ने दिया |

    बहुभाषी प्रतिभा के धनी माइकल मधुसूदन दत्त को युवावस्था में शराब की लत लग गई | मात्र 48 साल की आयु में ही उनकी मृत्यु हो गयी | अभावों में जिन्दगी गुजारने वाले मुक्तिबोध का रुझान वामपंथी विचारधारा की ओर था | “कामरेड तुम्हारी पालटिक्स क्या है ?” उनका सर्वाधिक प्रिय वाक्य था और “अँधेरे” में उनकी सर्वाधिक चर्चित कविता | श्रीलाल शुक्ल अपने धारदार व्यंगलेखन के लिए प्रसिद्ध हैं | 1968 में इनके द्वारा लिखा गया ‘रागदरबारी’ का पन्द्रह भारतीय भाषाओं में अनुवाद हुआ तथा इसका अंगरेजी में भी अनुवाद हुआ |
   
    कितना लिखा जाए ‘लेखकों की दुनिया’ के विषय में कलम है कि थमने का नाम ही नहीं ले रहा है | किस्सा दर किस्सा किन किस्सों का वर्णन किया जाय किनको छोड़ा जाए सब एक से बढ़कर एक लाजवाब | सारे किस्से रोचक | विजय दान देथा की कहानी ‘दुविधा’ पर अमोलपालेकर ने पहेली फ़िल्म बनाई | फ़िल्म की प्रीमियर के लिए विजय दान देथा को मुम्बई बुलाया गया | वह अपने छोटे बेटे कैलाश के साथ मुंबई आए | जब लौटकर जोधपुर वापस आए तो बड़ा बेटा महेंद्र ने पूछा कैसा रहा प्रीमियर ? छोटा बेटा कैलाश ने जबाव दिया बहुत अच्छा | सब आये थे फ़िल्म की हिरोइन रानी मुखर्जी भी आई उसने तो गजब कर दिया जी सा को किस कर दिया | महेंद्र ने खुश होकर कहा सच जी सा ! विजयदान देथा ने भोलेपन से कहा लेकिन एक कमी रह गई नामुराद मफलर बीच में आ गया |

     जैसा की लेखक स्वयं प्रस्तावना में कहते हैं कि दुनिया के हर लेखक अपने शब्दों के जरिए हमारे बीच जिन्दा हैं | वैसे भी लेखक कभी मरते नहीं अपने शब्दों के जरिए देश काल और भाषा की सारी सीमा लांघता हुआ हमेशा ज़िंदा रहता है |

       इसमें कोई दो राय नहीं कि ‘लेखकों की दुनिया’ हिन्दी साहित्य में ही नहीं बल्कि विश्व साहित्य में पहली अनोखी नायाब पुस्तक है | लेखक का एक बहुत ही इमानदार प्रयास का फल है | इस किताब की विशेषता यह है की आप जितनी बार इसे पढेंगे यह आपको नया तथा रोचक ही लगेगा | हिन्दी साहित्य को कालजयी रचना देने के लिए सूरज प्रकाशजी को साधुवाद | लेखक के कलम से मोती रूपी शब्द अनवरत झरता रहे और हिन्दी साहित्य समृद्ध होता रहे |
                                                   

                         अर्पणा दीप्ती 

                         समीक्षित कृति –लेखकों की दुनिया
                         लेखक-सूरज प्रकाश
                         प्रथम संस्करण- 2018
                         पृष्ठ संख्या-250
                         मूल्य-400/-
                         प्रकाशक-किताबवाले, 22/4735
                         प्रकाश दीप बिल्डिंग अंसारी रोड
                         दरियागंज नई दिल्ली-110002 
  

अगर कोई सुधी पाठक इस पुस्तक को पढ़ना चाहते हैं तो लेखक के ईमेल पर सम्पर्क कर इस पुस्तक को प्राप्त किया जा सकता है | kathaakar@gmail.com             


     

गुरुवार, 18 जनवरी 2018

प्राचीन मिथिला की गौरव गाथा - "भामती"


द्वैत दर्शन के टीकाकार पंडित वाचस्पति मिश्र और उनकी विदुषी पत्नी भामती के अलौकिक प्रेम को शब्दों के रेशमी धागों से बुना है आदरणीय उषाकिरण दीदी ने ! धर्म और दर्शन जैसे नीरस विषय भी सरस हो गया आपकी कलम से | दसवीं सदी की मिथिला उसकी सामाजिकसांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक परिस्थतियों का ऐसा अद्भुत वर्णन ऐसा प्रभावपूर्ण जीवंत  लेखन कि पाठक स्वत: उस काल खंड में प्रवेश करने पर विवश हो जाता है | कलम का यही जादु लेखिका के प्रति पाठक को श्रद्दा से नतमस्तक करता है |
उपन्यास में सम्पूर्ण मिथिला का तत्कालीन समाज है | मिथिला का बौद्धिक उत्थानस्त्री-स्वतंत्रतापठन-पाठनविवाह संस्कार में स्त्री की सहमति दसवीं सदी के समाज का जीवंत दर्शन तत्पश्चात मिथिला के शिथिला होने का विवरण है | यह उपन्यास केवल मिथिला का ही नहीं वरन सम्पूर्ण भारत के तत्कालीन राजनीतिक और ऐतिहासिक कालखंड का गवाह है .. स्त्री विमर्श के पैरोकारों को इसे अवश्य पढना चाहिए ---

[" सौदामनी जानती थी मूक-भाव से सेवा एक मैथिल पत्नी कर रही है , किन्तु पुस्तक पूर्ण हो उसकी कामना एक विदुषी पत्नीअत्यंत विद्वान परिवार की पुत्री भामती करती है !,

देह-मन के नेह-छोह के अभाव का विष पीती जो स्त्री थी वह विद्यमान थी किन्तु एक सशक्त नारी का परिचय इन्हें तब मिला जब औषधि के माध्यम से वाचस्पति को अपनी तरफ इन्होंने उन्मुख करने का विचार दिया था !

वह पंडित को अवांतर रूप में विवश नहीं करना चाहती थी !

सौदामिनी के सामने एक महान स्त्री मोहिनी, कामिनी न हो कर निर्मात्री हो गई ! कौन विश्वास करेगा आने वाले युग में कि ऐसी नारी हुई जिसने लेखनी पकड़े बिना पुस्तक का निर्माण किया था !"]-इसी पुस्तक से 

उषाकिरण दीदी आपको प्रणाम और आपकी लेखनी को प्रणाम 
भामती तीन दिन में पूरी पढ़ी -- बस ये लगा अब तक क्यूँ नहीं पढ़ा इसे |


                                                                                       -अर्पणा दीप्ति 

मंगलवार, 2 जनवरी 2018

बरखादत्त के नाम एक खुला खत


प्रिय बरखादत्त मैं हमेशा आपके भयरहित और उदेश्यपूर्ण reporting की बहुत बड़ी प्रशंसक रही हूँ | मेरे नजरिये में आप उन चंद भारतीय पत्रकारों में से हैं जिसने पत्रकारिता के लौ को जीवित रखा है | वर्तमान परिप्रेक्ष्य में चौबीसों घंटे चलने वाली खबरी चैनल पत्रकारिता के तमाम मानदंडों और नैतिक जिम्मेदारियों को दरकिनार करती नजर आ रही है | ऐसे में मुझे लगता है की आप भी पिछले कुछ दिनों से पत्रकारिता के मानदंडो के छलती नजर आ रही हैं | इन दिनों आपकी रिपोर्टिंग तथ्यों पर आधारित न होकर TRP बटोरने के चक्कर में है | आप अनुभवी पत्रकार हैं कृपया अपने शब्दों से देश को जंग की ओर धकेलने की कोशिश नहीं कीजिये | आपके अंदाज और लच्छेदार भाषा के बाद अचानक TimesNow, IBN, CNN, Headlines Today आजतक, और स्टार न्यूज जैसे चैनलों ने अपना सुर बदल लिया | अतिसंवेदनशील हालत में कृपया गैरजिम्मेदाराना बयान न दें | आप मेरी नजर में बहुत अच्छी पत्रकार हैं , बेबाक और बेमकसद पत्रकार के तौर पर सामने आइए जैसा आप पहले थीं | मेहरबानी करके एक उद्धारक और मसीहा का लबादा मत ओढिए |              

सोमवार, 11 दिसंबर 2017

एक और रास्ता (बाईपास)


जीवन हर कदम पर बाईपास ही तो मांगती है | बिषम परिस्थितियों में आपको अगर आगे बढ़ना है तो बगल का रास्ता आवश्यक है | जीवन के झंझावात से टकराते हुए अपने लिए नया रास्ता तलाशना “बाईपास” का केन्द्रीय विषय है |
  कथा-वस्तु उपन्यास के मुख्यपात्र कुमार के संघर्षों के इर्द-गिर्द घूमता है | अपने मुट्ठी भर तनख्वाह से बड़े परिवार को चलाने वाले पिता देवी दयाल यह चाहते  हैं की बेटा कुमार रेलवे में टी.टी.की नौकरी कर ले | पिता का यह मानना था कि टी.टी. की नौकरी में तनख्वाह से ज्यादा ऊपर की कमाई होती है | देवी दयाल की यह सोच सरकारी तंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार को दर्शाता है |
      बाईपास नामक यह जगह आवारा एवं शराबी लोगों के गलत कामों के लिए हमेशा सुर्ख़ियों में बना रहता है | देवी दयाल को यह चिंता सताती है की कहीं बेटा कुमार गलत सोहबत में न पड़ जाय | कुमार अपने पिता से बाईपास पर मोटर पार्टस की दूकान खोलने के लिए पांच हजार रुपया मांगता है | देवी दयाल कहते हैं की बड़ी मुश्किल से उनकी छोटी सी तनख्वाह से बड़ा परिवार का गुजारा चलता है | वे कहते हैं कि-

“सरकारी स्कूल में फीस भले ही थोड़ी है पर कापी-किताब.........पेन पेन्सिल इन सबका कितना मुश्किल होता है, पुरानी कापियों के पन्ने सी-सीकर आखिर कब तक चलेगा “ (पृ.सं.९) 

गरीबी के अतिसम्वेदनशील चित्रण के साथ-साथ लेखक ने ईमानदार सरकारी मुलाजिम की विवशता को भी दर्शाया है |
     आखिरकार काफी जद्दोजहद के बाद कुमार अपने पिता से पांच हजार रुपया लेने में सफल हो जाता है | यहीं से उसके जीवन की नयी पारी का शुरुआत होता है | बाईपास में कुमार की छवि एक ईमानदार समाज सुधारक के रूप में उभरता है | कुमार के यूथ कांग्रेस में शामिल होने के साथ-साथ उपन्यास के अन्य सहपात्र पुनिया, मस्तान, गिलैहरी, चुन्नी एवं फूलमती के साथ कथा आगे बढ़ती है |   
     लेखक ने कुमार के चरित्र को मजबूती प्रदान करते हुए उसे सिर्फ बाईपास तक ही सीमित नहीं रखा है बल्कि उसे युथ कांग्रेस का अध्यक्ष बना दिया जाता है | इतना ही नहीं कुमार यहीं नहीं रुकता है वह अपनी अधूरी शिक्षा पुरी करने के लिए कालेज में दाखिला लेता है | कालेज के भ्रष्ट प्रिंसिपल को बर्खास्त करवाता है, कक्षा में लडकियों की स्थिति सुधारता है | 

“सर वे पढ़ना चाहें या पढ़ाना चाहें यह उनकी मर्जी| पर मैंने भगाया इसलिए की कपड़े पहनकर तमीज से आएं यहाँ लडकियां भी हैं |” (पृ.६५)

        आदिवासी विमर्श की दृष्टिकोण से लेखक ने उपन्यास में आदिवासियों के गरीबी और बदहाली की समस्या को भी उभारा है | रोहतास बाबूजगजीवन राम के घर में चुराए गए सामान को बाजार में बेचते हुए कुमार द्वारा पकड़ा जाता है | कुमार के पूछने पर रोहतास अपनी विवशता को दर्शाते हुए कहता है 

“कौन देगा हमें नौकरी तू कहीं लगवा देगा क्या ? अगर किसी का एक रूपया चोरी हो जाए तो तेरा जूता मेरा सिर |” (पृ.102) 

रोहतास कहता है हम आदिवासियों को लोग जन्मजात चोर मानते हैं | जीने और पेट भरने की विवशता के लिए ये सब करना पड़ता है | 

“पकड़े जाने पर ज्यादा से ज्यादा क्या होगा ? पुलिस तबियत से तोड़ती.....सात साल की जेल होती और हाथ-पाँव तोड़कर सड़िया डाले होते |” (पृ.102)

रोहतास की बातों को सुनकर कुमार सोचने पर विवश हो जाता है कितनी बेबस जिन्दगी है इनकी | इस दलदल से न तो समाज इन्हें बाहर आने देगा और न पुलिस |
       स्त्री विमर्श की दृष्टि से इस उपन्यास में जो मुख्य बातें उभरकर सामने आयी हैं वे इस प्रकार है कि स्त्री आज भी समाज में ऊँचे तबके के लिए एक शरीर या वस्तु से ज्यादा कुछ भी नहीं है गिलैहरी जैसे पात्र इस बात का पुख्ता प्रमाण है |
    प्रेम अगर बराबरी वालों से न किया जाए तो वह समर्पण नहीं कुर्बानी मांगता है | श्यामा एवं कुमार का प्रेम इसका पुख्ता प्रमाण है | उपन्यास का अंत कुमार के रियल स्टेट के कारोबार से होता है जो इस बात को दर्शाता है जीवन हर कदम पर बाईपास ही तो मांगता है | जीवन में उत्पन्न होने वाले गतिरोधों को पार कर अगर आपको आगे बढ़ना है तो बाईपास उसके लिए आवश्यक है | किन्तु अंत में यह कहना उचित होगा की कुमार के चरित्र को लेखक ने जो मजबूती उपन्यास के शुरू एवं मध्यक्रम तक दिया वह अंत में लडखड़ा सा गया | रियल स्टेट स न जोड़कर अगर कुमार के चरित्र को राजनीति या समाजसुधार से जोड़कर रखा जाता तो शायद उसे और सुदृढ़ता मिलती थी |

-अर्पणा दीप्ति 
‘बाईपास’
लेखक-मालिक राजकुमार
श्री नटराज प्रकाशन- दिल्ली
प्रथम संस्करण-२०१३
पृ.संख्या-१६८
मूल्य-३५०   


शनिवार, 9 दिसंबर 2017

पद्मावती प्रकरण बनाम स्त्री अस्मिता


आजकल स्त्री अस्मिता के नाम पर चारों तरफ हंगामा बरप्पा हुआ है | राजस्थान में भंवरी देवी के साथ बर्बर अमानुषिक व्यवहार अपराध क्या था भंवरी का बस इतना सा की उसने दो सवर्ण बच्चियों का बाल-विवाह रोकने का प्रयास किया गांव के गुर्ज्जरो ने बर्बरता की सारी सीमा लांघ दी | तब भी राजस्थान में यही सरकार थी | नेताओं ने कहा ये औरत झूठ बोल रही है........ तब ये लोग क्यों नहीं खड़े हुए भंवरी के पक्ष में, अपराधियों को दंड क्यों नहीं दिलवाया ? और कुछ न सही तो कम से कम उस घृणित बलात्कारियों के लिए एक फतवा ही जारी कर देते उनका भी ‘नाक काट देने का’ | लेकिन कुछ भी नहीं हुआ दमन किया स्त्री का और अपराधी था पुरुष |
  वस्तुस्थिति बिलकुल नहीं बदली आज भी वही हो रहा है | सात सौ साल पुरानी कहानी को मुद्दा बनाकर हंगामा फैला रखा है | स्त्री की नाक काटने के लिए फतवा जारी कर दिया | वाह जज भी आप वकील भी आप और गवाह भी आप फिर सजा तो मिलेगी स्त्री को | इन्हें 15-20 साल से अपनी अस्मिता और सम्मान की लड़ाई लड़ रही स्त्रियाँ क्यों नहीं दिखाई देती जो आज तक इन्साफ की आस लगाए बैठी हुई हैं | स्त्री तो स्त्री है चाहे वह महरानी हो या दलित भंवरी देवी | मान-सम्मान तो सबका बराबर है | 

बुधवार, 6 दिसंबर 2017

इतिहास की सबसे लोकप्रिय रानी पद्मावती

कहते हैं रानी पद्मावती इतनी गोरी और सुकुमारी थीं कि जब पानी पीती थीं तो गले की नासिका से पानी की धारा बहती हुई दिखाई देती थी, पान खाती थी तो वह नासिका लाल रंग में रंगी दिखती थी और जब बाल खोलकर कंघा करती थी तो पूरी धरती पर अंधेरा छा जाता था; ऐसी रानी पदमावती के किरदार के रूप में दीपिका पादुकोण को देखने के लिए दर्शक उतावले हैं।
वैसे इस फ़िल्म ने राजनीतिक गलियारों में काफी उथल-पुथल मचा रखा है |



बाजीराव मस्तानी फ़िल्म से सबको रोमांचित तथा उद्भूत कर देने वाले संजय लीला भंसालीदीपिका पादुकोण और रणवीर सिंह इस बार लेकर आ रहे हैं पद्मावती। एक रानी थी चित्तौड़ की पद्मिनी, जिसे पद्मावती के नाम से भी जाना जाता है। इतिहासकारों की माने तो 13वीं-14वीं सदी की यह एक महान भारतीय रानी थीं। हालांकि इसका कोई प्रमाण नहीं है कि रानी पद्मिनी इतिहास के अस्तित्व में भी थी या नहीं। इसी कारण  अधिकांश आधुनिक इतिहासकारों ने 13वीं सदी की रानी पद्मावती के अस्तित्व को खारिज किया है। हालांकि रानी पद्मिनी के साहस और बलिदान की गौरवगाथा इतिहास में अमर है।
सिंहल द्वीप के राजा गंधर्व सेन और रानी चंपावती की बेटी पद्मिनी चित्तौड़ के राजा रतनसिंह के साथ ब्याही गई थी। कहा जाता है रानी पद्मिनी बहुत खूबसूरत थी और उनकी खूबसूरती पर चित्तौड़ को लूटने वाले दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी की बुरी नजर पड़ गई और अलाउद्दीन किसी भी कीमत पर रानी पद्मिनी को हासिल करना चाहता थाइसलिए उसने चित्तौड़ पर हमला कर दिया। अपनी आन-बान और शान को बचाने के लिए रानी पद्मिनी ने आग में कूदकर जौहर किया लेकिन अपने अस्तित्व पर आंच नहीं आने दी। इस कथा को हिंदी साहित्य के महान कवियों में शुमार कवि मलिक मुहम्मद जायसी ने अवधी भाषा में पद्मावत ग्रंथ लिखा था।
फ़िल्म के रिलीज होने से पूर्व जो विवाद उत्पन्न हुआ है उसका कारण भी यही है कि लोगों को कहानी और फ़िल्म में अंतर समझ में नहीं आया। वस्तुतः फिल्मकारों पर भी यह आरोप समय समय पर लगते रहे हैं कि उन्होंने इतिहासमिथक और कल्पना जगत में विचरती कहानियों को तोड़ मरोड़ कर जनता के समक्ष फ़िल्म के रूप में पेश किया है।
बॉलीवुड की सबसे महंगी फिल्म 
संजय लीला भंसाली द्वारा लिखितनिर्देशित तथा निर्मित इस फ़िल्म में मुख्य किरदारों में दीपिका पादुकोणशाहिद कपूर और रणवीर सिंह तथा रजा मुराद हैं। फ़िल्म एक दिसम्बर को सिनेमाघरों में प्रदर्शित होगी। फ़िल्म में दीपिका पादुकोण- रानी पद्मिनीशाहिद कपूर- रावल रतन सिंह, रणवीर सिंह-अलाउद्दीन खिलजी, अदिति राव हैदरी - कमला देवी के रुप में नज़र आएंगे। इसके अलावा ऐश्वर्या राय बच्चन और सोनू सूद भी फ़िल्म में अभिनय करते नजर आएंगे।  फिल्म की शूटिंग्स के दौरान राजपूत करणी सेना के कुछ सदस्यों ने फिल्म का विरोध किया और जयगढ़ दुर्ग में फिल्म के सेट पर तोड़फोड़ की। उन्होंने आरोप लगाया कि फिल्म में ऐतिहासिक तथ्यों के साथ छेड़छाड़ की गयी है। कुछ समय बाद फिल्म के निर्माताओं ने यह आश्वासन दिलाया कि फिल्म में कुछ भी आपत्तिजनक नहीं है। किन्तु  इन सदस्यों ने फिर से चित्तौड़गढ़ किला पर हमला किया  और रानी पद्मिनी के महल का दर्पण तोड़ दिया । भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधिकारियों के मुताबिक  इन दर्पणों को लगभग चालीस साल पहले चित्तौड़गढ़ किले में रखा गया था। इसके अलावा कोल्हापुर में भी इस फिल्म के सेट पर आग लगा दी गई थी। जिससे उत्पादन सेटवेशभूषा और गहने जल गए। जिसके कारण फिल्म का उत्पादन बजट 160 करोड़ से बढ़कर 200 करोड़ हो गया है। ऐसे में इसे अब तक की सबसे महंगी बॉलीवुड फिल्म होने का अनुमान लगाया जा रहा है।



खिलजी के रूप में रणवीर लगे हैं बेहद खतरनाक


'पद्मावतीमें रणवीर बेहद खौफनाक रूप में नजर आ रहे हैं। उनकी सिर्फ दाढ़ी ही नहींबाल भी काफी लंबे हैं। चेहरे पर एक बड़ा-सा चोट का निशान है। रणवीर उन एक्टर्स में शामिल हैं जो सिर्फ एक्टिंग करने के लिए ही नहीं जाने जाते अपितु अपने किरदार के हिसाब से ढल जाने के लिए भी जाने जाते हैं। सुनने में तो यहां तक आ रहा है कि खिलजी के नेगेटिव शेड में रणवीर ने खुद को इस कदर ढाल लिया कि उनका अपने दोस्तों से बात करने का तरीका भी इस कैरेक्टर जैसा ही हो गया। और वह खिलजी के प्रभाव से बाहर निकलने के लिए साइकेट्रिस्ट की मदद ले रहे हैं।
रणवीर सिंह कहना है कि ख़िलजी के रूप में देखकर आपको यकीन हो जाएगा कि उन्होंने अपने किरदार में उतरने के लिए कितनी मेहनत की है। क्योंकि अलाउद्दीन खिलजी को स्क्रीन पर उतारना आसान नहीं था |
साहित्य और इतिहास में पद्मावती’ 
अब एक नजर डालते हैं मलिक मोहम्मद जायसी के महाकाव्य ‘पद्मावत’ की कुछ पंक्तियों पर, जिनमें रानी पद्मिनी के विषय में उन्होंने लिखा था। उनके अनुसार पद्मावती की इतनी गोरी और सुकुमारी थी कि  अगर वे पानी भी पीती तो उनके गले की नली से पानी उतरता हुआ देखा जा सकता थाअगर वे पान खातीं तो पान का लाल रंग उनके गले की नजर में आता।

तन चितउरमन राजा कीन्हा । हिय सिंघलबुधि पदमिनि चीन्हा ॥
गुरू सुआ जेइ पंथ देखावा । बिनु गुरु जगत को निरगुन पावा ?
नागमती यह दुनिया-धंधा । बाँचा सोइ न एहि चित बंधा ॥
 राघव दूत सोई सैतानू । माया अलाउदीन सुलतानू ॥
 प्रेम-कथा एहि भाँति बिचारहु । बूझि लेहु जौ बूझै पारहु ॥

इस कविता के अनुसार रानी पद्मिनी / पद्मावती चितौड के राजा राणा रतन सिंह की पत्नी थी और समकालीन सिंहली (श्रीलंका का एक द्वीप) राजा की बेटी थी।
हिन्दी के साहित्यकार, समालोचक रामचंद्र शुक्ल ने अपनी किताब ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ में ‘रानी पद्मावती’ का जिक्र किया है। आचार्य शुक्ल लिखते हैंजायसी की अक्षय कीर्ति का आधार ‘पद्मावत’ है। उन्होंने तीन पुस्तकें लिखीं - पद्मावतअखरावटआखिरी कलाम। जायसी अपने समय के सिद्ध फकीरों में माने जाते हैं। अमेठी राजघराने में इनका बहुत मान था। कबीर ने अपनी झाड़-फटकार से हिंदू-मुसलमान के कट्टरपन को दूर करने का प्रयास किया। लेकिन जायसी ने हिंदू और मुसलमान के दिलों को आमने-सामने करके अजनबीपन मिटाने का काम किया। पद्मावत कहानी में इतिहास और कल्पना का योग है। इस कहानी का पूर्वार्ध (शुरुआत) पूर्ण तरह से कल्पित है लेकिन उत्तरार्ध (अंत) ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित है।
वहीं राजस्थान सरकार की पर्यटन वेबसाइट के मुताबिकअलाउद्दीन खिलजी के चित्तौड़ की रानी पद्मावती के प्यार में पड़ने की कहानी कोई कल्पना नहीं इतिहास है। सरकारी वेबसाइट में अलाउद्दीन के चित्तौड़ की रानी के प्रेम में पड़ने के बाद आक्रमण का समय 13 वीं सदी बताया गया है।
इतिहासकार हैदर के अनुसार- जो साहित्यिक चीज़ें ज़्यादा लोकप्रिय होती हैं। गंभीर ऐतिहासिक तथ्य, तथा उसकी व्याख्या आसानी से जनमानस में जगह नहीं  बना पाते हैं। ऐसी प्रवृत्ति हर जगह है और यह हमारे देश में भी है। जो ज़्यादा दिलचस्प है वो ज़्यादा लोकप्रिय होगा और जिन तथ्यों से दिलचस्पी पैदा नहीं होती है वे लोकप्रियता हासिल नहीं कर पातीं।

 इतिहास की सबसे लोकप्रिय रानी 

पद्मावती के लोकप्रिय होने की वजह यह है कि स्थानीय राजपूत परंपरा के तहत चारणों ने इस किरदार का खूब बखान किया। इस वजह से भी यह कथा काफ़ी लोकप्रिय हुई। पद्मावती हमारी वाचिक परंपरा की उपज है और इसका प्रभाव किताबों से कहीं ज़्यादा है। इसकी पैठ भी काफी गहरी है। हमें इससे कोई समस्या भी नहीं होनी चाहिए। 
कुल मिलाकर संजय लीला भंसाली की फिल्म पद्मावती इस साल की सबसे विवादास्पद ऐसी फ़िल्म होगी जिसका लोगों को बेसब्री से इंतजार है। ऐसा माना जा रहा है भंसाली की यह फिल्म दर्शकों पर बाजीराव मस्तानी वाला जादू बिखेरने में पुनः कामयाब हो जाएगी। लेकिन यह तो फ़िल्म देखने के बाद ही पता चलेगा की वाकई जिस पद्मावती की खूबसूरती तथा बहादुरी के चर्चे इतिहास में या मिथकों में या लोगों की कहानियों में श्रुति परम्परा के रूप में बनी हुई हैं उनके साथ संजय लीला भंसाली ने वाकई कोई छेड़छाड़ की है या नहीं?


गुरुवार, 23 नवंबर 2017

हरियाली और धुप (रविवार की डायरी )


जंगल, नदियाँ, खेत और कस्बे हमेशा मेरी कमजोरी अभिप्राय यह की प्राकृतिक दृश्यात्मकता मुझे बहुत पसंद है| पक्षियों का कलरव, भौरों का गुनगुनाना, तितलियों का मंडराना ! अक्सर मन में एक सवाल उठता है – किसने सिखाया होगा प्रकृति को यह संगीत ? दिन भर झरते पत्तों के साथ रात को उम्रदराज होती वनस्पतियाँ, सुबह खिलने को उत्सुक | प्रकृति शायद अपने-आपसे सीखती है खुद ही अपनी गुरु है खुद ही अपनी शिष्य है |
        यायावरी मेरी प्रवृति है किन्तु अभी तक मैंने कोई बड़ी यात्राएं नहीं की लेकिन ऐसा लगता है कि इस धरती पर मेरी हर चीज जानी पहचानी है | ख्वावों का टेलीस्कोप और कल्पना की तिलस्मी मेरे अन्दर कूट-कूटकर भरी पड़ी है | मेरा ये मानना है कि जब मैं अपने जीवन के अंतिम पड़ाव में होऊँगी तो संसार के किसी स्थान का रहस्य मुझसे अछुता नहीं होगा | भले ही मैं वहां जाऊं या न जाउँ | विचारों के इन्ही कल्पना लोक में घूमते हुए इक्का-दुक्का कार या लारी सरररssss से बगल से गुजरता | गति इतनी मानो पलक झपकते आँख से ओझल ! पतिदेव ने कहा इसे रिंग रोड कहते हैं | खूब चौड़ी सडकें | सड़क पर धान सुखाती कृषक महिलाएं | उन्हें न तो आने वाली बड़ी-बड़ी गाड़ियों का डर न रफ्तार का भय ! ढिठाई से लबरेज ये स्त्री-पुरुष दोनों धान को सुखाने और फैलाने में मशगुल | हमारी गाड़ी की रफ्तार चालीस के आसपास थी | कनछिया कर ये महिलायें हमे देखती और अपने पुरुष साथी को मुस्कराकर कुछ कहती | इनको देखकर पिताजी याद आए |
अपने बचपन में हम भी पिताजी के साथ खेत जाते थे , दालान पर धान की दउनी बड़े ही ततपरता के साथ करवाते थे | दादी के निर्देश का कड़ाई से पालन | अचानक गाड़ी मे ब्रेक लगने से विचारों के सिलसिले मे विराम लगा | मैनें इनसे पुछा और कितना दूर है कालेज ? इन्होंने कहा अभी और आधा घंटा | तकरीबन दो किलोमीटर बाद धान वाला परिदृश्य गायब ! हरे छोटे-छोटे पेड़ जामुनी रंग के बैगनों से लदे हुए, पता गोभी, गेन्दा का फूल तथा पपीता का बगान मन को मोह लेनेवाला | शहर के बाहर की हरियाली देखकर मन तिरपित ! हर तरह के पेड़, जंगली फूल तथा हरी सब्जियां | धरती हरियाली की  चादर ओढे बेहद खुबसुरत !
      सन्नाटा ! प्रकृति आवाजों के इको (echo) ! चिड़ियों का कलरव , बंदरों की खोखियाहटे ! कहीं-कहीं हाइवे पार दूर बनती इमारतों में काम करते मजदूरों का कोलाहल ! आखिरकार हम पहुंच ही गए बेटा के कालेज |
      अचानक से अपने कमरे के सामने माँ को पाकर विस्मित और खुशी मिश्रित हंसी बेटा के होठों पर | माँ-पापा आप दोनों यहाँ ! एकदम से कैसे ? बाहर बैठिए अभी आता हूँ | मेस की रसोई से आती खुशबू ! इन सबके बीच परिवारविहीन वरिष्ठों की उदासी आँखों से अछुता न रहा | उदासी मिश्रित मुस्कराहट के साथ अभिवादन नमस्ते आंटीजी , नमस्ते अंकलजी | बातचीत के क्रम में पता चला ये सेकेण्ड इयर के छात्र हैं, तथा अलग-अलग राज्यों से हैं | बाहर छात्रावास के किनारे विशाल पेड़ के नीचे सीमेंटेड बेंच पर हम विराजमान प्रतीक्षारत ! पढाई का प्रेशर तथा घर की सुविधाओं से विहीन बेटा कमजोर दिखा ........मैंने कहा–अन्नी चलो यहाँ से ! लेकिन अनुराग तो खूब रिलेक्सड मीठी मुस्कराहट के साथ इनकार नहीं माँ अभी नही .........| हैदराबाद के प्रदूषित आवोहवा से दूर  वनवास ही सही इसने अपनी कुटिया यहीं बना ली | मैंने पुन: आग्रह करते हुए कहा बेटा अभी दो दिन आकर हुआ अन्नी अकेलापन महसूस होता होगा चलो | उसने कहा नहीं माँ –व्यस्तता काफी है समय नहीं मिलाता | हमेशा मुझे छेड़ता ही तो है, देखो माँ ! ये लम्बे पेड़ मेरे दोस्त हैं बिल्कुल मेरी तरह लम्बा | इन्होंने  बताया 100 एकड़  कैम्पस है, मुश्किल से दस एकड़ इन्होंने कालेज के लिए उपयोग किया है | बाँकी नितांत खाली बियावान जंगल ! छात्रावास परिसर में खड़े लम्बे पतले आसमान को छुते पेड़ संतरियों की भाँती निश्चल, शांत मानो योगी | परिसर में शान्ति इतनी कि कोई सुखा पत्ता गिरे तो खड़ssss........बीज गिरे तो टप्पsssss....... आवाज......|
घास घनी झाड़ियो के बीच घूमते आवारा कुत्तों के झुण्ड.....| बिस्किट फेकनें पर अकचका कर हमें देखते हुए | फिर छीनाछपटी के लिए होड़ | दूसरे किनारे पर जंगली झाड़ियों के फूल तथा कैम्पस प्रबन्धन द्वारा लगाए गए कुछ फूल | इन पर मंडराती पीली-पीली प्यारी मस्त तितलियों के झुण्ड | सूर्य ढलान  की ओर अग्रसर..........|बड़ा ही मनोहारी दृश्य | हवा के झोंके भीनी-भीनी खुशबू महक बदलती हुई....मानो परफ्यूम की दूकान में ट्रायल ले रहा हो कोई............अन्नी प्रकृति के गोद में एकदम निश्चिन्त | जब हम चलने को तत्पर हुए तो बेटा ने इलेक्ट्रॉनिक डिपार्टमेंट के असिस्टेंट प्रोफेसर पूर्णिया निवासी अनुपम गुप्ता से मिलवाया | सीधे, सरल बड़े ही बातूनी | प्रदेश में कोई अपना मिले तो चेहरे की रौनक दुगनी हो जाती है | अनुपमजी के चेहरे पर यह साफ झलक रहा था | इन्होंने कहा सर अब आप ही इसके संरक्षक हैं यहाँ, अनुराग आज से आपके अधीन | तत्परता से उन्होंने जिम्मेदारी ले ली | मन को काफी सुकून मिला | शांत, सरल और विनोदी स्वभाव के अनुपमजी ने कालेज से सम्बन्धित बहुत सारी मौलिक जानकारी दी | लगे हाथ हमने उनसे कहा कि अगर आप व्यस्त नहीं हैं तो रविवार को घर आइये आपका अपना घर है | उन्होंने निमत्रंण स्वीकार कर लिया | हमारा बतियाना अंतहीन था | सांझ हो चुका था, पक्षी पेड़ो के झुरमुट में शांत, तितलियाँ भी गायब हो चुकी थी.....कुत्तों के झुण्ड भी आसपास नजर नहीं आ रहा था | परिसर में काम करनेवाले मजदुर भी अपने घर की ओर अग्रसर | इन्होंने कहा हमें भी अब चलाना चाहिए | अनुपमजी से विदा लेकर हम निकल पड़े घर की ओर ........मन में संतुष्टि आत्मा में गहरा सुकून | अनुपमजी की मानवीय गरिमा और सच्चेपन के साथ ........|
                                                                                                                                                    अर्पणा दीप्ति    
                                                                    
                                                                                                               
                                                                                                                    

                                                                                                                                
   
 
         
  


समय के लिए कुछ और तय नहीं

  स मय के लिए कुछ और तय नहीं सिवा इसके कि यह बीत जाता है लेकिन जो बीतता नहीं लौटता रहता है वह भी कोई समय ही था ज्यों तुम समय की तरह बीत चुके...