शनिवार, 31 मार्च 2018

आधुनिकता के आईने में कहानी



                                                                                                -अर्पणा दीप्ति 


श्री टी. वल्ली राधिका की कहानी संग्रह “पायोजी मैंने...” मूलतः तेलुगू कहानी  संग्रह है इसका हिन्दी अनुवाद आर.चन्द्रशेखर ने किया है | अनुदित हिन्दी संग्रह की भाषा बहुत ही सरल है | कपोल कल्पना से परे इसे दिन-प्रतिदिन की घटनाओं से लिया गया है | लेखिका स्वयं विज्ञान तथा टेक्नालजी की छात्रा तथा आईटी उद्यमी हैं | अत: इनकी कहानी के पात्र फैंटसी के ताम-झाम से पड़े बिना लाग-लपेट के निर्विकार दिखते हैं | संग्रह की कहानियों को पढने के बाद ऐसा प्रतीत होता है कि  ये हम सब की कहानी है | कहीं न कहीं हम भी इस कहानी के किरदार हैं | किसी कहानी का पात्र अमरुद का पेड़ है, तो किसी कहानी का पात्र दो दशक से काम करनेवाली घरेलू नौकरानी तो कहीं जीवन रूपी रथ को सहजता से खींचते हुए तथा सामंजस्य बिठाते हुए दम्पति है, तो कहीं मितव्यता का गुण सीखती ननद-भाभी | इस संग्रह में कुल मिलाकर बारह कहानी है | हर कहानी में स्त्री लैंस से भोगा तथा जीया गया समाज का वृहत्तर अंश है |

“सहधर्मचारिणी” गृहस्थ जीवन के ताने-बाने से बुनी हुई कहानी है तो “गुरुत्व” कहानी में यह दर्शाया गया है की किसी भी चीज पर विश्वास न करना, परिहास उड़ाना सामान्य सी बात है | किन्तु जब मनुष्य का सामना सच से होता है तो वह उस आलोक से आलोकित हो उठता है | यही इस कहानी की विशेषता है | चारदीवारी के पार खड़े अमरुद के पेड़ को कथा नायिका देखती है और नाराज होती हैं | एक दिन वह जब शाम को घर जल्दी लौटती हैं और सर उठाकर अमरूद के पेड़ को देखती हैं तो दंग रह जाती हैं-

“किस तरह वह कई जीव-जन्तुओं को आशियाना दे रहा.......सुरक्षा प्रदान कर रहा है......”(पृ.10)

 यानी कि किसी भी वस्तु को मात्र उसकी सतह से परखना उसके तलछट का सत्य नहीं है | उस सत्य से तभी परिचित हुआ जा सकता है जब उसे निकट से देखा-परखा जाए | यह कहानी गहरे सन्दर्भों में पर्यावरण के महत्ता को दर्शाती है |

“पायोजी मैंने....” की नायिका नित्या श्रेष्ठ-अश्रेष्ठ के मिथक को तोड़ते हुए उपनिवेशिक मानसिकता से मुक्त होने की दरकार रखती है | नित्या आत्मविश्वासी, तेजस्वी, सुलझे हुए विचारोंवाली निर्भीक और बेबाक स्त्री है | जाहिर है वह मात्र स्त्री देह नहीं मस्तिष्क भी है | नित्या ने हंसते हुए कहा-“मैं होती तो लाखों नहीं करोड़ों रूपये दिए जाएँ उस तरह डांस करने के लिए तैयार नहीं होती |” (पृ.74)
“मुक्ति” कहानी की भूमि कॉर्पोरेट जगत से निर्मित है | कहानी के दो मुख्य पात्र प्रिया और विनीत एक कम्पनी में प्रोजेक्ट मैनेजर हैं | यह कहानी यह दर्शाता है कि महत्वाकांक्षा के उड़ान को अतिस्वछंदता दे दी जाए तो उसका कोई अंतिम पड़ाव नहीं होता | सम्पूर्ण कहानी का मूलमंत्र एक वाक्य है- 

“चपलताओं और इच्छाओं का सांगत्य करने वाला मन.....इन्द्रियों का गुलाम बना मन.......क्रोध और लोभ का कारण बनता है |” (पृ.110)

अन्य कहानियाँ भी जैसे ‘सत्य के साथ’ ,’सीमाओं के बीच’ , ‘सत्य’ , ‘चयन’ , आदि अपनी सम्वेदनाओं के विस्तार और मूल्यों को अपनाने की ओर अग्रसर करती दिखाई देती हैं | कहानी के मुख्य छ: तत्व होते हैं-कथा-वस्तु, पात्र , चरित्र-चित्रण, भाषा-शैली, पूरक घटनाएँ, वार्ता और परिस्थितियां | इन छ: तत्त्वों का समावेश लेखिका ने अपनी कहानी में बखूबी किया है | इनकी हरेक कहानी एक संदेश लेकर खड़ी है जो आधुनिक परिवेश की विसंगतियों,विकृतियों विडम्बनओं एवं दरकते रिश्ते से जूझने के लिए जीवन का स्केच तैयार करती है | कहानी में कहीं भी भाषा का भदेशपना तथा किलिष्टता नहीं झलकता | जीवन में व्याप्त सहजता, मानवीय सम्वेदना, पारिवारिक सम्बन्धों की छावं, राग-द्वेष, खीझ-झुंझलाहट का का मनोवैज्ञानिक चित्रण इस कहानी संग्रह की विशेषता है | या यूँ कहिये मानवीय व्यवहार का मनोविज्ञान कहानी संग्रह में सर्वत्र विद्यमान है | भाषा की कड़ी भी जीवंतता तथा समग्रता से जुड़ी हुई है | श्रीवल्ली राधिका की कहानी भौतिक जगत से ली गई है | इनके स्त्रीपात्र कहीं भी स्त्रीपना से उठकर दैवी रूप धारण नहीं करती | आज के परिवेश में जब समाज दामिनी, गुड़िया,इमराना, भंवरीदेवी, निर्भया पर हुए अन्याय का बदल लेने के लिए सड़कों पर हैं वही श्रीवल्ली के स्त्रीपात्र बड़े ही साफगोई से अपने अस्तित्व को स्थापित करने में लगे हुए हैं | समग्र कहानी से जो निकलकर आया है वह यह कि समाज के साथ जो ‘स’ से जुड़ा हुआ है उसकी सकारात्मकता से हम क्यों अलग होते जा रहें हैं | हमारे पास अपार और अगाध है | कहानी संग्रह उम्दा तथा पठनीय है |   
   

मंगलवार, 27 मार्च 2018

नेह से जुड़ती कविता



                                                                                          अर्पणा दीप्ति 


जीवन के सारे रिश्ते नाते नेह ही तो है जिसे हम प्रेम कहते हैं | जहाँ प्रेम नहीं वहां कुछ भी नहीं | जैसे रचना के लिए सामाजिक सरोकार जरुरी है वैसे ही जीवन के लिए प्रेम जरुरी है | जिस दिन मानव जीवन से प्रेम को अलग कर दिया जाएगा उस दिन करूणा वेदना और सम्वेदना का संसार विलुप्त हो जाएगा | प्रेमविहीन व्यक्ति, समाज, व्यवस्था, अर्थ तथा भौतिक कंक्रीट के बढ़ते जंगल के समान है |प्रेम को भूषण या विभूषण पुरस्कार तो चाहिए नहीं, यह सही मायने में समर्पण, निष्ठा और त्याग ही तो चाहता है | यह एक सांस्कृतिक प्रक्रिया है जो विभिन्न परिस्थितियों में संचालित होता है | सही अर्थों में यह मनुष्य की शाश्वत भावना है जो स्त्री और पुरुष दोनों में विद्यमान है | इसे जायज या नाजायज ठहराना बस एक सामाजिक फंडा है |

      आज इच्छाओं के भीड़ में मनुष्य का संतुलन बिगड़ रहा है | वह प्रेमविहीन होता जा रहा है | छायावादोत्तर तथा वर्तमान कविताओं में सामाजिक विसंगतियां कविता का मुख्य सरोकार रही है | ऐसे में 2012 में प्रकाशित ॠषभ देव शर्मा का काव्य संग्रह “प्रेम बना रहे” अर्थ तन्त्र के कुचक्र से निकलकर प्रेम को स्थापित करती दीखती है | इस संग्रह में कुल मिलाकर छोटी तथा बड़ी काया वाली 68 कविताएँ हैं | जैसा की पुस्तक के आरम्भ में लिखा गया है कि यह कविता विवाह की 28 वीं वर्षगाँठ पर कवि न अपनी पत्नी को ससंकोच समर्पित किया है | जाहिर है की यह काव्य संग्रह दाम्पत्य जीवन के मधुर प्रेम को दर्शाती है | काव्य संग्रह में प्रेम जहाँ झील की तरह शांत है वहीं नदी की तरह कलकल छलछल भी करती है –

“तुम झील हो / जितनी शांत / उतनी ही गहरी |” (झील पृ .12)
तुम नहीं / आवेग में / छलछलाती उद्दाम | (नदी पृ. 13)

यहाँ कबीर के दोहे की तुलना इस काव्य संग्रह के एक कविता से की जा सकती है | कबीर ने कहा है  “पोथी पढि पढि जग मुआ पंडित भया न कोई ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय |” इस बात को दर्शाती एक लम्बी कविता (असमाप्त प्रेम कविता) है | इस कविता को पढ़कर ऐसा कहा जा सकता है कि कवि ने इसे समेटने में जल्दबाजी दिखाई | अगर इसको विस्तार दिया जाता तो यह अवश्य ही खंडकाव्य का रुप ले सकती थी |

“अक्सर हम दोनों / पास-पास रहते / पर चुप रहते / हमारी किताबें आपस में बात करती / और हम प्रेम मुदित होते |” (असमाप्त प्रेम कविता पृ.69)

स्त्री शृंगार प्रिय तथा आभूषण प्रिय होती है | शृंगारमना स्त्री के शृंगार को दर्शाती कविता है “वाली सोने की”

“कानों में इतराय कामिनी वाली सोने की “ (वाली सोने की पृ.1O8)

भाषिक जुगलबन्दी का अनूठा संगम भी देखने को मिलता है –


“मेहंदी बेंदी चुनरी कजरा गजरा फूलों की / किस पर यह गिर जाय दामिनी वाली सोने की |”
                                                                    (वही)
प्रेम का डगर कभी भी आसान नहीं था  न है प्रेम के रास्ते पर चलाना मानो दो धारी तलवार पर चलने जैसा है |

“कोई न साथ दे सका इस परम पन्थ में / तलवार धार पर सदा चलना हुआ |” (पृ.114)

जीविकोपार्जन लिए चाहे हम हो या आप सभी को अपनी माटी से बिछोह सहना पड़ता है | एक-एक बार तो मन:स्थितियां ऐसी हो जाती है कि “रहना नहीं देश बिराना है “ माटी के बिछोह तथा लोक संस्कृति  में रची बसी कविता भी इस संग्रह में है ‘यह गाँव खो गया’ ‘गोबर की छाप’ आदि लोक से पूरित रचनाएँ हैं |

“गाँव की सौंधी गंध तो / कभी की जाती रही / लेकिन / गोबर सनी हथेली की / इस छाप का क्या करूं / जिसका रंग पीठ पर / दिन-दिन गहराता जाता है |” (गोबर की छाप पृ.28)

संग्रह की सभी कविताएँ मिलन-बिछोह, आशा-निराशा तथा चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में भी प्रेम के लौ को जीवित रखती दिखाई देती है | सूफी संतों ने भी प्रेम को एक अबूझ पहेली माना है तो रहस्य कहाँ नहीं है ? क्षणभंगुर जीवन में अगर ईश्वर के बाद कोई शाश्वत सत्य है तो वह है प्रेम | शब्द तो बस एक माध्यम है | इससे भावनाओं का इतिश्री नहीं हो सकता | यह भी अकाट्य सत्य है की प्रेम में जहाँ उद्देश्य बीच में आता है वहाँ पर भावनाएं कठोर हो जाती है | प्रेम भी प्रेम नहीं रह जाता वह अपाहिज हो जाता है या उसकी अकाल हत्या हो जाती है | आज इच्छाओं के भीड़ में जहां कविताएँ असंतुलित हो रही हैं वहां निसंदेह ही यह काव्य संग्रह प्रेम रूपी वटवृक्ष के भाँति शीतलता प्रदान करती दिखाई देती है | अकविता, कुंठा और तनाव के दम घोंटू वातावरण से यह काव्यसंग्रह मुक्त है |       
   

मंगलवार, 20 मार्च 2018

सामाजिक सरोकार से जुड़ती गजलें



                                               अर्पणा दीप्ति 

हिन्दी साहित्य में अन्य भाषाओं से आई विधाओं में से गजल भी एक महत्वपूर्ण विधा है | उर्दू साहित्य में गजल जहाँ जुल्फ और हुस्न के दांव-पेंच में उलझी रही वहीं हिन्दी साहित्य में वर्तमान परिस्थितियों में ढलकर इसने बागी तेवर अपनाया | परिणाम स्वरूप हिन्दी गजलों में आक्रोश तथा विद्रोह अभिव्यक्ति का एक सशक्त माध्यम बनकर उभरा |
       जहाँ हिन्दी में गीत के लिए भाव अनिवार्य है और गीत के एक अंश से सम्पूर्ण भावों की अभिव्यक्ति सम्भव नहीं होती, वहीं गजल का हरेक शेर स्वतंत्र होने के साथ-साथ भाव तथा अभिव्यक्ति में भी परिपूर्ण होता है |
            हिन्दी साहित्य में गजल के सशक्त हस्ताक्षर रहे दुष्यंत कुमार के अलावा वर्तमान परिवेश में जिन गजलकारों ने अपनी सार्थक उपस्थिति दर्ज करवाई उनमें प्रकाश ‘सूना’, गौतम राजऋषि, प्रवीण प्रणव आदि प्रमुख हैं | गजल शब्द का शाब्दिक अर्थ है “प्रेमिका से वार्तालाप” | किन्तु आज के दौर में गजल अपने इस शाब्दिक खोल से बाहर निकलकर एक नई पहचान बना चुका है | अब यह प्रेमिका से बातचीत का माध्यम न होकर सामाजिक सरोकारों एवं मुद्दों से जुड़ गया है | प्रकाश सूना का गजल संग्रह “ख्यालों के पंख” में यह विशेषता स्पष्ट रूप से देखने को मिलता है | इस संग्रह की विशेषता यह है की इसकी भाषा सरल, बोधगम्य एवं ह्रदयस्पर्शी है |

“अहसान है मुझ पर जो तूने जिन्दगी बख्शी /
तेरा जो फैसला होगा मुझे मंजूर है या रब |” (पृ.12)

वहीं इन गजलों में वियोग, आशा-निराशा भूख-भय, बेकारी और तनाव आदि सभी समाजिक एवं व्यक्तिगत सरोकार भी देखने को मिलता है-

“चीख रहें हैं जाने कब से /फुटपाथों पर जो रहते हैं / सदियों से सहते आए हैं / फिर भी उनके होठ सिले हैं |”(पृ.33)
“कौन किसका इस शहर में /देखना है आदमी कितने बंटेंगे / रोटियों को तरसते इस जमी पें / लोग कहते हैं चाँद पर भी घर बनाएंगें |” (पृ.25)

लोक के बिना साहित्य की कोई भी विधा क्यों न हो वह निष्प्राण हीं तो है, मानो शरीर है किन्तु आत्मारहित | लोकविहीन साहित्य सम्प्रेषण रहित होता है एवं सुधी पाठकों में अपनी पैठ बनाने में असफल होता है | प्रकाश ‘सूना’ ग्रामीण अंचल में रचे-बसे साहित्यकार हैं | ’ख्यालों के पंख’ में संकलित गजलें लोक तथा संस्कृति से पूरित है | इस संकलन की गजल का हरेक शेर पीड़ा, घुटन, आक्रोश और परिवर्तन की आकांक्षा से ओत-प्रोत है |  इस संग्रह में समाहित हरेक गजल विशुद्ध भारतीय परिवेश की गजल दीखती है यथा-

“ऊँचे महलों को मत देखो ये तो ढोल सुहाने हैं|” (पृ.52)

कुछ गजलें ऐसी भी हैं जिन्हें पढ़ने-सुनने का आनंद वर्षा की शीतल फुहार में भींगने जैसा है-

“जब-जब प्यासी होगी धरती /फिर-फिर बादल आएंगें / गाँव-गाँव हरियाली से शीतल होगी जलधारा |” (पृ.52)

प्रकाश सूना के गजलों में जहां लोक तथा सामाजिक सरोकार है वहीं आध्यात्म भी देखने को मिलता है|

“कोई काशी में कहता है, कोई काबा में कहता है / मगर तू हर जगह, हर चीज में मस्तुर है या रब |” (पृ.12)

प्रकाशजी ने अपना उपनाम ‘सूना’ लगाया है | ‘सूना’ उपनाम की सार्थकता इनके गजलों में स्पष्ट दीखती है | गजलकार के जीवन में एक खालीपन, एक शुन्यता है जो संग्रह के गजलों के माध्यम से द्रष्टव्य है |
इस गजल संग्रह की विशेषता यह है की इसमें हरेक स्वाद की गजलों को समाने की कोशिश की गई है | कथ्य, भाव तथा शिल्प की दृष्टि से यह संकलन ताजगी से पूरित है संकलन की यही ताजगी इसकी लोकप्रियता का आधार है | इसे पढ़कर ऐसा प्रतीत होता है मानो तब और अब के दौर को आईने में समेटकर उसे रू-ब-रू दिखाया गया हो | हालाकि कि किसी भी क्षेत्र में परिपक्वता की कोई सीमा निर्धारित तो नहीं होती किन्तु और बेहतर करने की इच्छाशक्ति हमेशा बनी रहनी चाहिए | संग्रह की गजल पठनीय एव उम्दा है |  पाठकों तथा गजल प्रेमियों के बीच यह संकलन लोकप्रिय होगा |



          



शनिवार, 17 मार्च 2018

लोक तथा बिखरे मानवीय मूल्यों को सहेजती कविता



                                                     
                                                                                                    -अर्पणा दीप्ति 
 

कविता का सीधा सम्बन्ध ह्रदय से होता है | अगर कोई बात सामान्य रूप से न कहकर काव्य की भाषा में कही जाए तो उस बात का असर फलीभूत और स्थाई होता है | अपने कोमल शब्दों के द्वारा जहां कवि आनन्दमयी लोक की रचना करता है वहीं इन रचनाओं में लौकिक जीवन के सुख-दुःख, प्रेम-घृणा, करुणा के  भाव भी शब्दबद्ध होते हैं | ’सूँ साँ माणस गंध’ लोक जीवन में घटित होने वाली घटनाओं का उद्बोधन है | ऋषभ देव शर्मा की इस काव्य संग्रह को पढने से स्पष्ट पता चलता है कविता से गायब होते आदमी, पेड़, मौसम, गाँव, पर्व-त्यौहार, और देश की तलाश में जुटे कवि की अभिव्यक्ति ‘सूँ साँ माणस गंध’ है | 
"दुलहिनों ! मंगलाचरण गाओ नया वर्ष आया ..........आरती उतारो नए पाहुनों की |" (स्वागत नववर्ष पृ.19)
 भाषायी अस्मिता को बचाने की जद्दोजहद भी है –
“मेरे पिता ने बहुत बार मुझसे बात करनी चाही, मैं भाषाएँ सीखने में व्यस्त थी |”(भाषाहीन पृ.13)

जहां इन कविताओं में सभ्यता, संस्कृति, भाषा और देश को बचाने की संघर्ष का स्वर मुखर है वहीं विश्वास भी है जो परीलोक की कल्पना से परे है  | 

“इसके बाद परी मुस्कराई / मेरे पास आई / जादू की तलवार से धीरे-धीरे मेरे पंख रेत दिए /..................अब मैं फिर धरती पर रेंग रहा हूँ |”(परी की कहानी पृ.33 )

 26 जनवरी, संक्रातितथा प्रभात जैसी कविताएँ चुनौती देते हुए मुक्ति की आकांक्षा को स्वरबद्ध करते हुए संभावामी युगे-युगे की ओर ले जाती है |
       
           आज के दौर में बड़ी काया वाले काव्य ग्रन्थ पढ़ने का न तो लोगों के पास समय है और न ही धैर्य | समय के दबाव में रचनाकार की छोटी-छोटी सम्वेदनाएँ भी काव्य रूप धारण कर सकी | प्रस्तुत काव्य संग्रह में विचारों तथा सम्वेदनाओं को उद्वेलित करती लघु कविता भी प्रचुर मात्रा में हैं-पछतावा, कंगारू, और कब तक, अतिवादी की चुप्पी, एक चट्टान दूध की, झिल्ली, पेय, चवर्णा, मुलाकाती आदि इन कविताओं में कवि की बैचेनी सहज रूप से देखी जा सकती है |
इस काव्य संग्रह के हरेक कविता में भावनाओं तथा विचारों को आंदोलित करने की वह क्षमता है जो पाठकों को एक नई चेतना नया दृष्टिकोण प्रदान करता है-

 “स्वर्णकमलों की वाटिका में/ मेरा साम्राज्य है / तब मैं जीवित लाश था आज मैं शासक हूँ |” (कपाल स्फोट:भूख और कुर्सी पृ.81)
“भूख और प्यास के मुखौटे अब मुझे याद नहीं / मैंने शासन करना सीख लिया |” (वही पृ.81)

      कवि अपने कवि कर्म के प्रति बहुत ही सजग और सतर्क दीखता है वह समाजिक विद्रूपताओं और विषमताओं पर कटाक्ष करने से भी नहीं चूकता है इससे पहले की कोई हमें फिर पिंजरे में बंद करके चूहे की मौत दे और पूंछ पकड़कर नालियों के किनारे फ़ेंक दे हमें सजग होना ही पड़ेगा | पंगू अंधी तथा लाचार राजनीति पर भी कवि खुलकर कलम चलाने से नहीं चूकता है –

“केवल कुर्सी पगलाई है, बांकी सब कुछ ठीक-ठाक है / भोली-भाली जनता भरमाई बांकी सबकुछ ठीक-ठाक है |” (केवल कुर्सी पगलाई पृ.135)
“हर तरफ अंधे धृतराष्ट्र हैं /गान्धारियों ने / आँखों पर पट्टी बाँध रखी है |/.............भरे देश में क्या हुआ ?क्या न हुआ ?”

जहाँ कवि ने सामाजिक विसंगतियों पर खुलकर कलम चलाई है वहीं “जगदीश सुधाकर” कविता में  कवि का कोमल हृदय दोस्त की तलाश करते दिखाई देता है | दोस्त तो कहीं नहीं दिखता, लेकिन उसका तब्लक बत्तीस हर जगह मौजूद है | दोस्त भी तब्लक बत्तीस में हीं हैं-

“उस औघड़ यार ने /डायरी तो कभी रखी नहीं /फाइल या कापी भी नहीं / सब या तो जबान पर हैं या कागज के मुट्ठे में |” (जगदीश सुधाकर पृ.114)

    इस काव्य संग्रह अनोखी विशेषता यह दिखती है की कवि का आलोचक एक अनपढ़ किसान है जो शहरी पढ़े-लिखे लोगों की सो कॉल्ड (so called) सभ्य भदेशी काव्य भाषा को सिरे से खारिज करता है| सही मायने में यह किसान ब्रांडेड समालोचकों के लिए चुनौती ही तो है |

   “सूँ साँ माणस गंध” जीवन की समता-विषमता, आशा-आकांक्षा, सुख-दुःख, सहजता-जटिलता, भय-प्रेम,तनाव-संघर्ष एवं क्षीण होती जा रही मानवीय मूल्यों से पाठकों को रु-ब-रू करवाती है, वहीं दर्शन प्रकृति और सूक्ष्म सम्वेदनाएं भी कविता में सवर्त्र दिखाई देता है | कवि का बेबाकपना कविता को ह्रदयग्राही और मर्मस्पर्शी बनाता है | लोक जीवन से लिए गए बिम्ब, प्रतीक और उपमान  काव्य संग्रह को जीवन्तता प्रदान करती है तो भाषा और शिल्प दोनों का अद्भुत मेल इस काव्य संग्रह में हर जगह देखने को मिलता है | “सूँ साँ माणस गंध” लोक की भाषा है, समय की बैचेनी है, परिवर्तन की आकांक्षा है | कवि के सवाल न तो नींद से आँखे चुराते हैं और न दर्द से | कवि का संघर्ष लोक को बचाए रखने की जद्दोजहद है | निर्णय हमें करना है कविता को नहीं, कवि को भी नहीं | आने वाली पीढियों को हम विरासत में क्या देंगे लोक या लोक विहीन समाज ?
                         
               

शुक्रवार, 2 मार्च 2018

खुबसूरत चेहरे बिखरती जिन्दगी



स्त्री के बारे में कहा गया है की उसे 16 साल में पैदा होना चाहिए और 32 साल में मर जाना चाहिए ! पुरुषों के बारे में ऐसा क्यों नहीं कहा जाता ? 54 साल के सलमान अभी भी दर्शकों के हीरो हैं लेकिन 54 साल की श्रीदेवी शराब में डूबकर घुट-घुटकर मर जाती है | मीना कुमारी, मधुबाला,स्मिता पाटिल ने भी तो 40 से पहले संसार को अलविदा कह दिया | ग्लैमर की दुनिया का चकाचौंध यहाँ दस साल में स्त्री आउट डेटेड हो जाती है | लानत है ऐसी व्यवस्था पर तरस आता है समाज की सोच पर | मोना कपूर हों या सुनन्दा पुष्कर ये तो बस प्रतीक भर हैं पुरुष पसंद की देह चुनता है और स्त्री बदलता है बाद में वह फ़ेंक दी जाती है | श्रीदेवी के अभिनय की मैं प्रशंसक थी लेकिन विवाह के लिए चयन के फैसले से बिलकुल असहमत | 90 के दशक में मोना कपूर की निर्दोष दर्द भरी आँखें कैंसर से जूझती मां अस्पताल में अंतिम साँसे गिन रही थी | तनाव ग्रसित दोनों बच्चे अर्जुन और अन्शुला लगातार कुछ न कुछ चबाते रहते और भयंकर मोटे हो गये | बाद में ‘सलमान के फैन सुपरमैन’  लड़के ने वजन कम किया और शो बिजनेश से जुड़ गया |
           मायानगरी मुंबई की माया अजीब है यहाँ मानवता कम यथार्थ  की भौतिकता बड़ी है | नैतिक मूल्य कम और वस्तु मूल्य बड़े | मृत्यु तो नियति है परन्तु यूँ | बोनी कपूर की पहली पत्नी का दर्द  इस ग्लैमर में चीखता सा दिखता है | शिल्पा भी तो कुंद्रा की दुसरी पत्नी हैं | नाम तो कई हैं आमिर, ऋतिक, सैफ, धर्मेन्द्र, सलीमखान, रेखा के ग्लैमर को याद रखने वालों को याद होगा की उनकी शादी हुई और दो महीने बाद ही उनके पति ने दुपट्टा से लटकर फांसी लगा ली थी | दिव्या भारती नयी उम्र की उभरती नायिका शादी करते हीं छत से कूदकर मर गईं | गुलशन कुमार को सरेआम दौड़ा-दौड़ाकर मार दिया गया | परवीन बाबी पुरी तरह विकलांग अकेलेपन को झेलती हुई मर गई , तीन दिन बाद लाश सड़ने के बाद दरवाजा तोड़ा गया | पूनम ढिल्लन को बीस साल तक यातनाएं मिली बाद में शादी त्यागकर वापस आयीं | मन्दाकिनी नामकी मुस्लिम अदाकारा जासमीन न जाने कहाँ गायब हो गई ? किम काटकर लिस्ट लम्बी है ........ममता कुलकर्णी की भयंकर जीवन गाथा किसे पता ? दर्द है उन सबका जो नेपथ्य में हैं जिनके पास ग्लैमर की सीढ़ी नहीं रहने से एक ठोकर और  एकाकीपन रह गया है | ऐसे में केवल कुछ ऐसे लोग रह जाते हैं जो दोनों तरफ कुछ रोशनी कुछ सिद्धांत कुछ नियम रख पाते हैं|

यही सिनेमा है जिसे देखने के लिए हाल की सब बत्तियाँ बंद करनी पड़ती है |  

अर्पणा दीप्ति 
   

      


गुरुवार, 1 मार्च 2018

बड़े शौक से सुन रहा था जमाना तुम तो सो गई दास्ताँ कहते-कहते

       

अपने शानदार अभिनय से सिनेप्रेमियों के दिलों पर राज करनेवाली महानायिका श्रीदेवी अब हमारे बीच नहीं रहीं 24 फरवरी के रात उनका दुबई में निधन हो गया | श्रीदेवी का जन्म 13 अगस्त 1963 को तमिलनाडु में हुआ अपने करियर की शुरुआत महज चार साल की उम्र में उन्होंने तमिल फ़िल्म ‘कंधन करुनाई’ से बतौर बाल कलाकार के रूप में किया | बचपन में इन्हें अम्मा अयप्पन अयंगर के नाम से जाना जाता था | पिछले साल ही तो इन्होने फिल्मों में 50 साल पुरे किए | एक लम्बी शानदार यात्रा का अचानक असमय दुखद अंत !  सही मायने में वह सम्पूर्ण अभिनेत्री थीं | अगर दर्शकों को याद होगा श्रीदेवी की फ़िल्म सदमा जहाँ क्लाइमेक्स में कमल हसन बेहतरीन थे वहीं अभिनय में श्रीदेवी लाजवाब थीं | यह तमिल फ़िल्म ‘मुन्दरम पिरई’ की रीमेक थी |यादाशत खो चुकी युवती के बच्ची की तरह व्यवहार करने का एक जटिल अभिनय श्रीदेवी ने बखूबी निभाया | यह श्रीदेवी की सर्वश्रेष्ठ फिल्मों में से एक है | जिन्होंने फ़िल्म देखी है उन्हें ‘हरिप्रसाद’ वाला सीन याद होगा |   
  ग्लैमर के पैमाने पर उनके खाते में तोहफा,हिम्मतवाला,मकसद, मवाली, मास्टरजी, मिस्टर इण्डिया, चाँदनी, चालबाज, लम्हे, खुदा गवाह, नगीना, निगाहें तक लम्बी सफल फिल्मों का लिस्ट है |
‘मिस्टर इण्डिया’ में चार्ली चैपलिन की नक़ल में श्रीदेवी ने कामेडी पर अच्छी पकड़ दिखाई जो बाद में चालबाज की दोहरी भूमिका में और मजबूती से सामने आया | अगर यह कहा जाय की वह हिन्दी सिनेमा की आख़िरी महारानी थीं तो शायद गलत नहीं होगा | भले ही माधुरी दीक्षित ने नम्बर वन का खिताब उनसे झटक लिया था | लेकिन श्रीदेवी के रुतबे को उनसे कोई आंच नहीं आया | बाद में बहुत सारी प्रतिभावान अभिनेत्रियाँ आईं लेकिन श्रीदेवी के जैसा जादुई असर छोड़ने में नाकामयाब रही |
ऐसा कहा जाता है कि श्रीदेवी कुल मिलाकर 29 प्लास्टिक तथा कास्मेटिक सर्जरी करवा चुकी थीं इनमें से एक सर्जरी में गड़बड़ी हो गई थी | साउथ कैलफोर्निया के उनके डाक्टर ने उन्हें कई डायट पिल्स लेने की सलाह दी थी और वह उन्हें ले भी रही थीं, कई एंटी एजिंग दवाइयाँ भी ले रही थीं | इनसे खून गाढ़ा होने की शिकायत होती है | लीपोसकसन, बोटोक्स, प्लास्टिक सर्जरी लिप स्किन सर्जरी ये सब तो है हीं | इनके दर्द से बचने के लिए एनाल्जैसिक और अन्य सावधानियां धूप से बचना, हवा से बचना, एक ही तरह के वातावरण में रहना आदि | याद करें माइकल जैक्सन भी ऐसी हीं मिलती जुलती यातना सहकर मरे थे | रंग गोरा कराने के चक्कर में पहला सेलिब्रेटी जो हर समय दर्दनाशक दवाइयां लेता रहता था | मुस्कुराते चेहरों को भी बुढा होने का डर कितना भयंकर !
अपनी बड़ी बेटी जान्हवी की फिल्मी पारी की शुरुआत और उसकी पहली फ़िल्म को परदे पर देखने के लिए उत्साहित थीं लेकिन नियति ने उन्ही के कहानी पर परदा गिरा दिया |


अलविदा चांदनी 

अर्पणा दीप्ति  

शुक्रवार, 23 फ़रवरी 2018

अद्भुत अनोखा अकल्पनीय बेमिसाल “लेखकों की दुनिया”








2018 में प्रकाशित ‘लेखकों की दुनिया’ हिन्दी साहित्य का  एक बेशकीमती किताब है | यह किताब आपको दुनिया के उन तमाम लेखकों का दर्शन करवाता है जिनसे या तो आप अनभिज्ञ हैं या उनमें से कुछेक की जानकारी आपके पास है | 250 पृष्ठ की किताबवाले नयी दिल्ली से प्रकाशित यह पुस्तक दुनिया के तमाम लेखकों की झलकियों को सहेजे हुए है | हाँ सभी कालखंड के सभी लेखकों की जानकारी तो उपलब्ध नहीं है लेकिन तमाम प्रमुख लेखकों की जानकारी इसमें समाहित है | क्या आप सोच सकते हैं इन लेखकों को अलग से एक-एक कर पढ़ना कितना मुश्किल है ? 250 पृष्ठों में इनका संशोधन कर एकत्रित करना कितना कठिन है लेकिन इन सबको एक जगह एकत्र कर अनोखा और अद्भुत कार्य किया है लेखक सूरज प्रकाशजी ने |

कैसे होते हैं लेखक ? कैसी होती है उनकी अजीबो-गरीब दुनिया ? उनका दिनचर्या, उनका दुःख तकलीफ, जिन्हें वह अपने अन्दर समाहित कर दुनिया को अपना सर्वोत्तम देकर जाते हैं | हर लेखक की शैली अलग-अलग |

      अब बात करते हैं भाग एक 'लेखकों की दुनिया अजब-गजब' की | अजीबो-गरीब तरीके से लिखने वाले कुछ लेखक की अर्नेस्ट हेमिंग्वे, चार्ल्स डिकेंस, वर्जीनिया वुल्फ, आचार्य नगेन्द्र आदि खड़े होकर लिखते थे | एडमंड रोस्ता अपने बाथटब में बैठकर कविता लिखते थे तो दिविक रमेश शहतूत के पेड़ पर बैठकर कविता लिखते थे | सर वाल्टर स्काट घोड़े के पीठ पर सवार होकर कविता रचते थे | चेखव को घड़ी सामने रखकर लिखने की आदत थी तो अमेरीकी लेखक जान शीवर अंडरवियर में कहानी लिखते थे क्योंकि उनके पास एक ही सुट हुआ करती थी | रांगेय राघव पैर में रस्सी बांधकर पंखा चलाते थे और खूब सिगरेट पीते हुए लिखा करते थे | अमृता प्रीतम, बालजाक, तालस्ताय, दोस्तोवस्की रात में लिखते थे |

       घोस्ट राइटिंग करने वाले लेखक दुनिया के हर भाषा में आपको मिल जायेंगे जिन्होंने नाम बदलकर लेखन किया है | इनमें फर्नादो पेसाओ आजीवन 75 अलग-अलग नामों से लिखा तो ओ हेनरी ने 14 अलग नामो से लिखा | तंगी के दिनों में जार्ज बर्नाड शा ने भी नाम बदलकर लिखा | भारतीय लेखको में अमृतलाल नागर, राही मासूम रजा आदि शुरुआती दिनों में रवीन्द्र नाथ ठाकुर ने भी नाम बदलकर कविता लिखा |
                                  दुनिया भर में ऐसे लेखकों की भी कमी नहीं जिन्होंने अलग-अलग कारणों से आत्महत्या की | भारत में यह आंकड़ा विश्व साहित्य के अपेक्षा कम है | यहाँ केवल छ: प्रसिद्ध साहित्यकारों के बारे में बताया जाता है |
        कहते हैं सरस्वती और लक्ष्मी दोनों  का निवास एक साथ नहीं होता | यह भारतीय लेखकों के विषय में बिल्कुल सही है | लेकिन दुनिया के अन्य भाषा के लेखक भी इससे अछूते नहीं रहे | दाने-दाने  को उन्हें भी मोहताज होना पड़ा | भारतीय लेखकों में अन्नाभाऊ , गुरदयाल सिंह, सत्यार्थीजी, प्रेमचन्द मधुसुदन दत्त, मुक्तिबोध, राहुल सांस्कृत्यायन आदि | विदेशी लेखकों में गोर्की,एडगर एलन पो, ओ हेनरी, चार्ल्स डिकेंस आदि | आर्थिक तंगी में जीते हुए भी इन्होंने दुनिया को अपना सर्वश्रेष्ठ दिया |  
       विश्व साहित्य तथा हिन्दी साहित्य में भी ऐसे लेखकों की संख्या अधिक रही जो पारिवारिक और सामाजिक दबाव को झेल नहीं पाए तथा विक्षिप्त हो गए | कईयों को तो पागलखाने में भर्ती करवाया गया तो कुछ स्वस्थ होकर वापस  आये, तो कुछेक ने अवसाद में आत्महत्या कर ली | कुछ बायोपोलर डिसआर्डर का शिकार हो गए | जिस कारण यह साहित्य को जितना दे सकते थे नहीं दे पाए | इनमें अर्नेस्ट हेमिंग्वे, एडगर एलन पो, लियो तालस्ताय, अन्नाभाऊ साठे देवेन्द्र सत्यार्थी, राहुल सांस्कृत्यायन लिस्ट तो काफी लम्बी है |

बहुत कम उम्र पानेवाले लेखक भी हुए जिन्होंने कम समय में खूब लिखा और विश्व साहित्य को समृद्ध किया | ऐसे भी लेखक हुए जिन्होंने सौ साल की उम्र को पार किया और उसके बाद भी पढ़ने लिखने में लगे रहे | कुछ ऐसे बाल लेखक  भी हुए जिन्होंने 11 या 12 वर्ष के कम उम्र में लेखन कर विश्व साहित्य में काफी नाम कमाया | इनमें ज्योति और सुरेश गुप्ता जुड़वा भाई का नाम उल्लेखनीय है | जब वे ग्यारह वर्ष के थे 700 पृष्ठ की फेंटसी लिखी भारत में यह पुस्तक बेस्ट सेलर रही |

                     इनके अलावे ऐसे भी लेखक हुए जिन्होंने लेखन कर्म को अपना साधना समझा | किसी भी हालात में अपनी लेखनी को अनवरत ज़िंदा रखा | पुस्तक में दिए गए सभी लेखकों का नाम लेना तो सम्भव नहीं है कुछ लेखकों के नाम है जिनमे अज्ञेय ब्रिटिश सेना में रहे, कबीर जुलाहे थे, कमलेश्वर रात की पाली में चौकीदारी करते थे | जयशंकर प्रसाद तम्बाकू का खानदानी काम करते थे | तसलीमा नसरीन एम.बी.बी.एस. डाक्टर हैं | गोर्की ने बचपन में बोरा उठाकर कचरा तक बीना, जान स्टन बैक टूअर गाइड थे | जैम्स जायस गाते थे | बेबी हालदार झाडु-पोछा करनेवाली घरेलू नौकरानी थी | मराठी लेखक लक्ष्मण राव दिल्ली में हिन्दी भवन के बाहर फुटपाथ पर चाय बेचते थे | लक्ष्मण राव गायकवाड का तो जन्म ही चोर-उच्चकों की बिरादरी में हुई थी |

        विश्व साहित्य में ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं जहाँ लेखको ने एक से अधिक भाषाओं में रचना की है | खासतौर से भारत में अधिकाधिक संख्या में ऐसे लेखक हुए जिन्होंने एक से अधिक भाषाओं में रचना की | बाबा नागार्जुन ने मैथिली, हिन्दी और संस्कृत में रचनाएं की तो राजकमल चौधरी मैथिली और हिन्दी दोनों भाषाओं के रचनाकार थे | अमृता प्रीतम और गुरुदयाल सिंह हिन्दी और पंजाबी दोनों भाषाओं में रचनाएँ की | राहुल सांस्कृत्यायन कई भाषाओं में लिखते और अनुवाद भी करते रहे |
                  कुछ ऐसे भी लेखक हुए जीते जी जिनसे सफलता मुंह फेरे रही | मरने के बाद वे साहित्य जगत के सरताज बने | इनमें सर्वप्रथम विश्व साहित्य में प्लेटो का नाम आता है | “रिपब्लिक” को उनके मरने के बाद ही ख्याति मिली | ऐन फ्रेंक, जान केनेडी, हैनरी डेविड, एडिथ होल्डन एडगर पो, फर्नादों पेसाओ आदि | भारतीय साहित्य में मुक्तिबोध, भुवनेश्वर तथा राजकमल चौधरी को जीते जी बहुत संघर्ष करना पड़ा मृत्यु के बाद इनके लेखन को ख्याति मिली |

  इसके अलावा खतरनाक और हत्यारे लेखक भी हुए तो कुछ आत्महन्ता भी | तो कुछ ऐसे लेखक भी हुए जिन्होंने अपने जीवन में सिर्फ लिखा और लिखा |
      वहीं विश्व साहित्य के इतिहास में ऐसे भी लेखक हुए जिन्होंने एक ही किताब लिखकर अपनी अलग पहचान बनाई हालाकि बाद में ये विस्तृत लेखन भी करते रहे लेकिन प्रसिद्धि इन्हें अपनी इकलौती किताब के बदौलत ही मिली | इनमें अरुंधती राय का ‘गाड आफ स्माल थिंग्स’ , अन्ना सेवेल का ‘ब्लैक ब्यूटी’, आस्कर वाइल्ड का ‘द पिक्चर आफ डोरियाँ ग्रे’, मीना लायॅ का ‘इन्सेल’ आदि प्रमुख है |

अब बात भाग दो “लेखकों की दुनिया और दुनिया के लेखक” की
इस खंड में दुनिया भर के लेखकों की जानकारी भाग एक के अपेक्षा अधिक विस्तार से दी गयी है | दरभंगा के तरौनी में जन्मे बाबा नागार्जुन यायावर तथा फक्कड़ प्रवृति के लेखक थे | अपने लेखन में वह अपने पैनी तथा धारदार व्यंग के लिए जाने जाते थे | ब्रिटेन की महारानी के भारत आगमन पर बाबा ने देश का अपमान समझते हुए तीखी कविता लिखी –“आओ रानी हम ढोयेंगे पालकी/ यही हुई है राय जवाहर लाल की |” इमरजेंसी के दौरान इन्होंने इंदिरागांधी को बाघिन तक कह डाला | ऐसा कहा जाता है की इंदिराजी बाबा की कविताओं को  बहुत पसंद करती थीं |

   इस्मत आपा उर्दू की पहली बोल्ड लेखिका थीं | स्त्रियों के सवाल के साथ-साथ उन्होंने सामाजिक कुरीतियों पर भी जमकर कलम चलाई | 1941 में इनके द्वारा लिखी गई कहानी ‘लिहाफ’ ने ने भारतीय साहित्य जगत में खलबली मचा दी | कहानी में इन्होंने समलैंगिकता के मुद्दे को उठाया | उन पर अश्लीलता परोसने का आरोप लगा, मुकदमा चलाया गया | इस कहानी को हिन्दुस्तानी साहित्य में लेस्बियन प्यार की पहली कहानी माना जाता है |

  ज्याँ पाल सार्त्र की लेखन शैली बड़ी ही अजीब थी जब वे हाथ से लिखते हुए थक जाते तो वे पैर से लिखना शुरू कर देते | इन्होंने गम्भीर लेखन के अलावा कई फिल्मे भी लिखी 1964 में इन्होंने ये कहते हुए पुरस्कार लेने से मना कर दिया कि लेखक को खुद को संस्थान नहीं बनने देना चाहिए | 1980 में फेफड़े के ट्यूमर के कारण इनकी मृत्यु हुई | वहीं सिमोन अपने आपको दार्शनिक नहीं मानती थीं लेकिन उन्होंने उपन्यास, जीवनी, आत्मकथा, राजनैतिक लेखन के अलावा स्त्री विमर्श आदि पर विपुल लेखन किया | 1949 में इनके द्वारा औरतों के पक्ष में लिखी गई ‘The Second Sex’ एक ऐतिहासिक दस्तावेज है | बाद में प्रभा खेतान ने इसका हिन्दी अनुवाद किया यह पुस्तक हिन्दी साहित्य में “स्त्री उपेक्षिता" के नाम से उपलब्ध है | सार्त्र और सिमोन बिना विवाह किये आजीवन एक दुसरे के साथ रहे और मरने के बाद एक ही जगह दफनाए भी गए|  
  
वर्जीनिया अंगरेजी की प्रमुख लेखिका मानी जाती हैं लन्दन के साहित्य जगत में इनका काफी नाम है | 1900 में उन्होंने लिखना शुरू किया | इनकी रचनाओं का 50 से अधिक भाषा में अनुवाद हुआ | वर्जीनिया ने 1912 में लियोनार्ड वुल्फ से शादी की वीटा नामक एक महिला से भी इनके समलैंगिक सम्बन्ध रहे | 1941 में आर्थिक तंगियो से परेशान होकर 59 वर्ष की आयु में गले में भारी पत्थर बांधकर  नदी में डूबकर इन्होंने आत्महत्या कर ली | वुल्फ का शव तीन सप्ताह बाद ही मिल पाया था |
        कहानियों के साथ अनोखा प्रयोग करनेवाले रमेश बक्षी का जीवन भी विवादों से घिरा रहा | शराब तथा कई महिलाओं से प्रेम प्रसंग ने इनके कैरियर को बार-बार ध्वस्त किया | घर की तलाश में वह जीवन भर भटकते रहे | लेकिन घर बनाए रखने की कला उन्हें आती ही नहीं थी | उनके चिता को अग्नि उनके बचपन के मित्र प्रभाश जोशी ने दिया |

    बहुभाषी प्रतिभा के धनी माइकल मधुसूदन दत्त को युवावस्था में शराब की लत लग गई | मात्र 48 साल की आयु में ही उनकी मृत्यु हो गयी | अभावों में जिन्दगी गुजारने वाले मुक्तिबोध का रुझान वामपंथी विचारधारा की ओर था | “कामरेड तुम्हारी पालटिक्स क्या है ?” उनका सर्वाधिक प्रिय वाक्य था और “अँधेरे” में उनकी सर्वाधिक चर्चित कविता | श्रीलाल शुक्ल अपने धारदार व्यंगलेखन के लिए प्रसिद्ध हैं | 1968 में इनके द्वारा लिखा गया ‘रागदरबारी’ का पन्द्रह भारतीय भाषाओं में अनुवाद हुआ तथा इसका अंगरेजी में भी अनुवाद हुआ |
   
    कितना लिखा जाए ‘लेखकों की दुनिया’ के विषय में कलम है कि थमने का नाम ही नहीं ले रहा है | किस्सा दर किस्सा किन किस्सों का वर्णन किया जाय किनको छोड़ा जाए सब एक से बढ़कर एक लाजवाब | सारे किस्से रोचक | विजय दान देथा की कहानी ‘दुविधा’ पर अमोलपालेकर ने पहेली फ़िल्म बनाई | फ़िल्म की प्रीमियर के लिए विजय दान देथा को मुम्बई बुलाया गया | वह अपने छोटे बेटे कैलाश के साथ मुंबई आए | जब लौटकर जोधपुर वापस आए तो बड़ा बेटा महेंद्र ने पूछा कैसा रहा प्रीमियर ? छोटा बेटा कैलाश ने जबाव दिया बहुत अच्छा | सब आये थे फ़िल्म की हिरोइन रानी मुखर्जी भी आई उसने तो गजब कर दिया जी सा को किस कर दिया | महेंद्र ने खुश होकर कहा सच जी सा ! विजयदान देथा ने भोलेपन से कहा लेकिन एक कमी रह गई नामुराद मफलर बीच में आ गया |

     जैसा की लेखक स्वयं प्रस्तावना में कहते हैं कि दुनिया के हर लेखक अपने शब्दों के जरिए हमारे बीच जिन्दा हैं | वैसे भी लेखक कभी मरते नहीं अपने शब्दों के जरिए देश काल और भाषा की सारी सीमा लांघता हुआ हमेशा ज़िंदा रहता है |

       इसमें कोई दो राय नहीं कि ‘लेखकों की दुनिया’ हिन्दी साहित्य में ही नहीं बल्कि विश्व साहित्य में पहली अनोखी नायाब पुस्तक है | लेखक का एक बहुत ही इमानदार प्रयास का फल है | इस किताब की विशेषता यह है की आप जितनी बार इसे पढेंगे यह आपको नया तथा रोचक ही लगेगा | हिन्दी साहित्य को कालजयी रचना देने के लिए सूरज प्रकाशजी को साधुवाद | लेखक के कलम से मोती रूपी शब्द अनवरत झरता रहे और हिन्दी साहित्य समृद्ध होता रहे |
                                                   

                         अर्पणा दीप्ती 

                         समीक्षित कृति –लेखकों की दुनिया
                         लेखक-सूरज प्रकाश
                         प्रथम संस्करण- 2018
                         पृष्ठ संख्या-250
                         मूल्य-400/-
                         प्रकाशक-किताबवाले, 22/4735
                         प्रकाश दीप बिल्डिंग अंसारी रोड
                         दरियागंज नई दिल्ली-110002 
  

अगर कोई सुधी पाठक इस पुस्तक को पढ़ना चाहते हैं तो लेखक के ईमेल पर सम्पर्क कर इस पुस्तक को प्राप्त किया जा सकता है | kathaakar@gmail.com             


     

समय के लिए कुछ और तय नहीं

  स मय के लिए कुछ और तय नहीं सिवा इसके कि यह बीत जाता है लेकिन जो बीतता नहीं लौटता रहता है वह भी कोई समय ही था ज्यों तुम समय की तरह बीत चुके...